
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मृत्यु के सात प्रकार बताए गए हैं-
बालारिष्ट, योगारिष्ट, अल्प, मध्य, दीर्घ, दिव्य और अमित ।
मृत्युज्ञान अत्यंत दुर्लभ है, फिर भी इन सात प्रकारों के आधार पर आयु का विचार किया जाता है। बच्चे तथा उसके पिता के पूर्व जन्म के दुष्कृत्यों से उत्पन्न जन्मकालीन क्रूर ग्रह स्थितियों को अरिष्ट कहा जाता है । ये अरिष्ट योग कभी केवल शिशु, कभी पिता, कभी माता-पिता दोनों या पूरे परिवार के लिए कष्टकारक माने गए हैं।
अभुक्त मूल, भद्रा, यमघंट, दग्ध, मृत्यु व्यतिपात, वैधृति, वज्रयोग, ग्रहणकाल, सूर्य संक्रांति, अमावस्या, कृष्ण चतुर्दशी, विष घटी, चंद्र लग्न मृत्यु अंश आदि अनेक काल भी रिष्ट की श्रेणी में आते हैं। इसके अतिरिक्त वज्रपात, भूकंप, उल्कापात, धूमकेतु आदि अपशकुन भी अरिष्ट माने जाते हैं।
किसी भी अरिष्ट योग का फलादेश करने से पहले उसके अरिष्ट भंग (परिहार) का विचार अवश्य करना चाहिए।
बालारिष्ट योग :
मंत्रेश्वर, वैद्यनाथ तथा वेंकटेश आदि श्रेष्ठ आचार्यों के मत से 12 वर्ष की आयु तक बालारिष्ट का विचार करना चाहिए, उसके बाद ही कुंडली के राजयोगों तथा जीवन के शुभाशुभ का विचार करना चाहिए। इसलिए हम भी पूर्ववर्ती आचार्यों की आज्ञानुसार बालारिष्ट योगों से ही अपने योगशील का प्रारम्भ कर रहे हैं।
कुछ महत्त्वपूर्ण प्रभावशाली बालारिष्ट योग प्रस्तुत हैं।
1) लग्नेश यदि षष्ठ, अष्टम या द्वादश स्थान में हो तो प्रायः कष्ट होता है।
2) लग्न व चंद्रमा दोनों पापग्रह से युक्त हों, लग्नेश कमजोर हो तथा लग्न या चंद्रमा पर शुभग्रहों की दृष्टि न हो तो बालारिष्ट होता है।
3) क्षीण चंद्रमा बारहवें भाव में हो तथा उस पर राहु की दृष्टि हो।
4) पापग्रह से युक्त लग्नेश सप्तम (मारक) स्थान में हो।
5) लग्नेश अष्टम में तथा अष्टमेश लग्न में हो।
6) सिंह राशि का शुक्र 6-8-12 स्थानों में स्थित हो तथा उस पर पापी ग्रहों की दृष्टि हो।
7) सिंह राशि के नवांश में शनि हो तथा उस पर राहु की दृष्टि हो। साथ ही चंद्रमा चतुर्थ में एवं सूर्य षष्ठ में हो।
8) जन्म राशि का स्वामी पापग्रहों से युक्त होकर आठवें स्थान में हो।
9) सूर्य, चंद्र व शनि तीनों एकत्र होकर 6, 8, 12 स्थानों में कहीं स्थित हों।
10) चंद्र व बुध दोनों केंद्र में हों, शनि या मंगल (अस्त) की उनपर दृष्टि हो तो परम बालारिष्ट होता है।