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अष्टकवर्ग : गणितीय आधार पर आधारित फलादेश की शोधपरक दृष्टि

वैदिक ज्योतिष की विभिन्न पद्धतियों में अष्टकवर्ग एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं वैज्ञानिक आधार प्रदान करने वाली प्रणाली है, जिसके माध्यम से ग्रहों के बल, अनुकूलता और फलप्रदता का सूक्ष्म विश्लेषण किया जा सकता है। यद्यपि अधिकांश ज्योतिष विद्यार्थी अष्टकवर्ग से परिचित होते हैं, तथापि इसका सम्यक् उपयोग तभी संभव है जब इसके गणितीय स्वरूप—विशेषतः भिन्नाष्टक, सर्वाष्टक, राशि पिंड और ग्रह पिंड—का विधिवत् निर्माण एवं विवेचन किया जाए। इन तत्वों की गहन समझ न केवल परंपरागत फलादेश को पुष्ट करती है, बल्कि निर्णय प्रक्रिया में वस्तुनिष्ठता भी प्रदान करती है।

शोध की दृष्टि से देखा जाए तो अष्टकवर्ग मात्र एक अंक-प्रणाली नहीं, अपितु ग्रह-राशि-संबंधों का संरचित प्रतिरूप है, जिसके माध्यम से विभिन्न भावों से संबंधित संभावनाओं का मात्रात्मक आकलन किया जा सकता है। जब भिन्नाष्टक के माध्यम से प्रत्येक ग्रह की व्यक्तिगत प्रभाव-रेखाएँ निर्धारित की जाती हैं और सर्वाष्टक द्वारा समग्र ग्रह-ऊर्जा का संकलन किया जाता है, तब यह प्रणाली अधिक व्यापक हो जाती है। इसी प्रकार राशि पिंड और ग्रह पिंड का निर्माण घटनाओं के समय-निर्धारण एवं तीव्रता-निर्धारण में सहायक सिद्ध होता है।

 

विशेष रूप से, वर्ग कुंडलियों—जैसे चतुर्थांश (D–4)—में अष्टकवर्ग का प्रयोग अत्यंत उपयोगी है। यदि D–4 का सर्वाष्टक तैयार किया जाए और चतुर्थ भाव में स्थित राशि को प्राप्त अंकों का विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि किन ग्रहों ने उस भाव को अधिक बल प्रदान किया है। सामान्यतः पाँच या उससे अधिक अंक देने वाले ग्रह उस भाव से संबंधित फल को अधिक सक्रिय बनाते हैं। जब ऐसे ग्रह गोचर में उसी राशि में प्रवेश करते हैं या उससे दृष्टि संबंध बनाते हैं, तब उनके स्वभाव, तत्त्व, कारकत्व तथा संबंधित राशि के गुणधर्मों के आधार पर शुभ परिणाम प्राप्त होने की प्रबल संभावना बनती है।

यह सिद्धांत केवल चतुर्थ भाव तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य सभी भावों पर समान रूप से लागू होता है। ग्रहों के संयोग, दृष्टि-संबंध और गोचर-परिवर्तन जब अष्टकवर्गीय बल के साथ समन्वित होते हैं, तब फलादेश अधिक सटीक हो जाता है। यदि इसमें महादशा-अंतर्दशा तथा पंचमहाभूत तत्त्वों का सम्यक् विश्लेषण भी सम्मिलित किया जाए, तो निर्णय में स्पष्टता और वैज्ञानिकता दोनों का समावेश हो जाता है।

 

उदाहरणार्थ, यदि किसी जातक की D–4 कुंडली के चतुर्थ भाव में मिथुन राशि स्थित हो और सर्वाष्टक में शुक्र ने मिथुन को छह अंक प्रदान किए हों, तो गोचर में जब शुक्र मिथुन से दृष्टि-संबंध बनाएगा, तब भूमि, भवन, वाहन अथवा आभूषण से संबंधित लाभकारी योग बनने की प्रबल संभावना रहती है। ऐसे समय में शुक्र को बलवान करने हेतु उपयुक्त उपायों की अनुशंसा भी अधिक सार्थक सिद्ध होती है, क्योंकि अष्टकवर्गीय संकेत इसके पक्ष में समर्थन प्रदान करते हैं।

 

इस प्रकार, अष्टकवर्ग केवल एक सहायक उपकरण नहीं, बल्कि फलादेश की एक स्वतंत्र एवं सुव्यवस्थित पद्धति है, जिसे दशा, गोचर और तत्त्व-सिद्धांत के साथ समन्वित कर प्रयोग किया जाना चाहिए। आगामी लेखों में अष्टकवर्ग आधारित विभिन्न प्रयोगों, सिद्धांतों और व्यावहारिक सूत्रों को क्रमशः प्रस्तुत किया जाएगा, जिससे सभी भावों से संबंधित फल-विचार को अधिक व्यवस्थित, तर्कसंगत और शोधपरक रूप में समझा जा सके।

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