
‘हिंदू’ शब्द मूल रूप से ‘सिंधु’ नदी के नाम से प्रचलित हुआ है। भारत के उत्तर-पश्चिम भाग में बहने वाली सिंधु नदी केवल एक जलधारा नहीं थी, बल्कि वह एक महान सभ्यता की पहचान थी। ऋग्वेद में इस क्षेत्र का उल्लेख ‘सप्त सिंधु’ के रूप में मिलता है। सात नदियों का प्रदेश (सिंधु, वितस्ता, असिक्नी, परुष्णी, विपाशा, शतद्रु और सरस्वती) के रूप में इस भूभाग की पहचान थी। संस्कृत में ‘सिंधु’ शब्द का अर्थ ‘नदी’ या ‘समुद्र’ होता है।
“य ऋक्षादंहसो मुचद्यो वार्यात्सप्त सिन्धुषु…”
(ऋग्वेद 8.24.27)
इसका अर्थ है कि सात नदियों के क्षेत्र में रहने वाले लोगों को देवताओं ने संकट से बचाया। यही ‘सप्त सिंधु’ आगे चलकर ‘हप्त हिंदू’ बना।
‘हिंदू’ शब्द का सबसे प्राचीन और स्पष्ट उल्लेख प्राचीन ईरान के पारसी धर्मग्रंथ ‘अवेस्ता’ (Zend Avesta) में मिलता है। प्राचीन फारसी भाषा में ‘स’ अक्षर का उच्चारण ‘ह’ किया जाता था। इसी कारण ‘सप्त सिंधु’ का रूपांतरण पारसी भाषा में ‘हप्त हिंदू’ हुआ।
इतिहास में ‘हिंदू’ शब्द का सबसे पुराना लिखित प्रमाण ईरान के पर्सेपोलिस और नक़्श-ए-रुस्तम के शिलालेखों में मिलता है। ये अकैमेनिड साम्राज्य के राजा दारायवस (Darius I) के शिलालेख हैं (ईसा पूर्व 520)। इनमें सिंधु नदी के पार के प्रदेश का उल्लेख ‘हिंदुश’ (Hiduš) के रूप में किया गया है। इन शिलालेखों में दारा ने अपने अधीन प्रांतों की सूची दी है, जिसमें ‘हिंदुश’ (Hi-indu-sh) शब्द स्पष्ट रूप से अंकित है। यह उल्लेख किसी धार्मिक अर्थ में नहीं था, बल्कि सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्र का भौगोलिक नाम था।
जब यूनानी लोग (जैसे हेरोडोटस और सिकंदर) इस क्षेत्र के संपर्क में आए (ईसा पूर्व 450), तब उन्होंने पारसी शब्द को आधार बनाया। यूनानी भाषा में प्रारंभिक ‘ह’ उच्चारण लुप्त हो जाने से ‘हिंदू’ का उच्चारण ‘इंडोस’ (Indos) हो गया। इसी ‘इंडोस’ से आगे चलकर लैटिन भाषा में ‘इंडिया’ (India) शब्द बना। यूनानियों ने यहां के निवासियों को ‘इंडोई’ (Indoi) कहा। ‘हिस्टोरिया’ ग्रंथ में वह लिखता है कि “इंडोस के पूर्व में केवल रेगिस्तान है”, क्योंकि उस समय यूनानियों को केवल सिंधु घाटी की ही जानकारी थी।
चीन से आए यात्रियों ने भी इस भूभाग का उल्लेख विभिन्न नामों से किया। प्रारंभ में उन्होंने ‘शिन-तू’ (Shin-tu) या ‘हिएन-तू’ (Hien-tu) शब्दों का प्रयोग किया। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) ने अपने यात्रा विवरण में इस देश को ‘यिन्तु’ (Yin-tu) कहा है। चीनी भाषा में ‘यिन्तु’ का अर्थ चंद्रमा के समान प्रकाश देने वाली भूमि (बुद्ध की भूमि) भी माना जाता है।
जब अरब और तुर्क भारत आए, तब उन्होंने इस क्षेत्र को ‘अल-हिंद’ और यहां के निवासियों को ‘हिंदू’ कहा। उनके लिए यह शब्द भौगोलिक था। अरब भूगोलवेत्ताओं और यात्रियों (जैसे अल-बिरूनी) ने अपनी पुस्तकों के नाम ‘तहकीक-ए-हिंद’ रखे। अरबी भाषा में ‘हिंद’ का अर्थ केवल भारत देश और ‘हिंदू’ का अर्थ यहां का नागरिक होता है। अरबों ने भारतीय विद्वानों को सम्मानपूर्वक ‘साहिब-ए-हिंद’ (हिंद के विद्वान) भी कहा।
कुछ विद्वान ‘हिंदू’ शब्द की संस्कृत उत्पत्ति खोजते हुए ‘बृहस्पति स्मृति’ के इस श्लोक का संदर्भ देते हैं—
“हिमालयं समारभ्य यावदिन्दुसरोवरम्।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥”
अर्थ: हिमालय से लेकर इंदु सरोवर (हिंद महासागर) तक फैले देव-निर्मित देश को ‘हिंदुस्थान’ कहा जाता है।
अरबी भाषा में ‘हिंद’ या ‘हिंदू’ शब्द भौगोलिक संदर्भ में प्रयुक्त होते थे। प्राचीन अरबी साहित्य में ‘हिंद’ एक लोकप्रिय और सुंदर नाम माना जाता था। कई अरब महिलाओं के नाम ‘हिंद’ हुआ करते थे। उदाहरण के लिए, पैगंबर मुहम्मद की पत्नियों में से एक उम्मे सलमा का मूल नाम ‘हिंद’ था।
प्राचीन काल में भारत का इस्पात (वूट्ज़ स्टील) विश्व-प्रसिद्ध था। इससे बनी तलवारें अत्यंत धारदार, लचीली और मजबूत होती थीं। अरब देशों में इन भारतीय तलवारों को सर्वोच्च स्थान दिया जाता था। इन्हें ‘अल-मुहन्नद’ या ‘अल-हिंदुवानी’ कहा जाता था। अरबी काव्य में ‘मुहन्नद’ शब्द का प्रयोग ‘अत्यंत धारदार और उत्कृष्ट तलवार’ के अर्थ में आदरपूर्वक किया जाता है। अरबी व्याकरण के अनुसार, जब किसी वस्तु का नाम ‘हिंद’ से ‘मुहन्नद’ बनता है, तो उसका अर्थ ‘भारत में बनी’ या ‘भारतीय निर्मित’ होता है। जैसे हम किसी क्षेत्र की विशिष्ट वस्तु को उस क्षेत्र के नाम से पहचानते हैं (जैसे कोल्हापुरी चप्पल), वैसे ही अरबों ने भारतीय तलवार को ‘मुहन्नद’ कहा। आज भी अरबी में ‘मुहन्नद’ लड़कों का एक लोकप्रिय नाम है, जिसका अर्थ ‘तलवार’ माना जाता है।
स्वाभाविक रूप से, कई शताब्दियों बाद जब भारत में विभिन्न पंथ और संस्कृतियां साथ-साथ रहने लगीं, तब ‘हिंदू’ एक धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के रूप में स्थापित हुआ। संक्षेप में, ‘हिंदू’ शब्द भारत के किसी एक ग्रंथ या पंथ द्वारा स्वयं दिया गया नाम नहीं है, बल्कि यह सिंधु नदी के तट पर विकसित एक उन्नत सभ्यता को विश्व द्वारा दिया गया नाम है। इसी प्रकार ‘हिंदवी’ शब्द का प्रयोग भी सबसे पहले 13वीं शताब्दी में अमीर खुसरो ने किया था।
★ फिर इतने ठोस प्रमाण होने के बावजूद सोशल मीडिया पर अक्सर यह पोस्ट क्यों दिखाई देती हैं कि ‘हिंदू’ का अर्थ ‘गुलाम’ है?
ऐतिहासिक और भाषिक दृष्टि से देखें तो अरबी भाषा में ‘हिंदू’ का अर्थ कभी भी ‘गुलाम’ नहीं रहा। यह भ्रम ‘हिंदू’ और ‘बंदा’ या ‘अब्द’ शब्दों की गड़बड़ी से नहीं, बल्कि फारसी साहित्य के कुछ संदर्भों की गलत व्याख्या से पैदा हुआ है। मध्यकालीन फारसी काव्य (जैसे हाफ़िज़ शिराज़ी की कविताओं) में कभी-कभी ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग ‘काला’ रंग दर्शाने के लिए हुआ है। भारतीयों का रंग अरबों या फारसियों की तुलना में सांवला होने के कारण सौंदर्य वर्णन में आंखों की काली पुतली या गाल पर काले तिल को ‘हिंदू’ कहा जाता था। जब युद्धों के दौरान भारत से लोगों को गुलाम बनाकर मध्य एशिया ले जाया गया, तब उन्हें ‘हिंदू गुलाम’ कहा गया, अर्थात ‘हिंदू धर्म का गुलाम’ या ‘भारत का गुलाम’। जैसे ‘तुर्की गुलाम’ या ‘हबशी गुलाम’। इसका अर्थ यह नहीं है कि ‘हिंदू’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘गुलाम’ है।
फारसी शब्दकोश क्या कहते हैं?
‘लुग़त-ए-किशोरी’ और ‘ग़्यास-उल-लुग़त’ जैसे बाद के फारसी शब्दकोशों में ‘हिंदू’ के कई अर्थ दिए गए हैं—भारत का निवासी, काला रंग, पहरेदार और गुलाम। ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये अर्थ शब्द की मूल उत्पत्ति नहीं बताते, बल्कि मध्यकाल में ‘हिंदू’ शब्द के उपयोग का वर्णन करते हैं। संक्षेप में, अरबी भाषा में ‘हिंदू’ का अर्थ ‘गुलाम’ दर्शाने वाला कोई भी मूल या निकट अर्थ नहीं है। इसके विपरीत, प्राचीन अरबों के लिए ‘हिंद’ ज्ञान, विज्ञान और उत्तम तलवारों के लिए प्रसिद्ध भूमि थी। ‘गुलाम’ वाला अर्थ केवल ऐतिहासिक कालखंड में हुई मानव तस्करी के कारण कुछ शब्दकोशों में जुड़ा, न कि शब्द की वास्तविक व्युत्पत्ति (Etymology) के रूप में।