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समुद्र में पत्थर का पुल कैसे बनाया गया। एक वैज्ञानिक सोच

लंका के राजदरबार में सन्नाटा था। रावण के सबसे चतु र गुप्तचर, शुक और सारण, हाँफते हुए पहुँचे थे*। वे अभी-अभी समुद्र तट से ‘Aerial Surveillance’ (एरियल सर्विलांस – हवाई निगरानी) करके लौटे थे। उन्होंने जो देखा, वह उनकी कल्पना से परे था।

वे रावण के सामने झुके और बोले— “महाराज! वे वानर पत्थरों से समुद्र बाँधने की योजना बना रहे हैं।” रावण जोर से हंसा। उसकी वैज्ञानिक दृष्टि में यह ‘Physically Impossible’ (फिजिकली इम्पॉसिबल – भौतिक रूप से असंभव) था। लेकिन अहंकार में डूबा रावण यह भूल गया था कि शत्रु खेमे में ‘Material Science’ (मैटेरियल साइंस – पदार्थ विज्ञान) के दो महान दिग्गज ‘नल’ और ‘नील’ मौजूद थे।

 रावण अट्टहास कार्य हुए बोला , “पत्थर कभी तैर नहीं सकते! यह भौतिक विज्ञान (Physics) के विरुद्ध है।” लेकिन उसे आभास नहीं था कि रामेश्वरम के तट पर नल और नील—प्रकृति के नियमों को ‘री-राइट’ (फिर से लिख) रहे थे।

 

रामायण कि चौपाई है –

कपि कौतुक करि गिरि उठवहिं। आनहिं नल नीलहिं देवहिं॥

 

अर्थ: वानर खेल-खेल में (कौतुक करि) बड़े-बड़े पहाड़ों को उठा लेते और उन्हें लाकर नल और नील को देते। आगे का काम फिर उन्हें संभालना होता था।

 

नल-नील ने पूरे क्षेत्र को तीन कार्य क्षेत्रों (Work Zones) में विभाजित किया था। महेंद्र पर्वत और आसपास के पहाड़ों पर हनुमान, अंगद और द्विविद जैसे शक्तिशाली वानर बड़ी चट्टानें तोड़ रहे थे।

 पत्थरों को ढोने के लिए लाखों वानरों की एक ‘ह्यूमन चेन’ (Human Chain – मानव श्रृंखला) बनाई गई थी।

 समुद्र तट पर नल और नील पत्थरों की कोडिंग (राम नाम लिखना) और उनकी गुणवत्ता (Quality Check) की जाँच कर रहे थे।

 

नल और नील के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—हजारों वानरों द्वारा लाए गए पत्थरों को समुद्र के बीचों-बीच एक सही दिशा में जोड़ना। नल और नील ने हर पत्थर के उस हिस्से पर ‘राम’ नाम अंकित करवाया जिसे दूसरे पत्थर से जोड़ना था। यह आज के ‘Barcode’ (बारकोड) या ‘Alignment Marker’ (अलाइनमेंट मार्कर – दिशा सूचक चिन्ह) की तरह था।

 

 ‘राम’ नाम लिखा होने से वानरों को पता चल जाता था कि पत्थर का ‘Front Face’ (फ्रंट फेस – सामने का हिस्सा) किस ओर रखना है। इससे लहरों के बीच भी पुल की सीध (Alignment) नहीं बिगड़ी। पत्थरों को इस तरह रखा गया कि उनके गुरुत्वाकर्षण केंद्र (Center of Gravity) एक रेखा में रहें।पत्थरों पर ‘राम’ नाम केवल आस्था का प्रतीक नहीं था, बल्कि वह एक ‘यूनिक आईडी’ (Unique ID) की तरह काम करता था।

नल-नील ने पत्थरों को जोड़ों के हिसाब से चिन्हित किया था। पत्थरों पर लिखे अक्षरों की सीध से वानरों को पता चलता था कि कौन सा सिरा (Side) किस पत्थर में फिट होगा। यदि कोई पत्थर गलत तरीके से रखा जाता, तो वह ‘अलाइनमेंट’ (Alignment – सीध) से बाहर हो जाता, जिसे नल तुरंत पहचान लेते थे।

 

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में उनकी इस ‘विशेषज्ञता’ को चौपाई में अमर कर दिया:

 

“नल नील कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥

 तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥”

 

चौपई का अर्थ समझें -नील को ऋषियों का ‘आशीष’ (आशीर्वाद) प्राप्त था। वैज्ञानिक दृष्टि से यह उनके ‘Ancestral Knowledge’ (एंसेस्ट्रल नॉलेज – पूर्वजों का ज्ञान) और ‘Structural Engineering’ (स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग – ढांचागत अभियांत्रिकी) की क्षमता को दर्शाता है। उनके स्पर्श (परस) में वह तकनीक थी जो पत्थरों की ‘Specific Gravity’ (स्पेसिफिक ग्रेविटी – विशिष्ट घनत्व) को समझकर उन्हें पानी पर संतुलित कर देती थी।

इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि समुद्र तट पर कभी पत्थरों का ‘जाम’ नहीं लगा और न ही नल-नील कभी खाली बैठे।

 जितनी तेजी से नल-नील पत्थरों को समुद्र में स्थापित (Install) कर रहे थे, उतनी ही तेजी से पीछे से पत्थरों की अगली खेप पहुँच रही थी।

 

अब यहां से शुरू होता है

बैथीमेट्रिक सर्वे और टोपोग्राफी (गहराई और धरातल का विज्ञान) । पुल बनाने से पहले नल-नील ने समुद्र के भीतर का नक्शा तैयार किया।

 

Bathymetric Survey (बैथीमेट्रिक सर्वे – जल के भीतर की गहराई का मापन): नल-नील ने ‘Acoustic Sounding’ (अकूस्टिक साउंडिंग – ध्वनि तरंगों) और विशेष प्रकार के ‘शंकु’ (Cones) का प्रयोग किया। उन्होंने भारी धातुओं को लंबी डोरियों से बाँधकर समुद्र के तल (Sea Bed) की गहराई और वहां की मिट्टी की प्रकृति जाँची। आज इसे ‘Sonar Mapping’ (सोनार मैपिंग) का आदिम रूप कहा जा सकता है।

 

 * Topographical Mapping (टोपोग्राफिकल मैपिंग): उन्होंने पाया कि रामेश्वरम से मन्नार के बीच ‘कोरल रीफ’ और ‘चूना पत्थर’ की एक उथली पट्टी पहले से मौजूद है। उन्होंने इसी प्राकृतिक ‘Submerged Ridge’ (जलमग्न पर्वत श्रेणी) को आधार बनाकर सेतु का ‘अलाइनमेंट’ तय किया। उन्होंने इसी को ‘Foundation’ (फाउंडेशन – नींव) बनाया। आज नासा (NASA) के उपग्रह भी इसी पट्टी की पुष्टि करते हैं।

 

 

 मैकेनिकल इंटरलॉकिंग और मरीन कंक्रीट (समुद्री सीमेंट) का प्रयोग पुल में शुरू  हुआ। पत्थरों को केवल रखा नहीं गया, उन्हें ‘लॉक’ किया गया। Tenon and Mortise (टेनन एंड मोर्टिस – चूल और छेद का जोड़) तकनीक के जरिए पत्थरों को विशेष ‘खांचों’ (Grooves) में तराशा गया। एक पत्थर का उभरा हिस्सा दूसरे के छेद में फिट हो जाता था।

 

चूंकि समुद्र में लहरें थी तो  Chemical Binding (केमिकल बाइंडिंग – रासायनिक जुड़ाव) बहुत जरूरी था। नल नील ने चूने (Lime) और प्राकृतिक गोंद (Natural Polymers) का एक ‘पेस्ट’ बनाया। यह मिश्रण खारे पानी के संपर्क में आते ही ‘Marine Con

crete’ (मरीन कंक्रीट) की तरह पत्थर बन जाता था।

समुद्र की लहरें किसी भी दीवार को तोड़ सकती हैं। नल-नील ने यहाँ ‘Breakwater’ (ब्रेकवाटर – लहर रोधक) तकनीक का उपयोग किया।पुल के किनारों को ढलानदार (Sloped) बनाया गया। जब लहरें इनसे टकराती थीं, तो उनकी ‘Kinetic Energy’ (काइनेटिक एनर्जी – गतिज ऊर्जा) नष्ट हो जाती थी और पुल पर दबाव नहीं पड़ता था।

 

समुद्र के नीचे रेत का बहाव लगातार बदलता रहता है, जो किसी भी नींव को हिला सकता है। नल-नील ने पुल को पूरी तरह ‘कठोर’ (Rigid) बनाने के बजाय उसे ‘लचीला’ (Flexible) रखा। पुल के नीचे रेत की ऐसी परतें बिछाई गईं जो ‘शॉक एब्जॉर्बर’ का काम करती थीं।

नतीजा: जब भी समुद्री भूकंप या सुनामी जैसी लहरें आईं, पुल ने उस दबाव को सोख लिया और टूटा नहीं। इसे आज ‘Base Isolation Technique’ कहा जाता है, जिसका उपयोग गगनचुंबी इमारतों को भूकंप से बचाने में होता है।

 

समुद्र का नमक लोहे और साधारण पत्थर को गला देता है। नल और नील ने ऐसे पत्थरों (Limestone/Pumice) का चयन किया जिनमें सिलिका की मात्रा अधिक थी। सिलिका नमक के साथ प्रतिक्रिया करके और कठोर हो जाता है। उन्होंने निर्माण के दौरान समुद्री वनस्पतियों के अर्क का उपयोग किया, जो पत्थरों के रोम-छिद्रों (Pores) को सील कर देते थे, जिससे नमक अंदर तक नहीं पहुँच पाता था।

 

जब बड़े पत्थर आपस में जुड़ गए, तो उनके बीच सूक्ष्म अंतराल (Gaps) रह गए थे। यहाँ नन्ही गिलहरी की मंडली भी जुट गई। गिलहरियों का प्रवेश एक ‘इंजीनियरिंग मास्टरस्ट्रोक’ था। Aggregate Filling (एग्रीगेट फिलिंग – रिक्त स्थान की भराई) बहुत जरूरी थी। गिलहरियों द्वारा लाई गई रेत ने उन दरारों को भर दिया। इससे पुल की ‘Load Bearing Capacity’ (लोड बेयरिंग कैपेसिटी – भार सहने की क्षमता) कई गुना बढ़ गई।  रेत के कणों ने पत्थरों के बीच घर्षण पैदा किया, जिससे लहरों का प्रचंड वेग भी पुल को हिला नहीं सका। यह न केवल भक्ति थी, बल्कि ‘Precision Engineering’ (प्रीसिजन इंजीनियरिंग – सूक्ष्म अभियांत्रिकी) का अंतिम चरण था।

 

पुल बनते समय जयश्री राम के जयकारे क्यों लगते थे, यह भक्ति नहीं थी, विज्ञान का हिस्सा था। नल और नील ने पत्थरों को ‘वाइब्रेशनल ट्यूनिंग’ (Vibrational Tuning) के साथ सेट करते थे। जब वानरों द्वारा एक साथ ‘जय श्री राम’ का जयघोष होता, तो उन ध्वनि तरंगों (Sound Waves) se पत्थरों के बीच मौजूद सूक्ष्म हवा के बुलबुले सक्रिय हो जाते। यह वैसा ही था जैसे आज के वैज्ञानिक ‘Acoustic Levitation’ (अकूस्टिक लेविटेशन – ध्वनि से वस्तुओं को हवा में तैराना) की बात करते हैं।

नल-नील ने पत्थरों को केवल पानी में नहीं फेंका, बल्कि उन्हें ‘वाइब्रेशनल बैलेंस’ (Vibrational Balance) के साथ रखा। जब सेना ‘राम’ नाम का सामूहिक जयघोष करती थी, तो वह कंपन (Vibration) पत्थरों को एक-दूसरे के करीब खींचता था। इसे आधुनिक विज्ञान ‘Sonic Bonding’ (सोनिक बॉन्डिंग – ध्वनि द्वारा जुड़ाव) कहता है।

 

उस समय नाइट सर्विलांस (Night Surveillance)  मौजूद था। रावण के गुप्तचरों ने देखा कि रात के सन्नाटे में भी पुल चमकता था। दरअसल, नल-नील ने ‘Bioluminescent’ (बायोलुमिनेसेंट – प्राकृतिक रूप से चमकने वाले) समुद्री शैवालों का लेप लगाया था, ताकि रात के अंधेरे में भी निर्माण कार्य जारी रह सके।

 

5 दिनों का चमत्कार इतिहास बना गया।  ‘फास्ट-ट्रैक’ प्रोजेक्ट मैनेजमेंट हुआ। यह इतिहास का सबसे तेज निर्माण था। नल-नील ने ‘Division of Labour’ (डिवीजन ऑफ लेबर – श्रम विभाजन) का अद्भुत उदाहरण पेश किया। प्रथम दिन: १४ योजन (नींव और शुरुआती ढांचा)।

 

द्वितीय दिन: २० योजन (गहरे पानी में प्रवेश और पत्थरों का अलाइनमेंट)।

 

 तृतीय दिन: २१ योजन (पुल की स्थिरता की जाँच)।

 

चतुर्थ दिन: २२ योजन (ऊपरी सड़क का निर्माण और कोटिंग)।

 

 पंचम दिन: २३ योजन (अंतिम छोर तक पहुँच और भार परीक्षण)।

 

जैसे ही पांचवें दिन का सूरज ढला, महासेतु बनकर तैयार था। वानर सेना का उत्साह चरम पर था। समुद्र जो पहले एक ‘बाधा’ (Barrier) था, अब एक ‘राजमार्ग’ (Highway) बन चुका था। ज्ञान, विज्ञान और आस्था का महासंगम

राम सेतु केवल पत्थरों का जोड़ नहीं था। यह ‘Hydraulics’ (हाइड्रोलिक्स – जल शक्ति विज्ञान), ‘Oceanography’ (ओशनोग्राफी – समुद्र विज्ञान) और ‘Acoustics’ (अकूस्टिक – ध्वनि विज्ञान) का वह संगम था जिसे देखकर रावण जैसा महान वैज्ञानिक भी चकित रह गया।

 

जब मंदोदरी ने वह पुल देखा, तो उसने रावण से कहा:-

“कपिन्ह जलधि पाषान तहाए। जेहिं बलु दीन्ह सो प्रभु घर आए॥”

अर्थ: “जिनके प्रताप से वानरों ने समुद्र पर पाषाण (पत्थर) तैरा दिए हैं, वह प्रभु अब स्वयं आपके द्वार (लंका) पर आ गए हैं, अब भी संधि कर लीजिए।”

 

लेकिन रावण को अभी भी यकीन नहीं था। सेतु के पूर्ण होने पर रावण अपने दिव्य ‘Pushpaka Vimana’ (पुष्पक विमान) से वहां पहुँचा।

जब रावण अपने ‘Pushpaka Vimana’ (पुष्पक विमान) से ऊपर से गुजरा, तो वह एक इंजीनियर की दृष्टि से इस सेतु को देखकर स्तब्ध रह गया।

 

गोस्वामी जी लिखते हैं

 

“बाँध्यो सेतु नील नल नागर। राम कृपाँ जस भयउ उजागर॥

जहँ तहँ देखि कपिन कै भीरा। रावन हृदयँ भई अति पीरा॥”

 

 अर्थ

“बाँध्यो सेतु नील नल नागर”: रावण ने देखा कि चतुर (नागर) नल और नील ने समुद्र पर सेतु बाँध लिया है। यहाँ ‘नागर’ शब्द का अर्थ है— ‘निपुण’ या ‘Professional Engineers’।

“राम कृपाँ जस भयउ उजागर”: यह पुल प्रभु राम की कृपा और उनके प्रताप का यश चारों ओर फैला रहा था।

“जहँ तहँ देखि कपिन कै भीरा”: उस पुल पर यहाँ-वहाँ वानरों की विशाल सेना (भीड़) को चलते हुए देखकर रावण चकित रह गया।

“रावन हृदयँ भई अति पीरा”: यह दृश्य देखकर रावण के हृदय में ‘अति पीरा’ (अत्यंत पीड़ा और भय) उत्पन्न हुई।

 

 उसे लगा कि लंका की ‘अभेद्यता’ को नल-नील के ‘Geometric Precision’ (ज्यामितीय सटीकता) ने नष्ट कर दिया है। यह एक ‘Advanced Stealth Vehicle’ (पुष्पक) और एक ‘Solid Logistics Link’ (सेतु) के बीच के विज्ञान का आमना-सामना था।

 

रावण ने विमान को आसमान में स्थिर किया। पुष्पक का ‘Mercury Vortex Engine’ (पारे का इंजन) उसे हवा में रुकने (Hovering) की शक्ति देता था। वहां से रावण ने सेतु की ‘Geometrical Precision’ (ज्यामितीय सटीकता) देखी और दंग रह गया। एक महान वैज्ञानिक होने के नाते वह समझ गया कि यह केवल ‘लीला’ नहीं, बल्कि ‘परम विज्ञान’ है।

 

अब तक रावण इसे केवल अपने गुप्तचरों की ‘अफवाह’ मान रहा था। लेकिन जब उसने खुद अपनी आँखों से ३० मील लंबा वह मार्ग देखा, तो उसका ‘Logistical Confidence’ (सामरिक आत्मविश्वास) टूट गया। उसे समझ आ गया कि समुद्र अब लंका की रक्षा करने वाली ‘खाई’ (Moat) नहीं रहा, बल्कि वह तो अब दुश्मन का ‘हाइवे’ (Highway) बन चुका है।

 

 रावण को शारीरिक चोट नहीं लगी थी, लेकिन उसकी ‘Intellectual Superiority’ (बौद्धिक श्रेष्ठता) को गहरी चोट पहुँची थी। वह खुद को महानतम शिल्पी और ज्ञानी मानता था, पर दो वानरों (नल-नील) ने वह कर दिखाया जो रावण की कल्पना में भी नहीं था।

 

 रावण ने देखा कि पुल इतना मजबूत था कि उस पर ‘भीरा’ (लाखों वानरों का भार) आसानी से टिका हुआ था। यह पुल की ‘Load Bearing Capacity’ (भार सहने की क्षमता) का साक्षात प्रमाण था।

रामसेतु

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