
“सन 1817”
1817 में विश्व में एक नई बीमारी ने दस्तक दी।
नाम था *”ब्लू डेथ”*
ब्लू डेथ यानि *”कॉलेरा”* जिसे हिंदुस्तान में एक नया नाम दिया गया……..*”हैजा”।*
हैजा विश्व भर में मौत का तांडव करने लगा और इसकी चपेट में आकर कर उस समय लगभग 1,80,00,000(एक करोड़ अस्सी लाख) लोगों की मौत हो गयी। दुनिया भर के वैज्ञानिक हैजा का ईलाज खोजने में जुट गये।
“सन 1844”
*रॉबर्ट कॉख* नामक वैज्ञानिक ने उस जीवाणु का पता लगाया जिसकी वजह से हैजा होता है और उस जीवाणु को नाम दिया वाइब्रियो कॉलेरी।
रॉबर्ट कॉख ने जीवाणु का पता तो लगा लिया लेकिन वह यह पता लगाने में नाकाम रहे के वाइब्रियो कॉलेरी को कैसे निष्क्रिय किया जा सकता है।
हैज़ा फैलता रहा ……..लोग मरते रहे और इस जानलेवा बीमारी को ब्लू डेथ यानि “नीली मौत” का नाम दे दिया गया।
“1 फरवरी 1915”
पश्चिम बंगाल के एक दरिद्र परिवार में एक बालक का जन्म हुआ। नाम रखा गया *”शंभूनाथ”*। शुरुआत से ही शंभूनाथ पढ़ाई में अव्वल रहे। कोलकाता मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिल गया। डॉक्टरी से अधिक उनका रुझान “रिसर्च” की ओर था। इसलिये 1947 में उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के कैमरोन लैब में पीएचडी में दाखिला लिया। मानव शरीर की संरचना पर शोध करते समय शंभूनाथ डे का ध्यान हैज़ा फैलाने वाले जीवाणु वाइब्रियो कॉलेरी की ओर गया।
1949
माटी का प्यार शंभूनाथ डे को वापिस भारत खींच लाया। उन्हें कलकत्ता मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी विभाग का निदेशक नियुक्त किया गया और वह महामारी का रूप ले चुके हैज़े का ईलाज ढूंढने में जुट गये।
बंगाल उस समय हैज़े के कहर से कांप उठा था। हॉस्पिटल हैजे के मरीजों से भरे हुये थे।
1844 में रॉबर्ट कॉक के शोध के अनुसार जीवाणु व्यक्ति के सर्कुलेटरी सिस्टम यानी कि खून में जाकर उसे प्रभावित करता है। दरअसल यहीं पर रॉबर्ट कॉख ने गलती की, उन्होंने कभी सोचा ही नहीं कि यह जीवाणु व्यक्ति के किसी और अंग के ज़रिए शरीर में जहर फैला सकता है।
शंभूनाथ डे ने अपने शोध के निष्कर्ष से विश्व भर में सनसनी फैला दी। शंभूनाथ के शोध से पता चला वाइब्रियो कॉलेरी खून के रास्ते नहीं बल्कि छोटी आंत में जाकर एक टोक्सिन/जहरीला पदार्थ छोड़ता है।इसकी वजह से इंसान के शरीर में खून गाढ़ा होने लगता है और पानी की कमी होने लगती है।
1953
शंभूनाथ डे का शोध प्रकाशित के पश्चात ही *ऑरल डिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ORS) को बनाया गया।* यह सॉल्यूशन हैजे का रामबाण इलाज साबित हुआ। हिंदुस्तान और अफ्रीका में इस सॉल्यूशन के जरिये लाखों मरीजों को मौत के मुँह से निकाल लिया गया।
विश्व भर में शंभूनाथ डे के शोध का डंका बज चुका था। परंतु उनका दुर्भाग्य था के वह शोध भारत भूमि पर हुआ था। *लाखों करोड़ों लोगों को जीवनदान देने वाले शंभूनाथ को अपने ही राष्ट्र में सम्मान नहीं मिला।*
शंभूनाथ आगे इस जीवाणु पर और शोध करना चाहते थे लेकिन भारत में साधनों की कमी के चलते नहीं कर पाये।
उनका नाम एक से अधिक बार नोबेल पुरस्कार के लिए भी दिया गया। *इसके अलावा, उन्हें दुनिया भर में सम्मानों से नवाज़ा गया लेकिन भारत में वह एक गुमनाम शख्स की ज़िंदगी जीते रहे।*
शंभूनाथ की रिसर्च ने ब्लू डेथ के आगे से डेथ(मृत्यु) शब्द को हटा दिया। करोड़ों लोगों की जान बच गयी। इतनी बड़ी उपलब्धि के पश्चात भी वह *”राष्ट्रीय नायक”* ना बन सके। ना किसी सम्मान से नवाजे गये। ना सरकार ने सुध ली।
यही नहीं करोड़ों लोगों की ज़िंदगी बचाने वाले इस राष्ट्रनायक के विषय में हमें पढ़ाया तक नहीं गया।
हमें अपने असली नायकों को पहचाना होगा। उन्हें सम्मान देना होगा।
“गुमनाम नायक”…….यह श्रृंखला नहीं ……हिंदुस्तान के रियल लाइफ़ हीरोज़ से रूबरू करवाने का एक प्रयास है।
क्या आप को ऐसे असंख्य नायकों से मिलना है?
आपके जवाब का इंतजार है…
मलेरिया मानव सभ्यता के प्राचीनतम रोगों में से एक है जिसका उल्लेख 1600 ईसा पूर्व वैदिक लेखों में भी किया गया है। हिप्पोक्रेट्स द्वारा 2500 वर्ष पूर्व एवं 500 ईसा पूर्व आर्यन सर्जरी के संस्थापक चरक एवं सुश्रुत द्वारा भी इसका उल्लेख किया गया है। ऐतिहासिक दृष्टि से मलेरिया द्वारा युद्ध एवं शांति में भी अहम भूमिका निभाई गई है। मलेरिया के द्वारा ग्रीस की वैभवता, रोमन साम्राज्य का पतन, इजिप्शियन सभ्यता का नाश एवं सीलोन (श्रीलंका) की प्राचीन संस्कृति को समाप्त करने में बड़ा हाथ रहा है। प्राचीन रोम को यूरोप की मलेरिया कैपिटल (राजधानी) के रूप में जाना जाता था।
मलेरिया मानव को 50,000 वर्षों से प्रभावित कर रहा है शायद यह सदैव से मनुष्य जाति पर परजीवी रहा है। इस परजीवी के निकटवर्ती रिश्तेदार हमारे निकटवर्ती रिश्तेदारों मे यानि चिम्पांज़ी मे रहते हैं। जब से इतिहास लिखा जा रहा है तबसे मलेरिया के वर्णन मिलते हैं। सबसे पुराना वर्णन चीन से 2700 ईसा पूर्व का मिलता है। मलेरिया शब्द की उत्पत्ति मध्यकालीन इटालियन भाषा के शब्दों माला एरिया से हुई है जिनका अर्थ है ‘बुरी हवा’। इसे ‘दलदली बुखार’ (अंग्रेजी: marsh fever, मार्श फ़ीवर) या ‘एग’ (अंग्रेजी: ague) भी कहा जाता था क्योंकि यह दलदली क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैलता था।
मलेरिया पर पहले पहल गंभीर वैज्ञानिक अध्ययन 1880 मे हुआ था जब एक फ़्रांसीसी सैन्य चिकित्सक चार्ल्स लुई अल्फोंस लैवेरन ने अल्जीरिया में काम करते हुए पहली बार लाल रक्त कोशिका के अन्दर परजीवी को देखा था। तब उसने यह प्रस्तावित किया कि मलेरिया रोग का कारण यह प्रोटोज़ोआ परजीवी है। *इस तथा अन्य खोजों हेतु उसे 1907 का चिकित्सा नोबेल पुरस्कार दिया गया।*
इस प्रोटोज़ोआ का नाम प्लास्मोडियम इटालियन वैज्ञानिकों एत्तोरे मार्चियाफावा तथा आंजेलो सेली ने रखा था। इसके एक वर्ष बाद क्युबाई चिकित्सक कार्लोस फिनले ने पीत ज्वर का इलाज करते हुए पहली बार यह दावा किया कि मच्छर रोग को एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य तक फैलाते हैं। किंतु इसे अकाट्य रूप प्रमाणित करने का कार्य ब्रिटेन के सर रोनाल्ड रॉस ने सिकंदराबाद में काम करते हुए 1898 में किया था। इन्होंने मच्छरों की विशेष जातियों से पक्षियों को कटवा कर उन मच्छरों की लार ग्रंथियों से परजीवी अलग कर के दिखाया जिन्हे उन्होंने संक्रमित पक्षियों में पाला था। इस कार्य हेतु उन्हे 1902 का चिकित्सा नोबेल मिला।
जब आप मलेरिया की बात करतें है तो ये झूठ आपको विकिपीडिया पर मिलता है। लेकिन सच ये है कि मलेरिया की खोज सैकड़ो सालो पुरानी है 600 साल ईसा पूर्व और इसे किसी ब्रिटिश में नही बल्कि एक भारतीय ने खोजा था नाम था #सुश्रुत । नाम तो सुन रखा होगा आपने , The mosquito नामक किताब जो Timothy Winegard ने लिखी है उसमें इसका सपष्ट उल्लेख किया है । लेकिन हमारे वामपंथी विचारधारा के इतिहासकार पश्चिमी चरण चाटन में इतने व्यस्त रहे कि उन्होंने हमें बताया ही नही की हमारा भारत कितना गौरवशाली और आधुनिक रहा था ।।
आधुनिकता में हमसे आगे कोई नही था जिसपे पश्चिमी ठप्पा लगाकर ऐसे पेश किया गया कि हम अनभिज्ञ थे जानते ही नही थे जबकि हमे उनसे नही उन्हें हमसे सीखने की आवश्यकता है , वो हमें हमारी ही चीज़े देते गए अपना कहकर और हम जानते हुए भी उन्हें उनका बोलकर अपनाते गए… इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा???
सुश्रुत संहिता में 5 प्रकार के मच्छरों के स्प्ष्ट उल्लेख मिलता है , हैजा जैसी बीमारियो की जानकारी कारण उपचार तक उसमे लिखा है , *लेकिन हम क्यों माने जबतक पश्चिमी ठप्पा नही लगता उसपर ।*
#विशेष –
सुश्रुत संहिता’ आयुर्वेद एवं शल्य चिकित्सा का प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ है। यह आयुर्वेद के तीन मूलभूत ग्रन्थों में से एक है। आठवीं शताब्दी में इस ग्रन्थ का अरबी भाषा में ‘किताब-ए-सुश्रुत’ नाम से अनुवाद हुआ था। ‘सुश्रुत संहिता’ में 184 अध्याय हैं, जिनमें 1120 रोगों, 700 औषधीय पौधों, खनिज-स्रोतों पर आधारित 64 प्रक्रियाओं, जन्तु-स्रोतों पर आधारित 57 प्रक्रियाओं तथा आठ प्रकार की शल्य क्रियाओं का उल्लेख है।सुश्रुत यह जानते थे कि जन रोग और जानवरों के बीच एक कड़ी है। प्राकृतिक या अलौकिक आपदा, जलवायु परिवर्तन कुछ हद तक मानव गतिविधि के कारण ही होता है। इसके अलावा, बीमारी के बारे में सुश्रुत की यह धारणा कि हवा के माध्यम से बीमारी का ‘बिखराव’ होता है, काफी आधुनिक थी।
#सोर्स –
Monier-Williams, Monier (1899). A Sanskrit-English Dictionary. Oxford: Clarendon Press. पृ॰ 1237. मूल से 18 अक्तूबर 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 15 जून 2020.
“World’s first plastic surgeon may well have been Indian (but he wasn’t Shiva)”. मूल से 27 मई 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 27 मई 2019.
Pranayjoyoti and kashmiri pandit quote
Singhal, G. D. (1972). Diagnostic considerations in ancient Indian surgery: (based on Nidāna-Sthāna of Suśruta Saṁhitā). Varanasi: Singhal Publications.
*ऋग्वेद में वर्णित रोग और निदान*
ऋग्वेद की ऋचाओं में कुछेक रोगों के नाम भी मिलते हैं। इनमें *यक्ष्मा, राजयक्ष्मा, हृदय रोग, दनीमा (बवासीर) हरिमा पृष्ठयामगयी आदि रोगों का उल्लेख है।* इसमें से यक्ष्मा रोग का वर्णन कई ऋताओं में मिलता है। यक्ष्मा से ऋषियों का वास्तविक आशय किस तरह के रोग का है, यह पूरी तौर पर स्पष्ट नहीं हो पाता। सम्भवत: कई तरह की बीमारियों के लिये यक्ष्मा नाम रहा होगा। इनमें ज्वर जान पड़ता है और शायद विभिन्न अंगों की मांसपेशियों से होने वाले दर्द के लिये भी यही शब्द रहा हो। शारीरिक कमजोरी के लिये भी यक्ष्मा शब्द का प्रयोग किया जाता था। यह भी हो सकता है कि शायद रोग का अर्थ देने वाला यह एक सामान्य शब्द के रूप में भी प्रयुक्त होता रहा हो।
दसवें मंडल की एक ऋचा में यक्ष्मा और राजयक्ष्मा दोनो का अलग अलग रोग के रूप में नाम आया है। उससे संकेत यह मिलता है कि सम्भवत: राजयक्ष्मा बीमारी रही हो। आजकल यह नाम तपेदिक के लिये प्रयोग में आता है। उस समय यह बीमारी क्या थी, इसके बारे में निश्चत रूप से कुछ कहना कठिन है। ऋचा में कहा गया है – जीने के लिये हवि द्वारा मैं तुम्हे अज्ञात यक्ष्मा रोग और राजयक्ष्मा से छुुडाता हूं यदि कोई पाप-ग्रह इस रोगी को पकड़े हुए है, तो इन्द्र और अग्नि उससे इसे छुटकारा दिलावें। (10.161.1)
यदि इस रोगी की जीवन शक्ति समाप्त हो चुकी है (यदि क्षितायु:) और यह मृत्यु के नजदीक है, तब भी मै निऋति (मृत्यु देवता) के पास से इस वापस ले आउंगा। (10.161.2)
मैंने इस रोगी को सहस्त्रगुणयुक्त, सौ वर्ष आयु वाले यज्ञ से इसके रोग को नष्ट कर दिया है। सारे पापों से छुड़ाकर इन्द्र इसे सौ वर्ष तक जीवित रखें। (10.161.3)
मैंने इस रोगी को सौ शरत् एक सौ हेमंत और एक सौ वसंत ऋतुओं तक सुखपूर्वक जीवित रहने के लिए रोग मुक्त कर दिया है।
(शरद शत: शब्द कैसे आया समझ रहा है) इन्द्र, अग्नि, सविता और बृहस्पति हव्य से तृप्त होकर इसे सौ वर्षों तक जीने की शक्ति पुन: दें। (10.161.4) एवं पुन:
हे रोगी, तुम्हें मैने रोग से मुक्त किया है। तुम्हें मैं लौटा लाया हुॅ। तुम पुुन: नये होकर आये हो। तुम्हारे सफल अंगों (सर्व अंग) तुम्हारी ऑखों और समस्त परमाणु को मैंने प्राप्त किया है। (10.161.5)
ऋग्वेद के सातवें मंडल के सूक्त 71 की दूसरी ऋचा में अश्विनी कुमारों की स्तृति में कहा गया है कि वे अन्न की दरिद्रता और रोगों को हमसे दूर रखें और दिन रात हमारी रक्षा करें।
कुछ लोगों ने पहले मंडल के सूक्त 117 की सातवीं ऋचा के आधार पर यह कहा है कि कुष्ठ रोग के कारण घोषा का विवाह नही हुआ, जिससे वह अपने पिता के घर बैठी हुई वृद्धावस्था को प्राप्त हो रही थी, जब अश्विनी कुमारों ने उसके कोढ़ को दूर कर उसे प्रप्ति प्रदान किया। हालांकि इस ऋचा से घोषा को कुष्ठ रोग हुआ रहा हो यह स्पष्ट नही होता।
इस सूक्त की आठवीं ऋचा में भी कहा गया है- हे अश्विनौ, तुमने कुष्ठरोग से ग्रस्त श्याव ऋषि को अच्छा करके उन्हें उज्ज्वल त्वचा वाली स्त्री प्रदान की, तथा नेत्रहीन कण्व को तेजपूर्ण नेत्र दिये। तुमने नृषद के बहरे प्रभु को कान दिये, तुम्हारे ये कार्य प्रशंसनीय है। सूक्त की तेरहवीं ऋचा में कहा गया है – हे अश्विनीकुमारों, तुमने अपने औषधि दान के कार्य द्वारा वृद्ध च्यवन ऋषि को युवा किया था।
ऋग्वेद में जहां रोगों के इलाज की बात होती है, वहां सर्वत्र आश्विनौ का नाम लिया जाता है। अश्विद्वय ऋग्वेद के वैद्य की हैसियत रखते हैं। रोगों से छुटकारा दिलाने के लिये उन्हीं को याद किया जाता था। आठवें मंडल में है – प्रख्यात देव वैद्य अश्विनौ हमारा मंगल करें। हमारे यहां से पाप हटाये और शत्रुओं को दूर भगायें। (8.18.8)
पहले मंडल के सूक्त 117 की एक ऋचा में कहा गया – हे अश्विनी कुमारों, तुमने दस्यओं द्वारा कुएॅ के जल में डुबोए गये रेम ऋषि को बाहर निकाल कर उनके क्षत विक्षत शरीर को अपनी ओषधियों से ठीक किया था।
पहले मंडल के ही सूक्त 116 में उल्लेख है कि खेल राजा की पत्नी विश्पला का एक पैर युद्ध में कट गया था, जिसे अश्विनी कुमारों ने रात भर में घातु का पैर बनाकर विश्पला को लगायाा था। (15) हिरण्यस्तूय ने पहले मंडल की एक ऋचा में कहा है – हे अश्विनौ, दिव्य लोक की ओषधि हमें तीन बार दो, पृथ्वी पर पैदा वाली औषधि हमें तीन बार दो। अन्तरिक्ष से तीन बार औषधि हमें दो। बृहस्पति के पुत्र शंयु की तरह हमारे पूत्र को भी सुख स्वास्थय दो। हे शुभ लाने वाली औषधियों के पोषण, हमें वात, पित्र, कफ इन तीनों धातुओं से संवन्धित सुख दो।
हे नासत्यो, तुमने जिन औषधियों के द्वारा पकथ राजा की रक्षा की थी, जिन औषधियों के द्वारा अघ्रिगु राजा की रक्षा की थी, जिनमें बभु की रक्षा की थी, उन्हीं औषधियों के द्वारा, शीध्र आकर, आतुर (रोगी) को बचाओ।
कहीं कहीं सोमरस को भी दवा के रूप में माना गया है उदाहरण के लिये आठवें मंडल मे कहा गया है – हे मित्र और वरुण, सूर्योदय के समय मैं सोमरस पीता हूं, वह आतुर (रोगी) की दवा (भेषज) है। इसी तरह औषधि को लेकर भी ऋग्वेद में अनेक तरह से उसकी प्रशंसा की गई है। उसका वर्णन दसवें मंडल के सूक्त 97 की तेईस ऋचाओं में है। (8.61.17)
हे माता के समाप्त हितकारिणी ओषधियों! तुम्हारे सैकड़ों जन्म और सैकड़ों नाम है, और तुम्हारे सहस्त्रों अंकुर और पौधे हैं। तुम मुझे आरोग्य प्रदान करो। तुम्हारे पास सैकड़ों शक्तियां हैं।
हे ओषधियों! तुम सदैव फूल और फल वाली हो। तुम अश्वों के समान रोग रूप शत्रुओं पर विजय पाने वाली हो। तू विविध प्रकार की रोग-पीड़ाओं का रोधक हो। रोगियों को रोग से मुक्त करने वाली हो।
हे मातातुल्य हितकारिणी ओषधियो! तुम्हारे सामने मै यह कहता हुॅ कि हे वैघ, मै ओषधियों को पाने के लिये अश्व, गौ, भूमि, वस्य (वास:) और अपने आप को भी (आत्मन:) तुम्हारे लिये देता हूं।
हे ओषधियों, तुम्हारा अश्वत्थ और पलाश वृक्ष पर निवास है। तुम भूमि, सूर्य व राशियों को सेवन करने वाली हो, जिससे तुम पुरुष देह का पोषण करती हो।
राजा जिस प्रकार सभा में शोभायमान होते है (राजान: समितौ इव), उसी प्रकार भिन्न-मिल ओषधियों के बीच भिषक (चिकित्सक) शोभित होता है। भिषक रोगो का विनाश कर्ता है।
इस रोगी को दूर करने के लिये मै अश्ववती, सोमवती बल उत्पादकर और पराक्रम बढाने वाली ओषधि को तथा दूसरी सभी ओषधियो को जानता हूं।
गोशाला से जैसे गौवे आती है है, वैसे ही ओषधियों में से उनका गुण बाहर होता हैं। हे रोगी, ये ओषधियॉ तुम्हें स्वास्थ्य प्रदान करेंगी।
हे ओषधियो, तुम्हारी माता का निमा इष्कृति नीरोग करने वाली है। तुम सब रोगों को बाहर करने वाली हो जो रोग शरीर को पीड़ा देता है, उसे तुम लोग शीघ्रता से बाहर निकाल दो (नि:कृथ)। रोगी को रोग मुक्त करो।
लुटेरा जैसे पथिकों पर प्रहार करके लूटता है, उसी प्रकार शरीर में हर जगह फैल कर ओषधियॉ रोगो पर धावा करती है, और शरीर से रोगों को दूर करती है।
जब शक्ति प्रदान करने वाली इन ओषधियो को मै हाथ मे लेता हूँ तो रोग की आत्मा वैसे ही मर जाती है। जैसे मृत्यु से जीव मर जाता है।
हे ओषधियो, तुम जिसके अंग अंग, पोर पोर में प्रसिद्ध होती हो, उसके शरीर से रोग को तुरन्त ही दूर कर देती हो।
जो फल युक्त है, जो फलरहित है तथा जो फल युक्त है, जो फूलरहित है, वे सभी औषधियां, बृहस्पति द्वारा उत्पादित होकर हमें पाप से बचावें ।
जिन ओषधियों का राजा सोम है और जो ओषधियॉ सैकड़ों गुणों से युक्त है, उनमें तुम उत्तम हो तुम वासना को पुरी करने और ह्रदय को शन्ति देने में समर्थ हो।
हे ओषधियों, तुम्हे खोदकर निकालेने वाला मैं पीडि़त न होऊॅ जिसके आरोग्य के लिये मै तुम्हें खोदता हूंू वह भी नष्ट नहीं हो। मनुष्य और पशु सभी रोग रहित रहें।
जो ओषधियां मेरा यह स्तोत्र सुन रही है और जो दूर होने के कारण मेरा स्तोत्र नहीं सुन पा रही है, वे सब इकट्टी होकर इस रोग मुक्त शरीर को बल देवें।
हे ओषधियों! तुम उश्रम हो (त्वम् उश्रमा असि), जितने वृक्ष है, वे सब तुमसे हीन है। जो हमारा अनिष्ट चाहता है वह हमसे दूर रहे। (10.97.23)
हे वास्तोष्पति, तुम रोगनाशक हो। तुम सब प्रकार के रूपों में प्रवेश कर हमारे सखा और हमारे लिये सुखकर बनो। (7.55.10)
✍🏻फिर मिलते है…