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कांची महा स्वामीगल की कृपा से सूखे से समृद्धि तक

वह समय भयानक सूखे का था, जब मुझे कृषि विभाग का दायित्व सौंपा गया। बारिश बिल्कुल नहीं हो रही थी। खेतों में दरारें पड़ चुकी थीं। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। बस मुझे कांची महा स्वामीगल की याद आई। कांची क्षेत्र में एक कार्यक्रम में भाग लेने के बाद मैं कांची मठ पहुँचा। वहाँ के प्रबंधक श्री नीलकंठ अय्यर मुझे बचपन से जानते थे। उन्होंने मेरा स्वागत किया और कहा,
“महा स्वामीगल बार-बार आपके यहाँ आने के बारे में पूछ रहे थे। थोड़ी देर पहले वे मंच पर लेटे थे और अब सो गए हैं।”

मैंने कहा,
“मैं दूर खड़ा होकर बिना किसी शोर के दर्शन कर लूँगा,”
और उस मंच की ओर गया जहाँ महा स्वामीगल विश्राम कर रहे थे। मैंने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। कुछ मिनट बीत गए। महा स्वामीगल ने हल्की करवट ली और अचानक उठकर बैठ गए। मुझे देखकर उन्होंने पूछा,
“तुम कब आए?”
“अभी-अभी,” मैंने कहा।
फिर उन्होंने पूछा,
“तुमने यह संदेश क्यों भिजवाया था कि तुम मुझसे मिलना चाहते हो?”

मैंने कहा,
“राज्य में बारिश नहीं हो रही है। ऐसे समय में मुख्यमंत्री ने मुझे कृषि विभाग दिया है। ज़मीन में दरारें पड़ गई हैं। बिना बारिश वाले राज्य में मैं कृषि मंत्री बनकर कैसे टिक पाऊँगा? मुझे अपयश ही मिलेगा। इसलिए मैं आपसे प्रार्थना करने आया हूँ कि आप वर्षा के लिए यज्ञ करवाएँ।”

उन्होंने कहा,
“क्या तुम सिर्फ इसी कारण आए हो?”
मैंने उत्तर दिया,


“हाँ।”

वे कुछ समय तक ध्यानमग्न अवस्था में सिर झुकाकर मौन रहे। कुछ देर बाद उन्होंने कहा,
“ठीक है, कल से ही मैं कामाक्षी अम्मन मंदिर में पंद्रह दिनों का यज्ञ करवाने की व्यवस्था करूँगा।”

उस शाम मेरा चेंगलपट में कार्यक्रम था। उसे समाप्त करके मैं अपनी कार में बैठा। भोजन के बाद गाड़ी श्रीपेरुम्बुदूर की ओर बढ़ रही थी। रास्ते में गाड़ी चल रही थी। मुझे नींद नहीं आ रही थी, इसलिए मैं सीट पर थोड़ा लेट गया। अचानक उठकर मैंने कार की खिड़की से बाहर देखा। जो मैं कह रहा हूँ, उस पर शायद कोई विश्वास न करे! मानो कोई ऊपर से घड़े-के-घड़े पानी उड़ेल रहा हो—कार की विंडशील्ड पर मूसलाधार बारिश की चादरें गिर रही थीं! तेज़ बारिश हो रही थी। कांची महा स्वामीगल के वचन कुछ ही घंटों में फलित हो गए थे!

पूरे राज्य में ज़मीन फिर से हरी हो गई। हर जगह धान की फसल लहलहाने लगी। फसल अच्छी हुई और राज्य में पीने के पानी की भी भरपूर उपलब्धता हो गई। सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी होने से मेरे विभाग को भी अच्छी प्रतिष्ठा मिली। ये सभी घटनाएँ वास्तव में परम पूज्य श्री महा स्वामीगल की राज्य और मुझ पर बरसी कृपा का ही परिणाम थीं।

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