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अरुणा शानबाग: 42 वर्षों का ‘कोमा’ में मौन और ‘इच्छा मृत्यु’ की ऐतिहासिक लड़ाई

27 नवंबर 1973 की वह काली रात अरुणा के जीवन की आखिरी ‘सचेत’ रात साबित हुई। केईएम हॉस्पिटल में नर्स के रूप में कार्यरत अरुणा पर सोहनलाल वाल्मिकी नामक एक सफाई कर्मचारी ने अमानवीय हमला किया। उसने कुत्ते को बांधने वाली जंजीर से अरुणा का गला कस दिया, जिससे उनके मस्तिष्क तक ऑक्सीजन की आपूर्ति बंद हो गई। इस एक घटना ने अरुणा को हमेशा के लिए ‘पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (PVS) में पहुंचा दिया। अरुणा जीवित थीं, लेकिन वह केवल सांस ले रही थीं; उन्हें देखना, बोलना या किसी चीज़ का अनुभव करना संभव नहीं था।

 

अगले 42 वर्षों तक अरुणा के जीवन का केंद्र केईएम हॉस्पिटल ही बना रहा। उनके परिवार वालों ने उन्हें छोड़ दिया, लेकिन वहां की नर्सों ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा। उनकी मालिश करने से लेकर उन्हें खाना खिलाने तक, हर काम इन नर्सों ने एक मां की तरह किया। यह सेवा इतनी निस्वार्थ थी कि जब अरुणा के लिए ‘दया मृत्यु’ (Euthanasia) की मांग उठी, तो इन्हीं नर्सों ने इसका जोरदार विरोध किया। अरुणा उनके लिए ‘बेबी’ थीं और उन्हें मारने का अधिकार किसी को नहीं है—यह उनका दृढ़ विश्वास था।

दया मृत्यु की यह कानूनी लड़ाई पत्रकार पिंकी विरानी ने 2011 में सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचाई। उनकी मांग थी कि अरुणा को इस असहनीय पीड़ा से मुक्ति दी जाए। उस समय भारत में दया मृत्यु को लेकर कोई स्पष्ट कानून नहीं था। 7 मार्च 2011 को सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने अरुणा को दया मृत्यु देने से इंकार कर दिया, लेकिन भारत के इतिहास में पहली बार ‘पैसिव यूथेनेशिया’ यानी ‘निष्क्रिय दया मृत्यु’ को कानूनी मान्यता दे दी।

इस निर्णय के पीछे का कारण स्पष्ट था। यदि कोई मरीज ऐसी अवस्था में हो जहां उसके ठीक होने की कोई संभावना न हो, तो उसे कृत्रिम जीवनरक्षक प्रणाली (Life Support) हटाकर सम्मानपूर्वक मरने की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि इसके लिए हाईकोर्ट की अनुमति और डॉक्टरों के पैनल की निगरानी अनिवार्य कर दी गई। सीधे शब्दों में कहें तो अरुणा ने स्वयं मृत्यु नहीं चुनी, लेकिन उन्होंने भविष्य में हजारों असाध्य रोगियों के लिए सम्मानपूर्वक मृत्यु का रास्ता खोल दिया।

आज 2026 में पीछे मुड़कर देखने पर अरुणा का मामला और भी अधिक महत्वपूर्ण लगता है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में ‘लिविंग विल’ (Living Will) से जुड़े नियमों को और सरल बना दिया है। अब कोई भी व्यक्ति पहले से लिखकर यह तय कर सकता है कि यदि वह अरुणा जैसी कोमा की स्थिति में पहुंच जाए, तो उसे कृत्रिम जीवनरक्षक उपचार न दिया जाए। विज्ञान की प्रगति और कानून में सुधार—दोनों ही कहीं न कहीं अरुणा के उन 42 वर्षों के मौन संघर्ष पर खड़े हैं।

18 मई 2015 को अरुणा ने आखिरकार अंतिम सांस ली। उन्हें निमोनिया हो गया था और 66 वर्ष की आयु में उनका शरीर थक चुका था। अरुणा शानबाग केवल एक पीड़ित महिला नहीं थीं, बल्कि वह भारतीय चिकित्सा इतिहास में ‘रोगी अधिकारों’ की सबसे बड़ी मिसाल बन गईं। उन्होंने दुनिया को यह सिखाया कि जैसे जीवन को सम्मान मिलना चाहिए, वैसे ही मृत्यु को भी सम्मान मिलना चाहिए।

एक नर्स ने बिना बोले ही भारतीय कानून को जो आवाज दी, उसका प्रभाव आज भी बना हुआ है। सम्मान के साथ जीने का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही सम्मान के साथ विदा लेने का अधिकार भी एक मूलभूत मानवीय अधिकार है।

 

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