
जिंदगी में सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है, जब इंसान अपनी तरफ से कोई कमी नहीं छोड़ता, फिर भी परिणाम उसके विरुद्ध चला जाता है। बरसों की मेहनत के बाद काम बिगड़ जाता है, जिस रिश्ते को बचाने के लिए सब कुछ किया, वही रिश्ता टूट जाता है, कमाई होती है लेकिन पैसा टिकता नहीं, घर में सब कुछ होते हुए भी शांति नहीं रहती। इसके उलट कभी ऐसा भी होता है कि जिस काम के बनने की कोई उम्मीद नहीं बचती, वही अचानक बन जाता है, कोई व्यक्ति सही समय पर साथ दे देता है या बड़ा नुकसान होते होते टल जाता है। आखिर एक ही जीवन में ऐसे उलटफेर क्यों होते हैं?? क्या हर बार कारण केवल परिस्थितियाँ होती हैं, या जन्मकुण्डली में भी कुछ ऐसी बातें छिपी होती हैं जिन्हें साधारण फलादेश में पढ़ा ही नहीं जाता?? वैदिक ज्योतिष में किसी ग्रह को केवल शुभ या अशुभ कह देना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि ग्रह का फल उसके भाव, भावेश, राशि, नक्षत्र, युति, दृष्टि, बल और दशा से मिलकर बनता है। कई बार व्यक्ति जिस ग्रह को अपनी परेशानी का कारण मानता है, असल में वही ग्रह किसी दूसरे महत्वपूर्ण विषय को संभाल भी रहा होता है। किसी ग्रह को कमजोर देखकर उसके हर फल को खराब मान लेना भी एक प्रकार की भूल है, क्योंकि उसका भावाधिपत्य, दूसरे ग्रहों से संबंध और नवांश में उसकी स्थिति उसके परिणाम को बदल सकती है। कुण्डली को समझने की असली शुरुआत वहीं होती है, जहाँ केवल ग्रह का नाम देखकर निर्णय देना बंद किया जाता है और उसके पूरे संबंधों को परखा जाता है।।
मान लीजिए, किसी व्यक्ति की कुण्डली में दशमेश यानी कर्मभाव का स्वामी छठे भाव में बैठा है। केवल इस स्थिति को देखकर नौकरी में परेशानी या असफलता घोषित नहीं की जा सकती। छठा भाव सेवा, प्रतिस्पर्धा, ऋण, विरोध और कठिन परिश्रम से जुड़ा है, इसलिए दशमेश का वहाँ होना व्यक्ति को प्रतियोगिता, नौकरी, सेवा या संघर्ष के रास्ते से आगे बढ़ा सकता है। लेकिन दशमेश की राशि, उसका बल, उस पर पड़ने वाली दृष्टियाँ, छठे भाव के स्वामी से उसका संबंध और चल रही दशा यह तय करने में सहायता करते हैं कि संघर्ष किस रूप में सामने आएगा। यदि दशमेश दुर्बल हो, पापग्रहों से पीड़ित हो और प्रतिकूल दशा भी चल रही हो, तो काम में रुकावट, विरोध या बार बार प्रयास करने की स्थिति बढ़ सकती है। इसके विपरीत, वही दशमेश मजबूत हो और शुभ ग्रहों का सहयोग प्राप्त करे, तो व्यक्ति कठिन प्रतिस्पर्धा में भी स्थान बना सकता है। यही ग्रहस्थिति का वास्तविक अर्थ है, भाव का नाम सुनकर फल तय कर देना नहीं।।
धन के मामले में भी यही बारीकी आवश्यक है। दूसरे भाव का संबंध संचित धन और परिवार से है, ग्यारहवाँ भाव लाभ तथा आय से जुड़ा है, जबकि बारहवाँ भाव व्यय, त्याग और धन के बाहर जाने से संबंधित है। यदि दूसरे और ग्यारहवें भाव के स्वामी मजबूत हों, तो आय और धन संचय की अच्छी क्षमता बन सकती है, लेकिन यदि बारहवें भाव से उनका गहरा संबंध हो, तो कमाई के साथ बड़े खर्च भी बने रह सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि बारहवें भाव का संबंध होते ही व्यक्ति निर्धन हो जाएगा, क्योंकि बारहवाँ भाव विदेश, दान, आध्यात्मिक कार्य और आवश्यक खर्चों से भी जुड़ा है। असली प्रश्न यह है कि
धन देने वाले ग्रह कितने समर्थ हैं, खर्च का संबंध किस भाव से बन रहा है और धन से जुड़े ग्रहों की दशा कब चल रही है। कभी व्यक्ति अच्छी कमाई करता है, फिर भी बचत नहीं कर पाता, क्योंकि आय और संचय की स्थितियाँ एक जैसी नहीं होतीं। केवल धनयोग देखकर संपन्नता का दावा करना उतना ही अधूरा है, जितना किसी व्यययोग को देखकर निर्धनता तय कर देना।।
ग्रह जिस नक्षत्र में बैठा है, उसके स्वामी की स्थिति भी फलादेश में महत्वपूर्ण होती है। मान लीजिए, सप्तमेश किसी नक्षत्र में बैठा है और उस नक्षत्र का स्वामी आठवें भाव से संबंध बना रहा है। तब विवाह और साझेदारी के विषयों में अचानक परिवर्तन, साझा जिम्मेदारियों या गहरे भावनात्मक उतार चढ़ाव की पड़ताल करना आवश्यक हो सकता है। लेकिन इससे विवाह टूटने का निष्कर्ष नहीं निकलता। सप्तमेश का बल, शुक्र की स्थिति, नवांश, सप्तम भाव पर पड़ने वाली दृष्टियाँ और विवाह के समय सक्रिय दशा, इन सबको साथ रखकर ही दाम्पत्य का आकलन किया जा सकता है। यदि सप्तमेश मजबूत हो, शुभ ग्रहों का सहयोग मिले और नवांश में भी सहारा हो, तो कठिन ग्रहसंबंधों के बावजूद संबंध संभालने की क्षमता बनी रह सकती है। दूसरी ओर, केवल सप्तम भाव में शुभ ग्रह देखकर वैवाहिक जीवन को पूरी तरह सुखी मान लेना भी उचित नहीं, क्योंकि विवाह का फल किसी एक ग्रह या एक भाव से तय नहीं होता। नक्षत्र स्वामी की उपेक्षा करने पर ग्रह के फल का एक महत्वपूर्ण पक्ष छूट सकता है।।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि जन्मकुण्डली में योग बनना और उसका फल मिलने का समय अलग-अलग विषय हैं। कोई राजयोग या धनयोग मौजूद हो सकता है, लेकिन उसके फल के लिए संबंधित ग्रहों की दशा सक्रिय होना आवश्यक हो सकता है। दशा यह समझने में सहायता करती है कि जीवन के किस क्षेत्र का फल किसी अवधि में अधिक उभर सकता है, जबकि गोचर उस समय के ग्रहगत परिवर्तनों को समझने में सहायक होता है। फिर भी केवल दशा या गोचर देखकर घटना की निश्चित घोषणा नहीं की जा सकती, जब तक जन्मकुण्डली में उस विषय का आधार न हो। इसी प्रकार उच्च राशि में स्थित ग्रह हमेशा हर क्षेत्र में सर्वोत्तम फल नहीं देता और नीच राशि का ग्रह हर परिस्थिति में हानि नहीं पहुँचाता। ग्रह अस्त है या नहीं, उसकी अंशगत स्थिति क्या है, वह किस भाव का स्वामी है, नवांश में कितना समर्थ है और किन ग्रहों से संबंध बना रहा है, इन बातों से उसकी वास्तविक भूमिका समझ में आती है। ग्रह की शक्ति केवल उसकी राशि से तय नहीं होती, उसका काम और उसके संबंध भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।।
यही कारण है कि किसी की परेशानी का कारण जानने के लिए केवल राहु, शनि, मंगल या किसी एक दोष को जिम्मेदार ठहरा देना उचित नहीं। शनि का प्रभाव कुछ परिस्थितियों में विलंब, अनुशासन, दायित्व और कठिन परिश्रम से जुड़ सकता है, लेकिन उसका फल उसके भावाधिपत्य और बल पर निर्भर करता है। मंगल साहस, ऊर्जा और भूमि जैसे विषयों से जुड़ सकता है, पर पीड़ित स्थिति में जल्दबाजी या विवाद का पक्ष भी उभर सकता है। राहु की स्थिति तीव्र महत्वाकांक्षा, असामान्य मार्ग या भ्रमपूर्ण निर्णयों से जुड़ी हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि राहु जहाँ बैठा हो वहाँ केवल हानि ही होगी। ग्रहों के फल को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि वे किस भाव में हैं, किन भावों के स्वामी हैं, किससे युति कर रहे हैं और किस समय सक्रिय हैं। ग्रह का नाम भय पैदा करने के लिए नहीं, उसके वास्तविक कार्य को समझने के लिए देखा जाना चाहिए।।
कुण्डली का गहरा अध्ययन इसी बारीकी की माँग करता है। और ये अध्ययन वोही कर सकता है जो शास्त्रोक्त विधि जानता हो कुण्डली की गहराई मै उतरने के लिए, समझने के लिए, ऐसे बहुत कम लोग है फिर वो लग्न और भावेश, ग्रहबल, नक्षत्र स्वामी, दृष्टि और युति, नवांश, दशा अंतरदशा तथा गोचर, इन सबको एक साथ परखने पर ही किसी विषय की पूरी तस्वीर सामने आ जाती है ,अष्टकवर्ग और षड्बल जैसे साधन भी ग्रहों तथा भावों की शक्ति समझने में सहायता कर सकते हैं, लेकिन वे पूरी कुण्डली के स्थान पर निर्णय नहीं दे सकते। किसी महत्वपूर्ण प्रश्न पर परामर्श लेते समय जन्मसमय की शुद्धता, संबंधित भावों की स्थिति और वर्तमान दशा का परीक्षण जरूरी है। पारंपरिक उपाय भी व्यक्ति की कुण्डली और आस्था के अनुसार सुझाए जाते है ।।
जीवन में हर असफलता के पीछे कोई छिपा हुआ वरदान नहीं होता और हर सफलता के पीछे केवल भाग्य नहीं होता। फिर भी कुछ घटनाओं को समझने के लिए इतना जानना जरूरी है कि ग्रहों का फल सीधी रेखा में नहीं चलता। एक ही ग्रह किसी भाव से सुख और दूसरे से जिम्मेदारी जोड़ सकता है, कोई योग फल देने में देर कर सकता है और कोई कठिन स्थिति व्यक्ति को ऐसे क्षेत्र में आगे बढ़ा सकती है जहाँ उसे अपनी क्षमता का वास्तविक परिचय देना पड़े। जन्मकुण्डली का उद्देश्य बीती हुई पीड़ा को चमत्कार बताना नहीं, बल्कि ग्रहों की बनावट और समय के मेल से जीवन की परिस्थितियों को समझने का प्रयास करना है। जब कुण्डली को केवल शुभ अशुभ की गिनती से ऊपर उठकर पढ़ा जाता है, तभी उसके भीतर छिपे सूक्ष्म अर्थ सामने आते हैं।।