
1-सूर्य यदि 6,8,12 मे हैं तो अहम् का त्याग सबसे बड़ा जीवन मे कुछ पाने का सवाल ही नहीं बनता।
2-यदि लग्न, अष्टम,द्वितीय तथा द्वादश का भाव शनि, मंगल, चंद्र तथा राहु से पीड़ित है शुक्र चंद्र अष्टम मे हैं तो व्यक्ति प्रेम मे असफल होता है तथा अच्छे बुरे का भेद करने में समस्या आ जाती है।
3- मूल नक्षत्र हमारे जिद को दर्शाता है यदि मूल नक्षत्र में बैठा हुआ कोई भी ग्रह क्रूर ग्रह से दृष्ट हो चाहे चंद्र हो सूर्य हो ऐसी स्थिति में व्यक्ति मनमानी कर सकता है और स्वयं अपने किए हुए कार्यों से परेशान हो सकता है।
4- अष्टम भाव का चंद्रमा यदि ग्रहण दोष में हो तो व्यक्ति अपने सम्मान हेतु झूठ बोलता है मैनिपुलेट करता है कोशिश करता है उसे सब प्रेम करें यदि प्रेम ना मिला तो ऐसा व्यक्ति जलन जैसी चीजों का शिकार हो जाता है।
5- चंद्रमा और केतु की युति में व्यक्ति प्रेम में अधिक डूब जाता है और अत्यधिक प्रेम करना तथा अलगाव के समय असहनीय पीड़ा उसे जिंदगी का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाती है।
6- अगर लग्न में शनि हो द्वितीय भाव में राहु हो तो व्यक्ति की वाणी स्वयं में बहुत कठोर हो जाती है ऐसा व्यक्ति ज्यादातर अपने बारे में सोचता है दूसरों के बारे में उसे ख्याल काम रहता है।
7- यदि नवम भाव का मालिक लग्न में हो और उस पर बृहस्पति की दृष्टि हो कोई पाप ग्रह ना देखें एक कोई बहुत बड़ा गुरु पूर्व जन्म के पुण्य के कारण उसे प्राप्त हो जाता है बिना मेहनत के।
9- काम क्रोध मद लोभ मोह घृणा ये अत्यधिक हो जायें तो व्यक्ती का छठवा भाव पूर्ण अशुभ हो जाता है और जीवन मे अटकले आती हैं और व्यक्ति का स्वभाव बदल जाता है और अपने ही पराये लगते हैं।
10-तृतीय भाव का स्वामी अति पीड़ित अवस्था मे व्यक्ति की शुरुआती पढ़ाई रोक देता है और और तृतीय भाव अशुभ अधिक हो तो व्यक्ति दुनिया मे कही भी हो उसका अपना पडोसी उसे अधिक परेशान करता है यदि यहाँ गुरू पीड़ित अवस्था मे हो तो व्यक्ति के घऱ के अत्यंत निकट तंत्र मन्त्र आदि करने वाला कोई व्यक्ति हो सकता है।
11- सप्तम भाव में क्रूर ग्रह हो और सप्तम भाव का स्वामी त्रिक में हो और चतुर्थ भाव में मंगल हो तो ऐसा व्यक्ति अपने घर के अंदर सुख बहुत कम पाता है वैवाहिक जीवन में हमेशा उलझन बननी तय है।
12- लग्न में बैठ अकेला चंद्रमा यदि अशुभ दृष्ट हो और अग्नि राशि 1,5, 9 में हो तो व्यक्ति बहुत चिड़चिड़ा होता है ऐसा व्यक्ति अपने व्यवहार की वजह से अपनों को खो देता है फिर बाद में ऐसा व्यक्ति शिकायत करता है कि मुझे कोई प्रेम नहीं करता माता से अनबन निश्चित है यदि चतुर्थ भाव भी पीड़ित है ऐसा व्यक्ति दुनिया में किसी भी कोने में चला जाए हमेशा मानसिक सुख से विहीन होता है।
13- जन्म कुंडली का बिगड़ा हुआ बुध मंगल के साथ हो और उस पर कोई शुभ दृष्टि ना हो अशुभ स्थान में हो सिर्फ अशुभ ग्रह से दृष्ट हो ऐसा व्यक्ति बहुत झूठ बोलता है।
14- सूर्य पर शनि और राहु की दृष्टि यदि होती है और कुंडली का दसवां भाव अशुभ दृष्ट हो तो ऐसे व्यक्ति को जीवन में बहुत बार मानहानि का सामना करना पड़ता है।
15- अष्टम भाव का अकेला चंद्र व्यक्ति को जितना डिप्रेशन में डालता है उससे कहीं अधिक व्यक्ति कामुक होता है और चंद्रमा पर यदि अशुभ दृष्टि हो और कुंडली का चौथा भाव भी पीड़ित हो तो ऐसा व्यक्ति ज्यादातर समय पर अकेला रहना पसंद करता है।
16- यदि अष्टमेश लग्न में हो और लग्न पर शुभ दृष्टि हो तो ऐसा व्यक्ति तंत्र में बड़ा माहिर होता है यदि केतु का भी प्रभाव पंचम नवम पर हो तो ऐसा व्यक्ति सधा हुआ तांत्रिक हो सकता है।
सूर्य गुरु युति क़ो जीवात्मा योग कहते हैं। सूर्य आत्मा, गुरु जीव। दोनों देव ग्रह, दोनों सात्विक ग्रह है पर फल में जमीन-आसमान का अंतर है।
अस्त गुरु का फल – सूर्य गुरु में सबसे महत्वपूर्ण
उपाय – सामान्य और अस्त दोनों के लिए
सूर्य गुरु में दिखावे का दान पाप है।
अस्त गुरु में उल्टा – पहले गुरु, फिर सूर्य। अस्त को पहले बल।
पिता से लिया कर्ज 10 गुना ब्याज से चुकाना पड़ता है। यही अस्त का प्रायश्चित है।