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कुण्डली का पंचम भाव व संतान योग

आजकल हर मनुष्य चाहता है हमारे पास सभ्य संतान हों जो माता पिता की सेवा करें एवं कुल का नाम रोशन करें, हर मानव का सपना होता है कि उसकी संतान तेजस्वी एवं गुणों से संपन्न हो ! इसके लिए वह हर संभव प्रयास करता है, पढ़ाता है, लिखाता है, अच्छी उच्च शिक्षा एवं अच्छे संस्कारों में ढालने का प्रयास करता है परन्तु जब संतान इसके विपरीत आचरण करने लग जाती है, तब हर माता पिता के सामने दुःखों का पहाड़ खड़ा हो जाता है ! संतान का गलत रास्ते पर जाना दुष्कर्म करना माता पिता को प्रताड़ित करना यह कोई पिता माता बर्दास्त नहीं कर सकता, परन्तु हम लोग  भूल जाते हैं कि अच्छे संतान के लिए अच्छा योग अच्छा मुहूर्त एवं अच्छे समय की आवश्यकता  भी होती है, जिसे हम ज्योतिष द्वारा सही समय में सही संतान योग का चुनाव कर सकते हैं जिससे संतान भाग्यशाली कर्मनिष्ट

कुलदीपक यश दिलाने वाला होगा उसके लिए हमें ज्योतिषीय योगों को देखना चाहिए तथा सोच विचार कर संतान योग का निर्णय किसी विद्वान ज्योतिषी द्वारा तथा स्वयं निर्णय कर करना चाहिए ! उसके लिए मैं यहां बताने जा रहा हूं कि आप ज्योतिष द्वारा संतान योग कैसे जानें ! ज्योतिष शास्त्र ऐसा महाग्रंथ हैं, जिसमें हर तरह के योग मुहूर्त, काल, संयोग उपलब्ध हैं, आवश्यकता है उसे खोज कर अपने जीवन में उपयोग में लाने की !

 

हर मानव संतान का सपना देखता है संतान सुख से बड़ा कोई सपना नहीं होता है ! उसके लिए सही दिशा मिले अच्छी संतान हो, कुपुत्र ना हों, यह ज्योतिष द्वारा विश्लेषण कर लेना आवश्यक होता है !

 

संतान_योग_के_आवश्यक_तथ्य —

संतान के लिए पति पत्नी दोनों की कुण्डली का प्रबल होना, कुण्डली में  संतान कारक ग्रह का उदित अवस्था में होना, पंचम भाव एवं पंचमेश का बलवान होना,  की सही जानकारी करना चाहिए, क्योंकि पंचम भाव से ही पुत्र सुपात्र होगा या कुपात्र की जानकारी प्राप्त किया जा सकता है ! हमारी कुण्डली में 12  राशियां होती हैं जिनमें से किसी भी राशि का स्वामी पंचमेश होने पर संतान का सुख दुःख प्रदान करता है ! यदि पंचम भाव में विषम राशि हो जैसे – मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ यह सभी पुरुष राशि कहलाती हैं ! पंचम भाव में यदि सम राशि वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, और मीन हों तो यह सब कन्या राशि या स्त्री राशि होती हैं ! जब कोई राशि पंचमेश बनती है, जैसे मिथुन पंचम भाव में स्थित हो तब पंचमेश बुद्ध ग्रह होंगे !

 

अब यदि सूर्य पंचम भाव में स्थित होता है तब एक पुत्र होता है ! यदि चंद्रमा पंचम भाव में स्थित है तब कन्या संतान होगी यदि मंगल पंचम भाव में स्थित हों तब तीन पुत्रों का योग बनता है ! यदि पंचम भाव में बुद्ध स्थित हो तब यह दो कन्याओं का योग बनाता है ! पंचम भाव में गुरु स्थित हों तब वह पांच पुत्रों का योग बनाता है ! पंचम भाव में शुक्र स्थित हो तब कई कन्याओं का योग बनाता है ! पंचम भाव में शनि स्थित हो तब कन्या का प्रबल योग बनाता है ! पंचम भाव में राहु स्थित हो तब या तो पुत्र योग बनायेगा वहीं अशुभ प्रभाव में होने पर गर्भ ही नष्ट कर देता है ! अतः पंचम भाव का राहु प्रायः गर्भ नष्ट योग भी बनाते देखा गया है, जिसका जिक्र हम आगे करेंगे ! पंचम भाव में केतु स्थित हों तब समय से पहले संतान योग बनाता है तथा कभी कभी संतान नष्ट योग भी बनाता है ! ग्रहों के पंचम भाव में होने से पुत्र होगा, कन्या होगी, कुपात्र या सत्पात्र होगा ! यह ग्रहों पर निर्भय करता है ! आपका पंचम भाव जितना ही बलाबल से युक्त होगा उतना ही सुंदर संतान योग की संरचना करेगा ! पंचम भाव में राशियों का उतना ही महत्व है जितना ग्रहों का अथवा यह जान लेना आवश्यक होता है कि आपके पंचम भाव में शुभ या अशुभ, सम या विषम राशि हैं ! इनका ज्ञान करना आवश्यक होता है ! पंचम भाव में -2 वृष, 5 सिंह, 6 कन्या, 8 वृश्चिक राशियाँ स्थित हों तब कम संतान होती हैं ! पंचम भाव में उपरोक्त राशियों का होना संतान में विलम्बता की सूचक होती हैं ! 

 

गर्भाधान_योग :

 हर माह स्त्री रजस्वला होती हें जिसके कारक ग्रह चंद्र एवं मंगल है ! जब चंद्र जन्म राशि से 1, 2रे 4थे, 5, 7, 8,  12वें राशियों में आता है तब स्त्रियों के लिए उत्तम ऋतु समय होता है ! जब चंद्र इन राशियों में होता है उस पर मंगल अपनी पूर्ण दृष्टि से देख रहा हों तब ऋतुकाल का समय होता है ! ऋतुकाल के उपरांत ही संतान या गर्भधारण योग जाना जा सकता है ! ऋतुकाल एवं शुभ रात्रियां शुभ रात्रियों का ध्यान दिया जाय तो उत्तम संतान के योग स्वयं बन जाते हैं, क्योंकि नीव सही होगी तभी ग्रह योग का निर्माण सही दिशा में कार्य करेगा ! अतः शुभ रात्रियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है ! ऋतुकाल के पश्चात सोलह रात्रियां होती हैं जो हमारे ऋषियों ने अपने-अपने विवेक के अनुसार सही गलत का निर्णय दिया है ! ऋतुकाल के पश्चात “तीन रात्रियों” का सर्वथा त्याज्य करना चाहिए ! इन रात्रियों के ध्यान से हमे उत्तम संतान के योग की संरचना मानकर चलना चाहिए ! क्योंकि रात्रियों में उत्तरोत्तर रात्रियां बलवान होती हैं। जैसे “चौथी रात्रि से छठवीं रात” अधिक उत्तम होती है ! “छठवीं से आठवीं रात्रि” अत्यधिक बलवान होती हैं ! “आठवीं रात्रि से दसवीं रात्रि अति उत्तम रात्रि होती हैं !” दसवीं से बारहवीं रात्रि बलाबल से युक्त होती हैं ! बारहवीं रात्रि से चाैदहवीं रात्रि उत्तम मानी जाती हैं ! “चाैदहवी से सोलहवीं रात्रि अत्यधिक तेज एवं बलवान रात्रि होती है !”

 

निम्न रात्रियों को देखकर किया गया प्रसंग संतान को तेजस्वी एवं बुद्धिमान बनाता है !

 

रात्रि_एवं_पुत्र_योग :

  1. चाैथे रात्रि के प्रसंग से अवश्य ही पुत्र का योग बनाता है ! जिससे पुत्र पूर्ण दीर्घायु एवं निरोगी होता है !
  2. छठवी रात में प्रसंग करने से निश्चय ही श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न होता हैं !
  3. आठवीं, दसवी रात में प्रसंग करने पर धैर्यवान पुत्र उत्पन्न होता है !
  4. दसवीं रात में प्रसंग करने से धन ऐश्वर्य संयुक्त संतान उत्पन्न होती है !
  5. बारहवीं रात में प्रसंग करने से बलवान एवं साहसी पराक्रमी कुल दीपक ऐश्वर्य युक्त संतान उत्पन्न होती हैं !

 

वहीं यदि आपको कन्या संतान की चाहत हैं तब आप इन रात्रियों का उपयोग करके उत्तम कन्या भी प्राप्त कर सकते हैं —

 

  1. पांचवीं रात्रि को प्रसंग करने से निश्चय ही उत्तम कन्या जन्म लेती हैं !
  2. सातवीं रात्रि को प्रसंग करने से बुद्धिमान तर्कशक्ति युक्त कन्या जन्म लेती हैं !
  3. नवीं रात्रि को किया गया प्रसंग तेजस्वी कन्या को जन्म देता है !
  4. ग्यारहवीं रात्रि में किया गया प्रसंग सुन्दर कन्या को जन्म देता है !

 

उपरोक्त कन्या रात्रि उत्तरोत्तर बल से युक्त होती हैं, क्योंकि पांचवीं से सातवीं बलवान होती हैं, सातवीं से नौवीं, नौवीं से ग्यारहवीं रात्रि बलवान होती हैं !

 

उपरोक्त रात्रियां उत्तम कन्या जन्म के लिए अच्छी कही गयी हैं ! उत्तरोत्तर रात्रियों को उपयोग करके उत्तम कन्या प्राप्त कर सकते हैं ! उसी तरह से पुत्र को चाहत रखने वालों को पुत्र रात्रियों को उपयोग करके उत्तम पुत्र प्राप्त कर सकते हैं ! जिससे आपके कुल का नाम रोशन तथा संतान सुपात्र होने के पूर्ण अवसर आपके हाथ में होते हैं ! प्रभृति युग्म पुत्र रात्रियां चाैथी, छठी, आठवीं प्रभृति युग्म रात्रियां पुत्र रात्रियां कहलाती हैं ! इन रात्रियों में किया गया प्रसंग उत्तम पुत्र प्रदान करती हैं ! प्रभृति युग्म कन्या रात्रियां पांचवीं, सातवी, नवीं, प्रभृति युग्म कन्या रात्रियाँ कहलाती हैं ! इन रात्रियों में किया गया प्रसंग उत्तम कन्या का जनम देता है ! उस कन्या के द्वारा व्यक्ति का भाग्योदय भी होता है ! वह कन्या पूरे कुल के लिए उन्नति की प्रेरणास्रोत होती है ! हमने उन रात्रिओं को जानने के पूर्ण प्रयास किये जिससे हमारे पाठक लोग सुपात्र संतान को जन्म देकर अपना और अपने संतान का भाग्य बनाने में पत्थर रूपी नींव साबित कर सकते हैं ! आप थोड़ा सा ध्यान में इन रात्रियों को रख कर उत्तम संतान प्राप्त कर सकते हैं ! जिससे आपका लाभ तो होगा साथ में कुल एवं संतान के भाग्योदय में भी सहायक होगा ! उत्तम संतान और आपके कुंडली में गोचर अवस्था में चल रहे ग्रहों का भी पूर्ण योग होता है ! जन्म कुण्डली में  संतान योग जन्म कुण्डली में संतान विचारने  के लिए पंचम भाव का अहम रोल होता है ! पंचम भाव से संतान का विचार करना चाहिए ! दूसरी संतान का विचार करना हो तब सप्तम भाव से करना चाहिए ! तीसरी संतान के बारे में जानना हो तो अपनी जन्म कुण्डली के भाग्य स्थान से विचार करना  चाहिए ! तीसरी संतन का विचार भाग्य स्थान यानि नवम भाव से करें ! इससे अधिक संतान के बारे में जानने के लिए तीनों भावों के बलाबल को देखकर विचार करना चाहिए ! यदि किसी कारणवश द्वितीय संतान नष्ट हो जायें तब पता करें कि आपकी कुण्डली में सप्तम भाव पाप ग्रहों से युक्त तो नहीं है ? यदि किसी कारणवश तीसरी संतान नष्ट हो तब देखें कि आपका भाग्य स्थान पाप ग्रहों से प्रताड़ित तो नहीं है, एवं पापग्रहों का योग एवं दृष्टि तो नहीं है, अगर ऐसा हो तब अवश्य संतान नष्ट हो जाती है ! तीन से अधिक संतान नष्ट हो रही हों तब आप अपने जन्म कुण्डली के (4) सुख, (5) संतान, (6) कलत्र, (9) भाग्य भावों का गहन अध्ययन कर लें कि आपके इन भावों में पाप ग्रहों का बलाबल अधिक तो नहीं है ? यदि अधिक है तब संतान सुख में कमी के योग बनते हैं ! वंशक्षय एवं वंशनाश के पूर्ण आसार होने पर आप अपनी कुण्डली में देखें कि कहीं पंचम लग्न अष्टम द्वादश भावों में पाप ग्रहों का प्रभाव अधिक तो नहीं है ! यदि अधिक हैं,  तब समझें कि कुण्डली में वंशक्षय  योग बन रहा है इस योग से कुल में संतान पुत्र का आभाव अवश्य होता है ! यदि चतुर्थ भाव में पाप ग्रह पंचम भाव में गुरु सातवें भाव में बुध शुक्र स्थित हों तब उस मनुष्य के जीवन में संतान सुख का अभाव होता है, तथा वंश को चलाने वाला कोई नहीं होता पंचम भाव अष्टम भाव और द्वादश भाव में पाप ग्रह स्थित हों तब संतान योग में बाधा समझें और यदि आपके लग्न में पाप ग्रह स्थित हों, लग्नेश पंचम में विराजमान हों पंचमेश बली हो किंतु तृतीय भाव में स्थित हों तब ऐसा होने से अवश्य ही संतान में बाधा उत्पन्न करता हैं ! चतुर्थ भाव में चंद्रमा स्थित जाँय पंचम भाव में शुक्र सूर्य का योग हो तब अवश्य ही संतान के पक्ष में बाधा हो सकती है एवं संतान के क्षेत्र में विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है ! संतान क्षेत्र निर्बल हो जाता है और संतान यदि होगी भी तो बहुत परिश्रम करने के पश्चात परन्तु मृत संतान होने की भी पूर्ण संभावनाएं बनती हैं, यदि पंचम भाव में शनि स्थित हों या उस भाव को देख रहे हों तब निश्चय ही मृत संतान के योग देखने को मिलते हैं ! यदि मंगल पंचम भाव में स्थित हों तब समझ लेना चाहिए कि संतान अवरोध उत्पन्न करेंगे यानि कि गर्भ ही नहीं ठहरने देगें ! मंगल गर्भ ग्रह है अतः मंगल अपना प्रभाव पंचम भाव में रहने से दिखाते हैं और दूर-दूर तक संतान के लिए बाधक बन जाते हैं ! संतान के क्षेत्र विफल करते रहते हैं ! यदि पंचम भाव या पंचमेश राहु-केतु के द्वारा योग बना रहा हो साथ में हो तब संतान के प्रति सोच बदल जाती है, सोच बन भी जाय तब कई बार परेशानियां उत्पन्न करते हैं ! परेशानियों के अलावा अलगाव भी देता है ! अगर संतान का योग बन भी जाय संतान ऐसी होती है कि जिसकी कल्पना आप सपने में भी नहीं कर रहे होंगे ! क्योंकि संतान कुपुत्र कपटी एवं दरिद्री योगों को लेकर उत्पन्न होता है ! जिससे आपका जीवन दुःखमय बना देता है ! अंततः आपको संतान को छोड़कर कहीं और रहने पर मजबूर होना पड़ सकता है ! फिर भी वह आपको हर क्षण कांटों की तरह चुभता रहता है और आपका हंसता खेलता जीवन नरक जैसा बन जाता है ! पंचम भाव में पाप ग्रह स्थित हों पंचमेश से पंचम गुरु स्थित हों तथा उससे पांचवें में बृहस्पति स्थित हों तब उसे संतान के लिए तीन स्त्रियों का सहारा लेना पड़ता है, फिर भी संतान सुख से वंचित रहता है ! यदि संतान सुख मिलता भी है तो कन्या संतान होती है, जो कुल का नाम  बदनाम करके माता पिता का त्याग कर देती है और माता पिता जीवन भर दुःखों का सामना करते रहते हैं ! गुरु का पाप ग्रहों के प्रभाव में आना और भी घातक सिद्ध हो जाता है ! शनि निर्बल होकर गुरु को देख रहा हो और गुरु पंचम भाव से सम्बंध रख रहा हो तब निश्चचय ही संतान का सुख नहीं प्राप्त होता है ! संतान की तरफ आपको सोच विचार से युक्त करेगा और हर समय आप सोच में परेशान रहेंगे और आप समय का सही उपयोग नहीं कर सकेंगे ! जीवन में कई अवसर आपके हाथ से निकल जायेंगे जिससे रह रह कर आप दुखी रहेंगे और लोगों के द्वारा ताने सुनने पड़ेगे जिससे आपके दिलों दिमाग को समस्या आएगी और आप अपने जीवन में सही निर्णय लेने में असमर्थ होंगे ! आपको संतान गोद भी लेना पड़ सकता है या पैसा देकर संतान लेना पड़ सकता है ! यादि आपकी जन्म कुण्डली में लग्नेश अथवा  प्रथम भाव का स्वामी मंगल के घर में मेष-वृश्चिक में बैठा हो तब समझें कि संतान बाधक योग हैं एवं पंचम भाव का स्वामी छठे स्थान में स्थित हो तब निश्चित ही संतान बाधक योग होता है ! संतान होगी परंतु होकर मृत्यु को प्राप्त कर लेगी ! उसके पश्चात फिर दूसरी संतान नहीं होगी और निःसंतान जीवन व्यतीत करना पड़ सकता है ! पाप ग्रहों से युक्त कुण्डली और पंचम भाव का स्वामी  त्रिक 6, 8, 12 भावों में स्थित हो जाय, वह मनुष्य जीवन में संतान क्षेत्र में बार-बार असफल होता है ! जहां तक शास्त्रों में देखा गया है कि बुद्ध- केतु का संयोग पंचम भाव में होना पंचमेश का नीच राशि में होना भी संतान विहीन योग बनाता है ! इस योग से जातक को एक ही संतान होती हैं परन्तु वह भी अल्पायु  थोड़े समय पश्चात उसकी मृत्यु होते देखा गया है ! आपके जीवन में दूसरे संतान का न होना उपरोक्त योगों से होता है ! इसे शास्त्रों में #काकवंध्या योग भी कहते हैं जिसकी कुण्डली में  एक संतान योग दूसरी संतान न हो तो समझें काकबंध्या योग है, अर्थात आपकी स्त्री की कुण्डली में एक ही गर्भ ठहर सकता है और  आप ऐसी हीे औरत के पति हैं ! आपकी कुण्डली में पांचवें घर का  स्वामी नीच का हो वक्री अथवा अस्त हो या निर्बल ग्रह की दृष्टि पड़ रही हो शनि निर्बल होकर बुद्ध के साथ स्थित हों तब समझ लें कि आपकी स्त्री काकबंध्या योग से लिप्त है और काकबंध्या पत्नी के आप जीवन साथी हैं ! जिससे आपको जीवन में संतान सुख से वंचित रहना पड़ता है ! संतान पक्ष कमजोर निर्बल होता है ! आप ध्यान से देखें कि पत्नी या आपकी जन्मकुण्डली में संतान बाधक योग तो  विद्यमान नहीं है, यह योग संतान के पक्ष में बहुत ही परेशान करता है ! संतान प्रतिबंधक योग अगर कुण्डली में बुद्ध शुक्र  सप्तम भाव में बैठे हो, गुरु पंचम भाव में बैठा हो, और पाप ग्रह चतुर्थ भाव में बैठे हों तथा चंद्रमा से अष्टम पाप ग्रह हो तब संतान प्रतिबंधक योग बनता है ! निम्न कुण्डली को  हमने देखा कि संतान प्रतिबंधक योग व्याप्त है ! उपरोक्त कुण्डली में बुद्ध शुक्र योग तो नहीं पाया गया परन्तु संतान प्रतिबंधक जीवन  में पाया गया है ! इसका कारण यह है कि पंचमेश चंद्र पाप ग्रहों के मध्य होना राहु द्वारा चंद्र को ग्रसित करना सप्तमेश बुद्ध का स्वराशि में चतुर्थ में सूर्य के साथ स्थित होना, संतान ग्रह गुरु का शनि द्वारा कमजोर पड़ना तथा सप्तम दृष्टि द्वारा शनि का संतान स्थान को देखना केतु का द्वादश में बैठ कर पंचमेश को पूर्ण दृष्टि से देखना संतान प्रतिबंधक कारण है ! अतः हमें अपनी कुण्डली में संतान प्रतिबंधक योग के बारे में अवश्य  जानकारी रखनी चाहिए कि हमारी कुण्डली  में ऐसे योग के कारण संतान में बाधा तो नहीं आ रही है ताकि उन बाधाओं से मुक्ति पा सके और संतान योग बना सके !

वाक सिद्धि योग

तृतीय भाव में शुक्र: क्यों इसे हमेशा शुभ नहीं माना जाता?

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