
आज श्री रवि शंकर जी के साथ ध्रुव-स्तम्भ (so called Qutub Minar) जाना हुआ । साथ में कई विद्वज्जन रहे जिनमें पुस्तक “महरौली का आदित्यमन्दिरम् : ध्रुव-स्तम्भ” के संपादक विरजानंद दैवकरणी जी के भी दर्शन लाभ हुए ।
इच्छा थी कि 21-जून (ग्रीष्म अयनान्त/ उत्तर अयनान्त / Summer solstice) के दिन ध्रुव-स्तम्भ की छाया का प्रेक्षण किया जाए ।
तीन रेखाएं पृथ्वी की परिधि पर कल्पना की गई हैं –
ग्रीष्म अयनान्त के दिन उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे बड़ा दिन होता है । आज के दिन का मान दिल्ली में 13 घंटे 58 मिनट और 11 सेकंड है । कल से दिनमान शनैः शनैः घटना प्रारम्भ हो जाएगा ।
इसी प्रकार शीत अयनान्त/ दक्षिण अयनान्त/ Winter Solstice (21-22 दिसंबर) के दिन उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे छोटा दिन होता है ।
सूर्य का वार्षिक दोलन विषुवत रेखा से 23°27′ उत्तर में कर्क रेखा तक और 23°27′ दक्षिण में मकर रेखा तक रहता है । वसन्त सम्पात के दिन सूर्य ठीक पूर्व में उदय होता है फिर दिनोंदिन सूर्य उत्तर दिशा में खिसकता रहता है । ग्रीष्म अयनान्त के दिन अधिकतम उत्तर में पहुंच कर सूर्य पुनः दक्षिण की ओर खिसकना प्रारम्भ कर देता है और शीत अयनान्त के दिन अधिकतम दक्षिण में उदित होता है ।
कर्क रेखा भारत में जसदन (अहमदाबाद के पास), कालिंजर (बांसवाड़ा के पास), शाजापुर (उज्जैन के पास), सोनहाट (अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़ के पास) इत्यादि से होकर निकलती है । भूमध्य रेखा और मकर रेखा भारत में से नहीं जातीं ।
यदि दिल्ली की बात करें तो यह कर्क रेखा पर नहीं है यह 28° 39′ है जबकि जैसा ऊपर बताया कर्क रेखा 23°27′ पर । अतः ठीक मध्याह्न में ग्रीष्म अयनान्त के दिन छायाशून्यता नहीं होगी । आज दिल्ली में सूर्योदय 05:24 पर और सूर्यास्त 19:22 पर है अतः मध्याह्न 12:23 पर हुआ ।
हमारे प्रेक्षण में ध्रुव-स्तम्भ की छाया पहले पश्चिम से उत्तर की ओर घूमती हुई लगभग 12:25 पर न्यूनतम रही और मात्र स्तम्भ के छज्जों की छाया दिख रही थी ।
यहाँ यह बताना उचित है कि ध्रुव-स्तम्भ धरती से ठीक 90° पर नहीं है यह दक्षिण दिशा की ओर लगभग 8° झुका हुआ है, जिसके कारण यह ग्रीष्म अयनान्त के दिन कर्क रेखा पर न होते हुए भी लगभग छायाशून्यता प्राप्त करता है ।
ये सभी दृष्टि से दृश्य होने के कारण दृक विधि है ।
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21 जून, जब साल का सबसे बड़ा दिन होता है, तो कुतुबमीनार की छाया 12 बजकर 16 मिनट में धरती पर नजर नहींं आती। कारण ?
दिल्ली 28.5 डिग्री अक्षांश पर स्थित है, और सूरज आज के दिन मध्याह्न के समय कर्क रेखा जो कि 23.5 डिग्री है, उसके ठीक ऊपर रहता है। कुतुबमीनार 5 डिग्री कोण से दक्षिण की ओर झुका है, तो सूरज ठीक इसके ऊपर चमकता है, ठीक इसकी लाइन में, और छाया इसीकारण धरती पर नजर नहींं आती।
कुतुबमीनार जैसा सब जानते हैं, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के खगोलविज्ञ वराहमिहिर के समय उनके निर्देश के अनुसार बनाया गया था, खगोलीय गणना के लिए, और इसीकारण इसका झुकाव 5 डिग्री दक्षिण की ओर रखा गया। इस मीनार के चारों ओर 27 मंदिर थे, नक्षत्र या तारामंडलों के लिए, जिसके ऊपर गोल गुंबद थे, और उनमें से 7-8 अभी भी बचे हैं। वराहमिहिर के नाम पर ही इस वेधशाला के इलाके का नाम मिहिरावली रखा गया, जो अब महरौली कहा जाता है।
ये एक छोटे से पर्वत के शिखर पर बनाया गया था, जिसे विष्णु गिरि कहा गया, और इस मीनार को विष्णु स्तंभ कहा जाता था।
भारतीय धातुकर्म जो उस समय अपने उत्कर्ष पर था, उसका इस्तेमाल करते हुए मंदिर के सामने धातु का जो स्तम्भ बना है, जो 1600 बरसों से बिना जंग लगे खड़ा होकर आज भी मेटालर्जी के आधुनिक वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्य का विषय है, उसे गरुड़ स्तंभ कहा जाता था, जो विष्णु मंदिर का दीप स्तंभ भी था, उसपर ये जानकारियां ब्राह्मी लिपि में ढली है, जिसे इतिहास को मोड़ने के प्रेमी, मिटा नहींं पाए।
पहले ये विष्णु स्तंभ सात मंजिला था, जो भूकंप और रखरखाव के अभाव में 1200 ईस्वी तक आते आते टूटकर दो तीन मंजिला ही बच गया था। अब 800 बरस बिना मेन्टेनेंस के क्या चीज बच पाएगी?
एक टूटे हुए विष्णु स्तंभ को कुतुबमीनार में बदलने की प्रक्रिया 1192 में शुरु हुई, पर उसका 5 डिग्री का झुकाव बरकरार रखने की मजबूरी रही, और इसी कारण आज भी 21 जून को सूरज इसकी रेखा का आदर करते हुए धरती पर इसकी छाया गायब कर देता है।
(पुरानी पोस्ट है, पर हर बरस याद करना भी जरुरी है, कि कितना कुछ छीन लिया गया था हमसे
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. ग्रीष्म और शीत अयनांत (Summer and Winter Solstices)
आज, 21 जून 2023 को, भारतीय समयानुसार रात्रि के 8:28 बजे पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध का ग्रीष्म अयनांत (Summer Solstice) है। Universal Time (UT) के अनुसार उस समय 21 जून की दोपहर के 2:58 हो रहे होंगे। Universal Time को पहले ‘Greenwich Mean Time’ (GMT) कहते थे। यह लंदन के ग्रीनविच इलाके में स्थित ‘Royal Observatory’ की भौगोलिक स्थिति का समय होता है। इस स्थान से 0⁰ (ज़ीरो डिग्री) देशान्तर रेखा (Longitudinal line, or Longitude) गुजरती है। जिस समय भारतीय समयानुसार 21 जून की रात्रि के 8:28 हो रहे होंगे, उस समय अमेरिका के विभिन्न भागों में 21 जून की सुबह और दोपहर के विभिन्न समय होंगे, और इसी प्रकार संसार के अन्य भागों में विभिन्न समय होंगे। हां, भारत में रात्रि के 8:28 पर – जब यह अयनांत हो रहा होगा और सूर्य कर्क रेखा के वृत्त के ठीक ऊपर होगा – तब सूर्य भारत में दिखाई नहीं पड़ेगा क्योंकि उस समय यहां रात हो रही होगी – स्वाभाविक रूप से यह विश्व के उन भागों में ही दिखाई पड़ेगा जहां उस समय दिन हो रहा होगा।
1 वर्ष को 6-6 महीने के दो अयनों में बांटा जाता है। एक अयन का अंत होने पर उसे अयनांत कहा जाता है। यह पृथ्वी की सतह के सापेक्ष सूर्य की स्थिति से तय होता है। ये अयनांत दो होते हैं – ग्रीष्म और शीत (Summer and Winter). जब पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में ग्रीष्म अयनांत होता है, तब उसके दक्षिणी गोलार्ध में शीत अयनांत होता है, और जब यहां शीत अयनांत होता है, तब वहां ग्रीष्म अयनांत।
भौगोलिक रूप से क्या अर्थ होता है अयनांत या Solstice का? अंग्रेजी का यह शब्द Latin शब्दों ‘Sol’ और ‘Sistere’ से मिल कर बना होता है – जिसका अर्थ है – ‘Sun’ and ‘To stand still’. यह समय का वह बिंदु होता है जब किसी गोलार्ध में सूर्य आकाश में पृथ्वी की सतह के सापेक्ष वर्ष के उच्चतम अथवा निम्नतम स्थान पर दिखाई पड़ता है। इसलिए प्राचीन खगोलविदों ने समय के उस बिंदु को उस दिन अथवा रात्रि के रूप में माना, जब सूर्य ‘स्थिर खड़ा’ (Stand still) दिखाई पड़ता है।
उत्तरी गोलार्ध के ग्रीष्म अयनांत पर 21 जून के किसी समय सूर्य पृथ्वी की ‘कर्क रेखा’ (Tropic of Cancer) के ठीक ऊपर होता है। तब उसकी किरणें वहां लम्बवत् पड़ती हैं। 22 दिसम्बर के किसी समय वह ‘मकर रेखा’ (Tropic of Capricorn) के ठीक ऊपर होता है। Leap Year में यह तिथियां 20 जून और 21 दिसम्बर हो जाती हैं। 21 मार्च और 22 सितम्बर को ‘विषुवों’ (Equinoxes) के समय वह भूमध्य रेखा, या विषुवत रेखा (Equator – The Great Circle) के ठीक ऊपर होता है।
यहां मैं बताना चाहता हूं कि जब उत्तरी गोलार्ध में ग्रीष्म ऋतु – अर्थात् गर्मियां – होती है, तब पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव सूर्य की ओर झुका होता है, लेकिन उस समय हमारी पृथ्वी सूर्य से उस दूरी की अपेक्षा अधिक दूरी पर होती है जितनी उत्तरी गोलार्ध की शरद ऋतु – अर्थात जाड़ों – में पृथ्वी और सूर्य की होती है। इसका अर्थ है कि उत्तरी गोलार्ध के जाड़ों में पृथ्वी सूर्य के अधिक पास और उत्तरी गोलार्ध की गर्मियों में अधिक दूर होती है। लेकिन पृथ्वी पर सर्दी और गर्मी इस दूरी पर कम निर्भर करती है, और सूर्य की किरणों के पृथ्वी पर पड़ने के कोण, और उनकी अवधि, पर अधिक निर्भर करती है। हां, जब दक्षिणी गोलार्ध में गर्मी पड़ती है तब दक्षिणी ध्रुव सूर्य की ओर झुके होने के अतिरिक्त पृथ्वी सूर्य के अधिक पास भी होती है और जब वहां जाड़े पड़ते हैं तो दक्षिणी ध्रुव सूर्य से दूर झुके होने के अतिरिक्त पृथ्वी सूर्य से अधिक दूर भी होती है, इसलिए वहां सर्दियां और गर्मियां उत्तरी गोलार्ध की अपेक्षा अधिक कड़ी होती हैं। पृथ्वी के अक्ष के इस विभिन्न दिशाओं में झुकाव और पृथ्वी की सतह के गोल होने के कारण हमको वर्ष के विभिन्न समयों में पृथ्वी की सतह के सापेक्ष सूर्य की सबसे ऊंची स्थितियां विभिन्न दिखाई पड़ती हैं।
पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करने के क्रम में इसकी सूर्य से सबसे अधिक दूरी को Aphelion, और इसकी सूर्य से सबसे कम दूरी को Perihelion कहते हैं। इस वर्ष 3 जनवरी को – जब पृथ्वी Perihelion पर थी – यह दूरी 14 करोड़ 70 लाख किलोमीटर थी, और इस वर्ष 4 जुलाई को – जब पृथ्वी Aphelion पर होगी – यह दूरी 15 करोड़ 20 लाख किलोमीटर होगी। इसका अर्थ है कि पृथ्वी की इन दोनों स्थितियों में इसकी सूर्य से दूरी में लगभग 50 लाख किलोमीटर का अन्तर होता है।
साल के विभिन्न समयों में सूर्य की स्थिति पृथ्वी की सतह के सापेक्ष भिन्न-भिन्न क्यों होती है? पृथ्वी अपने घूर्णन के अक्ष (Axis of Rotation) पर सूर्य के चारों ओर अपने चक्कर लगाने के तल (Plane of revolution round the Sun) के लम्ब (Perpendicular) से लगभग 23.45⁰ (degree) झुकी होती है। Degree या अंश, कोण नापने की इकाई (Unit) होती है। एक वृत्त में 360⁰ होते हैं, एक सीधी रेखा में 180⁰ और समकोण में 90⁰ होते हैं।
सूर्य के चारों ओर अपने चक्कर लगाने के क्रम में इस झुकाव के कारण दिसम्बर के महीने में उत्तरी गोलार्ध का उत्तरी ध्रुव सूर्य से दूर झुका हुआ होता है। उस समय दक्षिणी गोलार्ध सूर्य की ओर झुका हुआ होता है। जून में इसका उल्टा होता है। पृथ्वी का जो हिस्सा सूर्य की ओर झुका होता है, वहां किरणें अपेक्षाकृत सीधी पड़ती हैं और वह हिस्सा अधिक समय तक सूर्य के प्रकाश में भी रहता है। सीधी किरणों का घनत्व (मात्रा प्रति क्षेत्रफल) तिरछी किरणों की अपेक्षा अधिक होता है। तिरछी पड़ने पर उतनी ही किरणें अधिक क्षेत्रफल में फैल जाती हैं और इसलिए विरल हो जाती हैं। इन कारणों से उस हिस्से – जो सूर्य की ओर झुका होता है – में गर्मी पड़ती है और दिन की अवधि बड़ी और रात की अवधि छोटी होती है। उस समय उस ध्रुव पर 6 महीने का दिन होता है और वहां सूर्य धरती के समानान्तर एक वृत्त में घूमता हुआ दिखाई पड़ता है। दूसरे ध्रुव पर उस समय 6 महीने की रात होती है।
यहां मैं बताना चाहूंगा कि कर्क रेखा का अक्षांश (Latitude of Tropic of Cancer) 23.4349 degree उत्तर होता है। कर्क रेखा उत्तरी अक्षांशों में वह सबसे अधिक उत्तर का स्थान होता है जहां पर सूर्य दोपहर के समय हमारे सीधे ऊपर हो सकता है। इसी प्रकार मकर रेखा का अक्षांश (Latitude of Tropic of Capricorn) 23.4349⁰ दक्षिण होता है और यह वह सब से अधिक दक्षिण का स्थान होता है जहां सूर्य दोपहर के समय हमारे ठीक ऊपर हो सकता है। पृथ्वी की सतह की गोलाई के कारण कर्क रेखा के और अधिक उत्तर और मकर रेखा के और अधिक दक्षिण में ऐसा होना संभव नहीं होता है।
उत्तरी ध्रुव के शीत अयनांत (Winter Solstice) के समय सूर्य मकर रेखा के ठीक ऊपर होता है। जैसा कि मैंने अभी बताया, कर्क और मकर रेखाएं भूमध्य रेखा से लगभग 23.45⁰ क्रमशः उत्तर और दक्षिण के अक्षांश होते हैं। यह अयनांत केवल एक क्षण का होता है। उस क्षण पर ही सूर्य की स्थिति उस प्रकार की होती है, जैसी मैंने बतायी – उसके बाद यह थोड़ी सी बदल जाती है क्योंकि पृथ्वी निरन्तर गति करती रहती है। लेकिन जिस दिन सूर्य की यह स्थिति होती है – अर्थात् अयनांत पड़ता है – सुविधा के लिए 24 घंटे के उस पूरे दिन को ही अयनांत मान लेते हैं। जैसे, 21 जून 2023 को पूरा दिन ग्रीष्म अयनांत (Summer Solstice) मान लेंगे जबकि वास्तव में यह केवल उस दिन की रात्रि के 8:28 बजे के एक विशेष क्षण पर ही होगा – फिर सूर्य की पृथ्वी की सतह के सापेक्ष स्थिति थोड़ी सी बदल जाएगी।
यहां पर एक अन्य बात जानने योग्य है। पृथ्वी की सतह पर कर्क और मकर रेखाओं की स्थिति बदलती रहती है। इसका कारण यह है कि हमारी पृथ्वी सूर्य के चारों ओर अपने परिक्रमा-तल के लंब के सापेक्ष 23.45 डिग्री झुकी हुई तो है ही, इसका यह झुकाव बदलता भी रहता है। यह एक घूमते हुए लट्टू के समान धीरे-धीरे डोलती (Wobble) है। इस डोलने में यह 25,772 वर्ष में एक परिक्रमा पूरी करती है। इसके डोलने का कारण इसके भूमध्य रेखा के उठाव (Equatorial Bulge) के ऊपर सूर्य, चन्द्रमा एवं अन्य ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण का Tidal प्रभाव होता है। इस गति को ‘अयन चलन’ (Precession of Equinoxes) कहते हैं। क्योंकि इस गति के कारण पृथ्वी की धुरी और उसकी गोल सतह का सूर्य के सापेक्ष झुकाव बदलता रहता है, इसलिए पृथ्वी की सतह के ऊपर की, काल्पनिक वृत्तों की, रेखाओं – कर्क और मकर रेखाओं – की स्थिति भी बदलती रहती है। कर्क रेखा प्रति-वर्ष लगभग आधे आर्क सैकंड (0.468″) – अर्थात् 15 मीटर प्रति-वर्ष – की गति से दक्षिण – अर्थात् भूमध्य रेखा – की ओर खिसकती रहती है। इसी प्रकार मकर रेखा इसी गति से उत्तर की ओर खिसकती रहती है। सन् 1917 में जहां कर्क रेखा 23⁰27′ उत्तर अक्षांश पर थी, सन् 2045 में यह 23⁰26′ उत्तर अक्षांश पर होगी। इसी प्रकार मकर रेखा जहां सन् 1917 में 23⁰27′ दक्षिण अक्षांश पर थी, सन् 2045 में यह 23⁰26′ दक्षिण अक्षांश पर रह जाएगी। इसी प्रकार आर्कटिक और एंटार्कटिक सर्कल्स भी अपने स्थान से खिसकते रहते हैं। कर्क और मकर रेखाओं की स्थिति में अंतर आने के कारण धीमे-धीमे ग्रीष्म और शीत अयनांतों की तारीख में अंतर आएगा। पृथ्वी की धुरी के इस दोलन के कारण जहां अभी पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव ध्रुव तारे (Polaris star) की ओर संकेत करता है, 12,000 साल में यह वेगा तारे (Vega Star) की ओर संकेत करेगा।
Summer Solstice के बाद से ही सूर्य पृथ्वी के आकाश में उसकी सतह के सापेक्ष दक्षिण की ओर बढ़ना शुरू करता है। इस दिन से यह कर्क रेखा से मकर रेखा की ओर बढ़ना शुरू करता है। 21 जून को सबसे बड़ा दिन होकर उसके बाद दिन की अवधि छोटी होनी शुरू हो जाती है। सूर्य उत्तरायण (उत्तर + अयन) से दक्षिणायन (दक्षिण + अयन) होना शुरू हो जाता है। यह समय दो अयनों का मेल – अर्थात् संक्रान्ति – होता है। इसलिए इस दिन को ही वास्तविक मकर संक्रान्ति होती है।
पृथ्वी के गोले पर भारत की भौगोलिक स्थिति के बारे में जानना भी एक रोचक तथ्य हो सकता है… भारत की मुख्य भूमि लगभग 8⁰ उत्तर से 37⁰ उत्तर तक, और लगभग 69⁰ पूर्व से 97⁰ पूर्व तक फैली है। यानी कर्क रेखा इसके बीच – दिल्ली के 580 किलोमीटर नीचे – से गुजरती है। दिल्ली का Latitude लगभग 29⁰ North है। भारत पूरा का पूरा भूमध्य रेखा (Equator) के ऊपर ही है, जबकि अफ्रीका महाद्वीप के बीच से भूमध्य रेखा गुजरती है।
जो बातें मैंने ऊपर बतायी हैं, वह केवल हमारी पृथ्वी की गति के प्रभावों का एक मोटा-मोटा खाका हैं। सूर्य के सम्मुख पृथ्वी के अपने अक्ष पर चक्कर काटने के कारण ही दिन-रात होते हैं और इसके अक्ष के सूर्य के सापेक्ष अपने झुकाव के कारण ही यहां ऋतुएं बदलती हैं। ऋतुएं इसलिए बदलती हैं क्योंकि पृथ्वी पर किसी स्थान पर तापमान इस झुकाव और गति के कारण ही बदलता है। इस तापमान पर ही ऋतुएं निर्भर करती हैं। ये साधारण सी बातें हमारे सभी विद्यार्थियों को मालूम होनी चाहिए, लेकिन, मुझे नहीं लगता है कि, बच्चे और विद्यार्थी तो दूर, हमारे अधिकांश बड़ों को भी यह सामान्य भौगोलिक ज्ञान होता होगा। इस लेख द्वारा मैंने केवल आज होने वाली एक भौगोलिक और खगोलीय घटना को समझाना चाहा है।
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