
हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व माना गया है। प्रत्येक अमावस्या अपने आप में पवित्र होती है, लेकिन जब अमावस्या मंगलवार के दिन आती है, तो उसे भौमवती अमावस्या कहा जाता है। ‘भौम’ शब्द का संबंध मंगल ग्रह और मंगलवार से है। इसलिए इस दिन का प्रभाव और पुण्यफल कई गुना बढ़ जाता है। मान्यता है कि इस तिथि पर किए गए स्नान, दान, जप और पितृ तर्पण से विशेष फल प्राप्त होता है तथा जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं।
भौमवती अमावस्या का अर्थ और ज्योतिषीय आधार
‘भौम’ शब्द का अर्थ है पृथ्वी पुत्र या मंगल। पौराणिक कथाओं के अनुसार मंगल को पृथ्वी का पुत्र माना गया है। जब अमावस्या तिथि मंगलवार को पड़ती है, तब यह विशेष संयोग बनता है। ज्योतिष शास्त्र में मंगल को शक्ति, साहस, भूमि, रक्त और ऊर्जा का कारक माना गया है।
अमावस्या स्वयं चंद्रमा के लुप्त होने की तिथि है, जो आत्मचिंतन, साधना और पितृ कार्यों के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है। जब यह तिथि मंगल के दिन आती है, तो यह संयोजन व्यक्ति को नकारात्मक शक्तियों से रक्षा, ऋण मुक्ति, शत्रु बाधा निवारण और भूमि संबंधी कार्यों में सफलता प्रदान करने वाला माना जाता है।
पौराणिक मान्यता
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भौमवती अमावस्या पर पवित्र नदियों में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होता है। विशेष रूप से भगवान शिव और हनुमान जी की उपासना इस दिन अत्यंत फलदायी मानी गई है। मंगलवार होने के कारण हनुमान जी की आराधना से भय, रोग और शत्रु बाधाएँ समाप्त होती हैं।
कुछ कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि इस दिन पीपल वृक्ष की पूजा और परिक्रमा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं।
व्रत और पूजा विधि
भौमवती अमावस्या के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए। यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी या तीर्थस्थल में स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लिया जाता है।
4- दान-पुण्य – गरीबों को अन्न, वस्त्र, गुड़, मसूर दाल, लाल वस्तुएँ अथवा दक्षिणा देने से मंगल दोष शांत होता है।
जो व्यक्ति पूर्ण व्रत नहीं रख सकते, वे फलाहार लेकर भी श्रद्धा से पूजा कर सकते हैं।
पितृ कार्यों का विशेष महत्व
अमावस्या तिथि पितरों को समर्पित मानी जाती है। भौमवती अमावस्या पर पितृ तर्पण करने से पितृ दोष की शांति होती है। जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष या मंगल दोष होता है, उनके लिए यह दिन विशेष उपाय करने का अवसर होता है।
माना जाता है कि इस दिन किया गया तर्पण पितरों को तृप्त करता है और उनके आशीर्वाद से परिवार में सुख-शांति और उन्नति आती है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण
भौमवती अमावस्या केवल बाहरी पूजा-अर्चना का दिन नहीं है, बल्कि यह आत्मनिरीक्षण और साधना का भी समय है। अमावस्या अंधकार का प्रतीक है, जो यह संदेश देती है कि जीवन में चाहे कितनी भी अंधकारमय परिस्थितियाँ क्यों न हों, श्रद्धा और भक्ति के माध्यम से प्रकाश प्राप्त किया जा सकता है।
मंगल ऊर्जा और साहस का प्रतीक है। इसलिए इस दिन की साधना व्यक्ति को मानसिक दृढ़ता, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है।
स्त्रियों के लिए विशेष महत्व
कई स्थानों पर विवाहित स्त्रियाँ इस दिन व्रत रखकर अपने पति की लंबी आयु और परिवार की समृद्धि की कामना करती हैं। वे पीपल वृक्ष की पूजा कर अखंड सौभाग्य की प्रार्थना करती हैं।
ऐसा माना जाता है कि भौमवती अमावस्या का व्रत करने से वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है और ग्रहों की अशुभ स्थिति में सुधार होता है।
सामाजिक और धार्मिक महत्व
भौमवती अमावस्या केवल व्यक्तिगत साधना का अवसर नहीं है, बल्कि यह समाज में दान और सेवा की भावना को भी बढ़ावा देती है। इस दिन जरूरतमंदों की सहायता करना, गौसेवा करना और मंदिरों में अन्नदान करना विशेष पुण्यदायी माना गया है।
दान करने से व्यक्ति के भीतर करुणा और विनम्रता का विकास होता है। यही इस पर्व का वास्तविक संदेश भी है — अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के लिए कुछ करना।
क्या करें और क्या न करें
क्या करें:
क्या न करें:
भौमवती अमावस्या एक अत्यंत शुभ और दुर्लभ संयोग है। यह दिन आत्मशुद्धि, पितृ तर्पण, दान और साधना के लिए विशेष माना गया है। इस दिन की गई पूजा और सेवा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है।
अमावस्या का अंधकार हमें यह सिखाता है कि जीवन में जब भी अंधेरा छाए, तो श्रद्धा, संयम और सत्कर्मों का दीपक जलाकर हम प्रकाश की ओर बढ़ सकते हैं। मंगल के प्रभाव से यह तिथि साहस और ऊर्जा प्रदान करती है।
इस प्रकार भौमवती अमावस्या केवल एक तिथि नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण, कर्तव्यबोध और पुण्य संचय का पावन अवसर है।