
गांव की पुरानी बाज़ार में एक छोटा सा दुकान था — “रफ़ूवाला”।
दुकान इतना छोटा कि अंदर खड़े हो जाओ तो बाहर की दुनिया भूल जाओ।
दीवारों पर टंगे पुराने कोट, फटी हुई शालें, घिसे हुए स्वेटर… और टेबल पर एक छोटा सा लेंस।
दादाभाई का काम सिर्फ एक — रफ़ू।
रफ़ू मतलब सिर्फ सुई-धागे का काम नहीं।
रफ़ू मतलब फटे हुए को इतनी सावधानी से जोड़ना कि फट कहाँ था, यह भी पता न चले।
लेकिन यह काम हर किसी के बस की बात नहीं।
क्योंकि सिर्फ सुई-धागा होने से रफ़ू नहीं होता।
इसके लिए चाहिए — वर्षों का अनुभव, धैर्य, और कपड़े की भाषा समझने वाली नज़र।
उस दिन दादाभाई की दुकान पर एक युवक आया। हाथ में एक पुराना स्वेटर था।
“भाई… ये रफ़ू हो जाएगा क्या?”
भाई ने लेंस लगाकर स्वेटर देखा।
फट काफी बड़ा था।
उन्होंने शांत होकर कहा,
“रफ़ू हो जाएगा… लेकिन समय लगेगा।”
युवक थोड़ा चिढ़कर बोला,
“इतना समय क्यों?
दो टांके मार दो, हो जाएगा ना?”
भाई हल्का सा मुस्कुराए।
“बेटा… दो टांके लगाना सिलाई है।
लेकिन रफ़ू मतलब ज़ख्म को छिपाना।”
उसी समय दुकान में एक बुजुर्ग आदमी बैठा था।
वह सब सुन रहा था।
उसने धीरे से कहा,
“भाई… कपड़े को तो रफ़ू होता है,
पर रिश्तों को होता है क्या?”
दुकान में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
उस बुजुर्ग का नाम था दत्ताभाऊ।
उनका एक जिगरी दोस्त था — गणेश।
स्कूल में साथ, कॉलेज में साथ, शादी में भी एक-दूसरे के साथ।
लोग कहते थे,
“ये दोनों दोस्त नहीं…
एक ही आत्मा के दो हिस्से हैं।”
लेकिन जिंदगी में एक दिन ऐसा आया…
व्यवसाय में पैसा आया।
पद, प्रतिष्ठा और सत्ता आई।
और उसके साथ आई —
अहंकार की एक छोटी सी दरार।
शुरुआत में वो दरार दिखाई नहीं दी।
फिर गलतफहमियां बढ़ीं।
एक-दूसरे पर शब्दों के वार हुए।
और एक दिन…
रिश्ता टूट गया।
दत्ताभाऊ धीमे स्वर में बोले,
“शुरुआत में लगा… दो फोन कर लेंगे तो सब ठीक हो जाएगा।
लेकिन अहंकार का धागा बहुत कड़ा होता है।”
साल बीत गए।
दोनों अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ गए।
लेकिन अंदर कहीं एक जगह खाली रह गई।
भाई चुपचाप रफ़ू कर रहे थे।
उन्होंने कहा,
“दत्ताभाऊ… कपड़ा फटता है तो लोग तुरंत लेकर आ जाते हैं।
लेकिन रिश्ता फटता है तो लोग रुक जाते हैं।
अहंकार को सूखने देते हैं… ज़ख्म को गहरा होने देते हैं।”
“और जब रफ़ू कराने आते हैं…”
उन्होंने स्वेटर उठाकर दिखाया,
“तो धागा नहीं मिलता… रंग नहीं मिलता…
और दरार बहुत बड़ी हो चुकी होती है।”
दत्ताभाऊ की आंखों में आंसू आ गए।
उन्होंने पूछा,
“भाई… फिर उपाय क्या है?”
भाई ने सुई धीरे से रख दी।
“उपाय सिर्फ एक…
रफ़ू जल्दी करना।”
“दरार दिखते ही बैठ जाना।
धागा हो धैर्य का, सुई हो समझदारी की,
और गांठ हो माफ़ी की।”
स्वेटर तैयार हो गया।
फट कहाँ था, यह पहचानना भी मुश्किल था।
युवक आश्चर्य से बोला,
“भाई… सच में दिख ही नहीं रहा!”
दादाभाई बोले,
“क्योंकि मैंने सिर्फ टांके नहीं लगाए…
कपड़े के धागों से ही धागा निकालकर रफ़ू किया है।”
दत्ताभाऊ उठे।
उन्होंने फोन निकाला।
कई सालों बाद एक नंबर मिलाया।
फोन के दूसरी तरफ से आवाज आई…
“हैलो…?”
दत्ताभाऊ की आवाज कांप गई।
“गण्या…
हमारी दोस्ती को थोड़ा रफ़ू करना है…
समय है क्या?”
उस दिन दादाभाई दुकान बंद करते हुए धीरे से बोले —
“कपड़ों का रफ़ू मैं कर सकता हूं…
लेकिन रिश्तों का रफ़ू इंसान को खुद करना पड़ता है।”
क्योंकि…
फटने में एक पल लगता है,
लेकिन रफ़ू करने में कभी-कभी पूरी जिंदगी लग जाती है।