
कुण्डली में सबसे बड़ी नजर अंदाजी तब होती है, जब किसी शुभयोग को देखकर जीवन के पूरे सुख का निर्णय कर दिया जाता है। किसी जातक की कुण्डली में विवाह का योग होते हुए भी दाम्पत्य जीवन कलह से भर सकता है, धन कमाने की योग्यता होते हुए भी कर्ज बढ़ सकता है और संतान का योग होते हुए भी संतानसुख के लिए लम्बा संघर्ष करना पड़ सकता है। इसका कारण यह है कि योग का होना और उस योग का सुखद फल दे पाना दो अलग बातें हैं। किसी भाव का स्वामी निर्बल हो, उसी भाव पर पापग्रहों का प्रबल प्रभाव हो और उस विषय का कारक ग्रह भी पीड़ित हो, तो उस क्षेत्र में दुर्योग अधिक कठोर हो जाता है। मेष लग्न में सप्तम भाव तुला में मंगल, लग्न में नीचस्थ शनि और सप्तमेश शुक्र का कन्या राशि के छठे भाव में नीचस्थ होना दाम्पत्य कलह का ऐसा ही कठोर संयोग है। मंगल सप्तम भाव में बैठकर विवाह भाव को प्रभावित करता है, शनि की सातवीं दृष्टि भी उसी भाव पर पड़ती है और विवाहेश शुक्र स्वयं नीच का होकर छठे भाव में स्थित है। यहाँ विवाह भाव, विवाहेश और दाम्पत्यकारक शुक्र तीनों प्रतिकूल स्थिति में हैं। यह मेल वैवाहिक संघर्ष, कटुता और अलगाव तक पहुँचने वाले विवाद का प्रबल दुर्योग बनाता है। प्रेम संबंधों में मिथुन लग्न के पंचम भाव तुला में राहु, पंचमेश शुक्र का अष्टम भाव मकर में और सप्तमेश गुरु का छठे भाव वृश्चिक में होना प्रेम तथा विवाह के बीच गंभीर टकराव पैदा करने वाला संयोग है। प्रेम भाव में राहु, उसके स्वामी का अष्टम भाव में जाना और विवाहेश का छठे भाव में होना संबंधों की स्थिरता को कमजोर करता है। संतानसुख में बाधा के लिए मेष लग्न के पंचम भाव सिंह में शनि, पंचमेश सूर्य का छठे भाव कन्या में होना और संतानकारक गुरु का दशम भाव मकर में नीचस्थ होना कठोर दुर्योग बनाता है। यहाँ पंचम भाव, पंचमेश और संतानकारक गुरु तीनों प्रतिकूल स्थिति में हैं, इसलिए संतानसुख का निर्णय केवल पंचम भाव देखकर नहीं किया जा सकता। कर्ज के विषय में वृषभ लग्न में षष्ठेश शुक्र का बारहवें भाव मेष में और द्वादशेश मंगल का छठे भाव तुला में होना दोनों भावेशों का राशि परिवर्तन बनाता है। यदि इसी कुण्डली में द्वितीयेश बुध अष्टम भाव धनु में राहु के साथ हो, तो ऋण, व्यय और संचित धन के बीच प्रतिकूल संबंध बनता है। यहाँ ऋण और खर्च के स्वामी परस्पर जुड़े हैं तथा धनभाव का स्वामी अष्टम भाव में राहु के साथ है। यह आर्थिक दबाव, देनदारियों और धन संचय में बाधा का गंभीर मेल है।।
मुकदमेबाजी के विषय में तुला लग्न के छठे भाव मीन में राहु तथा छठेश गुरु का अष्टम भाव वृषभ में मंगल के साथ होना विवाद और विरोध को तीव्र करने वाला दुर्योग है। छठेश का अष्टम भाव में मंगल के साथ होना और राहु का छठे भाव में बैठना शत्रुता, विवाद तथा कानूनी उलझनों के लिए प्रतिकूल संयोग बनाता है। कारोबार में मिथुन लग्न के सप्तमेश गुरु का अष्टम भाव मकर में नीचस्थ होना, द्वितीयेश चन्द्रमा का छठे भाव वृश्चिक में नीचस्थ होना और एकादशेश मंगल का बारहवें भाव वृषभ में बैठना व्यापार, पूँजी और लाभ को एक साथ प्रतिकूल स्थिति में रखता है। कारोबार का स्वामी अष्टम में, धन का स्वामी छठे में और लाभ का स्वामी बारहवें में होने से व्यापार में हानि, पूँजी फँसने और लाभ न टिकने का कठोर दुर्योग बनता है। नौकरी में बाधा के लिए वृषभ लग्न में दशमेश शनि का अष्टम भाव धनु में होना और लग्नेश शुक्र का बारहवें भाव मेष में बैठना कर्मक्षेत्र तथा जातक के बीच प्रतिकूल संबंध बनाता है। स्वास्थ्य के विषय में कर्क लग्न का लग्नेश चन्द्रमा छठे भाव धनु में शनि के साथ हो और छठेश गुरु अष्टम
भाव कुंभ में स्थित हो, तो लग्नेश, रोगभाव और अष्टम भाव के बीच कठिन संबंध बनता है। इन सभी दुर्योगों का वास्तविक फल ग्रहबल, अंश, दृष्टि, वर्गकुण्डली और दशा के संयुक्त विचार से निर्धारित होता है। किसी एक योग से तलाक, संतानहीनता, असाध्य रोग या पूर्ण आर्थिक विनाश का निर्णय करना उचित नहीं है। जब संबंधित भाव, भावेश और कारक ग्रह एक साथ पीड़ित हों और दशा भी उसी क्षेत्र को सक्रिय करे, तब दुर्योग का फल अधिक प्रबल होता है। कुण्डली में शुभयोग होने मात्र से दुर्योग निष्फल नहीं हो जाता, निर्णायक बात यह है कि संबंधित भाव को फल देने की शक्ति कितनी है और उसके विरुद्ध कितने प्रबल ग्रहयोग खड़े हैं ये सब देखना पड़ता है, और सब योग और दुर्योग का असली राज कुण्डली के वर्ग चार्ट में छुपा होता है।