
श्रीसीतापतये नमः
श्रीवाल्मीकि महामुनि कृत शतकोटि रामचरितान्तर्गतं (‘ज्योत्स्ना’ हृया भाषा टीकयाऽटीकितम्)
(सारकाण्डम्)
एकादश सर्गः
रामने देखा कि भुजा कट जाने पर भी यह गर्जना करता हुआ सामने चला आ रहा है, व उन्होंने दो अर्धचन्द्राकार बाणो से उसके दोनों पैर काट दिये। ये कटे पाँव जाकर लंका के दरवाजे पर गिरे। हाथ-पाँव से रहित होकर भी कुम्भकर्ण अति भीषण बडरामल के समान मुख फाड़कर घोर नाद करता हुआ चन्द्रमा पर राहु के समान राम पर झपटा ।। १५-१६० ।।
तब राम ने तीक्ष्ण बानो ने उस का मुँह भर दिया। मुख में बाण भर जाने से बह और भी भयानक तथा क्रूद्ध हो उठा ।। १६१ ॥
तब राम ने उसपर सूर्य के समान प्रदीप्त ऐन्द्र वाण छोड़ा। उससे कुम्भकर्ण का महान सिर कटकर गिर पड़ा ॥ १६२॥
उस समय आकाश मे देवताओं ने दिव्य बाजे बजाये और पुष्पों की वर्षा करके राम की विविध स्तोत्र से स्तुति की ।। १६३ ।।
बाबा कुम्मकरण को मारा गया तथा पिता को विह्वल सुनकर रावणपुत्र मेघनाद पिता को सांत्वना देकर बोला हे पिताजी ! आप आज मेरा बल देखें ।। १६४ ।।
इतना कहकर मेघनाद तुरन्त निकुम्भिला नाम की पश्चिमी गुफा में गया। वहाँ लाल फूलों की माला तथा लाल वस्त्र धारण करके वह हवन की तैयारी करने लगा ॥ १६५ ॥
दिव्य रथ, दिव्य अस्त्र तथा जयलाभ के लिए अभिचार क्रिया करने का निश्चय करके वह गुफा के भीतर योगिनीवट के पास एकान्त में जा बैठा ।। १६६ ।।
उसने वहाँ अपनी सुरक्षा के लिये अग्नि जल बायु सिद्ध सर्प राक्षस तथा कांटों से अपने चारों ओर सात दुर्ग बना लिये ॥ १६७ ।।
होमकुण्ड के ऊपरी भाग मे अधोमुख करके एक काला साँप बाँध दिया। तदनन्तर रक्त पुष्प तथा रक्तांबर धारण करके शरीर में रक्त चन्दन लगाया ॥ १६८ ॥
लाल फूल, अक्षत, गुंजा, सरसों, चन्दन, ईख, बेर, आम, पलाश तथा भलावे की लकड़ियें, समिधा, उर्दू, मांस, भल्लातक की गुठली, आक, नीम, बीजपूर, कृष्ण धतूरा, नीबू, चिचिड़ा, बेर, चित्रक, दालक, बंधूक, नरनुण्ड, चरबी, विभीतकफल, सर्पखण्ड, मण्डक, चर्म, दांत, स्नायु, आंत, माम तथा नाना वनचरों के मास आदि से उसने मन्त्रोच्चारपूर्वक एकान्त में हवन प्रारम्भ कर दिया। सहसा विभाषण ने होम के भयानक धुएँ को उठते देखा ॥ १६९-१७३ ॥