
एक जगह चर्चा के लिए आमंत्रित थे, साथ में एक और सज्जन थे जो शायद किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे, उन्होंने अज्ञेय को कोट किया कि पुल बनाने वाले वानर कहलाएंगे और निर्माता राम बताए जाएंगे, ऐसा कह कर उन्होंने शाहजहां और ताजमहल का किस्सा भी सुना दिया बोले ठीक इसी तरह श्रमिकों का श्रम इतिहास से गायब कर दिया जाता है। वामपंथी अक्सर आपको भ्रमित करने के लिए ऐसी हीं बातें कहते हैं। पहली दृष्टि में उनकी बात उचित और तर्कपूर्ण लगती है, ऐसी हीं बातों से भ्रम पैदा करके आपको बहलाया जाता है, और शत्रुता के बीज बोये जाते है। लेकिन एक बालिका ने इसका प्रतिउतर दिया
गौरी श्रोताओं में बैठी थी, तत्काल खड़ी हुई बोली, जिन्होंने पुल बनाया उनका नाम नल, नील, अंगद, जामवंत, सुग्रीव, केसरी और हनुमान था। जिन्हे आप वानर कहकर व्यंग्य कर रहे हैं उन्हें हम राम से पहले पूजते हैं, जिन्होंने पुल बनाया वह पीछे नहीं हैं, हनुमान चालीसा मैं रोज पढ़ती हूं मानस कभी कभी, बाकी मैं चुनौती देती हूं आपको कि एक भी वर्कर का नाम बता दें ताजमहल का।
वक्ता ने कहा यह सब बात किसी व्हाट्सेप युनिवर्सिटी ने बताई होगी, गौरी ने कहा मेरे पिताजी ने बताई जो आपके बगल में बैठे हैं ।
वक्ता का चेहरा देखने लायक था, उसने मुझसे पूछा क्या यह किसी सरस्वती स्कूल में पढ़ती है, मैने हंसकर कहा नही, वह विश्व की दूसरे सबसे बड़ी गर्ल्स यूनिवर्सिटी में पढ़ती है।
*बच्चे अब कोलोनियल मानसिकता से बाहर आ रहे हैं।* ( Bold)वे हमारी पीढ़ी से कहीं अधिक अपनी विरासत और संस्कृति को समझते हैं। सभी genz थोड़ी न जंतर मंतर जा कर मा बाप के मुंह पर कालिमा थोपते है। बस नाम रहेगा अल्लाह का सुन कर कोई प्रतिक्रिया , कोई विरोध नहीं तो समझो आपके खून में मिलावट है
अंगूठा चूसने के भोलेपन वाला बचपन बीत जाता है। मासूम भोले-भाले (क्यूट) हिन्दुओं की समस्या ये भी है कि वो बचपन वाले भोलेपन (क्यूटनेस) से बाहर नहीं आना चाहते। उनकी वो किताबें जिन्हें वो धर्म-ग्रन्थ कहते हैं, उसे ज्यादातर ने पहले पन्ने से आखरी पन्ने तक उल्ट पुलट कर पढ़ा ही नहीं। यकीन ना हो तो अपने आस पास में पूछकर देख लीजिये। आपके कितने परिचितों ने कोई भी एक धार्मिक ग्रन्थ (रामचरितमानस या कोई और रामायण, कोई भी गीता, एक भी उपनिषद, कोई ग्रन्थ,भी) पूरा पूरा पहले पन्ने से आखरी पन्ने तक पढ़ा है?
समझने, व्याख्या करने, अनुवाद करने जैसा कोई काम नहीं। सिर्फ एक बार भी पूरा पढ़ा हो ऐसे कितने लोगों को जानते हैं? अब जब किसी चीज़ की आपने कोई कद्र नहीं की उसे कूड़े के ढेर में घर के बाहर कहीं कोने में जमा कर रखा था, तो उसमें से कोई कब क्या उठाकर ले गया इसका आपको कैसे पता चलेगा? महीनों बाद अगर कबाड़ में से कुछ गायब हुआ इसका पता चला भी तो क्या कर लेंगे आप? मिशनरी उपनिषदों को अपना ग्रन्थ बताने में जुटे हैं वो बस इसलिए क्योंकि आपने उसकी कोई कद्र नहीं की।अभी तक आप सेकुलर रूपी मोह निद्रा में है
हीरे को पहचानने के लिए तो जौहरी ही चाहिए। उसने पहचाना तो आपने जिसे कूड़े के ढेर में फेंक रखा था, उसे उठा ले गया। उनके पास मीर जाफरों की भी कोई कमी नहीं! दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया अभी हाल ही में एक चंगाई सभा में सेकुलरिज्म बढ़ाने पहुंचे हुए थे। *हो-हल्ला* क्लिनिक के बाद अगला कदम *हालेलुइया* अस्पताल होना भी चाहिए। इसाई शासन के दौर के बने कानून वैसे ही हैं जैसे औरंगजेब के जमाने के होते थे। औरंगजेब के जमाने में कानून कहता था कि अगर 200 मुहम्मडेन मिलकर कोई संपत्ति (जमीन, औरत, दौलत, कोई भी) लूट लें तो काफिरों का उसपर कोई अधिकार नहीं रह जाएगा।थोड़ा इतिहास तो पढ़ लेते भाई मेरे..
अपनी चीज़ों को वापस लेने के लिए कानून बनवाने, कानून लागु करवाने और मुक़दमे लड़ने के लिए मासूम (क्यूट) हिन्दुओं के पास संगठन भी कम हैं। एक-आध जो हैं भी वो दक्षिण भारत में ज्यादा सक्रीय हैं, उत्तर भारत ने कभी इस विषय पर सोचा ही नहीं।
वेद कितने हैं ? 4 | पुराण कितने हैं – १८ ! दर्शन कितने हैं – 6, उपनिषद कितने हैं – 108 आदि | मेरे ख्याल से ये साधारण बातें सभी हिन्दुओं को पता हैं ! पर अगर मैं इन प्रश्नों को थोडा बदल दूं | आपने कितने वेद पढ़े हैं – ? आपने कितने पुराण पढ़े हैं – ? आपने कितने उपनिषद पढ़े हैं – ? आपने कितने दर्शन पढ़े हैं ? अब …. ?
अब असल पता चलेगा कि आप कितने बड़े सनातनी हैं | इन प्रश्नों के उत्तर यदि शून्य हैं तो फिर आप कैसे सनातनी हैं ? आपको धर्म के बारे में, शास्त्रों के बारे में क्या पता है ? फिर आपको किसी भी धार्मिक विषय पर लिखने और बोलने का क्या अधिकार प्राप्त है ? लेकिन आप देखिये, जिसने इनमें से किसी को पढ़ा तक तो क्या, छुआ तक नहीं है | वही, धर्म का झंडा सबसे बुलंद किये हुए है | अब आप समझिये कि बिना इनको पढ़े, आपको अपने धर्म के बारे में कितना ज्ञान हो सकता है ? फेसबुक, व्हात्सप्प से क्या आप धर्म को समझ सकते हैं ? क्या आप शास्त्रों को समझ सकते हैं ? नहीं… कदापि नहीं |
आपके घर में पूजा होती है, पंडित जी आते हैं | “ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।” पढ़ते हैं, पर क्या आपको सही में पता होता है, उनके कहे हुए मन्त्रों और श्लोकों का क्या अर्थ होता है ? जब आपको पता ही नहीं है कि वो क्या घपड सपड करके जा रहे हैं तो आप किस प्रकार की पूजा अथवा हवन कर रहे हैं ? भाव तो आपके अंदर है ही नहीं ! जब आपके अन्दर उस पूजा के लिए भाव ही नहीं है, उन श्लोकों और मंत्रो के बारे में कुछ पता ही नहीं है तो फिर वो पूजा, मात्र एक स्वांग के अलावा कुछ नहीं है | उस पूजा का कोई फल नहीं है |
इसीलिए शास्त्र ज्ञान अथवा इसी प्रकार के सत्र आवश्यक हैं, जिनकी समाज में महती आवश्यकता है | आप ने सांसारिक ज्ञान ले लिया, पढ़-लिख लिए पर अब शास्त्रों का अध्ययन कीजिये | इस प्रकार के सत्रों में आइये | आप यदि स्वयं पढ़कर इन शास्त्रों को नहीं समझ सकते तो ऐसे किसी सत्र में, हफ्ते-दस दिन में, एक बार आकर, इन शास्त्रों को समझिये | इससे आपके जीवन की वो समस्याएं हल होंगी, जो आपका सांसारिक ज्ञान हल नहीं कर सकता | यकीन मानिए, जब आप सामवेद में, गन्धर्व उपवेद पढेंगे, उसमें नाट्यशास्त्र पढेंगे, उसमें भावों को पढेंगे, रसों को पढेंगे तो आपको समझ आएगा, भाव क्या होते हैं, हम कैसे सोचते हैं, हम कैसे जीते हैं, किस भाव से क्या होता है, जीवन में भावों का जितना महत्व है, इंजिनीयरिंग का उतना महत्व नहीं है क्योंकि इंजिनीयरिंग सांसारिक ज्ञान है जबकि भाव, मनुष्य ज्ञान है | आपके अंदर का ज्ञान है | वो ज्यादा आवश्यक है, समझना | इसी प्रकार, तर्कशास्त्र, व्याकरण, उपनिषद आदि का अध्ययन करने से, आपको अपने जीवन के बारे में बहुत कुछ पता चलेगा, जो स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई में पता नहीं चलता है | वही असली ज्ञान है, वही जीवन को जीने के तरीका है | सांसारिक ज्ञान धन अर्जन में सहायक है तो शास्त्र ज्ञान, जीवन को जीने में अतिआवश्यक है | इसे व्यर्थ समझने की भूल न करें | अन्यथा जैसे अंधे को पता ही नहीं होता कि सूर्य क्या होता है, रौशनी कैसी होती है, वैसे ही आपका जीवन भी निकल जाएगा |
यही हाल धर्म का भी है | धर्म पर भी लोगों ने, समाज में फैले विभिन्न विचारों से, भांति भांति प्रकार की अवधारणायें धर्म के बारे में बना ली है | बाबा लोग भी ऐसे विषयों को हाथ नहीं लगाते हैं, कथा कहानियों तक ही धर्म को सीमित कर देते हैं | उन्ही के आधार पर विभिन्न अवधारणायें हम अपने जीवन में बना लेते हैं, जो अब पुष्ट हो चुकी हैं । पर क्या, वो अवधारणाएं हमने किसी शास्त्र के आधार पर बनाई है ? स्वयं किसी शास्त्र के अध्ययन के बाद रिसर्च और चिन्तन मनन से उपजी है अथवा सुनी सुनाई बातों से ही हमें अपने विचार बना लिए कि ये-ये चीज धर्म है | ऐसे ही, बिना पढ़े लोगों ने धर्म के बारे में कुत्सित विचार भी बना लिए कि यही सब फसाद की जड़ है | समाज में विद्वेष और घृणा फैलने लगी है.. इस विद्वेष और घृणा को कम करने के क्या उपाय हैं ?
दो ही उपाय हैं – एक तो आसान तरीका, कि न रहेगा धर्म का झंझट, न ही हमें ज्यादा अक्ल लगानी पड़ेगी सो या तो बौद्ध बन जाएँ या फिर हिन्दू तो रहें लेकिन ज्यादा धर्म/कर्म पर ध्यान न दिया जाए, ठीक है, हमसे जो होता है, हम कर रहे हैं… उतना ही काफी है | आस्ट्रेलिया, केनेडा, अमेरिका में लाखो हिन्दू हैं, इसी प्रकार रहते हैं कि न ज्यादा जानो, न ज्यादा झंझट फालो करने का… जितना हो पा रहा है, ठीक है | भारत में भी अब यही होता जा रहा है |
दूसरा तरीका, थोडा कठिन है कि जाना जाये कि धर्म है क्या ? क्या धर्म वही है, जो हम मानते आ रहे हैं ? क्या जो हमने माना हुआ है, वो किसी शास्त्र आदि से लिया है या हमने एक धारणा अपने मन में बना ली है कि फलां फलां चीज धर्म है ! उस अवधारणा का आधार क्या है ? कहीं ऐसा तो नहीं, जिसे हम धर्म जानते हो, मानते हों, वो वास्तव में धर्म हो ही न ? ऐसे ही धर्म क्या है ? कितने प्रकार का होता है ? क्या धर्म की कोई परिभाषा भी है ? अगर है तो फिर हमें बताई क्यों नहीं जाती और अगर नहीं है तो हमने अभी तक बनाई क्यों नहीं ? क्यों धर्म को सूक्ष्म और गूढ़ कहा जाता है ? क्यों धर्म को धीरे धीरे चलने वाला कहा गया है ?
हम धर्म को सही मायने में फॉलो तो तब ही कर पायेंगे, जब ये सही सही जान पायेंगे कि धर्म वास्तव में है क्या ?
शास्त्र ज्ञान के सत्र में जो भी पढाया जा रहा है, उसे हम यहाँ पर शेयर करते हैं | प्रश्न है क्यों ? क्योंकि आप ये देख सको कि जिन विषयों पर चर्चा यहाँ होती है, उन विषयों पर आपने कब चिंतन किया था आखिरी बार | कब उन विषयों के बारे में अंतिम बार किसी से बात की थी ? यदि आपको ऐसा लगता है कि ये वो विषय हैं, जिनके बारे में हमने किसी से बात नहीं की पहले या इन विषयों के बारे में तो हमने सुना ही नहीं तो क्या करना चाहिए ?
क्या आपको वो शास्त्र नहीं पढने चाहिए ! क्या हमारे पूर्वज इसलिए शास्त्र लिख कर गए होंगे कि उनकी आने वाली पीढ़ी इसे पढ़े ही न ! पढना तो दूर, उसके बारे में चर्चा तक न करे ! कितनी बार हमने शिक्षा शास्त्र की, नाट्य शास्त्र की, गन्धर्व वेद की, सामवेद के गायन की चर्चा सुनी है ! कितनी बार हमने उसे जानने की कोशिश की है ! हमारे पूर्वजों ने तो लिखते समय उसे स्वरों तक को लिखा कि जब २१ वी सदी की पीढ़ी इसे पढ़े तो जाने इसे कैसे पढना है लेकिन २१वी सदी की पीढ़ी तो संस्कृत ही नहीं जानती ! उसे पढना और गाना तो बहुत दूर की बात है ! जर्मन और राशियन लोग कम से कम कोशिश तो करते हैं पर हमारे महान भारत देश की भूमि में २१वी सदी के लोग, इतने आलसी हो गए हैं, कि शास्त्रों को स्वयं पढना तो छोडिये, उसके बारे में चर्चाओं में तक नहीं जा सकते | हो सकता है, मेरी बातें कडवी या बुरी लग रही हों ! लेकिन क्यों नहीं लगनी चाहिए ? आपका प्रयास क्या है हिन्दू धर्म को बचाने के लिए ? बस उसका जयकारा लगाना ? उसकी इधर उधर थोड़ी बहुत तारीफ कर देना पर उसे पढना नहीं, उसे जानना नहीं ! अरे असली रक्षा तो हिन्दू धर्म की, उसके शास्त्रों को पढने से ही होगी, उसको अपने जीवन में उतारने से ही होगी ! अन्यथा हमारे पूर्वजों की इतनी मेहनत बेकार जा रही है | सिर्फ इसलिए कि २१वी पीढ़ी के पास समय नहीं है |
अभी भी देर नहीं हुई है | ये कटाक्ष invite करने का गलत तरीका हो सकते हैं लेकिन मीठे मीठे बोलों में कभी कडवाहट भी होनी चाहिए | कोरा मीठा मीठा बोलने से काम बनता तो कृष्ण युधिष्ठिर को डांटते कभी, कि अरे युधिष्ठिर, तुम बड़े मूढ़ बुद्धि हो, मुझे लगता है, तुम तो पैदा ही जंगल में रहने के लिए हुए हो ! जब युधिष्ठिर जैसे धर्मज्ञ राजा को डांट पड़ सकती है, तो आपको क्यों नहीं पड़ सकती | बुरा मानने का समय नहीं है, धर्म को जानने का समय है और ये समय, ये जीवन बड़ी तेजी से निकलता जा रहा है | देखना है तो जरा गणेश उत्सव, नवरात्रो में घूम आना …आंखे फटी रह जायेंगी …पतन अपने चरम सीमा पर है…और हम आंखे होते हुए भी धृतराष्ट्र और गांधारी बने हैं…
✍🏻फिर मिलते है