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चरक संहिता - (रोगभिषग्जितीय – वमन द्रव्यों का वर्णन)

यानि तु खलु वमनादिषु भेषज द्रव्याण्युपयोगं गच्छन्ति ताम्बनु- व्याख्यास्यन्ते । तद्यथा-फल- जीमृत केश्वा धामार्गव कुटज कृतवेधन- फलानि, फल- जीमूत के कुधाभार्गव पत्र-पुष्पाणि आरग्बधवृक्षक- मदन-स्वादु-कण्टक-पाठा-पाटला- शाङ्गमूर्वा-सप्तपर्ण-न-माल पंचु- मर्द – पटोल- सुषवी गुडूची-चित्रक-सांमबल्क द्वीवि-शिम-मूल- कषार्यश्व, मधुक मधूक कोविदार कर्बुदार-जीप-निचुल-विम्बी शणपुष्पी सदापुष्पी – प्रत्यक्पुषपी-कषायैश्व, एला-हरेणु-प्रियंगु पृथ्वीका कुम्कुरुतगर-नलद- हीर-वाली- गोपी-कषायेच, इक्षुकाण्डवालिका-भ-पोट-का- लंकृत-कषायैश्च, सुमना-सौमनस्यायनी-हरिद्रा-दारुहरिद्रा- वृखीर- पुनर्नवा – महासहा- क्षुद्र सहा- कषायैश्च शाल्मलि शाल्मलिक-भद्रापपादि कोद्दालक- धन्वन-राजादनोपचित्रा-गोपी टाटिका-कपायैश्च, पिप्पली- पिप्पलीमूल- चव्य-चित्रक- शृङ्गवेर सर्पप-फाणित क्षीर-क्षार लवणोदकैश्व यथालाभं यथेष्टं वाऽप्युपसंस्कृत्य वर्तिक्रिया चूर्णावलेह स्नेह कषाय-मांस- रस- यवागू-यूष- काम्बलिक-क्षीरोप घेयान्मोदकानन्यश्च योगान विवि – धाननुविधाय यथाह वमनाहय दद्याद्विधिवद्वमनमिति कल्पसंग्रहो वमनद्रव्याणाम् । कल्परत्वेषां विस्तरेणोत्तरकालमुपदेक्ष्यते ॥१३३॥

 

*वमनोपयोगी द्रव्यः – वमन आदि कार्यों में जो औषध द्रव्य काम में आते हैं उनका वर्णन करते हैं। जैसे :–*

 

*वमन द्रव्य – फल (मदन फल), जीमूत (तुरई, मोथा, नागर मोथा), इक्ष्वाकु (कड़वी तुरई), धामार्गव (कोषातकी), कुटज (कुड़ा), कृतवेधन (तुरई, कोसाटकी) – इनके फल लेने चाहियें ।*

 

*फल, जीमूत (नागर मोथा; देवताड़ वृक्ष), ईक्ष्वाकु (कड़वी लौकी, तिक्तलौंकी), धामार्गव (धामासा, धमासा वनस्पतियाँ) – इनके पत्ते और फूल ।*

 

*अमलतास, कुड़ा मैनफल, विकङ्कत, पाठा, पाटला, गुञ्जा, मूर्वा, सतवन, नाटाकरञ्ज, नीम, परवल, करेला, गिलोय, चीता, खैर, शतावरी, कंटेरी (छोटी), शोभाञ्जन – इनकी जड़ों का कषाय (काढ़ा) बना कर देवे।*

 

*महुवा, मुलहठी, सफेद कचनार, लाल कचनार नीम, अम्लवेतस कन्दूरी, झनझनिया, लाक आक, अपामार्ग – इनका कषाय प्रयोग करना चाहिये।*

 

*बड़ी इलायची, रेणुका (मेथी के बीज), फूल प्रियंग, छोटी इलायची, धनिया, तगर, जटामांसी, खस, तालीशपत्र, उशीर, नेत्रवाला – इनके कषाय का प्रयोग करना चाहिये ।*

 

*गन्ना, काण्डेत्दु, कुश, होगळ, कसोदी, तगर – इनके कषाय को देवे।*

 

*चमेकी, चमेली की कली, हल्दी, दारूहल्दी, श्वेत पुनर्नवा, काल पुनर्नवा, माषपर्णी, मूंगपर्णी – इनका कषाय देवे ।*

 

*सिम्बल, रोहेड़ा, भादाली, रास्ना, कलम्बी, बहुवार, धामन, क्षीरणी वृक्ष, पूश्नपर्णी, सारिवा, सिंघाड़ा – इनका कषाय देवे ।*

 

*पिप्पली, पिप्पलीमूल, चविका, चीता, सोंठ, सरसों, फाणित (राव), दूध, क्षार और नमक – इनका कषाय देना चाहिये ।*

 

*अपना इच्छा के अनुसार, दोष दूष्य की अपेक्षा से प्रयोजनानुसार वर्ति, चूर्ण, अवलेह, घी, तेल आदि, कषाय, मांस रस, यवागू (लप्सी), यूष, काम्बलिक [*], दूध, इनको मिलाकर बनाये लड्डू तथा अन्य खाद्य पदार्थ तैयार करके वमन के योग्य व्यक्ति को – वमन विधि से खाने के लिये देना चाहिये ।*

 

[*] काम्बळिक यूष का लक्षण – ‘पिशितेन रसस्तत्र यूषो धान्यैः खटः फलैः । मूलैम तिहल्काम्लप्रायः काम्बलिकः स्मृतः ॥ अष्टांगसंग्रह – सूत्रस्थान ॥

 

*यह वमन द्रव्यों का कल्प संक्षेप में कह दिया है । वमन द्रव्यों के कल्प को पीछे कल्पस्थान में विस्तार से कहेंगे ॥१३३॥*

 

विरेचनद्रव्याणि तु श्यामा-त्रिवृधतुरंगुल-तिल्यक- महावृक्ष- सप्तला- शङ्खिनी- दन्ती- द्रवन्तीनां क्षीर-मूळ-स्वक्पत्र-पुष्प-फलानि यथायोगं तैस्तैः क्षीर-मूल-श्वक्पत्र- फलैर्विक्लिप्ताविक्लिप्तेरजगन्धाश्वगन्धाजशृङ्गी-क्षीर- णी-नीलिनी-क्ली तक कषायैश्च प्रकीर्योदकीर्या-मसूर विला-कम्पिल्लक- विडंग- गवाक्षी-कषायैश्व, पीलु प्रियाल सद्वीका काश्मर्य-परूषक-बदर- दाडिमामलक हरीतकी विभीतक पृथ्वीर- पुनर्नवा विदारिगन्धादि कक्षा- ये, शीधु-सुरा-सौवीरक-तुषोदक-मैरेय- मेदक-मदिरा-मधु-मधूलक-धा- न्याम्ल – कुवल-बदर – खर्जूर-कर्कन्धुभिश्च दधि-दधिमण्डोदश्विद्भिश्च, गोमहिष्यजावीनां च क्षीर-मत्रैर्यथालाभं यथेष्टं वाऽप्युपसंस्कृत्य वर्ति- क्रिया चूर्णासव-लेह – स्नेह कषाय- मांसरस यूषकाम्बलिक यवागू-क्षीरोप- धेयानमोदकानन्य भक्ष्यप्रकारान् विविधाश्च योगाननुविधाय यथार्ह विरेचनाय दद्याद्विरेचनमिति कल्पसंग्रहो विरेचनद्रव्याणाम् । कल्प- स्त्वेषां विस्तरेण यथावदुत्तरकालमुपदेक्ष्यते ॥१३४॥

 

*विरेचन द्रव्य – काली निशोथ, सफेद निशोथ, अमलतास, लोध, स्नुही, शिकाकाई, शंखपुष्पी, दन्ती, द्रवन्ती (मोगलई एरण्ड) इनके दूध, मूल, त्वचा, पत्ते, पुष्प, और फूल ये छः (६) विरेचनाश्रय द्रव्यों को मिला कर अथवा पृथक-पृथक रूप से प्रयोग करना चाहिये ।*

 

*अजवायन, असगन्ध, मेढ़ाशृङ्गी, दूर्वा, नीलनी, मुलहठी, इन के कषाय कर देते ।*

 

*प्रकीर्य और उदकीर्य (दो प्रकार का करंज), श्यामलता, कमीला, बायविडंग, इंद्रायण इनके कषाय का उपयोग करे।*

 

*पीलु, पियाल, मुनक्का, गम्भारी, फालसा, बेर, अनारदाना, आवळा, हरड़, बहेड़ा, श्वेत, और लाल पुनर्नवा, बिदारीगन्धा, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, और छोटी कटेरी (ह्रस्वपंचमूल) इनके कषाय का प्रयोग करना चाहिये।*

 

*सीधु, सुरा, काञ्जी, तुषोदक (धान्याम्ल), मैरेय (सुरा और आसव को मिलाकर तैयार की सुरा), भेदक, मदिरा, मधु (द्राक्षा-सुरा), मधूलिका, धान्याम्ल, कुवल, बदर और कर्कन्धु (बेरों के भेद हैं) और खजूर, दही, दही का मण्ड मस्तु, उदश्चित् (दही में आधा पानी मिलाकर तैयार की छाछ), गाय, भैंस, बकरी और भेड़ इनमें से जिसका मूत्र या दूध मिले उनसे वर्ति, चूर्ण, अवलेह, स्नेह, कषाय, माँस रस, यूष, काम्वलिक, यवागू, क्षीर, तथा लड्डू और अन्य खाद्य पदार्थों को तैयार करके विरेचन के योग्य व्यक्ति को विरेचन विधि से खाने के लिये देना चाहिये।*

 

*यह विरेचन द्रव्यों का संग्रह संक्षेप में कह दिया है । विस्तार से कल्पस्थान में कहेंगे ॥१३४॥*

 

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