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महाभारत में महादेव - भगवान शिव का तीसरा नेत्र

भूतभावन महादेव के सर्वाधिक रहस्यमय प्रतीकों में से एक उनका तीसरा नेत्र है। इसीलिए वे त्रिलोचन या त्रिनेत्र आदि नामों से भी पुकारे जाते हैं। लोक विश्वास है कि प्रलयकाल में महाकाल महादेव सृष्टि के विनाश के निमित्त इसे प्रकट करते हैं। यह संहार का प्रतीक है और इसका खुलना सर्वनाश का द्योतक है। इसके प्राकट्य से जुड़ी अनेक कथाएँ हैं और इसके प्रतीकार्थ बताती कठिन पारिभाषिक शब्दों वाली असंख्य पौराणिक व्याख्याएं भी सुलभ हैं। लेकिन महाभारत के अनुशासन पर्व की कथा जिस तरह इस प्रतीक का रहस्योद्घाटन करती है, वह इतनी अद्भुत है कि सुनकर गुनी जा सके तो आवश्यकता पड़ने पर सबके ललाट पर तीसरा नेत्र प्रकट हो जाएं। जो सच्चे अर्थों में अपने-अपने स्तर पर अपने भ्रम और जड़ता के विनाश करने का प्रतीक है।

 

अनुशासन पर्व के ‘दानधर्म पर्व’ के 140 वें अध्याय की कथा के अनुसार किसी अनजाने अनादिकाल में एक दिन परम पवित्र हिमालय पर्वत पर देवाधिदेव धर्मात्मा भगवान शंकर विराजमान थे। नाना प्रकार की औषधियों और भाँति-भाँति के फूलों से व्याप्त वह अत्यंत रमणीय स्थान सिद्धों, चारणों, भूतों और अप्सराओं की टोलियों से भरा हुआ था।

भूतों में अनेक के रूप विकृत थे, अनेक के दिव्य और अनेकों के अद्भुत थे। कुछ की आकृति सिंह के समान थी तो कई के मुख उल्लू जैसे थे। वहाँ विभिन्न वर्ण और जातियों वाले व्याघ्र, गजराज, सियार, चीता, रीछ, बैल, भेड़िए, बाज और हिरणों के समान मुख और आकृति वाले भी भूत थे, जो सबके सब महाभयंकर लगते थे।

 

तपस्यारत महादेव को किन्नरों, यक्षों, गन्धर्वों और राक्षसों ने भी चारों ओर से घेर रखा था। वहाँ अप्सराएँ नृत्य करती थी और स्वाध्याय परायण ब्राह्मणों की वेद ध्वनियाँ भी गूँजती थी। देवर्षियों के समुदाय से शोभित वह स्थान भयंकर होने पर भी अनिर्वचनीय और अलौकिक था।

 

महान सौभाग्यशाली मुनि, ऊर्ध्वरेता सिद्धगण, मरुद्गण, वसुगण, साध्यगण, इंद्र, विश्वदेवगण, यक्ष, नाग, पिशाच, लोकपाल, अग्नि, समस्त वायु और प्रधान भूतगण भी उस समय भगवान के दिव्य दर्शनार्थ वहाँ एकत्र हो गए थे।

 

सबकी दृष्टि महामना महादेवजी पर ही थी जो दिव्य धातुओं से विभूषित पर्यंक के समान एक पर्वत शिखर पर बड़ी शोभा पा रहे थे। उन्होंने व्याघ्रचर्म का वस्त्र धारण किया हुआ था। सिंहचर्म उनका उत्तरीय था और गले में सर्पमय यज्ञोपवीत डला हुआ था। उनकी मूंछें काली थी, मस्तक पर जटाजूट था और वे लाल रंग के बाजूबंद से अलंकृत थे। अपनी ध्वजा में वृषभ का चिन्ह धारण करने वाले वे भीमस्वरूप रुद्र देवद्रोहियों के मन में भय उत्पन्न करते थे लेकिन अपने भक्तों और सम्पूर्ण भूतों के भय निवारण के लिए प्रतिपल तत्पर थे।

 

उस समय भूतों की स्त्रियों से घिरी हुई गिरिजानन्दिनी उमा सम्पूर्ण तीर्थों के जल से भरा एक स्वर्ण कलश लिए उनके पास आईं। भगवती ने भी भगवान के समान ही वस्त्र धारण किए हुए थे। वे हिमालय के पार्श्व भाग का सेवन करती थी और शिव की भाँति ही उत्तम व्रत का पालन करती थी।

 

शुभलक्षणा पार्वती फूलों की वर्षा करती और नाना प्रकार की सुगन्ध बिखेरती हुई भगवान के निकट पहुँची। तब आते ही मनोहर हास्य वाली देवी ने हास-परिहास के लिए मुस्कुराकर अपने दोनों हाथों से भगवान शंकर के दोनों नेत्र बन्द कर लिए।

 

भगवान के दोनों नेत्र आच्छादित होते ही सारा जगत सहसा अंधकारमय, चेतनाशून्य तथा होम और वषट्कार से रहित हो गया। सब लोग अनमने हो गए। सबके ऊपर त्रास छा गया। संसार की दशा कुछ वैसी हो गई मानो सूर्यदेव नष्ट हो गए हैं।

 

तब अगले ही क्षण भगवान शिव के ललाट से एक अत्यंत दीप्तिशालिनी महाज्वाला प्रकट हुई और आदित्य के समान तेजस्वी तीसरे नेत्र का आविर्भाव हुआ। वह नेत्र प्रलयाग्नि की भाँति देदीप्यमान था। उस नेत्र से प्रकट हुई ज्वाला से धातुओं से भरे विशाल पर्वत शिखर दग्ध हो गए।

 

पार्वती सहित सारे सभासद आश्चर्यचकित थे। हिमालय के जिस भाग पर ज्वाला गिरी थी उसके वनों से भागे भयभीत मृगों के झुंड भी प्राण रक्षा के लिए शिवजी के शरणागत आ गए थे। सामने के पर्वत पर आग की आकाश चूमती लपटें बारह सूर्यों के समान प्रकाशित होकर दूसरी प्रलयाग्नि प्रतीत होती थी।

 

कथा के अनुसार हिमालय को जलता देख पार्वती ने पति की शरण ली और देवी की प्रार्थना पर भगवान के प्रसन्नता पूर्वक देखने मात्र से दग्ध हो चुका पर्वत पुनः पूर्ववत हो गया।

 

*महर्षि वेदव्यासजी* लिखते हैं उस समय यह सब देखकर पार्वती के सुंदर तथा विशाल नेत्र आश्चर्य से भरकर और अधिक विस्फारित हो गए। अपने मन में उत्पन्न संशय के निवारण के लिए देवी ने भगवान से तीसरे नेत्र के प्राकट्य का रहस्य पूछा तो भगवान शिव ने बड़ा ही सुंदर उत्तर दिया।

 

शंकर बोले, ‘प्रिये! सभी लोकों में मुझे कूटस्थ समझो। इसलिए जब मुझसे शुभ या अशुभ का स्पर्श होता है, तब यह सारा जगत वैसा ही शुभ या अशुभ हो जाता है।

 

देवि! तुमने अपने भोलेपन के कारण मेरी दोनों आँखें बंद कर दीं। इससे क्षणभर में समस्त संसार का प्रकाश तत्काल नष्ट हो गया। संसार में जब सूर्य अदृश्य हो गए और सब ओर अंधकार ही अंधकार छा गया, तब मैंने प्रजा की रक्षा के लिए अपने तीसरे तेजस्वी नेत्र की सृष्टि की है। उसी तीसरे नेत्र का यह महान तेज था, जिसने इस पर्वत को मथ डाला। फिर तुम्हारा प्रिय करने के लिए मैंने इसे पुनः प्रकृतिस्थ कर दिया है।

 

साधो! कृपा कर इस कथा को केंद्र में रखकर पार्वती जी की ‘एंट्री’ से लेकर अंत में तीसरे नेत्र के प्राकट्य के बारे में शिवजी के कथन तक शब्द-शब्द पर गौर कीजिए। आप पाएंगे कि हास-परिहास में मानो यह हमारे अपने जीवन की बात हैं।

 

ख़्याल कीजिए, बचपन में कोई दोस्त पीछे से आकर ठीक ऐसे ही हमारी आँखे मूंद देता था, तब भी हम बगैर देखे उसे पहचान कर नाम बता देते थे। विज्ञान कहता है ऐसा हम अपनी तीसरी आँख के कारण कर पाते हैं। जो हम सभी के मस्तिष्क के दोनों भागों के बीच में अदृश्य रहती है। शरीर विज्ञान की भाषा में इसका नाम पीनियल ग्लेंड हैं। इसी के छोड़े गए हार्मोन्स से हमारा सुषुप्ति और जागृति का चक्र संचालित होता है। यह ग्रन्थी प्रकाश के प्रति अत्यंत संवेदनशील होती हैं। नेत्रहीन व्यक्ति को भी इसी के ग्रन्थी के बूते दृष्टि न होते हुए भी प्रकाश और अंधकार का बोध हो जाता है।

योग की मान्यता में यह दोनों भौंहों के ठीक मध्य आज्ञाचक्र पर स्थित होती है। यह विवेक का प्रतीक है जिसके जागृत होने से *सहस्रार का मार्ग प्रशस्त होता हैं।* इसी तीसरी आँख को ज्ञान चक्षु या दिव्य नेत्र कह कर ब्रह्मांड में झाँकने का झरोखा कहा गया है।

 

इस कथा के परिपेक्ष्य में गुनो तो जब कभी जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियाँ या काम, क्रोध, मोह, माया अशुभ रूप में स्पर्श कर हमें अनमना करें और जीवन पर त्रास छा जाए। ऐसा लगे कि अंधेरा छा गया है, आँखें बंद हो रही हैं तब तत्क्षण अपनी तीसरी आँख को जागृत करने की चेतना, सामर्थ्य और कला आना चाहिए। यह प्रतीक है उस चेतना का, जो अशुभ के स्पर्श करते ही जागृत हो और हमें अंधकार के बजाय शुभ के प्रकाश की तरफ प्रवृत्त करने की घड़ी में सही और गलत का बोध दे सकें।

 

जो अपने पास सुलभ तीसरी आँख की सत्ता से परिचित हैं वहीं समय आने पर इस ‘कूटस्थ’ आँख को प्रकट करने का विचार और क्रियान्वयन कर सकते हैं। वहीं अपने मायाजन्य अंधकार की पर्वत-सी जड़ता का संहार कर अपनी ‘सृष्टि’ को पुनः प्रकृतिस्थ कर पाने में समर्थ हो पाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे कामदेव के विचलित करने पर शिव ने तीसरा नेत्र खोलकर उसे भस्म कर दिया था। अन्यथा दो आँखों से तो हम काम चला ही रहे हैं!

 

त्रिपुर, त्रिलोचन, त्रिशूल तब त्रिपुरारी!

 

पुराणों के भोले भंडारी शिव से इतर महाभारत में महादेव शिव महायोद्धा हैं। जब भी देवता संकट में आते हैं और शत्रु के नाश में इंद्र तक की शक्ति बौनी साबित हो जाती है तब सबकी रक्षा के लिए साक्षात शिव शत्रुओं के रक्त से रणभूमि में रक्त-फाग रचाने निकल पड़ते हैं।

 

महाभारत में शिव की अनेक कथाएँ हैं किंतु कर्ण पर्व का त्रिपुराख्यान इन सबमें सबसे अनमोल है। कथा है कि जब देवताओं ने तारकासुर को महान देवासुर-संग्राम में परास्त कर दिया तब प्रतिशोध हेतु उसके तीन बेटों कमलाक्ष, तारकाक्ष और विद्युन्माली ने कठोर तप से ब्रह्मा को प्रसन्न कर लिया।

 

तीनों ने वरदान माँगा कि “हम इच्छानुसार चलने वाले नगराकार विमानों में रहें और हमारा वह पुर अवध्य हों। यह भी कि ये तीनों पुर जब एकत्र हों तभी जो कोई एक ही बाण से तीनों को एक साथ नष्ट कर सकें, वहीं हमारी मृत्यु का कारण बने!”

 

ब्रह्मा ने तथास्तु कहा और फिर तो तीनों दैत्य भाइयों ने अवध्य की शक्ति के अहंकार में सारे जगत में कोहराम मचा दिया। न वृत्रासुर हंता देवराज इंद्र कुछ कर सकें न बाकी देवगणों की ताकत काम आईं। तब सब थक हारकर भगवान शिव की शरण में आएं।

 

यह रेखांकित किए जाने जैसा संवाद-सन्दर्भ है कि जब ब्रह्मा व इंद्र आदि देवताओं ने त्रिपुर के नाश के लिए शिव से प्रार्थना की तो त्रिलोक के सृजन और संहार में समर्थ शिव को कहना पड़ा कि “मैं अकेला ही उन सबको नहीं मार सकता क्योंकि वे देवद्रोही दैत्य अत्यंत बलवान हैं। *अतः तुम सब लोग एक साथ संघबद्ध होकर मेरे आधे तेज से पुष्ट हो युद्ध में उन शत्रुओं को जीत लो।* इसलिए कि जो संघठित होते हैं वे महान बलशाली हो जाते हैं!”

 

लेकिन देवताओं की दिक्कत कुछ और ही थी! उन्होंने बताया कि उन सबके पास दानवों की अपेक्षा आधा ही बल है जो मुकाबले के लिए पर्याप्त नहीं है।

 

तब शिव ने कहा, “जो पापी तुम लोगों के अपराधी हैं वे सब प्रकार से वध के योग्य हैं। मेरे तेज और अपने आधे बल से युक्त हो तुम लोग समस्त शत्रुओं को मार डालो।”

 

देवगण इस पर भी राजी न हुए। हाथ जोड़कर बोले, “महेश्वर! हम आपका बल धारण करने में असमर्थ हैं। अतः आप ही हम सबके आधे बल से संयुक्त होकर शत्रुओं का वध कीजिए।”

 

शिव ने उत्तर दिया, “तो ठीक है। यदि मेरे बल को धारण करने में तुम्हारी सामर्थ्य नहीं है तो मैं तुम लोगों के आधे तेज से ही परिपुष्ट होकर इन दैत्यों का वध कर दूंगा।”

 

महर्षि वेदव्यास लिखते हैं, “तब तो देवताओं की स्वीकृति मिलते ही उन सबके तेज से शिव और अधिक तेजस्वी हो गए। इस तरह देवबल पाकर सर्वाधिक बलशाली होने के कारण शंकर का नाम उसी समय से महादेव विख्यात हो गया।”

 

*स तु देवो बलेनासीत् सर्वेभ्यो बलवत्तर:।*

*महादेव इति ख्यातस्तत: प्रभृति शंकरः।।*

 

महाभारत में त्रिपुर वध के लिए शिव के रथारूढ़ होकर प्रयाण का चित्रण रोंगटे खड़े कर देता है। शिव के लिए तैयार दिव्य रथ में चार लोकपाल घोड़े बने तो सूर्य और चंद्रमा पहिए। प्राणियों की आधारभूता पृथ्वी ही रथ थी और मन्दराचल उस रथ का धुरा था। हिमालय उसका अपस्कर और विंध्याचल आधारकाष्ठ। दिन, रात, कला, काष्ठा और छह ऋतुएँ उस रथ का अनुकर्ष बनी तो त्रिवेणु-तुल्य धर्म, अर्थ और काम-तीनों को संयुक्त करके रथ की बैठक बनाई गई।

 

और तब धर्म, सत्य, तप और अर्थ की लगाम थामे, वषट्कार का चाबुक लिए साक्षात ब्रह्मा उस रथ के सारथी बने। फिर तो जब वृषभध्वज से सुशोभित उस रथ पर सावित्री की प्रत्यंचा वाले सवंत्सर के बने महान धनुष को धारे महादेव शिव ने प्रयाण किया तो त्रिलोक काँप उठा।

 

शिव ने स्वयं के तेज के साथ बाकी सबकी शक्ति से शक्तिमान बन संघबद्ध होकर महाबली शत्रुओं के द्वार पर पहुँच महा धनुष की टँकार कर दी। तारकासुर की तीनों सन्तानों के नाश की घड़ी आ गई थी। काल की प्रेरणा से तीनों पुर एकत्र हुए और पिनाकपाणि महादेव शिव ने त्रिशूल जैसे एक ही बाण से तीनों को जलाकर राख कर दिया। ‘एक होकर भी तीन और तीन होकर भी एक’ जैसा विचित्र दुश्मन सबने मिलकर मार डाला।

 

त्रिपुराख्यान का बड़ा विस्तार है और छोटा-सा सार! इसमें शिव के रथ के लिए पृथ्वी, पर्वत, सूर्य-चंद्र, लोकपाल, सारथी आदि प्रतीकों के साथ सबके तेज से पुंजीभूत होकर युद्ध लड़ने का इतना-सा अर्थ है कि जब देवता भी संकट में पड़ते हैं तब संघबद्ध होकर ही उससे पार पाते हैं।

 

आज हमारा देश भी संकट में हैं। दुश्मन घात में हैं, घर के भेदी फ़िराक़ में हैं। तारक के तीन ही कपूत थे, पापी पाकिस्तान की हजारों नाजायज़ औलादें हैं। इन सारे दैत्यों के विरुद्ध सेना शिव की तरह अपना आग्नेय त्रिलोचन खोल सीमाओं पर डटी हुई हैं।

 

विंग कमांडर अभिनन्दन के पायलेट प्रोजेक्ट की प्रैक्टिस के बाद अभी रियल बाक़ी हैं। देश को सदा विश्वास है कि हमारी सेना शांति में शिव हैं और रण में रूद्र! और इस बार देश को आशा है शीघ्र ही त्रिमूर्ति शिव की भाँति तीनों सेनाएँ अपने पराक्रम के त्रिशूल से त्रिपुरासुरों का अंत कर देगी!

 

पड़ौसी पाकिस्तान की पाप पुरियों में पल रहें मसूद, हाफ़िज़, लखवी, दाऊद जैसे अवैध कपूतों और महबूबा-हुर्रियत जैसे रोगों का अंत अब होना ही चाहिए! अन्यथा इस युग का यह *त्रिपुराख्यान* एक बार फिर अधूरा रह जाएगा। मानो हमने त्रिलोचन खोले त्रिशूल तो उठाया पर त्रिपुरारी बनने का अवसर फिर छोड़ दिया!

 

और हाँ देवभूमि भारत के सभी देवताओं को नहीं भूलना चाहिए कि देश के सैन्य-शिव को भी सबके तेज की अपेक्षा है। सबका बल पाकर ही वह महाबली बनेगी।

*इसलिए प्रतिशोध से भरे हर देवता को अपने हिस्से का तेज देने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए!क्या आप तैयार है??*

शिव कृपा और समृद्धि

अर्धनारीनटेश्वर

शिव दर्शन: शव से शिव बनने का आध्यात्मिक यात्रा

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