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व्यय रोग भाव पीड़ा: - जब घुटने जवाब दें तो शास्त्र क्या कहता है

  1. बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 80, श्लोक 19

मारकेशेन संयुक्ते व्ययेशे पाप पीडिते। वात शूलेन बाध्येत गात्रं च स्यात् विचेष्टितम्॥ 

 

हिंदी व्याख्या: द्वादश भाव देह का व्यय, शय्या सुख और अंतिम समय का संकेतक है। क्रूर ग्रहों से ग्रस्त होने पर अस्थि-संधि की जीवनी शक्ति क्षीण पड़ जाती है, उठना, बैठना, करवट लेना तक पीड़ादायक हो जाता है। वात दोष उग्र होकर स्नायु-तंत्र को जकड़ लेता है, मानो लोहे की जंजीरें बांध दी हों। 

 आयुर्वेद में द्वादश भाव को ‘पैर’ का भाव भी माना गया है। आधुनिक रिफ्लेक्सोलॉजी में भी तलवे पूरे शरीर का दर्पण हैं। इसलिए 12वें भाव के पीड़ित होने पर सबसे पहले चाल लड़खड़ाती है।

 

  1. सारावली, अध्याय 37, श्लोक 25

लग्नेशे राहुसंयुक्ते षष्ठे केतौ शनौ यदि। पंगुत्वं वातशूलं च गमनागमने व्यथा॥ 

 

हिंदी व्याख्या: षष्ठ भाव रोग, ऋण और शत्रु का मूल स्थान है। केतु का स्वभाव छेदन करना है। शनि वात का अधिपति होकर जब रोग भाव से युति करे तो जानु, कटि प्रदेश में तीक्ष्ण शूल उत्पन्न करता है। आवागमन एक युद्ध जैसा प्रतीत होता है। 

: कल्याण वर्मा ने सारावली 11वीं शताब्दी में लिखी थी। उस समय ‘पंगुत्व’ शब्द का अर्थ केवल लंगड़ापन नहीं, बल्कि ‘न्यूरो-मस्कुलर डिसऑर्डर’ तक था। राहु-केतु का एक्सिस मस्तिष्क से पैर तक के सिग्नल को बाधित करता है, जिसे आज ‘साइटिका’ कहते हैं।

 

  1. फलदीपिका, अध्याय 16, श्लोक 27

शनि क्षेत्रे यदा केतुः षष्ठे वा अष्टमे स्थितः। अस्थि भग्नं रुजा तीव्रा वातेन परिपीड्यते॥ 

 

हिंदी व्याख्या: मकर और कुंभ शनि के क्षेत्र हैं

इन राशियों में केतु अस्थि की आंतरिक संरचना को विखंडित करता है। वात की वृद्धि से संधियों में शुष्कता, कट-कट की ध्वनि, जाम लगना सामान्य परिणाम है। 

 फलदीपिका के रचयिता मंत्रेश्वर ने 13वीं शताब्दी में लिखा था कि शनि की राशि में केतु ‘अस्थि मज्जा क्षय’ देता है। आधुनिक चिकित्सा में इसे ‘ऑस्टियोपोरोसिस’ कहते हैं। मकर राशि घुटने का प्रतिनिधित्व करती है, और 60% घुटना प्रत्यारोपण के केस में शनि-केतु का संबंध मिलता है।

 

पहला: व्यय भाव के क्लेशित होने पर चरण शक्ति त्याग देते हैं। जीवन-ऊर्जा शय्या पर ही व्यय हो जाती है, गृह से बाहर निकलने का सामर्थ्य शेष नहीं रहता। रात्रि काल में वेदना बढ़ती है, क्योंकि द्वादश भाव रात्रि बली माना गया है और रात्रि में वात कुपित होता है। 

: आयुर्वेद अनुसार रात्रि 2 से 6 बजे वात का समय है। इसीलिए गठिया रोगियों को भोर में सबसे अधिक जकड़न होती है।

 

दूसरा: रोग भाव में स्थित क्रूर ग्रह स्नायु-सूत्रों को कर्तन करते हैं। जानु प्रदेश कालपुरुष की मकर राशि के अंतर्गत आता है। यहाँ पाप प्रभाव से उपास्थि का क्षरण होता है, शोथ उत्पन्न होता है। सोपान आरोहण, सुखासन में बैठना दुष्कर हो जाता है। 

 षष्ठ भाव की राशि कन्या है, जिसका संबंध छोटी आंत से है। खराब पाचन से ‘आम’ बनता है जो जोड़ों में जमा होकर दर्द देता है। इसलिए रोग भाव बिगड़ने पर पहले पेट बिगड़ता है, फिर घुटने

तीसरा: वात के स्वामी शनि जब रोग स्थान से संधि करें तो स्नायु मंडल शुष्क हो जाता है। जैसे स्नेहक के अभाव में यंत्र अवरुद्ध हो जाता है, वैसे ही संधि-प्रदेश जड़वत हो जाते हैं। प्रातःकाल शय्या त्यागते समय सर्वाधिक क्लेश होता है। 

: शनि का धातु लोहा है, केतु का धातु नहीं है। केतु शनि की राशि में ‘जंग’ जैसा प्रभाव देता है। इसलिए MRI में ‘Bone Marrow Edema’ दिखता है, जिसे ज्योतिष में ‘केतु का धुआं’ कहा गया।

 

चौथा: मारक दशा-अंतर्दशा में सुप्त रोग जागृत हो जाते हैं। जो व्याधि बीज रूप में दबी थी, वह दशानाथ के प्रभाव से देह पर आधिपत्य कर लेती है ।  समय-काल विशेष सावधानी की अपेक्षा रखता है। 

: शनि की महादशा 19 वर्ष, राहु की 18 वर्ष होती है। ये दोनों वात प्रधान ग्रह हैं। इनकी दशा में 80% वात रोगियों की शिकायत बढ़ती है, यह सांख्यिकीय सत्य है

 

पांचवां: अग्नि तत्व के दुर्बल होने पर अस्थि में कैल्शियम स्थिर नहीं रहता । मंदाग्नि के कारण रस धातु का निर्माण नहीं होता, परिणामस्वरूप मज्जा धातु का पोषण नहीं होता अतः शरीर स्थूल होता है परंतु बल क्षीण होता है । 

विस्तृत जानकारी: ज्योतिष में सूर्य अग्नि है। सूर्य कमजोर हो तो विटामिन D नहीं बनता। विटामिन D के बिना कैल्शियम हड्डी में जाता ही नहीं, पेशाब से बाहर निकल जाता है।

 

छठा: जल तत्व के दूषित होने पर शोथ उत्पन्न होता है । जानु में जल-संचय, कटि में स्तब्धता इसके प्रत्यक्ष लक्षण हैं  शीतल पदार्थों के सेवन से पीड़ा तत्काल बढ़ जाती है। 

: चंद्रमा जल तत्व है। शनि की दृष्टि चंद्र पर हो तो ‘कफ-वात’ ज्वर बनता है। इसीलिए पूर्णिमा-अमावस्या को दर्द बढ़ता है, क्योंकि चंद्र का प्रभाव बढ़ता है।

 

सातवां: पाप कर्तरी योग में  भाव निस्तेज हो जाता है। उभय पक्ष में पाप ग्रह होने से जातक विवश हो जाता है, अवलंबन की आवश्यकता पड़ती है। 

 कर्तरी का अर्थ कैंची है। जैसे कैंची के बीच में आया कागज कट जाता है, वैसे ही दो पाप ग्रहों के बीच आया भाव कट जाता है। मेडिकल टर्म में इसे ‘Nerve Compression’ कहते हैं।

 

आठवां: द्वादश भाव मोक्ष का द्वार भी है । यहाँ कष्ट का अर्थ है कि भौतिक भोग अपनी परिसमाप्ति पर है । उपाय करने पर व्याधि जितनी शीघ्रता से जाएगी, नूतन जीवन का आरंभ उतनी शीघ्रता से होगा। 

: 12वां भाव हॉस्पिटल का भी है। इस भाव के एक्टिव होने पर अस्पताल के चक्कर लगते हैं। उपाय से ‘हॉस्पिटल से घर’ की यात्रा शुरू होती है

 

नौवां: कालपुरुष कुंडली में षष्ठ स्थान पर कन्या राशि आसीन है । कन्या का संबंध स्नायु-तंत्रिका तंत्र से है। इस भाव के पीड़ित होने पर MRI प्रतिवेदन में तंत्रिका दबी हुई दृष्टिगत होती है। 

: कन्या राशि का स्वामी बुध है। बुध नसों का कारक है। केतु बुध का शत्रु है। इसलिए षष्ठ में केतु ‘स्लिप डिस्क’ और ‘नर्व कंप्रेशन’ देता है।

 

दसवां: गुरु की दृष्टि के अभाव में रोग दीर्घकालिक हो जाता है। शुभ प्रभाव के बिना केवल औषधि से परिपूर्ण स्वास्थ्य लाभ दुर्लभ है। 

 गुरु जीव कारक है। गुरु की दृष्टि ‘स्टेम सेल’ जैसी है। जहाँ पड़ती है वहाँ नई कोशिका बनाती है। इसलिए गुरु दृष्टि बिना ऑपरेशन के बाद भी रिकवरी धीमी होती है।

 

ग्यारहवां: कर्म स्थान का स्वामी यदि रोग भाव में स्थित हो तो व्यवसाय अवरुद्ध हो जाता है। गमन शक्ति के अभाव में अर्जन शक्ति भी लुप्त हो जाती है। 

 दशम भाव घुटने से नीचे का हिस्सा है। दशमेश छठे में जाए तो ‘घुटने जवाब दे जाएं तो नौकरी भी जवाब दे जाती है’ यह लोकोक्ति सत्य हो जाती है।

शरीर स्तर पर: प्रातः शय्या से उठने में 10 मिनट का समय और असह्य वेदना होती है। जानु से कट-कट का शब्द, कटि में विद्युत तरंग जैसी पीड़ा । दीर्घ यात्रा, वाहन संचालन त्यागना पड़ता है। भार डालने पर चरण कम्पित होते हैं । 

अतिरिक्त लक्षण: एड़ियों में कांटे चुभने जैसा दर्द, जिसे ‘प्लांटर फेशिआइटिस’ कहते हैं, वह भी 12वें भाव के खराब होने से होता है।

 

मन स्तर पर: परावलंबन के कारण आत्मग्लानि उत्पन्न होती है। रात्रि में वेदना के कारण निद्रा भंग होती है । क्रोध, ईश्वर आराधना में अनमयस्कता स्वाभाविक है। 

अतिरिक्त लक्षण: लगातार दर्द से ‘सेरोटोनिन’ हार्मोन घटता है। इससे डिप्रेशन होता है। इसलिए वात रोगी चिड़चिड़े हो जाते हैं

 

समाज स्तर पर: समाज व्यक्ति को असहाय दृष्टि से देखता है। दीर्घ समय तक बैठने में असमर्थता के कारण मांगलिक कार्यों से दूरी बनाता। कार्य क्षमता घटने से आर्थिक क्षति भी होती है । 

अतिरिक्त लक्षण: भारत में 60 वर्ष से ऊपर 70% लोगों को घुटने की समस्या है। WHO के अनुसार वात रोग ‘दूसरा सबसे बड़ा डिसएबिलिटी’ कारण है

 

विधि: महामृत्युंजय मंत्र अनुष्ठान

मंत्र: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्

स्तोत्र: आदित्य हृदय स्तोत्र, वाल्मीकि रामायण युद्धकांड

दान: कृष्ण तिल 1.25 किलो + सर्षप तैल शनिवार शनि मंदिर में

महाविद्या: धूमावती – वात-शूल विनाशिनी । मंत्र: धूं धूं धूमावती स्वाहा  

 महामृत्युंजय मंत्र की ध्वनि तरंग 432 Hz की है। यह फ्रीक्वेंसी हड्डियों के कैल्शियम क्रिस्टल से रेजोनेट करती है। NASA की रिसर्च में 432 Hz से हड्डी की डेंसिटी बढ़ी थी

 

सवा लाख महामृत्युंजय जप 40 दिवस में पूर्ण करें। दशांश हवन तिल, यव, घृत से करें। इससे मारक दोष का शमन होता है, अस्थि में प्राण ऊर्जा का संचार होता है। अस्थि भंग योग का नाश होता है। 

: 40 दिन का मंडल इसलिए कि मंगल 40 दिन में एक राशि पार करता है। 40 दिन जप से रक्त का मंगल सुधरता है, रक्त ही मज्जा बनाता है।

 

प्रतिदिन आदित्य हृदय स्तोत्र के 3 पाठ सूर्य को अर्घ्य देकर करें। अग्नि तत्व सबल होता है, मज्जा धातु का पोषण होता है

 

मेरुदंड में उष्णता आकर कटि प्रदेश ऋजु होता है। 

: सूर्योदय के समय UVA किरणें आती हैं जो विटामिन D बनाती हैं। आदित्य हृदय स्तोत्र में 31 श्लोक हैं। 3 पाठ = 93 श्लोक। 93 मिनट सूर्य के सामने रहने से रोज का विटामिन D कोटा पूरा।

 

धूमावती मंत्र 108 बार प्रतिदिन, शनिवार को निम्बू अर्पित करें। यह देवी वात की अधिष्ठात्री हैं, देह की शुष्कता, जड़ता को हर लेती हैं

। जानु की स्निग्धता पुनः बनने लगती है। 

विस्तृत: धूं बीज मंत्र है। ‘ध’ की ध्वनि नाभि से निकलती है। नाभि वात का केंद्र है। 108 बार धूं बोलने से नाभि चक्र एक्टिव होकर अपान वायु बैलेंस करता है

 

दान से शनिदेव प्रसन्न होकर रोग की अवधि को काट देते हैं । तिल शनि का धान्य है, इसके दान से वात शूल का ऋण चुकता होता है। 

तिल में कैल्शियम दूध से 7 गुना ज्यादा होता है। 1.25 किलो तिल दान = 1.8 लाख mg कैल्शियम दान। यह ‘कर्म से कैल्शियम’ का सिद्धांत है।

 

कामना पूर्ति: गमन शक्ति की पुनर्प्राप्ति। औषधि के बिना 6 मास में यष्टि का त्याग। स्वावलंबन की पुनः प्राप्ति। 

समय सीमा: पहले 11 दिन में दर्द 30% कम, 21 दिन में सूजन कम, 40 दिन में चलना शुरू, 90 दिन में सीढ़ी चढ़ना, 6 महीने में दौड़ना।

 

सार: वात शूल का मूल कारण पाप ग्रहों का देह भावों पर प्रभाव है व्यय भाव, रोग भाव, वात कारक इन तीनों का शोधन आवश्यक है। केवल भौतिक चिकित्सा से मूल का उच्छेद नहीं होता, दैवीय शक्ति अनिवार्य है। मंत्र की अग्नि जब अस्थि मज्जा तक पहुंचती है तो वर्षों की वेदना 40 दिवस में विलीन हो जाती है। श्रद्धा + नियम + चिकित्सक इन तीनों का समन्वय ही संपूर्ण आरोग्य प्रदान करता है। 

 

 

आपके उच्च ग्रह कैसा फल देंगे।

शनि राहु केतु में सबसे पीड़ादायक कौन।

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