Sshree Astro Vastu

आनन्दरामायणम् - (राम-रावण सेना का संघर्ष)...(दिन 98)

श्रीसीतापतये नमः

 

श्रीवाल्मीकि महामुनि कृत शतकोटि रामचरितान्तर्गतं (‘ज्योत्स्ना’ हृया भाषा टीकयाऽटीकितम्)

 

(सारकाण्डम्)

 

एकादश सर्गः

 

(राम-रावण सेना का संघर्ष)…(दिन 98)

〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

तब उन्होंने राम से कहा-देखिये, उस दुरात्मा ने होम आरम्भ कर दिया है। यदि उस दुर्बुद्धि मेघनाद का होम निविघ्न समाप्त हो गया तो फिर है राम। वह दैत्यों तथा देवताओं से भी अजेय हो जायगा। इसलिए शीघ्र लक्ष्मण के द्वारा मैं उसको मरवा दूंगा ॥ १७४ ॥ १७५ ॥

 

जो मनुष्य बारह वर्ष तक निद्रा तथा आहार से रहित रहा हो, उसी से ब्रह्मा ने मेघनाद की मृत्यु कही है ॥ १७६ ॥

 

लक्ष्मण जब अयोध्या से निकले हैं, तबसे निद्रा तथा आहार त्यागकर इन्होंने आपकी सेवा की है। यह मैं भली भांति जानता हूँ। पश्चात् राम की आज्ञा से लक्ष्मण तथा हनुमान आदि वीर सेनापतियों को साथ लेकर विभाषण वहाँ गये और लक्ष्मण को निकुम्भिल-का होमस्थान बताया ॥ १७७-१७९ ॥

 

वहाँ जाकर लक्ष्मण ने अङ्गद के कन्धे पर सवार होकर अग्निबाण से काँटों को जलाकर राक्षसों को मार डाला ॥ १८० ॥

 

उन्होंने गारुडास्त्र से सर्पों तथा पर्वतास्त्र से दाँतवाले सिह जादि जन्तुओं को समाप्त कर दिया। उन्होंने मेधास्त्र से अग्नि को शान्त किया। हनुमान ने क्षणभर में  वायु पी लिया और लक्ष्मण ने बायव्यास्त्र से जल को सुखा दिया ॥ १८१ ॥ १८२ ॥

 

उन सब घेरों के नष्ट हो जाने पर भी जब शत्रु का स्थान नहीं दिखायी दिया तो हनुमान् कुद्ध होकर योगिनीवट की ओर गये। वहाँ उन्हें योगिनीवट वाली गुफा दीख पड़ी, तुरन्त गुफा के द्वार पर लगे हुए पत्थर को हनुमान्‌ ने लात मारकर चूर्ण कर डाला और भीतर जाकर मेघनाद को ललकारा। तब मेघनाद ने भी तुरन्त होम छोड़ दिया ॥ १८३-१८५ ॥

 

तदनन्तर क्रोध के साथ रथ पर सवार होकर वह लक्ष्मण के समक्ष गया और अस्त्र शस्त्र, पर्वत तथा मर्मभेदी वाक्यों से उनको जीतने की इच्छा से भयानक युद्ध करने लगा। लक्ष्मण ने भी अनवरत वाण छोड़कर उसके अश्व, रथ, धनुष, ध्वजा, दृढ़ कवच तथा सारथी को क्षणभर में छिन्न-भिन्न कर दिया। तब मेघनाद भी दूसरा धनुष से तथा नीचे ही खड़े हो हजारों बाण छोड़कर शत्रु के कवच को काटने लगा। उस समय लक्ष्मण ने क्रुद्ध होकर अपने बाण से इन्द्रजित् का बाण के सहित दाहिना हाथ काटकर उसी के घर में गिराया। तव विह्वल होकर मेघनाद ने बायें हाथ में त्रिशूल सम्हाला ।। १८६-१६० ।।

 

वह उत्तम त्रिशूल लेकर लक्ष्मण को मारने के लिए दौड़ा। तब मेघनाद के त्रिशूल सहित बायें हाथ को भी सुमित्रापुत्र लक्ष्मण ने बाण से ही काटकर रावण के पास गिराया। यह देखकर लंका में सबको बड़ा आश्वर्य हुआ ।। १९१ ।। १९२ ।।

 

तब मेघनाथ मुँह फाड़-कर लक्ष्मण की ओर झपटा। तब लक्ष्मण ने भी राम का ध्यान करके रामनाम से अंकित दिव्य बाण छोड़ा। उस बाण ने जाकर पगड़ी सहित, शोभायुक्त तथा प्रदीप्त कुण्डल वाले मेघनाद के सिर को घड़ से अलग करके धरती पर गिरा दिया। यह देखकर देवतागण अतीव प्रसन्न हुए और लक्ष्मण की स्तुति करने लगे ॥ १९३-१६५ ।।

 

वे उनपर कुसुमों की वृष्टि करके आरती उतारने लगे। तब लक्ष्मण ने शांत होकर विजय शंख बजाया ॥ १६६ ॥

आप सभी लोगों से निवेदन है कि हमारी पोस्ट अधिक से अधिक शेयर करें जिससे अधिक से अधिक लोगों को पोस्ट पढ़कर फायदा मिले |
Share This Article
error: Content is protected !!
×