
श्रावण मास उत्सव है तो रहस्य भी। गूढ़ रहस्य होगा न कि वैदिक ऋषि श्रावण मास को ‘नभ’ क्यों कहते हैं। नभस् इसलिए क्योंकि जल का अवरोध समाप्त रहता है। इस महीने का सूर्य ‘इन्द्र’ क्यों है? वह इन्द्र जो द्यौ का और शवसी नाम की गौ से उत्पन्न है। उपेन्द्र विष्णु का बड़ा भाई है, तड़ित और मेघ का स्वामी देवता हैं।
और अप्सरा! अप्सरा प्रम्लोचा क्यों? वह प्रम्लोचा जिसे इन्द्र ने गोमती तट पर तपस्या कर रहे कंडु ऋषि का तप भंग करने भेजा था। कमाल देखिए कि ऋषि को लगा कि वह प्रम्लोचा पर बस कुछ क्षण के लिए आसक्त हुए थे पर उन्हें साथ रहते ९०७ वर्ष बीत गये थे। जैसे एक महीने का सावन एक क्षण में बीत जाता है।
फिर गंधर्व कौन? विश्वावसु! वह विश्वावसु जिसे कुंवारियों का अधिपति कहा गया। जिसे कुमारी हृदय पर अधिकार है। सावन में यह *’मन’* कैसा *’नम’* हो जाता है कि कहीं *’अ-मन’* होने लगता।
और इस माह का नाग कौन? एलापत्र! वह एलापत्र जो ब्रह्मसभा का मान्य सदस्य है। वह एलापत्र जो वंश रक्षा का देवता है। सावन में वंश- परम्परा अक्षुण्ण रखने के जतन आज भी तमाम समुदायों में जीवित हैं।
और इस श्रावण मास के यक्ष को देखिए। क्या नाम है? श्रोता! भारतीय वेदान्त दर्शन में *ब्रह्मज्ञान* की प्राप्ति का एक मार्ग कहा गया श्रवण। तो श्रोता बनना आवश्यक। किसी ऋषि तुल्य संत महात्मा से आत्मज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न ही सावन को मना ना हे, *घटअंदर बैठे ब्रह्म का बोध होना, अनुभव करना ही शिवपूजा है।*(जीते जी कभी इस के लिए प्रयत्न तो कर लेना)
धर्म-बक उपाख्यान का मूल चरित्र यही। सावन का राक्षस कौन? वर्य ! क्यों? मैं ही प्रधान यही बड़ा अवगुण इसका।
और ऋषि अंगिरा! स्वयं बृहस्पति के पिता। श्रावण नक्षत्र स्वयं चंद्रमा का नक्षत्र है। चंद्रमा और बृहस्पति का संबंध जगजाहिर है ही। सावन को सावन कहते ही इसीलिए हैं क्योंकि चंद्रमा पूर्णिमा के समय इस नक्षत्र के आस-पास होंगे। *“श्रावणः श्रवणनक्षत्रे पौर्णमास्यां भवत्यतः।”*
सावन ऋतु, रस, स्मृति, लोकाचार, कृषि, देह, देवता और प्रेम को एक साथ बाँधने वाला सांस्कृतिक रज्जु है।
सावन आते ही आकाश का रंग बदलता है, धरती की गंध बदलती है, खेतों की भाषा बदलती है और मनुष्य के भीतर भी कोई पुराना संगीत जाग उठता है। सूखी हुई डालियों पर हरियाली लौटती है, कुओं में जल का स्वर आता है, मोर बोलते हैं, झूले पड़ते हैं और लोकगीतों में विरहिणी स्त्री अपने दूर गए प्रिय को पुकारती है—
*अजहुँ ना आए बालमा, सावन बीता जाए*
किन्तु भारतीय परंपरा में सावन केवल प्रकृति का उत्सव नहीं है। यह श्रवण का महीना है—वेद सुनने का, गुरु से ज्ञान ग्रहण करने का, शिव को जान ने का, नागों और पृथ्वी के प्रति कृतज्ञ होने का, बहन के हाथ से रक्षा-सूत्र बाँधने का और वर्षा से पुनर्जीवित हुई पृथ्वी के साथ अपने संबंध को फिर से पहचानने का महीना है।
इसलिए सावन को समझना हो तो केवल पंचांग देखना पर्याप्त नहीं। उसे आकाश, आयुर्वेद, कृषि, ज्योतिष, पुराण, वेद, वास्तु (जो सबसे अगत्य है),लोकगीत और भारतीय स्त्री-मन—इन सबके बीच रखकर देखना होगा।
सूर्य का उत्तरायण से दक्षिणायन की ओर संक्रमण भारतीय कालगणना में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। वर्षा ऋतु इसी व्यापक सौर-ऋतुचक्र के भीतर आती है।आधुनिक खगोल-विज्ञान की दृष्टि से देखें तो भारतीय मानसून का वास्तविक कारण पृथ्वी-सूर्य की मौसमी ज्यामिति, स्थल और समुद्र के तापांतर, वायुदाब-प्रणाली तथा वायुमंडलीय परिसंचरण है। अतः यह कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा कि *“सावन की वर्षा चंद्रमा के कारण होती है।”* परंपरा ने इन आकाशीय घटनाओं को एक दूसरे से जोड़कर काल की एक समग्र भाषा बनाई थी। सूर्य ऋतु का नियंता है। चंद्रमा मास का सूचक है।
नक्षत्र काल का चिह्न हैं। और वर्षा पृथ्वी के पुनर्जन्म की सूचना।
सावन का सबसे लोकप्रिय धार्मिक रूप है—शिव का महीना।
*“चन्द्रशेखरमाश्रये।”* यह चंद्रमा और शिव के संबंध का माह भी अद्भुत रहस्य। एक श्रुति के हिसाब से दोनों साढ़ू भाई हैं आपस में। तो शिव ने साढ़ू को सर चढ़ा रखा है।
चंद्रमा मन के अधिपति माने जाते हैं और शिव *‘मनःशमन’* के देवता की तरह भारतीय मानस में प्रतिष्ठित हैं। इसीलिए सावन के सोमवारों में शिवोपासना का जो विस्तार हुआ, उसमें केवल पौराणिक आस्था ही नहीं, चंद्र-मन-शिव-जल के प्रतीकात्मक संबंध को भी पढ़ा जा सकता है।
जल और चंद्रमा का संबंध भी भारतीय चिंतन में बहुत प्राचीन है। चंद्रमा का कलात्मक बढ़ना-घटना, समुद्र के ज्वार-भाटे और जल के साथ उसकी सांस्कृतिक संबद्धता ने चंद्रमा को रस, सोम और जीवन-जल के प्रतीक के रूप में स्थापित किया।
सावन में शिवलिंग पर जलाभिषेक इसलिए केवल एक पूजा-पद्धति नहीं रह जाता। वह वर्षा से भीगी पृथ्वी के बीच मनुष्य द्वारा जल के प्रति व्यक्त किया गया आभार और समर्पण भी बन जाता है।
रामायण के किष्किंधा कांड में मिलता है।राम सुग्रीव से कहते हैं कि श्रावण वर्षा के आरंभ का समय है और वर्षा ऋतु में युद्ध करना उचित नहीं। वर्षा बीतने पर कार्तिक में आकाश निर्मल होगा और तब अभियान आरंभ किया जा सकेगा। यह प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रकृति यहाँ मनुष्य की राजनीति को भी अनुशासित कर रही है।सावन में युद्ध स्थगित है।
कालिदास के मेघदूत में बादल केवल जल लेकर चलने वाला वाष्प-पुंज नहीं है। वह विरही यक्ष का दूत है। मेघ के भीतर संदेश है, स्मृति है, प्रेम है और मिलन की आशा है। कालिदास से कजरी तक बारहमासा से भोजपुरी तक सावन विरह को दृश्य और मिलन को संभाव्य बनाता है।वर्षा बाहर भी होती है और भीतर भी।
सावन सच में भारतीय स्त्री का मन है। लोकगीतों को देखिए? कहीं मायके आई बेटी अपने भाई से कहती है कि उसे फिर ससुराल न भेजा जाए। विवाह के बाद पति से जिद कर मायके लौटना और कहीं इसका उलट भी, सखियों से मिलना, झूला झूलना, मेहंदी रचाना, माता-पिता से मिलना—इन सबको सावन के धार्मिक पर्वों ने एक सांस्कृतिक वैधता दी है। इसलिए हरियाली तीज केवल व्रत नहीं है। वह बेटी के मायके लौटने की सामाजिक कविता भी है।
हरियाली तीज, हरित प्रकृति,श्रावण शुक्ल तृतीया को अनेक क्षेत्रों में हरियाली तीज मनाई जाती है। श्रावण की तृतीया तिथि को तीज-परंपरा से जोड़ने की पुष्टि पंचांग-परंपरा में भी मिलती है। इस दिन प्रकृति का रंग हरा है। हरी चूड़ियाँ। हरी साड़ी मेंहदी।झूला। नीम और आम की डालियाँ। सखियों का समूह। गीत।
यहाँ ‘हरियाली’ केवल वनस्पति का रंग नहीं है। वह उर्वरता का प्रतीक है। वर्षा ने पृथ्वी को गर्भवती किया है। खेतों में अंकुर फूट रहे हैं। वृक्षों में नई पत्तियाँ हैं। स्त्री-सौंदर्य और पृथ्वी-सौंदर्य एक दूसरे का रूपक बन जाते हैं। इसलिए तीज के गीतों में पति की प्रतीक्षा और वर्षा की प्रतीक्षा एक-दूसरे में घुल जाती हैं।
मेघ प्रिय के आने का संकेत है।
श्रावण शुक्ल पंचमी आती है *नागपंचमी*। इसे केवल ‘साँपों की पूजा’ कह देना भारतीय परंपरा की जटिलता को बहुत छोटा कर देना होगा। भारतीय कृषि-समाज में नाग का संबंध खेत, मिट्टी, जल और भूमिगत संसार से रहा है। साँप चूहों जैसे कृंतकों को नियंत्रित करते हैं; कृषि-पर्यावरण में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है।
धार्मिक प्रतीक में नाग, भूमि के भीतर की शक्ति हैं, जल से जुड़े हैं, कुण्डलित ऊर्जा के प्रतीक हैं, अनन्त के प्रतीक हैं, और शिव के कंठ का अलंकार भी हैं। सावन में नागपंचमी का आना इस बात की सांस्कृतिक स्मृति है कि मनुष्य अकेला जीव नहीं है; उसका जीवन असंख्य अन्य प्राणियों के साथ साझा है।
अब सावन के सबसे गंभीर बौद्धिक पक्ष की बात कर लें।
सावन का एक ऐसा पक्ष भी है जो लोक-उत्सवों की चमक में अक्सर छिप जाता है—श्रावणी उपाकर्म। मनुस्मृति कहती है—
*“श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वाप्युपाकृत्य* *यथाविधियुक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासानर्धपञ्चमान्॥”— मनुस्मृति 4.95*
अर्थात् श्रावण की पूर्णिमा पर विधिपूर्वक उपाकर्म करके वेदाध्ययन किया जाए। गौतम धर्मसूत्र भी श्रावण पूर्णिमा को वार्षिक वेदाध्ययन के आरंभ से जोड़ता है। यजुर्वेदीय परंपरा में श्रावण पूर्णिमा का उपाकर्म आज भी एक महत्वपूर्ण वैदिक संस्कार है। विभिन्न शाखाओं के लिए नक्षत्र और तिथि की सूक्ष्म भिन्नताएँ भी धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में मिलती हैं।
यहाँ सावन का एक अद्भुत अर्थ खुलता है—
श्रावण = श्रवण।
वर्षा बाहर हो रही है,
*अंदर की वर्षा का क्या??* और भीतर वेद की वाणी का श्रवण प्रारंभ हो रहा है।
बाहर बादल गरज रहे हैं;
*अंदर नौबत बज रहे है,* ऋषियों की वाणी गूँज रही है।
यह संयोग भारतीय सांस्कृतिक चेतना में आकस्मिक नहीं लगता।
उपाकर्म जहाँ वैदिक ज्ञान की रक्षा का संस्कार है, वहीं रक्षा-सूत्र सामाजिक संबंधों की रक्षा का प्रतीक बन जाता है।
धागा यहाँ केवल धागा नहीं है।
वह कहता है—
मैं तुम्हारी रक्षा का संकल्प लेता हूँ और तुम मेरे जीवन की स्मृति में बँधे रहो।
एक ही पूर्णिमा पर—
वेद की रक्षा, संबंध की रक्षा और संस्कार की रक्षा।
यही भारतीय पर्व-व्यवस्था की खूबसूरती है।
अब सावन को शरीर की दृष्टि से देखिए।
वर्षा के साथ तापमान, आर्द्रता, जल की गुणवत्ता, भोजन की उपलब्धता और पाचन-शक्ति—सब बदलते हैं।
आयुर्वेद ने इसीलिए *ऋतुचर्या* की व्यवस्था की।
चरकसंहिता में वर्षा ऋतु के विषय में कहा गया है कि इस समय वर्षा, आर्द्रता और पृथ्वी से उठने वाले प्रभावों के कारण अग्नि कमजोर पड़ती है और वातादि दोषों का प्रभाव बढ़ता है। इसलिए आहार में संयम और अग्नि की रक्षा पर विशेष बल दिया गया है।
चरक के अनुसार वर्षा ऋतु में,
पुराना शालि/चावल, जौ,गेहूँ, हल्का एवं सुपाच्य भोजन, उचित मात्रा में मधु आदि का प्रयोग उपयोगी माना गया है; अत्यधिक जलपान, दिन में सोना और अनावश्यक शारीरिक परिश्रम से बचने की सलाह दी गई है।
सुश्रुत भी वर्षा ऋतु में पाचन और वात की स्थिति को ध्यान में रखते हुए आहार-विहार के विशेष नियम बताते हैं।
आज के संदर्भ में इसका एक व्यावहारिक अर्थ और भी है—मानसून में दूषित जल, संक्रमण, फफूँद, खाद्य-संदूषण और मच्छरजनित रोगों का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए ताजा, स्वच्छ, अच्छी तरह पका हुआ और सुपाच्य भोजन तथा सुरक्षित जल का सेवन आधुनिक सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी विवेकपूर्ण है।
अर्थात् आयुर्वेद का संदेश था
*सावन में प्रकृति बदली है, इसलिए आहार भी बदलो।*
बचपन की याद भी है सावन। मां झूला झूल रही है। हम बच्चे पेंग मार रहे हैं। मां गा रही है।
*”हमके मेंहदी मंगा द पिया मोतीझील सेजा के साइकिल से ना “*
कि
*”छैला छाय रहे मधुबन में सावन सुरत बिसारे मोर।मोर शोर बरजोर मचावै, देखि घटा घनघोर।।*
*कोकिल शुक सारिका पपीहा, दादुर धुनि चहुंओर।झूलत ललिता लता तरु पर, पवन चलत झकझोर।।”*
अब भी है सावन हमारी प्रतीक्षा में । पर राजनीति के अलावा अब कुछ और दिखाई नहीं देता
सावन आया साजन आए
सावन! शिव का श्रावण। सजना सजनी का सावन। कालिदास का सावन, माघ का सावन, रेणु का सावन। वेदों के श्रवण का महीना। कारी बदरिया, झूला, कजरी, सोहनी रोपनी, नायक-नायिका, संजोग- विरह, दादुर पाहुन का महीना।
सावन रस है, काव्य रस है। पण्डित लोग कह गये हैं कि *”रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम”!* और यह रस अपूर्व है। काव्य रस और सावन इन दोनों में आंसू घुलते हैं। सावन आंसुओं की निष्पत्ति भी है और कसौटी भी। श्रावण संजोग और वियोग दोनों का मूर्तिमान विग्रह है। यह परस्पर विरोधाभासी रसों का मादक ‘कॉकटेल’ है।
सावन रसाग्रही है, रसज्ञाता है रसराज है, रसेश्वर है। होता होगा रास शरद में, *रसाकर्षण और रसोत्कर्ष तो सावन में ही होगा।* आश्चर्य नहीं कि इस अप्रमेय अनिर्वचनीय मास को शिव की आराधना का समय माना गया। पुरूष सूक्त की बारम्बारता का समय यही तो है।
चैत्र मधुमास है परन्तु सावन ‘मधुराज’ है। यह ऋतुओं का *’गीत-गोविन्द’ है।* यह कालक्रम का पंचम माह काल- भागवत का रास पंचाध्यायी है। यह कालपुरूष का पञ्चम भाव है। हो भी क्यों नहीं इस माह के आदित्य स्वयं ‘इन्द्र’ होते हैं, वही ‘मघवा’! वर्षा और मेघ का देवता देवराज। प्रम्लोचा अप्सरा इस माह के आदित्य का मनरंजन करती हैं।
गांव गिरावं में जब बरसात न हो, किसी जमाने में प्रम्लोचा की देहयष्टि को भी मात देने वाली ग्राम्या नारी रात्रि में निर्वसना हल जोतती थी। अप्सराएं लाज से गड़ जातीं और असहाय इन्द्र मेघों को आदेश करता कि अब बरस!
न बरसे बादल! ब्राह्मण वृष्टि सूक्त की आवृत्तियां करेंगे और कहीं लुहेड़ा लोक मेंढक मेंढकी को पकड़कर उनकी चतुष्पदी विवाह करा देगा। बरसोगे नहीं तो जाओगे कहां।
यह सावन हमारे मन-काष्ठ के भीतर का हरापन है। यह वह रक्तधमनी है जहां आलोड़न, चुलबुलापन, स्फूर्ति और कैशौर्य बहते हैं। वैदिक ऋषियों के लिए यह वर्षा के देवता पर्जन्य की पिता के रूप स्थापना भी है साथ में उनके पिता होने का बोध भी। वाल्मीकि की उपमा देखिए- वह मेघमाल को ऐसी सीढ़ी कहते हैं जिस पर चढ़कर कुटज और अर्जुन की माला से हम सूर्य का अभिनंदन कर सकते हैं।
शूद्रक एक जगह लिखते हैं कि *’ सावन आकाश की जम्हाई है’!* ऐसा रूपक पूरे संसार के साहित्य में कहीं नहीं। ठाकुर बिल्वमङ्गल जी एक पद में लिखते हैं कि एक तो कर्क संक्रान्ति और सिंह संक्रान्ति को एक साथ सम्भालने वाला मास, दूसरे कि इस माह की पूर्णिमा पर ब्राह्मणों का राजा सोम अपने ही नक्षत्र में होगा, तीजे का क्षत्रियों का राजा इन्द्र इस महीने का आदित्य है और चौथे कि इस माह यौवन पर्वों से मकरन्द झरता है। ऋतुओं का यौवन काल है। *’प्राप्ते तु षोडशे वर्षे गर्दभी अप्सरा भवेत!* तो, सावन को घमण्ड क्यों न हो जाए?
मर्यादा पुरुषोत्तम भी लपेटे में आ जाते हैं।
*घन घमण्ड गरजत नभ घोरा।प्रियाहीन मन डरपत मोरा ।*
और बाबू जिस दो टके की नौकरी के लिए तुम मरे जाते हो, सनद रहे कि उसके सामने हमारी नायिकाओं के लिए सावन लखटकिया है।
ऋतुसंहार में कालिदास को वर्षा आगमन ऐसा दिखाई देता है, मानों कोई राजा गाजे बाजे के साथ चतुरङ्गिणी सैन साजे चला आ रहा हो। राजा ही है भाई सावन। इसके भय से कहो या प्रभाव से कहो सुकुमार नदियां रजस्वला हो जाती हैं। अगस्त्य के उदयपर्यन्त रजस्वला रहेंगी। और जो समुद्र गामिनी नदियां हैं जिनको पति का साहचर्य सुलभ है, वह रजोधर्म में नहीं होंगी। जानते हैं न नदी किसको कहते हैं? पानी की वह लहर जिसकी गति आठ हजार धनुष कम से कम हो वही नदी है, उसके पहले तो बस गर्त।
*प्रकृति धन्य है, भारतवर्ष धन्य है।*
अभी सोलह जुलाई को कर्क संक्रान्ति है।
कर्क संक्रांति के प्रारम्भ में तीन दिन तक महानदियां रजस्वला रहती हैं, वे स्त्रियों की भाँति चौथे दिन शुद्ध हो जाती हैं। *सिंह संक्रान्ति के समय गौ-प्रसव भी अशुभ।*
हमने समझा सावन न केवल शस्य, भावोद्रेक, रसोत्कर्ष और रजोधर्म का नियंता है अपितु वह इन सबमें *अंत:संश्लिष्ट* भी है। अब ऐसा लगेगा कि अहा! कितना सुन्दर सावन। पर नहीं ऐसा कतई नहीं। मैथिल-कोकिल महाकवि विद्यापति झूठ तो कहेंगे नहीं-
*” साओन मास बरिस घन वारि।पंथ न सूझए निसि अंधयारि।।चउदिस देखिअ बीजुरि रेह ।हे सखि! कामिनि जिवन संदेह!*
अब लाख टके का सवाल कि वो क्या चीज जो कामी-कामिनी के प्राण हरे ले रही। तो बाबू भाई उत्तर है कि सावन की हवा। हां, यह हम नहीं कह रहे, उलटा जपने वाले वाल्मीकि कह गये।
कैसी हवा है सावन की।
*मेघो दरविनिर्मुक्ताःकर्पूरदलशीतलाः* है। मने बादलों के गर्भ से निकली कपूर की डली है। और कैसी तो उसकी सुगंध है? सद्य:पुष्पित केतकी के सुगंध जैसी। और हवा की गति कैसी? जैसे योगी जल पीते हैं नासिका से।
आदिकवि कहते हैं बिजली इस हवा का साथ ऐसे दे रही मानो आकाश में सोने के कोड़े मारे जा रहे हों। विरही मन तो घायल होगा।
कुछ भाविक जन पूछते हैं कि सावन में क्या करें। आचार्य लोग कह गये हैं कि सावन में योग्य आत्मज्ञानी संत को घृतकुम्भ और नवयौवना को षोडशी का दान करना चाहिए।
उदाहरण और सरलता के लिए एक योग्य ब्रह्मज्ञानी की तस्वीर भी इस लेख के साथ आगे संलग्न है।