
ज्योतिष शास्त्र में यदि किसी एक ग्रह का नाम सुनते ही लोगों के मन में भय, उत्सुकता और रहस्य तीनों एक साथ जाग उठें, तो वह निस्संदेह राहु है। बहुत से लोग राहु का नाम सुनते ही घबरा जाते हैं, क्योंकि उनके मन में यह धारणा बैठी होती है कि राहु केवल अशुभ फल ही देता है। जबकि वास्तविकता इससे कुछ भिन्न है।
राहु न तो स्वभाव से पूर्णतः शुभ है और न ही पूर्णतः अशुभ। यह जिस ग्रह के साथ बैठता है, जिस राशि में स्थित होता है और जिस भाव में अपना प्रभाव डालता है, उसी के अनुसार अपना रंग बदल लेता है। यही कारण है कि किसी साधारण परिवार में जन्मा व्यक्ति अचानक राजनीति, व्यापार, फिल्म, तकनीक या विदेश के माध्यम से अपार धन और प्रसिद्धि प्राप्त कर लेता है, तो दूसरी ओर कोई अत्यंत सम्पन्न व्यक्ति भी देखते-देखते सब कुछ खो बैठता है। ऐसे अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव के पीछे प्रायः राहु का प्रभाव माना गया है।
इसी कारण प्राचीन ज्योतिषाचार्यों ने राहु को “मायावी ग्रह” कहा है। यह माया का भी स्वामी है और महत्त्वाकांक्षा का भी। यह भ्रम भी उत्पन्न करता है और असंभव को संभव बनाने की शक्ति भी रखता है। यही ग्रह मनुष्य को सीमाएँ तोड़ने, नया सोचने, जोखिम उठाने और भीड़ से अलग चलने की प्रेरणा देता है। यदि यह शुभ स्थिति में हो तो व्यक्ति सामान्य से असामान्य बन जाता है, और यदि अशुभ हो जाए तो विवेक पर पर्दा डालकर ऐसे निर्णय करवाता है जिनका परिणाम जीवनभर भोगना पड़ सकता है।
अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम्।
सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्॥
राहु को समझने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि खगोल विज्ञान की दृष्टि से राहु कोई ठोस ग्रह नहीं है। आकाश में इसका कोई भौतिक अस्तित्व दिखाई नहीं देता। फिर भी ज्योतिष में इसका प्रभाव इतना गहरा क्यों माना गया है? इसका उत्तर हमें सूर्य और चन्द्रमा की गति में छिपा मिलता है।
चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है और पृथ्वी सूर्य की। दोनों के पथ एक-दूसरे को दो स्थानों पर काटते हैं। जहाँ चन्द्रमा दक्षिण से उत्तर की ओर क्रांतिवृत्त को पार करता है, वही बिंदु राहु कहलाता है। इसी कारण इसे आरोही पात (Ascending Node) कहा जाता है। दूसरा बिंदु केतु कहलाता है।
यही वे बिंदु हैं जहाँ सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा एक सीध में आ जाएँ तो ग्रहण की घटना घटित होती है। इसलिए शास्त्रों ने राहु और केतु को छाया ग्रह कहा है।
राहु की उत्पत्ति और पौराणिक रहस्य
राहु का उल्लेख वेदों, पुराणों तथा ज्योतिष ग्रंथों में अनेक स्थानों पर मिलता है। यद्यपि खगोल विज्ञान इसे केवल एक छाया बिंदु मानता है, परन्तु वैदिक परंपरा ने इसके स्वरूप को एक दिव्य शक्ति के रूप में स्वीकार किया है। राहु की सबसे प्रसिद्ध कथा समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है।
जब देवताओं और दैत्यों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया, तब अनेक दिव्य रत्नों के साथ अमृत कलश भी प्रकट हुआ। अमृत प्राप्त होते ही देवताओं और दैत्यों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का मोहक रूप धारण कर अमृत वितरण का दायित्व अपने हाथ में लिया।
उसी समय दैत्यराज विप्रचित्ति और सिंहिका का पुत्र स्वर्भानु देवता का वेश धारण कर चुपचाप देवताओं की पंक्ति में बैठ गया। जब अमृत की कुछ बूंदें उसके कंठ तक पहुँचीं, तभी सूर्यदेव और चन्द्रदेव ने उसकी पहचान कर ली और भगवान विष्णु को संकेत दिया।
भगवान ने तत्काल अपने सुदर्शन चक्र से उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया। किन्तु अमृत का स्पर्श हो जाने के कारण वह मृत्यु को प्राप्त नहीं हुआ। उसका सिर राहु और धड़ केतु के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में ब्रह्माजी ने दोनों को नवग्रहों में स्थान प्रदान किया।
इसी घटना के कारण राहु सूर्य और चन्द्रमा से वैर रखता है। जब भी अवसर मिलता है, वह उन्हें ग्रसने का प्रयास करता है, जिसे हम सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि राहु को ग्रहण का कारक ग्रह कहा गया है।
राहु की माता का नाम सिंहिका था, इसलिए शास्त्रों में उसे सैंहिकेय भी कहा गया है। अनेक ग्रंथों में राहु का वर्णन अत्यंत बलशाली, पराक्रमी और रहस्यमय ग्रह के रूप में किया गया है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि राहु की कथा केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं है, बल्कि इसके भीतर गहरा आध्यात्मिक संकेत भी छिपा है। राहु उस अतृप्त इच्छा का प्रतीक है जो किसी भी सीमा को लांघने के लिए तैयार रहती है। छलपूर्वक अमृत प्राप्त करने का उसका प्रयास मनुष्य की अनियंत्रित महत्वाकांक्षा का प्रतीक है। इसलिए जिस व्यक्ति की कुंडली में राहु प्रबल होता है, उसके भीतर आगे बढ़ने की तीव्र इच्छा, जोखिम उठाने का साहस, सामाजिक बंधनों को तोड़ने की प्रवृत्ति तथा किसी भी कीमत पर सफलता पाने की लालसा देखी जा सकती है।
यदि यही शक्ति शुभ ग्रहों के प्रभाव में हो तो व्यक्ति असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त करता है। लेकिन यदि राहु पाप प्रभाव में हो, तो यही महत्वाकांक्षा लालच, छल, भ्रम, व्यसन और पतन का कारण भी बन सकती है।
इसीलिए आचार्यों ने कहा है कि राहु स्वयं न अच्छा है और न बुरा। वह केवल उस शक्ति को बढ़ा देता है जिसके साथ उसका संबंध बनता है। यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता भी है और सबसे बड़ा रहस्य भी।