Sshree Astro Vastu

बापू

पुणे के सदाशिव पेठ इलाके के एक बड़े मेडिकल स्टोर में शाम के समय बहुत भीड़ थी। युवा लड़के-लड़कियाँ और बुज़ुर्ग लोग दवाइयाँ लेने के लिए खड़े थे।
उसी समय काँच के दरवाज़े के पास 50–55 साल का एक आदमी आकर खड़ा हो गया। उसका नाम था

बापू की हालत देखने लायक नहीं थी। शरीर पर फटा हुआ शर्ट था, जिसमें 5–6 जगह गाँठें लगी थीं। बढ़ी हुई दाढ़ी, बिखरे बाल और शरीर से अजीब-सी बदबू आ रही थी। वह एक कचरा बीनने वाला (Ragpicker) था।


डरते-डरते वह काउंटर के पास आया।

वहाँ खड़े एक कॉलेज के लड़के ने नाक पर रुमाल रख लिया और बोला,
“ए काका, थोड़ा दूर खड़े रहो ना। बदबू आ रही है। कभी-कभी नहाया भी करो।”

बापू ने सिर झुका लिया और थोड़ा पीछे हट गया।

जब भीड़ कम हुई तो उसने जेब से मुड़ी-तुड़ी 10-20 रुपये की नोटें और कुछ सिक्के काउंटर पर रखे और बहुत धीमी आवाज़ में मेडिकल वाले से कहा,
“साहब… एक… वो… सैनिटरी पैड का पैकेट दे दो।”

यह सुनते ही दुकान में सन्नाटा छा गया।

मेडिकल वाले ने गुस्से से पूछा,
“क्या चाहिए?”

बापू ने फिर कहा,
“वो… औरतों के… पैड दे दीजिए।”

पास खड़े 3-4 नौजवान आपस में देखकर हँसने लगे।
एक ने ताना मारा,
“क्या काका, इस उम्र में? गर्लफ्रेंड जवान है क्या? या खुद के लिए चाहिए?”

दुकान में ठहाके गूंज उठे।

मेडिकल वाला चिल्लाया,
“ए बाबा, यहाँ मज़ाक चल रहा है क्या? तुझे ये क्यों चाहिए? खाने को रोटी नहीं और ये खरीदने के पैसे कहाँ से आए? ज़रूर शराब पीकर आया होगा। चल, निकल यहाँ से!”

बापू की आँखों में आँसू भर आए। हाथ जोड़कर बोला,
“साहब, मज़ाक मत कीजिए। बहुत ज़रूरत है। ये लीजिए पैसे, पूरे हैं।”

मेडिकल वाले ने मजबूरी में गुस्से से एक पैकेट काउंटर पर फेंक दिया,
“ले और मर इधर से।”

बापू ने वह पैकेट अपनी गंदी थैली में छुपाया और सिर झुकाए चोर की तरह वहाँ से निकल गया।

यह पूरा दृश्य वहीं खड़े सागर नाम के एक पत्रकार ने देखा। बापू की आँखों में बेबसी और दर्द देखकर उसे शक हुआ—
“कोई भिखारी ये क्यों खरीदेगा?”

सागर ने अपनी गाड़ी निकाली और चुपचाप बापू का पीछा करने लगा।

बापू शहर के बाहर पुल के नीचे बनी एक झुग्गी बस्ती में पहुँचा। वहाँ गंदगी थी, सूअरों का आतंक था।
एक टिन की झोपड़ी के पास वह रुका।
सागर दूर से सब देख रहा था।

उस झोपड़ी में 25–26 साल की एक मानसिक रूप से बीमार युवती बैठी थी। उसके कपड़े फटे थे, बाल उलझे हुए थे और वह शून्य में देख रही थी। उसे अपने शरीर का भी होश नहीं था।

बापू ने आसपास देखा और पास रहने वाली एक औरत को आवाज़ दी,
“ताई… ओ ताई… इधर आओ।”

वह औरत आई। बापू ने अपनी थैली से सैनिटरी पैड का पैकेट और एक वडापाव निकाला और बोला,
“ताई, इसे चार दिन हो गए हैं… कपड़े गंदे हो गए हैं। इसे कुछ समझ नहीं आता। लोग हँसते हैं, पत्थर मारते हैं।

ये पैड ले लो, इसे साफ करो, ये लगा दो। और ये वडापाव इसे खिला देना। मैं बाहर खड़ा रहता हूँ।”

वह औरत लड़की को अंदर ले गई।
बापू बाहर पत्थर पर बैठकर पहरा देने लगा, ताकि कोई उसे गलत नज़र से न देखे।

यह दृश्य देखकर झाड़ी के पीछे छिपे सागर के रोंगटे खड़े हो गए। उसे मेडिकल स्टोर में किए गए ताने याद आ गए।

सागर बापू के पास आया।
“काका…”

बापू चौंक गया।

सागर ने पूछा,
“ये लड़की कौन है? आपकी क्या लगती है?”

बापू ने आँखें पोंछीं, गहरी साँस ली और बोला:

“मुझे नहीं पता साहब, ये कौन है। छह महीने पहले इसे कूड़े के पास पाया था। लोग इसे पागल कहकर पत्थर मारते थे। कुछ दरिंदे रात में इस पर टूट पड़ने वाले थे।

मेरी न पत्नी है, न बच्चे। मैंने सोचा, अगर मैंने इसकी अनदेखी की, तो ये दुनिया इसे नोच-खसोट कर खा जाएगी।

ये पागल है साहब, इसे नहीं पता वो ‘दिन’ क्या होते हैं। जब खून से कपड़े भर जाते हैं तो मक्खियाँ बैठती हैं, इंफेक्शन हो जाता है।

लोग कहते हैं, तू भिखारी है, तुझे क्या मतलब?
पर मैं ‘बाप’ तो बन सकता हूँ ना?

लोग मेडिकल में मुझ पर हँसते हैं, हँसने दो।
जब तक ये बापू ज़िंदा है, इस लड़की की इज़्ज़त सड़क पर नहीं जाने देगा।”

सागर के पास कहने के लिए शब्द नहीं थे।

जिस आदमी को मेडिकल स्टोर में चरित्रहीन और पागल समझकर भगाया गया था, वही आदमी एक बेसहारा मानसिक रोगी लड़की का बाप बनकर उसकी इज़्ज़त की रक्षा कर रहा था।
समाज के तथाकथित सभ्य लोगों से कहीं ज़्यादा साफ़ दिल इस कचरा बीनने वाले बापू का था।

सागर ने जेब के सारे पैसे निकालकर बापू को देने चाहे।

लेकिन बापू ने मना कर दिया और मुस्कुराकर बोला,
“साहब, पैसे नहीं चाहिए। बस जब कभी मैं दुकान में ये माँगने आऊँ, तो लोगों से कहना—हँसो मत। क्योंकि एक बाप को अपनी बेटी के लिए ये माँगने में बहुत हिम्मत लगती है।”

किसी के बाहरी रूप या उसकी खरीदी हुई चीज़ों के आधार पर उसका मज़ाक मत उड़ाइए।
दुनिया में कई रिश्ते खून के नहीं होते, पर इंसानियत के होते हैं।
एक स्त्री की इज़्ज़त बचाने के लिए अमीर होना ज़रूरी नहीं—
सिर्फ़ पुरुष होना काफी नहीं, इंसान होना ज़रूरी है।

कला से करुणा तक: Shreeyash Pravin P की रंगों से सजी मानवीय पहल

आप सभी लोगों से निवेदन है कि हमारी पोस्ट अधिक से अधिक शेयर करें जिससे अधिक से अधिक लोगों को पोस्ट पढ़कर फायदा मिले |
Share This Article
error: Content is protected !!
×