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तिथि भी देवी स्वरूप!

हमारे यहां तिथियों को माता के समान सम्‍मान मिला है। देखिये- तीज माता! राजस्‍थान में तो तीजां की सवारी निकलती है। चौथ माता! कितनी चौथ, करवा चौथ! पंचमी, पाची माता! छठ और छठ माता! ब्रज से लेकर उत्‍तरी भारत में छठमाता की पूजा होती है, वह नवजात के लेख लिखती है। दशा माता! चैत्र के कृष्‍ण पक्ष की दशमी को दशामाता की पूजा और दसों ही दिन तक पूजा के साथ कहानियां कहने की परंपरा है। ग्‍यारस को भी तारणी कहा जाता है।

 

सारी ही तिथियों के अपने-अपने देवता हैं। गर्गसंहिता, शिवधर्मोत्‍तर पुराण, बृहत्‍संहिता, कालिका पुराण, विष्‍णुधर्मोत्‍तर पुराण, भविष्‍य पुराण, अग्नि पुराण, वह्निपुराण सहित मुहूर्त के लगभग सारे ही ग्रंथों यथा- ज्‍योतिष रत्‍नमाला, मुहूर्त तत्‍वम्, मुहूर्त चिन्‍तामणि ही नहीं, एकलिंग पुराण जैसे स्‍थलीय माहात्‍म्‍य ग्रंथों में तिथियों की इसी तरह की मान्‍यताएं आई हैं। ( ज्योतिष रत्नमाला : श्री कृष्ण जुगनू)

एक बात ओर, मान्‍यता सबसे पहले लोक में जन्‍म लेती है, वही बाद में श्‍लोक होकर शास्‍त्र सम्‍मत होती है। इसीलिए लोक को सबसे बडा प्रमाण माना गया है, लोके वेदे…. यह जुमला सभी ग्रंथों में आता है। इन मान्‍यताओं में कहीं समयानुसार भी बदलाव दिखाई देता है या दे सकता है, मगर अधिक नहीं। कहीं पर्याय के स्‍तर पर तो कहीं देववाद के विकास के स्‍तर पर ही।

 

हेमाद्रि कृत चतुर्वर्ग चिंतामणि ( 1260 ई.) में तिथियों को भी देवियों का रूप मानकर उनकी मूर्तियां बनाने का निर्देश दिया गया है। (देखें : व्रतखंड अध्‍याय प्रथम, पृष्‍ठ 151 से 156 तक) इस आधार पर अनेक चित्र बने हैं। यह तिथि चित्र शृंखला मुझे डॉ. दलजीत कौर ने दिखाई और शेयर भी की।

 

यह रूपांकन केवल कृष्‍ण पक्ष की तिथियों का ही नहीं, शुक्‍ल पक्ष की सभी तिथियों का भी है, यह विश्‍वकर्मा शास्‍त्र में कहीं आया है जिसको हेमाद्रि ने 1260 के आसपास उदृत किया है। जैसे शुक्‍लपक्ष की प्रतिपदा की मूर्ति का रूप बताया है- वह द्विभुजा अरुण वर्ण की होगी, मेष पर आरूढ होगी, शक्ति और पात्र उसके हाथ में होंगे- तिथयोह्यधुनोच्‍यन्‍ते प्रतिपद्दिभुजारूणा। मेषगा शक्ति पात्रा सा सितपक्षादिमा मता…

 

देवी दृष्टि :

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वृक्षमूर्व्यां तथा वायौ व्योमे स्वर्गे सर्वश:

एवं विधा त्वियं देवी सदा पूज्या विजानता।

अप्येकं वेत्ति तो नाम धात्वर्थ निगमैर्नर:

दु:खैर्वर्ज्जित: सर्वै: सदा पापाद्विमुच्यते।।

(देवी पुराण 38, 100-102)

 

कुल देवियां हमारे मूल द्वार की सूचक होती हैं। अधिकांश के नाम वे होते हैं, जो शास्त्रों में नहीं मिलते हैं, क्यों?

 

उनके आहार, पानक, स्थान, स्थिति केवल लोक स्मृतियों के आधार पर होते हैं, क्यों?

 

कहीं कहीं इन देवियों के मूल जनजातीय होते हैं, शासकों के साथ विशेष रूप से देखने की जरूरत है, क्यों?

 

शाक, अमिष जैसे आहार, भोग, नैवेद्य, उनके पूजन की सभी तिथियां भी बहुत कुछ कहती हैं, तीज तिथि का नाम ही गौरी तिथि हो गया… क्यों और कब?

 

देवियां वंश वल्लरी की मूल होती हैं, कभी माता से ही व्यक्ति को पहचाना जाता था… और उनके बारे में सबसे ज्यादा केवल कुल की वरिष्ठ महिलाएं ही जानती हैं, क्यों?

 

अर्गला :

 

आगल (आगळ, अघळ)

अर्गलक्रिया (आगलकिया)

 

द्वार से भवन की सुरक्षा के दो उपाय। जो नाम वर्तमान में हैैं, संस्कृत में वे ही नाम है। कुछ स्तोत्र पाठ से पहले अर्गला पाठ वैसे ही है, जैसे कि देवी मंदिर में प्रवेश से पहले अर्गला लंघन जरूरी होता है। देवी मंदिरों में अर्गला की अनिवार्यता रही। सप्तशती के पाठ से पहले अर्गलास्तोत्र है जिसके विष्णु ऋषि, अनुष्टुप छंद और महालक्ष्मी देवता है, यह अर्गला की रचना की पृष्ठभूमि है।

मनुष्यालय चंद्रिका” में अर्गलक्रिया निर्माण की विधि है और बहुत रोचक, लेकिन सातवीं सदी के बाद कपाट पर बाहरी तालों और उस पर बीजलसार लोहे के दंशतालों ( डस ताला) ने पुरानी अर्गलक्रिया को भुलाने का मौका दे दिया और… अब मुहावरा सा चल पड़ा : लॉक कर दिया जाए !

 

गोधासना गिरिजा

#प्रतिमालक्षण

 

पार्वती की प्रतिमाएं प्राय: शिव सन्निधि में ही मिलती है। जहां शिव वहां शिवा, लेकिन उत्तर में प्रतिहार काल और पूर्व चौहान काल (7वीं से 11वीं सदी) में पार्वती की अनेकत्र स्वतंत्र प्रतिमाएं बनीं और देवी मंदिरों पर भी लगीं। इनमें अधिकांश प्रतिमाएं गोह पर सवार मिलती हैं। गोह यानी गोधा, गोरपड़ (घोरपड़) या गोयरी। कोशों में गोसाप् नाम है। अमरकोश में निहाका गोधिका पर्याय हैं तो वराहमिहिर ने दारुमुख्याह्वा नाम दिया है। इसके गुण, लक्षण मनु ने दिए ही, आयुर्वेदिक निघंटुओं में भी हैं। जातकों में कथाएं है।

 

यह पर्वत विहारी जीव है, सरीसृप वर्ग का। कुल कोटि पर्वतों के जीवों में इसकी गणना होती है यानी पारियात्र या अरावली, विंध्याचल, सतपुड़ा, सह्याद्रि आदि में बारहों मास गोरपड़ या गोह दौड़ते भागते दिखाई दे जाती है और शिकारियों के निशाने पर भी रहती रही हैं।

 

बड़ी छिपकली जैसे आकार वाला, बेहद डरावना लेकिन भोला जीव – बादलों से आच्छादित अंबर तले जब हम उमस के मारे घमौरियां खुजाल रहे होते हैं तब गोह गगनमुखी होकर सिटी सी बजाती कूकती है। पर्वतीय गुहाओं में छिपना, रहना, दुबकना और पर्वतीय जीवों की क्रीड़ाओं को देखकर उनका संगी हो जाना गोह को रुचता है। पांव गद्दीदार और भित्ति पर भी एेसे चिपकते हैं कि हम लटक जाएं तो छूटें। सैनिकों ने दीवारें लांघने, चढ़ने के लिए गोह का इस्तेमाल किया है।

 

बहरहाल, वह पार्वती का वाहन क्यों है ? यह सवाल कम रोचक नहीं। इसका जवाब जनजातीय मान्यता में मिलना चाहिये क्योंकि पर्वत विहारियों ने ही हिमालय पुत्री को देखा होगा जो गोधा पर सवार समझी गई। वैसे देवियां दिव्य इस अर्थ में भी हुईं कि असंभव को संभव करती लगीं, अलभ्य को सुलभ कराने वाली लगीं। पर्वतीय प्रदेशों की देवियां वहां के जीवों पर ही सवार मानी गईं। यूं दुर्लभ देवी-देवताओं का लोक हमारे लिए अपनी कल्पनाओं के परिप्रेक्ष्य में ही होता है। गिरिजा को भी गोधा विहारी, गोधासना, गोधारूढ़ा माना गया। प्रतिमा शास्त्रों में पार्वती का लांछन, वाहन गोधा को माना गया लेकिन दुर्गा रूप होने पर सिंहस्थ भी कहा है। (मेरी संपादित : देवता मूर्ति प्रकरण )

 

हमारे यहां तो पार्वती के पर्याय के रूप में कन्याओं का नाम गोदीबाई या गोधीबेन रखा जाता है। महाराष्ट्र के पहाड़ी प्रदेशों में राष्ट्रकुल और शिलीहारों के काल में पार्वती को गोधारूढ़ा ही बनाया गया। यह आगे भी रहा।

 

गोधा पर गिरिजा के विहार की मान्यता भारत ही नहीं, कंबोडिया में भी रही है। सिमरिप के पास की पहाड़ियों से निकलने और बहने वाली नदी जिसे वहां गंगा तुल्य आदर प्राप्त है, के प्रवाह क्षेत्र में पहाड़ी भित्तियों पर गोधाओं का अंकन जब मैंने देखा तो चकित रह जाना पड़ा। मैंने मित्रों से कहा कि यहां भी गोधा-गिरिजा ! तो जवाब था यहां भी भारत और भारतीय संस्कृति की पहुंच पक्की ! सचमुच गिरिजा की यह मान्यता सुदूर अतीत से चली आई तो सुदूरवर्ती देशों तक भी पहुंची है।

जय जय।

 

नाग देवी – मान्‍यता का प्रसार मिस्र तक !

 

विश्‍व में कई जगहों पर नागपूजा की परंपरा रही है। हमारे यहां नाग लोक की मान्‍यता के मूल में यही विश्‍वव्‍यापी विचार रहा है। गांव-गांव और खेत-खेत नागों के स्‍थानक बने मिलेंगे। यदि लोक मान्‍यता पर विचार करें तो कुछ लोगों को सांपों की दैहिक उपस्‍िथति भी होती है जिसमें वह अनायास ही सांप की तरह रैंगता हुआ आगे जाकर बैठ जाता है और लोग अपनी पी‍ड़ाएं बताते हैं। राजस्‍थान में गोगाजी, तेजाजी, देवजी, ताखाजी, गातोड़जी ही नहीं कल्‍लाजी, जयमल आदि भी नाग योनि को प्राप्‍त लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं।

 

बौद्ध ग्रंथों ललितविस्‍तर, जैन मूर्तिलक्षण ग्रंथों में अनेकत्र नागों का विवरण मिलता है। शिवधर्म पुराण और अन्‍यत्र भी यह विवरण है। नाग काे संख्‍या कोश में आठ का पर्याय माना गया है, इसलिए हमारे यहां अष्‍टकुली नागों की मान्‍यता रही है। यह नागपुरी नामक किसी राज्‍य के शासकों की वंश विस्‍तार बताता है, ऐसी मान्‍यता विदिशा में रही है जहां से नाग वंशीय शासकों के सिक्‍के भी मिले हैं।

मिस्र में भी यह मान्‍यता रही है जैसी कि Luxor City – Egypt की सूचना है, वहां पर नागदेवी या नागिन की मान्‍यता रही है। यह ”आइसिस” के नाम से ख्यातिलब्‍ध रही है। यह चंद्रमा की देवी मानी जाती है। हमारे यहां रोहिणी काे लेकर प्रचलित मान्‍यताओं पर विचार करना होगा। वह मिस्र ही नहीं, टोलेमियो और रोम के निवासियों के द्वारा भी सम्‍मान प्राप्‍त रही है। वे मानते थे क‍ि चांद के माथे पर तस्‍तरी एक नारी का प्रतीक है। आइसिस मिस्र के देवताओं ओसीरसि-मिथक के समूह में प्रमुखता प्राप्‍त देवी रही है।

 

यह जानकार आश्‍चर्य होता है कि संबंध उनमेें ऐसे हैं कि वह देवता की बहन भी है और उसकी पत्नी थी। उसने जीवनकाल में छह हत्‍याएं की। बाद में उसका शव बरामद हुआ। नेफथीस और थोथ के सहयोग से उसने दूसरी दुनिया में एक नया जीवन पाया…उसने अपनी मुखाकृति नारी वाली रखी जबकि शेषांग नाग जैसा रखा। नागिन की हमारे यहां भी ऐसी कथाएं बहुत रोचक है.. साऊ या साई माता की पूजा की परंंपरा हमारे यहां रही है, इसे अहोई भी कहा जाता है, कार्तिक कृष्‍णा अष्‍टमी को खासकर मारवाड़ में यह पर्व मनाया जाता है,, इस दिन कही जाने वाली कथा में मिस्र की मान्‍यता का रोचक रूप देखा जा सकता है…

 

द्वार द्वार ड्याढ़ी

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हर द्वार पर देवी विराजमान रहती है। कुलदेवी की मान्यता उस काल की देन है जबकि गायों के गुवाड़ की तरह पालकों ने एक साथ रहकर गोत्र की मान्यता का विकास किया। तब गोखे चोखे होकर गोखडे गवाक्ष हुए और द्वार पर सुरक्षा के भाव के रूप में आयुध चिह्नित किए जाने लगे।

मित्र प्रद्योत कहते हैं गोत्र शब्द बड़ा ही रोचक इतिहास समेटे हुए है। गोत्र का अर्थ है— गोशाला (cowshed)

त्र प्रत्यय (अन्त्यलग्न/suffix) का प्रधान अर्थ है— रक्षक। अत: गोत्र का अर्थ गोरक्षक भी हुआ।

 

गो के तीन अभिप्राय हैं—

  1. गाय की कोई विशेष प्रजाति (नस्ल/breed)
  2. गेहूँ (गोधूम) की कोई विशेष प्रजाति।

    (गोमेध = गोवत्स-बधियाकरण गेहूँ की खेती)

  1. वेद की कोई विशेष शाखा।

 

भारत में पिता-पुत्र-क्रम (male lineage) को गोत्र संज्ञा प्रदान की गई थी और प्रत्येक पिता-पुत्र-क्रम गो के उपर्युक्त तीनों रूपों की रक्षा कर रहा था।

 

ब्रह्म वैवर्त पुराण में द्वार द्वार देवी की बात अाई तो मत्स्येंद्र नाथ ने कुलदेवी की बात कौल मत निर्णय में कही। आज जो गुवाड़ वाले द्वार बचे हैं, उनको देखता हूं तो ये बातें याद आती है…

 

राठासेन : राष्ट्रश्येन माता

#मेवाड़_महिमा

जब मेवाड़ का एक देश के रूप में विकास नागदा को राजधानी के रूप में मानकर हो रहा था, तब इस क्षेत्र पर नज़र रखने के लिए सबसे ऊंची पहाड़ी पर जिस देवी को विराजित किया गया, उसका नाम राष्ट्रश्येन रखा गया। आज उसे राठासेन के नाम से जाना जाता है।

 

एकलिंग पुराण में इसकी महिमा है। कहा गया है कि वहां से देवी राष्ट्र पर निगाह रखती है। हारीत राशि आदि ने इस देवी की महिमा गायी है। यह सन्दर्भ 1495 ईस्वी से पुराना है। पुराण में इस देवी का मंत्र आदि भी आया है और उसका प्रयोग विधान बताया है।

 

लोक में एक कहावत है : राठासन राठौड़ों से रूठी तो झालों पर टूटी अर्थात यह देवी कभी राठौड़ों से रूठ गई तो झालाओं पर दयार्द्र होकर अनुग्रह करने वाली बनी। यह भी लगता है कि यह देवी कभी राष्ट्रकूटों की रही हो लेकिन पुराण में वज्रहस्ता और उसके पक्षिणी रूप के स्मरण का निर्देश भी है और सौम्य स्वरूप का भी।

 

पक्षिणी के रूप में राष्ट्र रक्षा करने की मान्यता जोधपुर और बीकानेर में करणी माता मंदिर से भी जुड़ी हुई है। क्षेमंकरी देवी और उसकी मान्यता को कवितावली में गोस्वामी तुलसी ने लिखा है और इधर उधर खेमज माता भी बहुत पूज्य रही है। शक्ति के मूल में अनेक जन मान्यताओं की बुनियाद भी रही है।

 

पुराणकार गोपाल भट्ट ने जिस प्रकार से वर्णन किया है, वह बहुत रोचक है और तांत्रिक क्रियाओं से प्रेरित भी है और जब मैं इस पुराण के अनुवाद का काम कर रहा था तब इसके अन्य सन्दर्भ भी विश्वसारतंत्र, शारदा आदि से निकाले थे। हाल ही जब यहां से होकर गुजरा तब कई यादें तरोताजा हो गई।

जय जय।

 

कुल देवी : एक दृष्टि

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वृक्षमूर्व्यां तथा वायौ व्योमे स्वर्गे सर्वश:

एवं विधा त्वियं देवी सदा पूज्या विजानता।

अप्येकं वेत्ति तो नाम धात्वर्थ निगमैर्नर:

दु:खैर्वर्ज्जित: सर्वै: सदा पापाद्विमुच्यते।।

(देवी पुराण 38, 100-102)

 

भारतीय परिवारों में कुल देवी की मान्यता लगभग वैसे ही रही है जैसे मिस्र में थी। ग्रीक परिवार भी कुल की रक्षा करने वाली शक्तियों में विश्वास करते थे। कुल देवियां हमारे घर – गुवाड़ के मूल द्वार की सूचक होती हैं। अधिकांश कुल देवियों के नाम ऐसे होते हैं, जो शास्त्रों में नहीं मिलते हैं, क्यों?

 

उनके आहार, पानक, स्थान, स्थिति केवल लोक स्मृतियों के आधार पर होते हैं, क्यों? कहीं कहीं इन देवियों के मूल जनजातीय होते हैं, कुछ प्रसंगों में शासकों के साथ विशेष रूप से देखने की जरूरत होती है, क्यों यह मान लिया गया है कि जो कुल देवी राजा की होगी, वही उनकी प्रजा की होगी।

 

शाक, अमिष जैसे आहार, भोग, नैवेद्य, उनके पूजन की सभी तिथियां भी बहुत कुछ कहती हैं, तीज तिथि का नाम ही गौरी तिथि हो गया… क्यों और कब?

 

देवियां वंश वल्लरी की मूल होती हैं, कभी माता से ही व्यक्ति को पहचाना जाता था, नामकरण मां के आधार पर ही होता था, देवताओं के नामकरण में भी इस मान्यता को मुहर लगाई गई है … और उनके बारे में सबसे ज्यादा केवल कुल की वरिष्ठ महिलाएं ही जानती हैं, क्यों?

श्री एस्ट्रो वास्तु

सपने में कुलदेवता-कुलदेवी को देखना

वेदों में वाग्देवी और श्रद्धा देवी

शीतल देवी भारत की तीरंदाज

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