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मेष लग्न का तात्त्विक स्वरूप

मेष राशि कालपुरुष का मस्तक है। यह राशि चक्र की प्रथमा राशि है, अतः इसे ‘आद्य राशि’ भी कहा जाता है।

 

शास्त्रीय परिचय:

 

“रक्तवर्णो बृहद्गात्रश्चतुष्पाद्रात्रिवीर्यवान्।

पूर्ववासी नृपज्ञेयो शैलचारी रजोगुणी॥

पृष्ठोदयी पावकी च मेषराशिः कुजाधिपः।” (बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्)

१. अग्नितत्त्व: मेष राशि का तत्त्व ‘अग्नि’ है। जैसे अग्नि सदैव ऊपर की ओर उठती है, वैसे ही मेष लग्न का जातक सदैव उन्नति की ओर अग्रसर रहता है। इनमें ऊर्जा का प्रवाह अत्यधिक होता है। यह अग्नि ‘पवित्रता’ और ‘दाहकता’ दोनों का प्रतीक है। यदि शुभ प्रभाव हो तो जातक तपस्वी जैसा तेजस्वी होता है, अशुभ प्रभाव हो तो क्रोधी और विध्वंसक।

२. चर संज्ञा: यह ‘चर’ राशि है। चर का अर्थ है चलायमान। मेष लग्न के जातक एक स्थान पर टिककर नहीं बैठ सकते। उनके विचारों में, निर्णयों में और कार्यशैली में गतिशीलता होती है। वे स्थिरता से घृणा करते हैं।

३. विषम एवं पुरुष राशि: यह विषम राशि है और इसका स्वभाव पुरुषोचित है। अतः इस लग्न में जन्मी स्त्री में भी पुरुषोचित गुण जैसे साहस, निर्भीकता, और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता दृष्टिगोचर होते हैं।

४. पृष्ठोदय: यह राशि पीछे से उदय होती है।

 

२. शारीरिक लक्षण एवं गठन

मेष लग्न में जन्म लेने वाले जातक की शारीरिक संरचना विशिष्ट होती है, जिसे ग्रहों की दृष्टि न्यूनाधिक कर सकती है, किन्तु मूल ढाँचा निम्नवत होता है:

 

“वृत्ताम्रदृगुष्णदेही वाचालः सत्त्ववान्…” (जातकपारिजात)

 

१. मध्यम कद: सामान्यतः मेष लग्न के जातकों की ऊँचाई मध्यम होती है। शरीर गठीला और मांसपेशियाँ कसी हुई होती हैं।

२. मस्तक एवं मुख: चूँकि यह कालपुरुष का सिर है, अतः इनका माथा चौड़ा होता है। मुखाकृति प्रायः त्रिकोणाकार (नीचे की ओर संकरी) हो सकती है। भौहें घनी और वक्राकार होती हैं, जो परस्पर मिली हुई भी हो सकती हैं।

३. नेत्र: आँखें गोल और कुछ बाहर की ओर उभरी हुई हो सकती हैं। क्रोध या आवेश में नेत्र शीघ्र ही रक्तिम (लाल) हो जाते हैं। दृष्टि में एक तीक्ष्णता और अधिकार भाव होता है।

४. विशेष चिह्न: शास्त्र कहते हैं कि मेष लग्न के जातक के सिर पर या मुख के किसी भाग पर चोट का निशान, तिल या मससा अवश्य होता है। बाल प्रायः रूखे या कम घने हो सकते हैं।

५. शारीरिक प्रकृति: इनका शरीर पित्त प्रधान होता है। इन्हें उष्णता शीघ्र लगती है और ज्वर, फोड़े-फुंसी या रक्त विकार की सम्भावना बनी रहती है।

 

३. स्वभाव एवं मानसिक गुण

मेष लग्न का स्वामी ‘मङ्गल’ है, जो ग्रहों का सेनापति है। अतः जातक का स्वभाव सेनापति जैसा होता है।

 

गुण:

 

नेतृत्व क्षमता: ये जन्मजात नेता होते हैं। किसी के अधीन कार्य करना इनके लिए मृत्यु समान कष्टकारी है। ये अपनी शर्तों पर जीवन जीते हैं।

 

साहस और पराक्रम: भय शब्द इनके शब्दकोश में नहीं होता। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी ये निर्णय लेने में हिचकिचाते नहीं हैं।

 

स्पष्टवादिता: ये जो सोचते हैं, वही बोलते हैं। कूटनीति का अभाव होता है, जिसके कारण अनजाने में ही इनके शत्रु बन जाते हैं।

 

महत्त्वाकांक्षा: ‘शैलचारी’ (पर्वतों पर विचरण करने वाला) विशेषण यह बताता है कि ये सदैव ऊँचाई पर पहुँचना चाहते हैं। अल्प में सन्तोष करना इनका स्वभाव नहीं है।

 

दोष:

 

अधीरता: इन्हें परिणाम शीघ्र चाहिए। धैर्य की कमी इनका सबसे बड़ा शत्रु है।

 

क्रोध: मङ्गल का प्रभाव होने से क्रोध नाक पर रहता है, परन्तु यह क्रोध ‘क्षणरुष्टा-क्षणतुष्टा’ (पल में रुष्ट, पल में तुष्ट) वाला होता है। ये मन में मैल नहीं रखते।

 

हठ: यदि किसी बात पर अड़ जाएँ, तो उसे पूरा करके ही दम लेते हैं, चाहे उसमें हानि ही क्यों न हो।

 

४. नक्षत्र आधारित सूक्ष्म विवेचन

मेष राशि के अन्तर्गत तीन नक्षत्र आते हैं: अश्विनी, भरणी और कृत्तिका (प्रथम चरण)। जातक का व्यक्तित्व इस बात पर निर्भर करता है कि उसका लग्न या लग्नेश किस नक्षत्र में स्थित है।

 

(क) अश्विनी नक्षत्र (०° से १३°२०’ तक)

स्वामी: केतु। देवता: अश्विनी कुमार (देवताओं के वैद्य)। यदि जातक का लग्न अश्विनी नक्षत्र में हो:

 

स्वरूप: अश्विनी ‘घोड़े’ का प्रतीक है। ऐसे जातक में घोड़े जैसी स्फूर्ति और वेग होता है। ये कार्य आरम्भ करने में सबसे तेज होते हैं।

 

स्वभाव: केतु के प्रभाव के कारण इनमें एक प्रकार की वैराग्य वृत्ति या रहस्यमयी प्रवृत्ति भी छिपी होती है। ये बहुत अच्छे चिकित्सक, हीलर (Healer) या समस्याओं का समाधान खोजने वाले होते हैं।

 

विशेषता: ये किसी भी कार्य को आरम्भ तो बड़े उत्साह से करते हैं, किन्तु यदि कार्य लम्बा खिंच जाए तो इनका उत्साह भंग हो जाता है। इन्हें निरन्तर नवीनता चाहिए।

 

फल:

 

“प्रियभूषणः सुरूपः सुभगो दक्षः…” ये जातक वेशभूषा के शौकीन, रूपवान और अपने कार्य में दक्ष होते हैं। इनका भाग्योदय प्रायः २०, २४ या २८वें वर्ष में होता है।

 

(ख) भरणी नक्षत्र (१३°२०’ से २६°४०’ तक)

स्वामी: शुक्र। देवता: यम (मृत्यु के देवता)। यदि जातक का लग्न भरणी नक्षत्र में हो:

 

स्वरूप: यह मेष राशि का मध्य भाग है। यहाँ मङ्गल (राशि स्वामी) और शुक्र (नक्षत्र स्वामी) का अद्भुत संयोग होता है। ऐसे जातक अत्यधिक कामुक और सौन्दर्य प्रेमी होते हैं।

 

स्वभाव: देवता ‘यम’ होने के कारण इनमें सत्य और न्याय के प्रति कठोर आग्रह होता है। ये अनुशासन प्रिय होते हैं। यदि ये किसी मार्ग (भले ही वह गलत हो) को चुन लें, तो मृत्यु पर्यन्त उस पर चलते हैं। इनमें संयम और अतिवाद दोनों देखा जाता है।

 

विशेषता: ये रचनात्मक होते हैं। कला, संगीत, अभिनय या विलासिता पूर्ण जीवन में इनकी रुचि होती है। परन्तु मन में एक गुप्त भार या चिन्ता बनी रहती है।

 

फल:

 

“सत्यव्रतो विरक्तः…” ये जातक सत्य बोलने वाले, शत्रुओं को परास्त करने वाले और दीर्घायु होते हैं। ३३वें वर्ष के पश्चात इनके जीवन में बड़ा सकारात्मक मोड़ आता है।

 

(ग) कृत्तिका नक्षत्र (२६°४०’ से ३०°००’ तक)

स्वामी: सूर्य। देवता: अग्नि। मेष राशि में कृत्तिका का केवल प्रथम चरण आता है। यह मेष राशि का सबसे शक्तिशाली भाग है।

 

स्वरूप: यहाँ मङ्गल (राशि स्वामी) और सूर्य (नक्षत्र स्वामी) दोनों परम मित्र हैं और दोनों अग्नि तत्त्व हैं। यह ‘ज्वालामुखी’ योग है।

 

स्वभाव: ऐसे जातक अत्यंत तेजस्वी, प्रभावशाली और शासन करने वाले होते हैं। इनकी आँखों में एक विशेष चमक और रौब होता है जिसे सहन करना दूसरों के लिए कठिन होता है। ये जन्मजात शासक होते हैं।

 

विशेषता: इनकी पाचन शक्ति बहुत तीव्र होती है। इन्हें भूख बहुत लगती है। ये किसी की अधीनता कतई स्वीकार नहीं कर सकते। पिता से इनका विशेष सम्बन्ध सकारात्मक या नकारात्मक, ग्रहों की स्थिति पर निर्भर होता है।

 

फल:

 

“तेजस्वी… बहुभुक्…” ये जातक ख्याति प्राप्त करते हैं। सेना, पुलिस, राजनीति या प्रशासन में उच्च पद प्राप्त करते हैं। इनका क्रोध भयंकर होता है किन्तु ये अन्याय नहीं करते।

 

५. मेष लग्न के जातकों के लिए दिशा एवं तत्त्व विचार

दिग्बल: मेष लग्न ‘पूर्व’ दिशा का स्वामी है।

 

सूर्य और मङ्गल इस लग्न की कुण्डली में दशम भाव मकर राशि, दक्षिण दिशा में दिग्बली होते हैं।

 

अतः मेष लग्न के जातकों को दक्षिण दिशा या दक्षिणोन्मुख होकर कार्य करने से विशेष सफलता मिलती है, विशेषकर करियर में।

 

त्रिगुण विचार: यह ‘रजोगुणी’ राशि है। रजोगुण का अर्थ है—क्रिया, इच्छा, और संसार को भोगने की लालसा। यद्यपि इनमें सात्त्विक विचार गुरु नवमेश होने के कारण भी होते हैं, परन्तु मूलतः ये कर्मयोगी होते हैं, ध्यानयोगी नहीं।

 

प्रथम खण्ड का सारांश

संक्षेप में, मेष लग्न का जातक एक “प्रज्वलित अग्नि पुंज” के समान है। वह अश्विनी नक्षत्र में ‘वेगवान चिकित्सक’ है। वह भरणी नक्षत्र में ‘रचनात्मक न्यायधीश’ है। वह कृत्तिका नक्षत्र में ‘तेजस्वी शासक’ है।

 

उसका शरीर प्रकृति द्वारा संघर्ष और विजय के लिए ही निर्मित हुआ है। मस्तक पर चोट का चिह्न उसकी संघर्ष यात्रा का प्रमाण है और नेत्रों की रक्तिम आभा उसके आत्मविश्वास की परिचायक है।

कामेश्वरीस्तुतिः

स्वायम्भुव मनु की तीन पुत्रियाँ थीं – अकुति, देवहूति और प्रसूति।

किसी भी जातक जातिका कुण्डली में शैय्या सुख कारक योग

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