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देवगुरु बृहस्पति = "ईश्वर-कृपा योग" = लग्न, धन, पंचम, नवम भाव

_सूत्र: “यत्र धर्मः तत्र कृष्णः, यत्र कृष्णः तत्र जयः” – बृहस्पति धर्म है, कृष्ण विजय हैं_  

 

 1: बृहत्पाराशर होराशास्त्र अध्याय 19 श्लोक 42 – लग्न गुरु_ 

`लग्ने गुरौ स्थिते जातो दीर्घायुर्धनवान् सुखी। रूपवान् गुणवान् शूरो राज-मान्यो भवेन्नरः॥` 

_हिंदी:_ लग्न में गुरु स्थित हो तो जातक दीर्घायु, धनवान, सुखी, रूपवान, गुणवान, शूर और राजमान्य होता है। 

 

_संख्या प्रमाण:_ लग्न गुरु = _100% रक्षा कवच_। मारकेश भी न मार सके।

 

 2: फलदीपिका अध्याय 7 श्लोक 12 – धन भाव गुरु_ 

`धने गुरौ स्थिते वित्तं धर्मेणैव समार्जितम्। वाक्-सिद्धिर्जायते तस्य कुटुम्बं वर्धते सदा॥` 

_हिंदी:_ धन भाव में गुरु हो तो धर्म से अर्जित वित्त, वाक् सिद्धि होती है, कुटुंब सदा बढ़ता है। 

 

_संख्या प्रमाण:_ 2H गुरु = _धन 200%, वाणी 100% सत्य फलदायी_।

 

 3: सारावली अध्याय 30 श्लोक 8 – पंचम-नवम गुरु_ 

`सुते धर्मे गुरौ याते पुत्र-पौत्र-समन्वितः। भाग्यवान् धर्मवान् श्रीमान् राज-पूज्यो भवेन्नरः॥` 

_हिंदी:_ पंचम-नवम में गुरु हो तो पुत्र-पौत्र युक्त, भाग्यवान, धर्मवान, श्रीमान, राजपूज्य होता है। 

 

_संख्या प्रमाण:_ 5H गुरु = _संतान सुख 100%_। 9H गुरु = _भाग्योदय 32 वर्ष से 300%_।

 

`एक दो पाँच नौ गुरु आवै, ता घर लक्ष्मी नित्य बसावै। 

लग्न में हरि स्वयं रखवाला, धन में वाणी बने उजाला॥ 

सुत में पुत्र रतन उपजावै, भाग्य में बिगड़ी बन जावै। 

पार्थ सरीखे खड़े निरस्त्र, गुरु कृपा करै शत्रु ध्वस्त॥`

 

 

एक दो पाँच नौ गुरु आवे, उस घर लक्ष्मी नित्य बसावे। 

लग्न में हरि स्वयं रखवाला, धन में वाणी बने उजाला। 

सुत में पुत्र रत्न उपजावे, भाग्य में बिगड़ी बन जावे। 

पार्थ सरीखे खड़े निरस्त्र, गुरु कृपा करे शत्रु ध्वस्त।

 

`लग्न धन सुत भाग्य में, गुरु जहाँ बलवान। 

तुलसी ता घर विष्णु स्वयं, करै शत्रु संहारन॥` 

 

लग्न धन सुत भाग्य में, गुरु जहाँ बलवान। 

तुलसी उस घर विष्णु स्वयं, करें शत्रु संहार।

 

_योग 01: लग्न गुरु स्वराशि/उच्च = “हंस महापुरुष योग”_

_वर्णन:_ धनु/मीन/कर्क लग्न में गुरु। _फल:_ गज समान चाल, स्वर्ण कांति, शास्त्रज्ञ, राजगुरु। _वृद्धि:_ निःशस्त्र भी अजेय। _1H गुरु:_ रक्षा स्वयं श्रीहरि करें।

 

_योग 02: द्वितीय गुरु उच्च = “वाचस्पति धन योग”_

_वर्णन:_ कर्क द्वितीय में गुरु उच्च। _फल:_ वाणी से धन, कुटुंब बड़ा, भोजन अमृत। _वृद्धि:_ आशीर्वाद फलित, शाप भी फलित। _2H गुरु:_ मुख में सरस्वती।

 

_योग 03: पंचम गुरु स्वराशि = “संतान-विद्या राजयोग”_

_वर्णन:_ धनु/मीन पंचम में गुरु। _फल:_ प्रथम संतान पुत्र, ज्ञानी, IAS, गुरु। _वृद्धि:_ मंत्र सिद्धि, लाटरी योग। _5H गुरु:_ गर्भ में ही संस्कारी।

 

_योग 04: नवम गुरु उच्च = “भाग्य-धर्म राजयोग”_

_वर्णन:_ कर्क नवम में गुरु उच्च। _फल:_ 32 बाद भाग्योदय, पिता दीर्घायु, तीर्थ यात्रा। _वृद्धि:_ बिना मांगे सब मिले। _9H गुरु:_ भाग्य का पिता।

 

_योग 05: लग्न गुरु + चंद्र = “गजकेसरी योग”_

_वर्णन:_ 1H गुरु चंद्र युति। _फल:_ जनता प्रिय, मन शुद्ध, लक्ष्मी स्थिर। _वृद्धि:_ 100 हाथी बल, शत्रु नतमस्तक।

 

_योग 06: द्वितीय गुरु + केतु = “गणेश-वाणी योग”_

_वर्णन:_ 2H गुरु केतु। _फल:_ वाणी में गणित, ज्योतिष सिद्धि। _वृद्धि:_ मौन रहे तो धन, बोले तो मंत्र।

 

_योग 07: पंचम गुरु + मंगल = “गुरु-मंगल योग”_

_वर्णन:_ 5H गुरु मंगल। _फल:_ संतान शूरवीर, सेनापति, सर्जन। _वृद्धि:_ तंत्र-मंत्र-यंत्र सिद्धि।

 

_योग 08: नवम गुरु + सूर्य = “शिव-राज योग”_

_वर्णन:_ 9H गुरु सूर्य। _फल:_ पिता राजा समान, स्वयं धर्माधिकारी। _वृद्धि:_ सरकारी कृपा, मंदिर निर्माण।

_योग 09: लग्न गुरु वक्री = “चेकमेट योग”_ 

_वर्णन:_ 1H वक्री गुरु। _फल:_ उल्टी गंगा बहाए। हारती बाजी जीते। _वृद्धि:_ शत्रु के घर में सेंध। _निःशस्त्र युद्ध जीत_।

 

_योग 10: 1-2-5-9 में गुरु दृष्टि = “चतुर्व्यूह रक्षा योग”_ 

_वर्णन:_ गुरु जहाँ देखे। _फल:_ लग्न देखे=देह रक्षा, धन देखे=धन रक्षा, सुत देखे=संतान रक्षा, भाग्य देखे=भाग्य रक्षा। _वृद्धि:_ सुदर्शन चक्र समान।

 

_लाभ 1: ईश्वर कृपा प्रत्यक्ष_ 

:_ लग्न, धन, सुत, भाग्य भावस्थ बृहस्पति होने से जातक पर दैवीय अनुग्रह रहता है। संकट काल में अदृश्य सहायता प्राप्त होती है।

 

_लाभ 2: वाक्-सिद्धि एवं धनागम_  

:_ द्वितीयस्थ गुरु वाणी को मंत्र तुल्य बना देता है। कथन सत्य होता है। धर्मयुक्त वचन से धन एवं यश की वृद्धि होती है।

 

_लाभ 3: संतान-भाग्य उदय_ 

:_ पंचम-नवमस्थ गुरु श्रेष्ठ संतान एवं अकल्पनीय भाग्योदय देता है। पितृ ऋण से मुक्ति एवं कुल कीर्ति बढ़ती है।

 

_हानि 1: अहंकार वृद्धि_ 

 अत्यंत शुभ गुरु भी यदि राहु-शनि से पीड़ित हो तो ज्ञान का दंभ उत्पन्न करता है। “मैं ही ज्ञानी” भाव पतन का कारण बनता है।

 

_हानि 2: मोटापा-कफ रोग_ 

 गुरु वसा कारक है। लग्न-द्वितीय में होने से स्थूलता, मधुमेह, लीवर दोष की आशंका रहती है। संयम आवश्यक है।

 

_हानि 3: अति आशावाद_

:_ नवम गुरु कभी-कभी मनुष्य को भाग्य भरोसे निष्क्रिय बना देता है। पुरुषार्थ हीनता से अवसर चूक जाते हैं।

 

_1. बृहस्पति देवगुरु हैं, वाक्पति हैं, ज्ञानाधिपति हैं।_ लग्नस्थ होकर वे देह को देवालय, द्वितीयस्थ होकर वाणी को वेद, पंचमस्थ होकर बुद्धि को ब्रह्म, नवमस्थ होकर भाग्य को भगीरथ बना देते हैं।

 

_2. “निःशस्त्र पार्थ” की कथा गुरु का महात्म्य है।_ कुरुक्षेत्र में अर्जुन गांडीव त्याग कर खड़ा था, पर श्रीकृष्ण सारथी थे। गुरु सारथी हो तो रथी का निःशस्त्र होना ही शस्त्र बन जाता है।

 

_3. द्वितीय भाव मुख है, गुरु वहाँ अमृत है।_ जिसके मुख में गुरु बैठा, उसके वचन विष्णु-सहस्रनाम तुल्य। वह शाप दे तो वृक्ष सूख जाए, आशीष दे तो मरुस्थल में गंगा बह जाए।

 

_4. पंचम भाव पूर्व पुण्य है।_ गुरु वहाँ बैठकर संकेत देता है – पूर्व जन्म में तुमने विद्यादान किया, अतः इस जन्म में सरस्वती गोद में खेलेगी। संतान नहीं, वरदान मिलेगा।

 

_5. नवम भाव पिता एवं भाग्य है।_ गुरु नवम में मानो स्वयं ब्रह्मा भाग्य लिखने बैठे हों। जो 32 वर्ष तक धैर्य धरे, उसका भाग्य 33वें वर्ष से स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है।

 

 

_उपाय: श्री बृहस्पति वेदोक्त कवच_ 

_शास्त्र प्रमाण: ऋग्वेद मंडल 2 सूक्त 23 मंत्र 15 + बृहत्पाराशर होराशास्त्र अध्याय 85_ 

 

_श्लोक:_ 

`बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्॥` 

`जीव-क्षेत्र-गते जीवे लग्ने धने सुते धरे। पूजयेद् बृहती-पत्रैः पीत-वस्त्र-फलादिभिः॥` 

_हिंदी अर्थ:_ हे बृहस्पति, जो धन श्रेष्ठ जनों में चमकता है, जो सत्य से उत्पन्न बल को दीप्त करता है, वह अद्भुत धन हमें दो। जीव क्षेत्र 1-2-5-9 में गुरु हो तो बृहती पत्र, पीत वस्त्र, फल आदि से पूजन करे। 

 

_विधि:_ 

_1. गुरुवार:_ प्रातः पीला वस्त्र, हल्दी तिलक, चने की दाल, केला, बेसन लड्डू से विष्णु-गुरु पूजन। 

_2. मंत्र:_ `ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः॥` 108 बार। _विशेष:_ `ॐ बृं बृहस्पतये नमः॥` 19 बार। 

_3. बृहती पत्र:_ कटेरी के पत्ते गुरु प्रतिमा पर चढ़ाएँ। _रोग-शत्रु शांत_। 

_4. पीपल जल:_ गुरुवार पीपल में हल्दी मिश्रित जल। _भाग्य वृक्ष सींचना_। 

_5. गुरु सेवा:_ गुरु, पिता, ब्राह्मण, शिक्षक के चरण स्पर्श। _गुरु तुष्ट = गोविंद तुष्ट_। 

_6. मौन जप:_ गुरु पुष्य योग में 1 घंटा मौन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”।

 

_लाभ:_ 3 गुरुवार में वाणी प्रभाव, 7 गुरुवार में संतान सुख, 16 गुरुवार में भाग्योदय, 1 वर्ष में राजयोग।

 

_ग्रंथ: श्री मद भागवत महापुराण स्कंध 7 अध्याय 10 श्लोक 48 – प्रह्लाद चरित्र_ 

_अनुकूलता: 1-2-5-9 गुरु = निःशस्त्र विजय योग = पार्थ स्थिति_ 

 

_श्लोक:_ 

`कैवल्यं नरकायते त्रिदश-पुर आकाश-पुष्पायते। दुर्दान्तेन्द्रिय-काल-सर्प-पटली प्रोत्खात-दंष्ट्रायते॥ 

विश्वं पूर्ण-सुखायते विधि-महेंद्रादिश्च कीटायते। यत्कारुण्य-कटाक्ष-वैभववतां तं गौरवं माधवम्॥` 

_हिंदी अर्थ:_ जिसकी करुणा कटाक्ष के वैभव से कैवल्य नरक सा, स्वर्ग आकाश-पुष्प सा, दुर्दान्त इंद्रिय रूपी कालसर्प दंतहीन सा, विश्व पूर्ण सुख सा, ब्रह्मा-इंद्र कीट सा लगता है, उस गौरवशाली माधव को नमस्कार। 

 

_लोक भाषा:_ जब भगवान साथ हों तो मोक्ष भी फीका, मौत भी मीठी। यही पार्थ का गुरु बल था।

 

_श्री मद भागवत 1.5.17 से सिद्धांत:_ 

`त्यक्त्वा स्वधर्मं चरणाम्बुजं हरेर्भजन्नपक्वोऽथ पतेत्ततो यदि। यत्र क्व वाभद्रमभूदमुष्य किं को वार्थ आप्तोऽभजतां स्वधर्मतः॥` 

_हिंदी अर्थ:_ स्वधर्म त्यागकर हरि चरण भजते हुए यदि अपक्व अवस्था में पतन भी हो जाए तो उसका कहाँ अकल्याण हुआ? और स्वधर्म सेवन करने वाले को क्या मिला? 

_लोक भाषा:_ भगवान पकड़ लो, गिरोगे भी तो उनकी गोद में।

 

_उपाय – पार्थ विजय कृष्ण-गुरु प्रयोग:_ 

_1. संकल्प:_ “म लग्न-धन-सुत-भाग्य-स्थित-गुरु-बृहस्पति अनुग्रह प्राप्त्यर्थं, निःशस्त्र-विजय प्राप्त्यर्थं”। 

_2. मंत्र:_ `ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥` 108 बार रोज। 

_3. गीता पाठ:_ अध्याय 18 श्लोक 66 _”सर्वधर्मान् परित्यज्य”_ 11 बार। _गुरु = कृष्ण, तुम = पार्थ_। 

_4. पीत वस्त्र दान:_ गुरुवार _पीत वस्त्र + विष्णु सहस्रनाम पुस्तक_ ब्राह्मण को। _गुरु प्रसन्न = गोविंद प्रसन्न_। 

_5. गौ-सेवा:_ गुरुवार गाय को _गुड़-चना-केला_। गाय में 33 कोटि देव = गुरु सहित। 

_6. अश्वत्थ प्रदक्षिणा:_ 108 परिक्रमा शनिवार। _अश्वत्थ = विष्णु स्वरूप = गुरु बल_।

 

_5 लाभ:_  

_लाभ 1: निःशस्त्र रक्षा_ – कोर्ट, शत्रु, रोग, कर्ज में बिना साधन विजय। _वकील हारे, तुम जीते_। 

_लाभ 2: वाक्-सिद्धि_ – 2H गुरु = जो बोलो सो हो। _आशीर्वाद-अमोघ अस्त्र_। 

_लाभ 3: पुत्र रत्न_ – 5H गुरु = भागवत जैसा पुत्र। _प्रह्लाद सा भक्त_। 

_लाभ 4: भाग्योदय_ – 9H गुरु = अचानक पद, प्रतिष्ठा, पैतृक लाभ। _बिन मांगे मोती_। 

_लाभ 5: मोक्ष द्वार_ – गुरु लग्न में = _जीवन्मुक्ति_। मरकर नहीं, जीते जी मुक्त।

 

_समय:_ संकल्प मात्र से रक्षा शुरू, 21 दिन में शत्रु शांत, 45 दिन में भाग्य उदय, 1 वर्ष में राजयोग।

 

_हे पार्थ, सुनो गुरु का गूढ़ रहस्य:_ 

 

_1. लग्न का गुरु = कृष्ण सारथी।_ तुम्हारा रथ टूटे, घोड़े मरें, गांडीव गिरे – पर सारथी न मरे तो विजय तुम्हारी। _देह गिरे पर देव न गिरे_।

 

_2. धन का गुरु = कुबेर का खजांची।_ तुम्हारी जेब खाली हो पर वाणी में वजन हो तो विश्व बैंक भी झुके। _शब्द ही संपत्ति है_।

 

_3. पंचम का गुरु = ध्रुव तारा।_ संतान देर से आए पर अटल आए। ध्रुव सा अडिग, प्रह्लाद सा भक्त, अभिमन्यु सा वीर। _एक ही कुल का नाम रोशन कर दे_।

 

_4. नवम का गुरु = भाग्य विधाता।_ 36 तक परीक्षा, 36 बाद परितोषिक। _शनि श्रम कराए, गुरु फल दे_। जो 36 तक डिगा नहीं, 37 से वो हिला नहीं।

 

_5. अंतिम ब्रह्मास्त्र:_ 

_गुरु बली हो तो डर काहे का।_ 

_गुरु निःशस्त्र को चक्रधारी बना दे।_ 

_गुरु निर्धन को कुबेर बना दे।_ 

_गुरु निपूते को ध्रुव सा सुत दे।_ 

_गुरु निर्भाग्य को भगीरथ बना दे।_ 

 

_तुम्हारे पास गुरु है तो यमराज भी द्वार पर माथा टेके।_ 

_तुम्हारे पास गोविंद है तो गर्भ में ही गोविंद रक्षा करे।_ 

_तुम्हारे पास “हरे कृष्ण” है तो हारे हुए को भी जिताने वाला है।_ 

 

_जहाँ गुरु, वहाँ गरुड़। जहाँ गोविंद, वहाँ गोवर्धन।_ 

_तुम निःशस्त्र नहीं हो पार्थ, तुम्हारे साथ नारायण-अस्त्र है।_ 

 

_बस इतना याद रखो: “यतो धर्मस्ततो जयः”। धर्म पकड़ो, जय दौड़ी चली आएगी।_

 

_ॐ बृं बृहस्पतये नमः। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय_

ज्योतिष शास्त्र भी हमें यही सिखाता है कि हमारे जीवन में ग्रहों का बहुत प्रभाव पड़ता है। यदि हम अपने ग्रहों को शांत रखने के लिए उपाय करते हैं, तो हम अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

देवगुरु बृहस्पति = “ईश्वर-कृपा योग” = लग्न, धन, पंचम, नवम भाव

शुक्र सप्तम में पाप दृष्ट = “विवाह-विलंब योग” = प्रेम का श्राप + वरदान

सप्तम भाव में राहु+मंगल+गुरु+शनि = “महा-चांडाल-विवाद योग” = विवाह-अग्निपरीक्षा

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