यह संबंध युति, दृष्टि अथवा राशि परिवर्तन आदि से बन सकता है।
विशेष सूत्र —
यदि लग्नेश और सप्तमेश का परस्पर संबंध बन रहा हो, तो व्यक्ति को सामान्यतः जन्म स्थान से दूर धन, सम्पन्नता एवं सफलता प्राप्त होने की संभावना अधिक बन सकती है।
2. द्वितीय एवं चतुर्थ भाव में समान संख्या में ग्रह
यदि लग्न से द्वितीय एवं चतुर्थ भाव में समान संख्या में ग्रह स्थित हों, तो व्यक्ति को अपेक्षाकृत कम समय में सफलता के संकेत मिल सकते हैं।
इसमें ग्रहों का बल विशेष महत्व रखता है। यदि स्थित ग्रह बली, स्वराशि, मित्रराशि अथवा उच्च राशि में हों, तो ग्रहों के बल के अनुसार सफलता एवं सम्पन्नता की संभावना बढ़ सकती है।
विशेष सूत्र —
यदि द्वितीय एवं चतुर्थ भाव में ग्रहों की संख्या समान हो और चतुर्थ भाव में स्थित ग्रह उच्च के हों, तो सफलता एवं सम्पन्नता के संकेत अपेक्षाकृत अधिक अनुकूल बन सकते हैं।
3. लग्न–सप्तम में उच्च-नीच ग्रह एवं नीचभंग का सूत्र
यदि लग्न और सप्तम भाव—दोनों में ग्रह स्थित हों और उनमें से कोई ग्रह उच्च अथवा नीच राशि में स्थित हो, साथ ही केंद्र के किसी अन्य स्थान में शुभ ग्रह स्थित हो, तो एक विशेष स्थिति बन सकती है।
लग्न और सप्तम भाव परस्पर पूर्ण दृष्टि रखते हैं। अतः यदि लग्न एवं सप्तम में स्थित ग्रहों में उच्च-नीच की ऐसी स्थिति बने जिसमें नीच ग्रह का भंग हो रहा हो, तो इसे नीचभंग की स्थिति के रूप में देखा जा सकता है।
ऐसी स्थिति में, यदि केंद्र के अन्य भाव में शुभ ग्रह का बल भी प्राप्त हो, तो व्यक्ति के भाग्यशाली एवं सम्पन्न होने की संभावना बन सकती है।
निष्कर्ष
इन सूत्रों का फलित विचार करते समय केवल एक योग को देखकर निश्चित निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। ग्रहों का बल, राशि, दृष्टि, युति, भावाधिपत्य तथा दशा–अंतर्दशा आदि भी साथ में विचारणीय हैं।
अतः ये सूत्र कुंडली में धन, सम्पन्नता एवं सफलता की संभावनाओं को समझने के उपयोगी संकेत प्रदान कर सकते हैं।