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समाजवाद

समाजवाद नाम का कोढ़ कैसे असर करता है? इसे समझना है तो बाजार से आलू-प्याज जैसी सब्जियां खरीदने के बारे में सोच लीजिए। होता क्या है कि हरी सब्जियां तो लोग ताजा खरीदना चाहते हैं, मगर आलू जैसी चीजें एक ही बार में ढाई किलो – पांच किलो भी खरीदकर रख लेते हैं। बाजार में अगर आलू की कीमत 20 रुपये किलो है तो सीधा हिसाब तो ये होता है कि ढाई किलो के 50 रुपये हुए, लेकिन असल में ऐसा होगा नहीं। एक साथ ढाई किलो खरीदने पर दुकानदार थोड़ी सी छूट देता है और पचास के बदले 45 रुपये ही लगें, ऐसा आमतौर पर होता है। अधिक – थोक में खरीदने पर छूट मिलती है।
ये हर चीज में बाजार में होता हुआ दिखेगा। हरी सब्जियां भी पांच किलो एक ही बार में खरीदें तो थोक भाव कम होगा। कपड़ों पर, स्टेशनरी पर, तेल-शैम्पू आदि के गैलन पर, छोटा पैकेट महंगा और बड़ा सस्ता होगा ही। शराब तक में चार निब्स की कीमत मिला लें तो एक पिंट से अधिक होगी। थोक भाव सस्ता रहेगा। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अधिक माल जमा रखने के लिए गोदाम आदि, जगह का खर्च लगेगा। उनके सड़ने/खराब होने का खतरा है, मेन्टेनेन्स लगता है। ज्यादा माल लेकर व्यापारी को हमने जो बचत करवाई है, उसमें से वो हमें छूट देता है। इसके अलावा लेन-देन से टर्नओवर भी बढ़ता रहता है, भले मुनाफा/प्रॉफिट कम हो। इसे अब बैंडविड्थ और नेटवर्क पर ले जाएँ तो 4जी-5जी का स्पेक्ट्रम कंपनी ने एक बार खरीदा और उसका किराया तो फिक्स है। हम छोटा रिचार्ज 10 का करवाएं तो साढ़े सात रुपये के लगभग ही मिलेंगे, लेकिन अगर 100 का करवाया तो 70-75 नहीं बल्कि 85-90 रुपये आते हैं। थोक में लिया सस्ता हो गया। अब इसी सिस्टम को सरकारी समाजवाद पर ले चलिए। बिजली एक बार में जितनी पैदा हो गयी, उसे स्टोर नहीं कर सकते। या तो खर्च होगी, या बर्बाद हो जाएगी। तो अधिक खपत करने वाले को क्या बाजार के नियम वाली छूट मिलती है, या समाजवादी उल्टा अर्थशास्त्र चलाकर उनसे अधिक वसूलते हैं? जी हाँ, समाजवाद नाम के कोढ़ से ग्रस्त सोच तुरंत अधिक बिजली बिल देने वाले को महंगे दाम पर बिजली बेचने की कोशिश करेगी। समाजवाद नाम के कोढ़ से ग्रस्त नीतियाँ कमर्शियल सप्लाई जो कि निश्चित रूप से रोजगार भी पैदा कर रहा है, उसी से उल्टा अधिक से अधिक वसूल लेने की वकालत करता है। मूलतः #समाजवाद एक कोढ़ है। राजनीतिक जुमलों में ये भले खुबसूरत लगे, लेकिन इससे बचना चाहिए। किसी महंगी कार, ऑडी, बी.एम.डब्ल्यू. जैसी को देखते ही, “इतने पैसों में जाने कितने गरीबों का पेट भर जाता”, कह कर ताना देना कोई नयी बात तो नहीं है | साम्यवादियों-समाजवादियों के मूंह से कभी ना कभी सुना ही होगा | सवाल है कि कैसे खिलाते गरीबों को ? उन पैसों की सब्सिडी यानि कुछ अनुदान, कुछ भीख जैसा देकर ! कितने दिन काम चल जाता उस से ? कभी सोचा है एक महंगी कार ने कितनों का पेट भरा है ? पक्का पक्का देखा जाए तो उसकी टायर के रबर का सफ़र कहीं दक्षिण भारत में शुरू हुआ हो सकता है | रबर प्लांटेशन से लेकर टायर की फैक्ट्री तक आने में कई किसानों, कई मजदूरों को रोजगार देते हुई उस टायर ने कितनों का पेट भरा है | उसके अलावा भी कई छोटे छोटे पुर्जे होते हैं कार में | शीशे की विंड स्क्रीन से लेकर हेड लाइट और इंडिकेटर तक सबने एक अलग क्षेत्र में रोजगार पैदा किया और गरीबों का पेट भरा है | फिर गाड़ी में बिजली का भी ढेर सारा काम होता है | जिन खदानों से तम्बा निकला वहां से लेकर तार बनने और इलेक्ट्रीशियन के उसे गाड़ी में फिट करने तक फिर रोजगार के जरिये पेट भरा | लोहे के पुर्जों को भूल मत जाइएगा | सबसे ज्यादा तो वही होते हैं | वो भी खदानों से फैक्ट्री तक का सफ़र तय कर के आये हैं | अब आप ये जोड़ पा रहे होंगे कि कार की कीमत में उतने लोगों को सब्सिडी नहीं दी जा सकती थी | अपने बनने के सफ़र में वो जाने कितना रोजगार पैदा कर आई है | अभी जो इस प्रक्रिया में नहीं जोड़ा है वो है कार को बेचने की प्रक्रिया | उसके लिए प्रचार बनाना, कार को किसी शो रूम तक पहुँचाना, वहां उसे बेचना, इस सब में भी डीलर, मार्केटिंग वाले, प्रचार बनाने वाले, कागज़ी कार्यवाही देखने वाले क्लर्क, कितने ही लोग लगे हैं | कार इन सब का पेट भरती हुई आई है | ओह हां, ये कोई सब्सिडी जैसी राशि देकर नहीं हुआ | यहाँ पूरी इज्जत से श्रम का मूल्य दिया गया था | गरीब झेंपता सा किसी अनुदान की कतार में नहीं खड़ा था जहाँ सरकारी मन मर्जी का राशन बांटता | वो शान से अपनी मेहनत के पैसे लेकर गया, और अपनी मर्ज़ी से उस से चीज़ें खरीद कर लाया था | ये पूंजीवाद और समाजवाद-साम्यवाद का अंतर है | जब आप कुछ खरीदते हैं तो दिए गए पैसे किसी के श्रम का मूल्य होता है | बिना काम किये किसी को भीख की तरह कुछ देकर शर्मिंदा नहीं किया होता है आपने | पूंजीवादी किसी वस्तु की, किसी सेवा की कीमत दे रहा होता है | समाजवादी – साम्यवादी आपको टैक्स के पैसे के बदले में भीख थमाता है, बिना ये जाने कि आपको वो चाहिए भी कि नहीं | इस कार की कीमत में गरीबों का खाना वाले सवाल पर शायद हम सब पॉलिटिकली करेक्ट रहने के चक्कर में चुप रह जाते हैं | दोबारा सोचकर देखिये पॉलिटिकली करेक्ट ही नहीं मोरल्ली करेक्ट, एथिकल, सोशली करेक्ट क्या होता ? इतने रोजगार पैदा करना या इतने पैसों से एक बार, सिर्फ एक बार सब्सिडी दे डालना ? ✍️#विषैलावामपंथ #BasicEconomics एक बड़ा ही पॉपुलर मीम है, जो”इक्वलिटी” और “इक्विटी” के बीच का अंतर बताता है. बेसबॉल का मैच चल रहा है और तीन बच्चे मैदान के बाहर से मैच देख रहे हैं. मैदान में फेंस लगी है. तीनों बच्चे अलग अलग लंबाई के हैं. तीनों के पास एक एक लकड़ी के बक्से हैं जिनपर खड़े होकर वे मैच देखने की कोशिश कर रहे हैं. सबसे लंबा लड़का बिना बक्से पर खड़ा हुए भी मैच देख सकता है, लेकिन सबसे छोटा लड़का उसपर खड़े होने के बावजूद नहीं देख सकता. तीनों के पास एक एक बक्से हैं, यह इक्वलिटी है. लेकिन सबसे लंबे लड़के से लेकर सबसे छोटे को दे दिया गया जो अब दो बक्सों पर खड़े होकर मैच देख सकता है…यह इक्विटी है.
देखने से यह मॉडल बहुत ही आकर्षक और न्यायपूर्ण लगता है. लेकिन इसमें कुछ बहुत ही फंडामेंटल गलतियां हैं… Assumptions और pitfalls हैं. पहला, यह मान लिया गया है कि उस मैदान के बाहर लगा बाड़ा और तीन बक्से कॉन्स्टेंट हैं…वे हमेशा रहेंगे. मैच देखने की वही एक जगह है, और तीन ही बक्से हैं और पूरी समस्या सिर्फ उनके वितरण की है. वे बक्से कहां से आए जिनपर खड़े होकर वे बच्चे मैच देख रहे हैं? किसी ने उन्हें बनाया. उन तीन लोगों में से किसे उस बक्से की सबसे अधिक जरूरत है और किसे उन्हें बनाकर या उसपर खड़े होकर मैच देखने का आइडिया आएगा? लंबे लड़के को तो बिल्कुल नहीं, क्योंकि उसे जरूरत ही नहीं है. इसकी संभावना ही अधिक है कि सबसे छोटे लड़के को इसकी आवश्यकता महसूस होगी और वह लकड़ी खोजेगा, उसके बक्से बनाएगा और उसपर खड़े होकर मैच देखने का इंतजाम करेगा. इस तरह उसके पास एक स्किल आएगा…उसे मालूम रहेगा कि लकड़ी के पटरे कहां पड़े हैं, घर से वह हथौड़ी और कीलें लेकर आएगा और बेकार पड़े लकड़ी के पटरे जो कि जलावन के काम आते, उन्हे एक उपयोगी चीज में बदल देगा. वह वहां आने वाले दूसरे बच्चों को भी ये बक्से बेचेगा, और शायद सबसे लंबे लड़के के लिए भी एक स्टूल बना देगा और वह खड़े रहने के बजाय बैठ कर मैच देख सकेगा. वह लड़का जिसने बक्से बनाना सीखा, अब ना सिर्फ मैच देख सकेगा बल्कि उसके पास चिप्स का बैग और कोक की बॉटल के लिए पैसे भी होंगे. यह भी हो सकता है कि उनमें से कोई एक ऐसी ऊंची जगह खोज ले जहां से सभी फेंस के पार से मैच देख सकेंगे. कोई वहां उन्हीं पटरों से एक बेंच बना देगा जिसपर सभी बैठ कर मैच देख सकेंगे. वह उनसे बेंच पर बैठने के पैसे लेगा, और कोई तीसरा पास में कोक और पेप्सी बेचने का जुगाड़ कर लेगा. यानि एक पूंजीवादी व्यवस्था विकसित हो जायेगी. अब आते हैं वामपंथी… उन्हें यह पसंद नहीं आएगा कि यह सब बिना उनकी मर्जी के क्यों हो रहा है. वे आकर बेकार पड़े लकड़ी के पटरों को सार्वजनिक संपत्ति घोषित कर देंगे, और हथौड़े से कील ठोकने के काम को एक खतरनाक काम घोषित कर देंगे जो बिना उनके परमिशन और लाइसेंस के कोई नहीं कर सकता. वे यह भी सीमित कर देंगे कि बक्से तीन से ज्यादा नहीं हो सकते और एक खास ऊंचाई से अधिक नहीं बनाये जा सकते. वे सबसे छोटे लड़के को यह आश्वासन भी देंगे कि उसे अब कील हथौड़े से काम करने और बक्से बनाने की कोई जरूरत नहीं है, दो बक्सों पर खड़े होकर मैच देखना उसका अधिकार है, और वह लंबा लड़का “टॉल प्रिविलेज” ले रहा है. अब वह लंबा लड़का और छोटा लड़का लड़ रहे होंगे और कोई मैच नहीं देख रहा होगा. आप समानता नहीं खोज रहे होते हैं, आप संपन्नता खोज रहे होते हैं. संपन्नता आती है स्वतंत्रता से. जिन लोगों को यह पता होता है कि संपदा का सृजन कैसे होता है, जब वे यह करने के लिए स्वतंत्र होते हैं तो संपन्नता आती है. जब उस छोटे लड़के को स्वतंत्रता मिलती है तब बेकार पड़े लकड़ी के पटरे जलावन में जाने के बजाय लकड़ी के स्टूल और बेंच बन जाते हैं. आर्थिक स्वतंत्रता सभी मानव उपलब्धियों की जननी है. समानता प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है. असमानता ही सभी मानव उपलब्धियों का स्रोत है. जो लोग इस असमानता में निचली सीढ़ी पर हैं उनके पास इसकी भरपाई करने के लिए अधिक परिश्रम करने का और नए उपाय खोजने का सबसे अधिक इंसेंटिव होता है. जब कोई तीसरा आकर इक्विटी स्थापित करने बैठता है तो वह इस इंसेंटिव स्ट्रक्चर को नष्ट कर देता है. समान वितरण की धारणा उत्पादकता को नष्ट कर देती है और मानव सभ्यता को विपन्न बना देती है. पर इस चित्र में तो सभी बच्चे हैं, वे कील हथौड़े का प्रयोग कैसे करेंगे? वे लकड़ी के बक्से, स्टूल और बेंच कैसे बनाएंगे? यह सबसे महत्व की बात है. जब वामपंथियों ने समाज में समान वितरण का, आर्थिक व्यवस्था का, इक्विटी का मॉडल प्रेजेंट किया तो उन्होंने उसमें बच्चों को क्यों रखा? क्योंकि समाजवाद आपको ऐसे ही देखता है. उसके मस्तिष्क में यह एडल्ट्स का नहीं, इन्फेंट्स का समाज है और वे इसके अभिभावक हैं. समाजवाद व्यक्ति से शिशुवत व्यवहार ही नहीं करता, वह व्यक्तियों को जिम्मेदार वयस्कों के बजाय असहाय शिशुओं में बदल देता है जो सत्ता पर आश्रित हो जाते हैं. ✍ कुछ पल्ले पड़ा.. शुद्ध लोहा (Pure Iron) कितना कठोर होता हैं मालुम हैं ???… ये इतना कठोर होता हैं कि इसे आप अपने दाँतों से चबा सकते हैं !! इतना मुलायम होता हैं ये । इसके Hardness को बढ़ाने के लिए इसमें Impurities मिलाया जाता हैं. और इसका main impurity होता हैं ‘Carbon’ . (मेरे Mechanical और Metallurgy के मित्र Iron-Carbon diagram से अच्छी तरह वाकिफ़ होंगे.) . इसमें हम जैसे-जैसे Carbon की मात्रा याने Percentage बढ़ाते जाते हैं वैसे-वैसे Iron का Hardness बढ़ते जाता हैं. और अगर हम ज्यादे percentage में Carbon मिला दे तो फिर Iron Brittle हो जाता हैं. और इस brittle Iron का उपयोग बहुत कम होता हैं. brittle माने भंगुर.. ज़रा सा भी वार करने पे बिखर जाएगा. दैनिक जीवन और इंडस्ट्रियल पर्पस में यूज़ होने वाला Iron, Medium Iron-Carbon स्टील होता हैं. और यही सबसे ज्यादा sustainable होता हैं. इसी तरह सोने का भी यही हाल हैं। कहने का तात्पर्य ये हैं कि कोई भी शुद्ध चीज का व्यवहारिक जीवन में कोई भी यूज़ नहीं हैं. उसमें impurities मिलाया ही जाता हैं ताकि वो sustainable हो। . इसीतरह शुद्ध राष्ट्रवादी हो के आप एक sustainable राष्ट्रवादी नहीं हो सकते । चबा दिए जाओगे च्युंगम की तरह… इस राष्ट्रवाद में थोड़ा Impurities मिलाइये. मतलब थोड़ा ‘वामपंथ’ मिलाइये, थोड़ा ‘समाजवाद’ मिलाइये, थोड़ा ‘पूंजीवाद’ मिलाइये .. और फिर राष्ट्रवाद को एक मार करने वाला और sustainability प्रदान करने वाला Hardness दीजिये. लेकिन हाँ इतना Impurities मत मिलाइये कि ये Brittle (भंगुर) हो जाय और कोई ज़रा सा भी वार करने पे शीशे की तरह बिखर जाय. . तो आज से ही अपने राष्ट्रवाद में थोड़ा-थोड़ा सा Impurities मिलाना शुरू कर दीजिये, तभी हम sustain हो पाएंगे। ✍ क्या विचार है??
आप सभी लोगों से निवेदन है कि हमारी पोस्ट अधिक से अधिक शेयर करें जिससे अधिक से अधिक लोगों को पोस्ट पढ़कर फायदा मिले |

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