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कुशोत्पाटिनी अमावस्या महत्व

कुशा जिसे सामन्य घांस समझा जाता है उसका बहुत ही बड़ा महत्व है … कुशा के अग्र भाग जोकी बहुत ही तीखा होता है इसीलिए उसे कुशाग्र कहते हैं *””तीक्ष्ण बुद्धि वालो को भी कुशाग्र इसीलिए कहा जाता है “”* इसकी विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करने से पहले इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता आपको बता दूँ कि कुशा महिलाओं की सुरक्षा करनें में राम बाण है जब लंका पति रावण माता सीता का हरण कर उन्हें अशोक वाटिका ले गया …उसके बाद वह बार बार उन्हें प्रलोभित करने जाता था और माता सीता “इस कुशा को अपना सुरक्षा कवच बनाकर “” उससे बात करती थी … जिसके कारण रावण सीता के निकट नहीं पहुँच सका …आज भी मातृ शक्ति अपने पास कुशा रखे तो अपने सतीत्व की रक्षा सहज रूप से कर सकती है क्योंकि कुशा में वह शक्ति विद्यमान है जो माँ बहिनों पर कुदृष्टि रखने वालों को उनके निकट पहुंचने भी नहीं देती …वहीं जो माँ या बहिन मासिक विकार से परेशान है उन्हें कुशा के आसन और चटाई का विशेष दिनों में प्रयोग करना चाहीये .पूजा-अर्चना आदि धार्मिक कार्यों में कुश का प्रयोग प्राचीन काल से ही किया जाता रहा है… यह एक प्रकार की घास है, जिसे अत्यधिक पावन मान कर पूजा में इसका प्रयोग किया जाता है…. इसकी पावनता के विषय में कथा पुराणों में अनेको प्रसंग मिलते है…।

 

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण कर समुद्रतल में छिपे महान असुर हिरण्याक्ष का वध कर दिया और पृथ्वी को उससे मुक्त कराकर बाहर निकले तो उन्होंने अपने बालों को फटकारा… उस समय कुछ रोम पृथ्वी पर गिरे.. वहीं कुश के रूप में प्रकट हुए..।

कुश ऊर्जा की कुचालक है.. इसलिए इसके आसन पर बैठकर पूजा-वंदना, उपासना या अनुष्ठान करने वाले साधन की शक्ति का क्षय नहीं होता.. परिणामस्वरूप कामनाओं की अविलंब पूर्ति होती है… उल्लेखनीय है कि वेदों ने कुश को तत्काल फल देने वाली औषधि, आयु की वृद्धि करने वाला और दूषित वातावरण को पवित्र करके संक्रमण फैलने से रोकने वाला बताया है…कुश का प्रयोग पूजा करते समय जल छिड़कने, ऊंगली में पवित्री पहनने, विवाह में मंडप छाने तथा अन्य मांगलिक कार्यों में किया जाता है…इस घास के प्रयोग का तात्पर्य मांगलिक कार्य एवं सुख-समृद्धिकारी है, क्योंकि इसका स्पर्श अमृत से हुआ है…

हिंदू धर्म में किए जाने वाले विभिन्न धार्मिक कर्म-कांडों में अक्सर कुश (विशेष प्रकार की घास) का उपयोग किया जाता है। इसका धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक कारण भी है…कुश जब पृथ्वी से उत्पन्न होती है तो उसकी धार बहुत तेज होती है….असावधानी पूर्वक इसे तोडऩे पर हाथों को चोंट भी लग सकती है… पुरातन समय में गुरुजन अपने शिष्यों की परीक्षा लेते समय उन्हें कुश लाने का कहते थे.. कुश लाने में जिनके हाथ ठीक होते थे उन्हें #कुशल कहा जाता था अर्थात उसे ही ज्ञान का सद्पात्र माना जाता था..।

 

वैज्ञानिक शोधों से यह भी पता चला है कि कुश ऊर्जा का कुचालक है…इसीलिए सूर्य व चंद्रग्रहण के समय इसे भोजन तथा पानी में डाल दिया जाता है जिससे ग्रहण के समय पृथ्वी पर आने वाली किरणें कुश से टकराकर परावर्तित हो जाती हैं तथा भोजन व पानी पर उन किरणों का विपरीत असर नहीं पड़ता…।

पांच वर्ष की आयु के बच्चे की जिव्हा पर शुभ मुहूर्त में कुशा के अग्र भाग से शहद द्वारा सरस्वती मन्त्र लिख दिया जाए तो वह बच्चा कुशाग्र बन जाता है।

 

कुश से बने आसन पर बैठकर तप, ध्यान तथा पूजन आदि धार्मिक कर्म-कांडों से प्राप्त ऊर्जा धरती में नहीं जा पाती क्योंकि धरती व शरीर के बीच कुश का आसन कुचालक का कार्य करता है…।

 

कुश की जानकारी अंश मात्र हैं… कुश गुणों की खान हैं.. इसका उपयोग जानिये,, अपने गांव शहर में नही हो तो कही से लाकर ,अपने यहाँ रोपित करे ताकि सबको इसका लाभ मिल सके..।

 

कुशा के खेत बहुत महत्वपूर्ण

 

भादौ की अमावस बैल पोला और कुशा संग्रहण का सुंदर अवसर है। इस पर्व पर कुशा संग्रह का काम जब से समझ आई तब से हो रहा है। कई बार उदयपुर की मशहूर झील उदयसागर के पिछवाड़े के खेतों से कुशा का संग्रह किया और उसके पूले मित्रों तक पहुंचाये। कुशा के प्रयोग की सबको जानकारी है। महिलाएं कुछ ज्यादा ही ध्यान रखती हैं क्योंकि ग्रहण, सूतक, अर्पण – तर्पण आदि के दौरान हम से ज्यादा स्त्रियां ही कुशा को याद और उपयोग करती हैं।

सीता के काल से ही स्त्रियों को मालूम है कि कुशा रावण जैसी बला को टाल सकती है तो वे ही आगे चलकर बेटे का नाम कुसला या कुश रखती हैं! कुसल भूमि पर कितने कोसल, कौशल या कुशलगढ़ बसे और कुश उत्पाटन में दक्ष व्यक्ति को ही कुश या कुशल नाम मिला! कुशाग्र नामकरण का आधार क्या है? संस्कृत वाले इस घास के बारे में और भी जानते होंगे लेकिन चेटक विद्या और अंत्यकर्म प्रवीण लोग जानते होंगे कि कुशा के पुत्तल (पुतले) कब और क्यों बनते हैं? और, कुशा से कुशवाह, दाभ से दाभी जैसे वंशों की कहानियों के पीछे क्या कारण हैं?

 

कुशा उत्पादन वाले, बेड़च नदी के डब्बा छोर के एक खेत का नाम ही “कुसला” है, ऐसा पता चला। मित्र श्री उपेन्द्रसिंह अधिकारी और मैं वहां की तुलसीबाई के खेत पर जा पहुंचे और उनके परिवार के वृद्ध भेराजी द्वारा बताए कोने में कुशा उखाड़ने में जुट गए। बात – बात में पता चला कि कुशा मीठे पानी वाली भूमि पर होती है। मुझे तुरंत याद आया कि भेराजी और तुलसीबाई ने कब *वराहमिहिर को पढ़ा* जिसने मुंज, काश और कुशा को मीठे पानी का संकेत देने वाली वाली घास बताया है! (दकार्गल विद्या) वराह ने कुशा के आधार पर मीठे पानी का ज्ञान इस देहात से ही लिया हो और इसके गुण – धर्म को पहचान कर अध्येता वैदिक महर्षि बने।

 

कुशा हमारे घर में बारहों मास होनी चाहिए, यह मां का आदेश है! कहती थीं : पशुओं ने इसको नहीं खाया, मानवों के हित में छोड़ रखा है ताकि वे मीठे पानी की पहचान कर सकें, सूतक जैसे उत्पातों से निजात पा सकें। इसीलिए वह भादवी अमावस को हमें खेत पर लेे जाती थीं और कहानी में कहती थीं तुम जिसको घास कहते हो, उसने क्या – क्या नहीं दिया! पूछती जाती : क्यों कुशा का आसन बनाया गया! कब बना? कुशा उत्पादन कहां होता है और क्यों होता है? कुश द्वीप, हिन्दू कुश, कुशावर्त… जैसे नाम कैसे पड़े! यही उपयोगी घास मानी गई जिसके रज्जू से लेकर आसन और वितान तक बने, अंगूठी और मृदभांड रखने के लिए इंडोनिया (अंग्रेजी नाम नहीं) बनाई गईं… आदि मानव भी इसको जानता था और इसी कारण ज्ञानियों ने भी बात को आगे बढ़ाया लेकिन उन्होंने संस्कृत भाषा में कहा जबकि यह सब लोक के ज्ञान में है।

कुशोत्पाटिनी अमावस्या महत्व

भाद्रपद कुशोत्पाटिनी (पिठौरी)  अमावस्या विशेष

पॉजिटिव साइंसेज ऑफ हिंदूज

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