
वह रस है,जो जीवन देता है।
चेतना, चैतन्य, चित्त को जो शक्ति देता है, वह रस है।
किंतु इससे पहले पंचकोश के रसों को समझे
सः वै रसः
पंच कोष हैं- 1. अन्नमय, 2. प्राणमय, 3. मनोमय, 4.
विज्ञानमय और 5. आनंदमय।
पंच कोष: जड़, प्राण, मन, बुद्धि और आनंद
अवस्था: जड़, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय।
आत्मा को एक एक कर प्रत्येक कोष में स्थित होकर
उसका अनुभव प्राप्त करना होता है
ऐसी आत्मा ‘आनंदमय’ कोश में स्थित होकर मुक्त हो
जाती है।
ब्रह्म के अर्थ को समझने के लिये हम आप को ले चलते हैं
तैत्तिरीय उपनिषद की एक प्रसिद्ध कथा की ओर।
भृगुवल्ली नाम के अध्याय में चर्चित यह कथा है |
प्रसिद्ध ऋषि भृगु के मन में जिज्ञासा उठी कि ब्रह्म को
जाना जाये — ब्रह्म को समझा जाये।
उनके पिता वरुण जी वेदों को जानने वाले ब्रह्मनिष्ठ
महापुरुष थे। भृगुजी ने अपने ब्रह्मज्ञानी पिता वरुण जी
से प्रार्थना की —
“भगवन, मैं ब्रह्म को जानना चाहता हूँ, अतेव आप कृपा
कर के मुझे ब्रह्म का अर्थ समझाइये।“
तब वरुण जी ने भृगु से कहा, “वत्स अन्न, प्राण, नेत्र,
श्रोत्र, मन और वाणी — ये सब ब्रह्म की उपलब्धि के द्वार
हैं। इन सब में ब्रह्म की सत्ता स्फुरित हो रही है।‘
फिर साथ में यह भी बताया कि सब प्रत्यक्ष दिखने वाले
प्राणी जिस से उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे
जीते हैं, तथा प्रयाण करते हुए जिस में विलीन हो जाते हैं,
वही ब्रह्म है।
भृगु जी कुछ समझ नहीं पाये। उन्होंने वरुण जी से
विस्तार पूर्वक समझाने की विनती की।
“मेरे समझाने से कुछ नहीं होगा”, वरुण जी बोले, ‘यह
तुम्हें स्वयं ही समझना होगा। जाओ, तपस्या करो और
स्वयं जानो इसका अर्थ।‘
भृगु जी ने निष्ठापूर्वक पिता के कथन पर विचार किया,
मनन किया। यही उनका तप था।
मनन के बाद भृगु जी इस निश्चय पर पहुँचे कि अन्न ही
ब्रह्म है। उन्हें अन्न में वे सारे लक्षण नजर आये जो पिता
जी ने बताये थे —
समस्त प्राणी अन्न से ही (अन्न के परिणार्मभूत वीर्य से)
उत्पन्न होते हैं, अन्न खा कर ही जीवित रहते हैं और
मरणोपरान्त अन्न देने वाली पृथ्वी में ही प्रविष्ट हो जाते
हैं।
लेकिन वरुण जी ने भृगु महाराज के इस निश्चय का
समर्थन नहीं किया। वे जानते थे कि पुत्र ने ब्रह्म के स्थूल
रूप को ही समझा है। ब्रह्म के वास्तविक रूप तक
उसकी बुद्धि अभी हीं पहुँची है।
भृगु जी ने फिर प्रार्थना की, “भगवन्! यदि मैं ठीक नहीं
समझा तो आप ही मुझे ब्रह्मतत्त्व समझाइये।“ लेकिन
वरुण जी नहीं माने। उन्होंने कहा, “तू तप के द्वारा ब्रह्म
को समझने की कोशिश कर। तेरा तप ब्रह्म का बोध
कराने में सर्वथा समर्थ है।“
पिता की आज्ञा पाकर भृगु जी ने फिर तप शुरू किया।
इस बार उन्होंने निश्चय किया —
प्राण ही ब्रह्म है।
लेकिन इस बार भी वरुण जी ने न तो उनके निश्चय का
समर्थन किया और न ही उसे ब्रह्म का अर्थ समझाया।
“तुम्हारा तप ही ब्रह्म की प्राप्ति का साधन है।“ — ऐसा
कह कर उन्होंने भृगु जी को फिर से तपस्या करने के लिए
कहा।
अगली दो बार भृगु जी के निश्चय थे —
मन ही ब्रह्म है।
विज्ञान ही ब्रह्म है।
लेकिन वरुण जी ने इन दोनों का भी समर्थन नहीं किया।
उन्होंने सोचा — इस बार बेटा ब्रह्म के निकट आ गया है।
उसका विचार स्थूल और सूक्ष्म दोनों जड़ तत्त्वों से ऊपर
उठ कर चेतन तक तो पहुँच गया है, किन्तु ब्रह्म का
स्वरूप तो इससे भी विलक्षण है। इसे अभी और तपस्या
की आवश्यकता है।
जब इस बार भी भृगु जी के निश्चय को समर्थन नहीं मिला
तो वे पुनः तप करने चले गये।
पाँचवीं बार भृगु जी ने अन्तिम रूप से निश्चर्यपूर्वक
जाना—
आनन्द ही ब्रह्म है।
सचमुच में आनन्द से ही सारे प्राणी उत्पन्न होते हैं,
आनन्द के सहारे ही वे जीते हैं, तथा इस लोक से प्रयाण
करते हुए अन्त में आनन्द में ही विलीन हो जाते हैं।
इस प्रकार जान लेने पर भृगु जी को ब्रह्म का पूरा ज्ञान हो
गया। तब से भृगु महाराज ब्रह्मज्ञानी कहलाने लगे।
आनन्द ही ब्रह्म है — इस बोध में ब्रह्मज्ञान है।
यहाँ पर एक बात को ठीक से समझना है — ब्रह्म और
आनन्द एक ही तत्त्व के दो नाम हैं। ब्रह्म आनन्द से अलग
नहीं है, आनन्द ब्रह्म से अलग नहीं है। ऐसा नहीं है कि
ब्रह्म में आनन्द है, और ऐसा भी नहीं है कि आनन्द में
ब्रह्म है। तथ्य यह है कि आनन्द ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही
आनन्द है।
इसे समझने के लिये एक छोटा सा उदाहरण लेते हैं —
जब हम कहते हैं कि गिलास में पानी है तो इसका अर्थ
होता है कि गिलास और पानी दो अलग-अलग चीजें हैं।
एक ओर जहाँ पानी के बिना भी गिलास हो सकता है,
वहीं दूसरी और गिलास के बिना भी पानी हो सकता है।
लेकिन जब पानी की अधिकता इतनी बढ जाये कि हम
उसे समुद्र कहने लगें, तब यह कहने की आवश्यकता नहीं
रह जाती कि समुद्र में पानी भरा है। समुद्र का अर्थ ही है
— अथाह पानी। इसी प्रकार ब्रह्म का अर्थ ही है —
अथाह आनन्द। ब्रह्म का अर्थ ही है — आनन्द का समुद्र।
यह ब्रह्मानंद है
आनन्द का अपार सागर ही परमात्मा है। कोई इसे गॅाड़
कहता है, तो कोई खुदा कहता है। कोई उसे ओंकार
कहता है तो कोई उसे महाशक्ति कहता है। कोई इसी को
कर्त्तापुरख कहता है तो कोई सुप्रीम पावर कहता है। नाम
चाहे जो भी हो किन्तु ब्रह्म एक ही है — आनन्द का
सागर! अनन्त सुख का महासमुद्र!
तुलसीदास जी ने भी अपने परमात्मा (राम) को आनन्द-
सिंधु ही कहा है। पुत्रों के जन्म के अवसर पर मुनि वसिष्ठ
जी भी दशरथ के घर आये थे। देखिये! नामकरण के
समय वसिष्ठ जी दशरथ महाराज से क्या कहते हैं —
जो आनन्द सिन्धु सुख रासी।
सी करते त्रैलोकी सुपासी।।
सो सुखधाम राम असनामा।
अखिल लोक दायक बिश्रामा।।
यह जो आनन्द के समुद्र और सुख की राशि हैं, और जिस
(आनन्द सिंधु) के एक कण से तीनों लोक सुखी होते हैं,
उन (आप के सबसे बड़े बेटे) का नाम राम है। राम सुख
का भवन हैं और वे तीनों लोकों को शांति देने वाले हैं।
परमात्मा सुख से ओत-प्रोत है। परमात्मा सुख का अथाह
सागर है। अनन्त सुख ही परमात्मा है। वेदान्त में
परमात्मा की यही परिभाषा दी गई है।
परमात्मा में केवल सुख होता है — इसके अतिरिक्त और
कुछ नहीं होता। जो परमात्मा में डूबता है, वह भी सुख
से सरोबार हो जाता है। सुख में डूब जाने का ज्ञान ही
ब्रह्मज्ञान है।
आनन्द में डूब जाने का ज्ञान ब्रह्मज्ञान है।
भृगुवल्ली की कथा में दो बातें विशेष रूप से उल्लेखनीय
हैं। पहली बात तो यह है कि ब्रह्मज्ञान केवल अपने ही
अन्दर से हो सकता है, किसी और उपाय से नहीं।
इसीलिये तो इसे आत्मज्ञान कहा जाता है।
भृगु जी बार-बार विनती करते रहे कि वरुण जी उसे ब्रह्म
का अर्थ समझाएँ, लेकिन वरुण जी एक ही बात पर अड़े
रहे — ब्रह्मज्ञान तो केवल अपने स्वयं के मनन से ही हो
सकता है।
ब्रह्मज्ञान कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका लड्रडू बनाकर
किसी दूसरे के मुँह में ड़ाला जा सके।
जो सच्चा ब्रह्मज्ञानी है, वह जानता है कि ब्रह्मज्ञान तो
अपने पुत्र को भी नहीं दिया जा सकता, दूसरों को देने की
बात तो दूर रही।
लेकिन फिर भी हमारे बहुत सारे महात्मा “ब्रह्मज्ञान” को
प्रसाद की तरह बाँटने में लगे हुए हैं, और बहुत सारे लोग
उसे बटोर कर ले जाने में लगे हुए हैं।
सोचिये जरा—
कैसा होगा यह प्रसाद!
कैसे होंगे बाँटने वाले!
कैसे होंगे बटोरने वाले!
भृगुवल्ली की दूसरी उल्लेखनीय बात कथा की विवेचना
में कही गई है। कथा के अन्त में दी गई यह टिप्पणी
ध्यानपूर्वक पढने योग्य है —
जो कोई मनुष्य भृगु की भान्ति तपस्यापूर्वक विचार कर
आनन्द-स्वरूप परब्रह्म परमात्मा को जान लेता है, वह
भी *सतचित्तआनन्द-स्वरूप परमात्मा में स्थित हो जाता है।*
इतना ही नहीं, वह इस लोक में भी बहुत अन्न वाला और
अन्न को भली भान्ति पचाने की शक्ति वाला हो जाता है।।
ऐसा ब्रह्मज्ञानी नाना प्रकार के जीवनयात्रोपयोगी भोगों से
सम्पन्न हो जाता है और उन सब को सेवन करने की
सामर्थ्य भी उसमें आ जाती है।
उस के मन, शरीर और इन्दि्रयाँ सर्वथा निर्विकार और
निरोग हो जाते हैं।
वह सन्तान से, पशुओं से (धन-सम्पत्ति), ब्रह्म तेज से और
बड़ी भारी कीर्ति से समृद्ध होकर *जगत के तीनों लोकों* में सर्वश्रेष्ठ
समझा जाता है।
यह सभी का मूल हे
मूल को जानो
आओ सच्चितानंद स्वरूप ब्रह्म के अनुभव की राह पर चले