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आषाढ मास जगन्नाथ ने ले लिया तो सावन मास विश्वनाथ ने।

आपने देखा – इन दोनों ने वर्षा के दिनों पर दावा ठोक रखा है।

भारतवर्ष एक ऐसे देश का नाम है जो वर्षा को बहुत मान देता है।

 

*जगन्नाथ और विश्वनाथ*

 

जगन्नाथ और विश्वनाथ दो आस्था के अद्भुत केन्द्र हैं।

जगत के नाथ वासुदेव आठ वसुओं के स्वामी हैं। आठ वसुओं से वसुंधरा /पृथ्वी बनी है। जिन वसुओं में रत्न , धातु , खनिज इत्यादि पृथ्वी के सारे तत्त्व आते है। जगन्नाथ की पुरी ऐश्वर्य का धाम है।

और विश्वनाथ- विश्व की आत्मा सूर्य केन्द्रित सारे नक्षत्र मंडल जिसमें पृथ्वी भी है के स्वामी है। ये वेद के अधिष्ठाता है, विश्वनाथ की काशी वेद की भूमि है।

✍🏻कुछ समझें??

स्कंद पुराण की सनत्कुमार संहिता में श्री शिवपुराण का श्रवण व्रत करनेवालों यानी सुननेवालों के लिये विधि-निषेध, मने सुनते समय क्या करें क्या न करें ? – का वर्णन किया गया है –

 

वक्ता का मुख उत्तर दिशा की ओर हो और मुख्य श्रोता – सुनने वाले का मुँह पूर्व की ओर हो,

 

*उदङ्मुखो  भवेद्वक्ता श्रोता  प्राग्वदनस्तथा ६.२०*

 

काहे भाई ?

बोले – माइक का युग था नहीं, और यदि सुनने के लिए बैठे हो तो कान में वाणी पड़े इसका क्या उपाय है ?

 

मने वक्ता की सुन्दरता गौण है,

मंच की सुन्दरता मुख्य नहीं है,

 

मुख्य है – भगवान की वो राम कथा,

जो राम जी से पहले हुए

*ऐसे गुप्त –     राम  कथा का कान में पड़ना*

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सावन यानी श्रावण

भगवान की कथा-श्रवण- सुनने का महीना

*स्रवन सुजस सुनि आयउँ …*

✍🏻 चले श्रवण से सुयश की और

 

*दृश्य का दृष्टिसम्पात….!*

 

अभी वैदिक शुक्र और शुचि ने अपनी पीठ घुमाई है। आषाढ़ की क्रीड़ा अभी थकी नहीं है। नभ और नभस्य का आगमन हो चुका है। छिटपुट बादल डोलते रहते हैं। यदाकदा सूरज को छाप लेते हैं। पुरवाई उन्हें धकियाती हुई लिवा जाती है। अभी ताप की तपस्या शिखर पर है। हवा धूप को और चमका जाती है। सूरज का स्वच्छ चेहरा धरती के दर्पण में दीखता है।

पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के स्वामी शुक्र हैं जबकि उत्तराषाढ़ा के सूर्य।श्रवण के स्वामी चंद्रमा हैं। ये तारा-समूह चन्द्रपथ पर चलते हुए कितना कुछ करा जाते हैं। धरती आकाश से दूर नहीं अपितु आकाश में ही स्थित है। यहाँ कुछ भी अपनेआप नहीं होता किन्तु कारणों और कारकों के लिए जो कुछ भी होता होगा, वह अपनेआप में अपनेआप जैसा ही लगता है।

सावन मेघों का होनहार है। हवा इसकी रथ है। बादलों की यात्रा घुमड़ती हुई है। वे चलते हुए ठहरते हैं और बरस जाते हैं। मेह गिरता है। तलैया चल पड़ती है। बन्धे टूटने लगते हैं। दादुर पीठ के सङ्गी पा जाते हैं। मेड़ बरोबर हो जाते हैं। सीमाएँ टूटती है। आम चूने लगते हैं। ध्वनियाँ कुछ और गाढ़ी हो जाती हैं। रेंवा गीतने लगते हैं। लोक गाता है:-

*कवने करनवा तरइया ई घूमे*

*बरखा झूमि झूमि आवै*

*साधो की संगति, साधो की महिमा*

*साधो से नखत ई अँखिया मिलावे*

*कि बरखा झूमि झूमि आवै*

 

प्रकृति श्रृंगार रचती है। छाया, प्रतिछाया, वर्ण, विवर्ण,उदय, अस्त, इसमें डोलते रहते हैं। इसकी लीला के हम लीलाचर हैं। हमारी गति इसकी इच्छा है। हमारा गन्तव्य इसका आँचल। यह सबकुछ समेट लेती हैं। सहज मानवीय संदर्भों के तल की हमारी यह समझ वह कहाँ समझ पाती है, जो इस अनन्त का सहज व्यवहार है।

हम इसके सिद्धान्त को सीखते हैं। ज्ञान का अर्थ ही प्रकृति के व्यवहार को समझ लेना है। इससे हमारी किन्हीं क्षणों में युति हो जाती है। हम कुछ सार्वभौमिक नियमों से परिचित हो जाते हैं। किन्तु अन्तिम नियम से परिचय नहीं हो पाता। उसे बचा लिया जाता है। सम्भवतः यहीं लीला है।

देह के भिन्न आयाम हैं। मन की अपनी गति है। आश्चर्य कि यह प्रकाश से भी तीव्र है। किन्तु इसकी सीमा है। यह अज्ञात में गति नहीं कर सकता। किन्तु इसके भीतर आई सभी बातें सम्भव होती हैं। और प्रकाश तो इसके भी परे है। अतएव प्रकाश की गति इससे सदा से अधिक रही है और रहेगी।

आखिर अन्धकार को कैसे महसूसा जाता है! आँख सूचित भले कर दे, किन्तु आँखों तक यह सूचना पहुँचने के लिए भी एक आश्रय तो चाहिए ही। यह आश्रय इसे कौन देता है। जब कुछ देखने के लिए होवे ही न, तब क्या देखा जाएगा भला। और सूर बिन आँख के भी क्या कह जाते हैं:-

*काहू के मन को कोउ न जानत¸ लोगन के मन हांसी*

*सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौ¸ करवत लैहौं कासी*

 

यह दृष्टि, यह दृष्टिसार, यह दृष्टिसंभेद, यह दृश्येतर, और इसकी पिछाई, अनुगमन और वृहत्तर होतीं रहस्य की इतनीं सीमाएँ। आदमी कितना जाये। कितना पाये। कहाँ से चले और कहाँ ठहर जाये। भौतिक पदार्थों का एक बिन्दु में यह संचयन इतना कुछ कर गया। परमशून्य की ऐसी गति। बुद्ध इसीलिए कह गये कि वहाँ न आनन्द है और न ही दुःख। वहाँ कुछ है ही नहीं। किन्तु यह ‘कुछ नहीं’ सदा से मुझे कुछ होने की खबर देता रहता है।

यहाँ प्रत्यक्ष में भी रहस्य उत्कीर्ण है। अवगुण्ठन है। पेड़ में ही डाली सूख जाती है। पेड़ उसे छोड़ देता है। धरती ही पेड़ है। मिटती हुई चीज़ें किसमें मिटती हैं किसे पता। पदार्थ की गति अपदार्थ में और यह सतत क्रम।

सावन अपने सङ्ग बरखा लाता है। आषाढ़ मात्र सूचना है। जैसे किसी आने वाले की गन्ध उसके पहले चली आती है। चित्त में उसकी पूर्वउपस्थिति निर्मित हो जाती है। ठीक वैसे ही आषाढ़ भी हरबार अपने ढंग से सावन का सन्देशवाहक बनकर आता है। किन्तु उसका सन्देश किसी आदेश से मुक्त है।

पीठ घूमता रहता है। चेहरे पाछिल होते रहते हैं। ऋतुओं का आपस में स्नात होता रहता है। निरन्तरता कभी नहीं टूटती। और न ही टूटता है अस्तित्व का यह ध्यानपर। सुन्दरदास कहते हैं :-

 

*भारी अचरज होइ, जरै लकरी अरु घासा*

*अग्नि जरत सब कहैं, होइ यह बडा तमासा*

 

और अन्त में—

हम सभी में भीतर का दृश्य उतर जाय,

कुछ समझें???

*जब*

 *जगन्नाथ और विश्वनाथ*

*एकरूप दिखे समझो सावन सफल हे!*

✍🏻 आगे और हे

 

हिन्दू कैलेण्डर के बारह मासों में  से सावन का महीना अपनी विशेष

पहचान रखता है। इस माह में चारों ओर

हरियाली छाई रहती है। ऐसा लगता है मानों प्रकृति में एक नई जान आ गई है। वेदों में मानव तथा प्रकृति का बड़ा ही गहरा संबंध बताया गया है। वेदों में लिखी बातों का अर्थ है कि बारिश में ब्राह्मण वेद पाठ तथा धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते हैं। इन मंत्रों को पढऩे से व्यक्ति को सुख तथा शांति मिलती है। सावन में बारिश होती है। इस बारिश में अनेक प्रकार के जीव-जंतु बाहर निकलकर आते हैं। यह सभी जन्तु विभिन्न प्रकार की आवाजें निकालते हैं। उस समय वातावरण ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने अपना मौन व्रत तोड़कर अभी बोलना आरम्भ किया हो।

 

जीव-जन्तुओं की भाषा का वर्णन इस प्रकार किया गया है कि जिस प्रकार बारिश होने पर जीव-जन्तु बोलने लगते हैं उसी प्रकार व्यक्ति को सावन के महीने से शुरु होने वाले चौमासों (चार मास) में ईश्वर की

*चतुर-स्वरूप* भक्ति के लिए धर्म ग्रंथों का पाठ सुनना भी तो चाहिए।

 

धर्मिक दृष्टि से समस्त प्रकृति ही शिव का रुप है। इस कारण प्रकृति की पूजा के रुप में इस माह में शिव की पूजा विशेष रुप से की जाती है। सावन के महीने में वर्षा अत्यधिक होती है। इस माह में चारों ओर जल की मात्रा अधिक होने से शिव का जलाभिषेक किया जाता है।

 

शिव पूजन क्यों किया जाता है:

 

प्राचीन ग्रंथों के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से विष निकला था। इस विष को पीने के लिए शिव भगवान आगे आए और उन्होंने विषपान कर लिया। जिस माह में शिवजी ने विष पिया था वह सावन का माह था। विष पीने के बाद शिवजी के तन में ताप बढ़ गया। सभी देवी – देवताओं और शिव के भक्तों ने उनको शीतलता प्रदान की लेकिन शिवजी भगवान को शीतलता नहीं मिली। शीतलता पाने के लिए भोलेनाथ ने चन्द्रमा को अपने सिर पर धारण किया। इससे

उन्हें शीतलता मिल गई।

चन्द्र काल मान का प्रतीक हे,

शिव काल के महाकाल हो गए

 ऐसी मान्यता भी है कि शिवजी के विषपान से उत्पन्न ताप को शीतलता प्रदान करने के लिए मेघराज इन्द्र ने भी बहुत वर्षा की थी। इससे भगवान शिव को बहुत शांति मिली। इसी घटना के बाद

सावन का महीना भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है। सारा सावन, विशेष

रुप से सोमवार को, भगवान शिव को जल अर्पित किया जाता है। महाशिवरात्रि के बाद पूरे

वर्ष में यह दूसरा अवसर होता है जब भग्वान शिव की पूजा बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है।

 

सावन माह की विशेषता: हिन्दु धर्म के अनुसार सावन के पूरे माह में भगवान शंकर का पूजन किया जाता है। इस माह को भोलेनाथ

का माह माना जाता है। भगवान शिव का माह मानने के पीछे एक पौराणिक कथा है।

 

इस कथा के अनुसार देवी सती ने अपने पिता दक्ष केे घर में योगशक्ति से अपने शरीर का त्याग कर दिया था। अपने शरीर का त्याग करने से पूर्व देवी ने महादेव को हर जन्म में पति के रुप में पाने का प्रण किया था।अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमालय और

रानी मैना के घर में जन्म लिया। इस जन्म में देवी पार्वती ने युवावस्था में सावन के माह में निराहार रहकर कठोर व्रत किया। यह व्रत उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किए। भगवान शिव पार्वती से प्रसन्न हुए और बाद में यह व्रत सावन के माह में विशेष रुप से रखे जाने लगे।

 *कामार्थी>काँवारथी>*

       *काँवरि*

         या

काम और अर्थ के लिये धर्म का आश्रय लेने वाले कांवरिये आपका रुद्री पाठ या कोई स्तोत्र नहीं जानते । ये भोले भालेे भोले भक्त बस बम भोले बोल अपना पूजन कर लेते हैं।

भारत में दो ही महीनें कुछ खास हैं एक सावन दूजा फागुन , ज्यों शरद और बसंत। सावन में  स्त्रियाँ चहकती हैं तो फागुन में पुरुष बहकते हैं । दोनों ही मासों में कांवर यात्रा होती है । शिवतत्व लोक में रचा बसा हुआ है यही भारत हैं।

महाभारत की कथा में जब पांडव वनवासी हुये तब द्रौपदी सहित भीमसेन ने भी युधिष्ठिर को युद्ध के लिये खूब उकसाया । वनपर्व के तेतीसवें अध्याय में भीमसेन ने युधिष्ठिर को उपदेश किया जिसके कुछ श्लोकों का संक्षेप इस प्रकार है

राजन् ! धनकी इच्छा रखनेवाले पुरूष महान् धर्म की अभिलाषा रखता है और कामार्थी मनुष्य धन चाहता है जैसे धर्म से धनकी और धन से काम की इच्छा करता है, उस प्रकार वह कामसे किसी दूसरी वस्तु की इच्छा नहीं करता है। ‘जैसे फल उपभोग में आकर कृतार्थ हो जाता है, उससे दूसरा फल नहीं प्राप्त हो सकता तथा जिस प्रकार काष्ठ से भस्म बन सकता है; इसी तरह बुद्धिमान् पुरूष एक कामसे किसी दूसरे काम की सिद्धि नहीं मानते, क्योंकि वह साधन नहीं, फल ही है। ‘राजन् !  जो खोटी बुद्धिवाला मनुष्य काम और लोभ के वंशीभूत होकर धर्म के स्वरूप को नहीं जानता, वह इहलोक और परलोक में भी सब प्राणियों का वध्य होता है। ‘राजन् ! आपको यह अच्छी तरह ज्ञात है कि धनसे ही भोग्य-साम्रगी का संग्रह होता हैं और धनके द्वारा जो बहुत-से कार्य सिद्ध होते हैं, उसे भी आप जानते हैं। ‘उस धनका अभाव होने पर अथवा प्राप्त हुए धनका नाश होने पर अथवा स्त्री आदि धन के जरा-जीर्ण एवं मृत्यु-ग्रस्त होने पर मनुष्य की जो दशा होती है, उसी को सब लोग अनर्थ मानते हैं। वही इस समय हमलोगों को भी प्राप्त हुआ है।। ‘पांचों ज्ञानेन्द्रियों, मन और बुद्धि की अपने विषयों में प्रवृत होने के समय जो प्रीति होती है, वही मेरी समझ में काम है। वह कर्मों का उत्तम फल है। इस प्रकार धर्म, अर्थ और काम तीनों को पृथक्-पृथक् समझकर मनुष्य केवल धर्म, केवल अर्थ अथवा केवल काम के ही सेवन में तत्पर न रहे। उन सबका सदा इस प्रकार सेवन करे, जिससे इनमें विरोध न हो। इस विषय शास्त्रों का यह विधान है कि दिन के पूर्वभाग में धर्म का, दूसरे भाग में अर्थ का और अंतिम भाग में काम का सेवन करे।  ‘वक्ताओं में श्रेष्ठ ! उचित काल का ज्ञान रखनेवाला विद्धान् पुरूष धर्म, अर्थ और काम तीनों का यथावत् विभाग करके उपयुक्त समयपर उन सबका सेवन करे। ‘ राजन् ! इसी प्रकार लौकिक सुख की इच्छावालों के लिये धर्म, अर्थ, कामरूप त्रिवर्ग की प्राप्ति ही परम श्रेय है। अतः महाराज ! भक्ति और योगसहित ज्ञान का आश्रयलेकर आप शीघ्र ही या तो मोक्ष ही प्राप्ति कर लीजिये अथवा धर्म, अर्थ, कामरूप त्रिवर्ग की प्राप्ति के उपायका अवलम्बन कीजिये। जो इन दोनों के बीच में रहता है, उसका जीवन तो आर्त मनुष्य के समान दुःखमय ही है। ‘मुझे मालूम है कि आपके सदा धर्मका ही आचरण किया है, इस बात को जानते हुए भी आपके हितैषी, सगे-सम्बन्धी आपको (धर्मयुक्त) कर्म एवं पुरूषार्थ के लिये ही प्रेरित करते हैं। महाराज ! इहलोक और परलोक में भी दान, यज्ञ, संतो का आदर, वेदों का स्वाध्याय और सरलता आदि ही उत्तम एंव प्रबल धर्म माने गये हैं।

*दिल का भोला है तबियत का बडा है सादा*

*मेरा शिव भोला भाला!*

सावन शिवरात्रि: एक आध्यात्मिक उत्सव का दिव्य अनुभव

शिव पूजा की उपासना पद्धतियां

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