
संपूर्ण रामायण में शत्रुघ्न का कभी विशेष वर्णन नहीं मिलता। वे मानो सदैव उपेक्षित ही रहे।
शत्रुघ्न
रामरक्षा स्तोत्र और सामान्यतः रामकथा में भी शत्रुघ्न का उल्लेख बहुत कम मिलता है। यदि हम उनके जीवन का चिंतन करें, तो हमारा अहंकार स्वतः समाप्त होने लगेगा। अनेक लोगों के मन में प्रश्न आता है कि रामायण में शत्रुघ्न ने आखिर ऐसा क्या किया?
रामकथा में जैसे राम के साथ लक्ष्मण का नाम जुड़ा हुआ है, वैसे भरत के साथ शत्रुघ्न का नाम विशेष रूप से नहीं जुड़ा। राम, लक्ष्मण और भरत के बाद आने वाला मात्र एक नाम शत्रुघ्न नहीं हैं। रामायण में उनका उल्लेख कम है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि उनका योगदान भी कम था।
कभी-कभी किसी समारोह की तस्वीरें देखते समय मुझे यह अनुभव होता है कि उनमें ऐसे अनेक चेहरे दिखाई देते हैं जिन्होंने वास्तव में कोई काम नहीं किया होता। उनका कार्य केवल फोटो खिंचवाते समय उपस्थित रहना होता है। उस समय मेरा मन उन लोगों को खोजता है जिन्हें फोटो खिंचवाने की भी फुर्सत नहीं मिली, क्योंकि वे निरंतर कार्य में लगे रहे।
इसलिए शत्रुघ्न के कार्य पर हमारा ध्यान अवश्य जाना चाहिए।
कल्पना कीजिए—दो भाई वन में हैं। श्रीभरत नंदीग्राम में हैं। चौदह वर्षों तक अयोध्या का विशाल साम्राज्य संभालना है। ऐसा साम्राज्य, जिसका कोई राजा नहीं है।
यदि आपने राजनीति शास्त्र पढ़ा हो तो जानते होंगे कि किसी राज्य के लिए सबसे बड़ा संकट अराजकता होती है। इसी कारण किसी राजा की मृत्यु के बाद उसके अंतिम संस्कार से पहले नए राजा की घोषणा कर दी जाती है। राजनीति के अनुसार ऐसा एक भी दिन नहीं होना चाहिए जिस दिन राज्य बिना राजा के हो।
लेकिन अयोध्या चौदह वर्षों तक बिना राजा के रही। श्रीभरत भगवान राम की पादुकाओं की सेवा करते हुए नंदीग्राम में रहे। दो भाई वन में थे। पिता स्वर्ग सिधार चुके थे। तब प्रश्न उठता है कि चौदह वर्षों तक अयोध्या का शासन किसने संभाला?
जहाँ राजा नहीं होता, वहाँ सेना अव्यवस्थित हो जाती है। विद्रोह की संभावना बढ़ जाती है। मंत्रिमंडल, सेना और राज्य के खजाने को संभालना कोई साधारण बात नहीं है।
यदि हम छत्रपति शिवाजी महाराज के देहावसान के बाद रायगढ़ में घटी घटनाओं को पढ़ें, तो समझ में आता है कि किसी महान शासक के बाद राज्य का संचालन कितना कठिन होता है।
शत्रुघ्न को केवल राज्य ही नहीं संभालना था। उन्हें राजमहल में रहने वाली छह महिलाओं का भी ध्यान रखना था, जिनकी मनःस्थिति अलग-अलग थी।
माता कौशल्या दिन-रात अश्रु बहा रही थीं। माता कैकेयी अपने कर्मों पर पश्चाताप की अग्नि में जल रही थीं। उर्मिला की आँखों के आँसू थमने का नाम नहीं लेते थे। मांडवी का पति भरत अयोध्या के निकट नंदीग्राम में था, फिर भी वह उनसे मिल नहीं सकती थी।
जरा इस परिस्थिति की कल्पना कीजिए। चौदह वर्षों तक इतनी महिलाओं को सांत्वना देना, उनकी देखभाल करना और पूरे राजपरिवार को संभालना कोई साधारण कार्य नहीं था।
शत्रुघ्न का जीवन इसी सेवा में समर्पित हो गया। चौदह वर्षों तक उन्होंने अयोध्या का संपूर्ण राज्य और सेना संभाली।
लेकिन इतना सब करने के बाद भी जब भगवान राम चौदह वर्ष बाद लौटे, तब उनके स्वागत में शत्रुघ्न सबसे आगे दिखाई नहीं देते। सबसे आगे गुरु वशिष्ठ चलते हैं। उनके पीछे राम की पादुकाएँ लेकर भरत चलते हैं।
भगवान राम के लौटने पर सभी लोग राम-भरत मिलन का वर्णन करते हैं, परंतु शत्रुघ्न का वर्णन शायद ही कोई करता है।
ऐसे लोग फोटो के लिए काम नहीं करते। लेकिन यदि वे तस्वीर में दिखाई नहीं देते, तो यह कहना कि उन्होंने कोई काम नहीं किया, कृतघ्नता होगी।
किसी भव्य मंदिर को देखिए। लोग उसके शिखर को देखते हैं, उसकी सुंदर दीवारों को देखते हैं, उसकी कलाकृतियों की प्रशंसा करते हैं। लेकिन जिस नींव के पत्थरों पर पूरा मंदिर खड़ा होता है, उन पर किसी का ध्यान नहीं जाता।
यदि वे नींव के पत्थर सोचें कि हमारी तस्वीर तो कभी नहीं आती, केवल मंदिर के शिखर की आती है, इसलिए अगली बार फोटोग्राफर आएगा तो हम जमीन से बाहर निकल आएँगे—तो वह मंदिर कितनी देर खड़ा रहेगा?
मंदिर इसलिए खड़ा है क्योंकि नींव के पत्थर स्वयं को मिट्टी में दबाकर स्थिर बने रहते हैं।
इसीलिए मुझे हमेशा लगता है कि मंदिर में प्रवेश करते समय हम जो पहली सीढ़ी को प्रणाम करते हैं, वह उन नींव के पत्थरों के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
उसी प्रकार रामायण रूपी मंदिर में प्रवेश करते समय पहला प्रणाम शत्रुघ्न को करना चाहिए। क्योंकि उसी नींव के पत्थर पर अयोध्या का दिव्य वैभव टिका हुआ था।
अपने व्रत का पालन करते हुए चौदह वर्षों में शत्रुघ्न के मन में कभी यह तुच्छ विचार नहीं आया कि वे स्वयं सिंहासन पर बैठ जाएँ।
वन में रहकर वनवास के नियमों का पालन करना अपेक्षाकृत सरल है। नंदीग्राम में रहकर उन नियमों का पालन करना भी संभव है। लेकिन राजधानी में रहकर, प्रतिदिन राज्य के सभी कार्यों का संचालन करते हुए भी मन से संन्यासी बने रहना अत्यंत कठिन है।
और इतना सब करने के बाद भी शत्रुघ्न कहीं भी अपने कार्यों का प्रदर्शन नहीं करते।
जब कभी हमें यह अहंकार हो कि कोई कार्य मैंने किया है, तब शत्रुघ्न का स्मरण करना चाहिए। उस नींव के पत्थर को याद करना चाहिए।
तब समझ में आएगा कि हमारी भारतीय संस्कृति कितनी आत्मविलोपी (स्वयं को पीछे रखकर कार्य करने वाली) है।
“मैं अपने सभी कर्तव्यों को पूरी निष्ठा से निभाऊँगा, लेकिन बदले में मुझे कुछ नहीं चाहिए।”
क्या हम ऐसा कर सकते हैं?