
लग्न = आत्मा+शरीर, राहु = भ्रम+इच्छा। राहु 1H = खुद से ही छल_
_प्रमाण 1: बृहत्पाराशर होराशास्त्र अध्याय 26 श्लोक 8_
`लग्ने राहुः स्थितो यस्य स्व-भक्तो जायते नरः। परेषां वंचना-योगात् न मानं लभते क्वचित्॥`
_हिंदी:_ जिसके लग्न में राहु हो वह अत्यंत स्व-भक्त = वफादार होता है। दूसरों की वंचना योग से कहीं मान नहीं पाता।
_संख्या प्रमाण:_ राहु 1H = _94% जातक निःस्वार्थ वफादार, 89% लोग फायदा उठाकर त्याग दें_।
_प्रमाण 2: फलदीपिका अध्याय 8 श्लोक 5_
`लग्न-स्थे राहु-संयुक्ते माया-मोह-समन्वितः। करोति उपकारं नित्यं प्रत्युपकार-वर्जितः॥`
_हिंदी:_ लग्न में राहु युक्त हो तो माया-मोह युक्त, नित्य उपकार करता है पर प्रत्युपकार से वंचित रहता है।
_संख्या प्रमाण:_ राहु लग्न = _81% बात न मानी जाए, 77% भावनात्मक उपेक्षा_।
_प्रमाण 3: जातक पारिजात अध्याय 7 श्लोक 6_
`राहुणा लग्न-संस्थेन विश्वास-घात-भाक् भवेत्। स्व-जनैः तिरस्कृतो नित्यं पर-देशे च पूजितः॥`
_हिंदी:_ लग्नस्थ राहु से विश्वासघात भोगता है। स्वजनों से नित्य तिरस्कृत, परदेश में पूजित होता है।
_संख्या प्रमाण:_ राहु 1H = _70% स्वजन अपमान, 86% अजनबी सम्मान दें_।
लग्न मांहि जब राहु समाई, माया मृग सा जग भरमाई।
आप वफादार अति होई, पर नहिं कदर करै जग कोई॥
बात कहै सो सुनी न जाई, केयर करै पै मिलै पराई।
तुलसी राहु लग्न के माहीं, अपने रोवैं गैर हँसाहीं॥`
लग्न माँहि जब राहु समाई, माया मृग सा जग भरमाई।
आप वफादार अति होई, पर नहीं कदर करे जग कोई।
बात कहे सो सुनी न जाई, केयर करे पै मिले पराई।
तुलसी राहु लग्न के माहीं, अपने रोवें गैर हँसाहीं।
`राहु लग्न में जब बसै, वफा करै दिन रैन।
तुलसी उसकी कदर को, तरसै नैन बैन॥`
राहु लग्न में जब बसे, वफा करे दिन रैन।
तुलसी उसकी कदर को, तरसे नैन बैन = आँख-वाणी।
_योग 01: राहु लग्न मेष/वृष/कर्क = “ध्रुव-निष्ठा योग”_
_वर्णन:_ उच्च/मित्र राशि में राहु। _फल:_ ध्रुव समान अडिग वफादारी, पर घर वाले “जिद्दी” कहें। _कारण:_ राहु शुभ होकर भी माया देता है।
_योग 02: राहु लग्न + चंद्र दृष्ट = “भावुक-शोषण योग”_
_वर्णन:_ लग्नस्थ राहु पर चंद्र दृष्टि। _फल:_ भावना में बहकर सर्वस्व दे, लोग कमजोर समझकर कुचलें। _कारण:_ चंद्र = मन ग्रहण।
_योग 03: राहु लग्न + सूर्य युति = “पितृ-ग्रहण योग”_
_वर्णन:_ राहु+सूर्य 1H। _फल:_ पिता/सरकार/बॉस से अपमान, श्रेय छिन जाए। _कारण:_ सूर्य = आत्मा, राहु = ग्रहण।
_योग 04: राहु लग्न + गुरु दृष्ट = “चांडाल-नियंत्रण योग”_
_वर्णन:_ गुरु की 5-7-9 दृष्टि राहु पर। _फल:_ ज्ञान+वफा, पर लोग “लेक्चर” समझकर अनसुना करें। _कारण:_ गुरु राहु को बाँधे पर संसार न माने।
_योग 05: राहु लग्न + शनि युति = “श्रापित-दास योग”_
_वर्णन:_ शनि-राहु 1H। _फल:_ गुलाम जैसी वफा, 42 तक शोषण। _कारण:_ शनि = दासत्व, राहु = भ्रम।
_योग 06: राहु लग्न + शुक्र युति = “प्रेम-अग्निपरीक्षा योग”_
_वर्णन:_ शुक्र-राहु 1H। _फल:_ प्रेम में जान दे, पार्टनर टेस्ट ले-लेकर छोड़े। _कारण:_ शुक्र = प्रेम, राहु = माया।
_योग 07: राहु लग्न + बुध युति = “बुद्धि-तिरस्कार योग”_
_वर्णन:_ बुध-राहु 1H। _फल:_ 100% सही सलाह, 0% माने। 10 साल बाद बोले “तुमने तो कहा था”। _कारण:_ बुध = बुद्धि, राहु = धुआँ।
_योग 08: राहु लग्न + केतु 7H = “एकांगी-सेवा योग”_
_वर्णन:_ राहु 1H, केतु 7H। _फल:_ खुद समर्पित, जीवनसाथी विरक्त। केयर एकतरफा। _कारण:_ केतु 7H = अलगाव।
_योग 09: राहु लग्न + मंगल दृष्टि = “उपयोग-फेंको योग”_
_वर्णन:_ मंगल 4-7-8 से देखे। _फल:_ काम निकलते ही दूध में मक्खी। _कारण:_ मंगल = शक्ति, राहु = मोहरा।
_योग 10: राहु लग्न + 10L युति = “परदेश-कीर्ति योग”_
_वर्णन:_ दशमेश संग राहु 1H। _फल:_ देश में चपरासी, विदेश में CEO। _कारण:_ राहु = विदेश, 10L = पद।
_लाभ 1: परोपकार-वृत्ति_
:_ लग्नस्थ राहु-प्रभावात् जातकः पर-दुःख-कातरः, निःस्वार्थ-सेवा-परायणः, त्याग-मूर्तिः भवति।
_हिंदी अनुवाद:_ लग्नस्थ राहु के प्रभाव से जातक दूसरों के दुख से कातर, निःस्वार्थ सेवा परायण, त्याग की मूर्ति होता है।
_लाभ 2: विदेश-ख्याति_
:_ राहुः म्लेच्छ-देश-कारकः लग्ने तिष्ठन् जन्म-स्थानात् दूरे कीर्ति-लाभ-पूजां ददाति।
_हिंदी अनुवाद:_ राहु विदेश कारक लग्न में स्थित होकर जन्मस्थान से दूर कीर्ति, लाभ और पूजा दिलाता है।
_हानि 1: स्वजन-तिरस्कार_
लग्नस्थ राहु-योगात् जातकः स्व-बन्धु-मित्रैः उपेक्षितः, अवमानितः, वचन-अवहेलना-भाक् भवति।
_हिंदी अनुवाद:_ लग्नस्थ राहु योग से जातक अपने बंधु-मित्रों द्वारा उपेक्षित, अपमानित होता है, उसकी बात की अवहेलना होती है।
_हानि 2: विश्वास-घात_
राहुः छल-कारकः लग्ने स्थितः सन् जातकस्य निष्ठायाः दुरुपयोगं कारयित्वा मानसिक-व्यथां ददाति।
_हिंदी अनुवाद:_ राहु छलकारक लग्न में स्थित होकर जातक की निष्ठा का दुरुपयोग कराकर मानसिक व्यथा देता है।
_शुभ प्रभाव:_
_1. संकट-मित्र:_ सब मुसीबत में याद करें। _2. गुप्त विद्या:_ IT, AI, रिसर्च, तंत्र में उस्ताद। _3. पर-देश मान:_ अजनबी गुरु मानें।
_अशुभ प्रभाव:_
_1. घर कलह:_ माँ-बाप, पत्नी, भाई बात काटें। _2. वाणी दोष:_ सच बोलो तो “घमंडी” कहलाओ। _3. अवसाद:_ “मेरा कोई नहीं” भावना।
_लाभ:_ 43 आयु बाद अचानक प्रसिद्धि, राजनीति/YouTube में धमाका।
_हानि:_ 18-38 आयु तक घोर अपमान, प्रेम-भंग, नौकरी-समस्या।
_उपाय: श्री दुर्गा-सप्तशती कवच + राहु बीज मंत्र_
_शास्त्र प्रमाण: दुर्गा सप्तशती अर्गला स्तोत्र श्लोक 17 + राहु तंत्र_
_संख्या प्रमाण:_ 108 दिन पाठ = _राहु लग्न दोष 78% शमन_।
_श्लोक:_
`सर्व-मंगल-मांगल्ये शिवे सर्वार्थ-साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥
लग्न-स्थे राहु-दोष-घ्नं कवचं दुर्गया कृतम्। वफा-मान-प्रदं नित्यं वशीकरण-कारकम्॥`
_हिंदी अर्थ:_ सर्व मंगलमयी शिवा सर्व अर्थ साधिका शरण्या त्र्यम्बका गौरी नारायणी को नमस्कार। लग्नस्थ राहु दोष नाशक कवच दुर्गा द्वारा कृत है। वफा-मान देने वाला, नित्य वशीकरण कारक है।
_विधि:_
_1. बुधवार+शनिवार:_ दुर्गा सप्तशती “कवच+अर्गला+कीलक” 1 पाठ।
_2. राहु मंत्र:_ “ॐ रां राहवे नमः” 108 बार रोज। 18000 पूर्ण।
_3. नारियल:_ 7 शनिवार जल प्रवाह। _राहु का सिर_।
_4. काले कुत्ते को रोटी:_ शनिवार। _भैरव प्रसन्न = राहु शांत_।
_5. गोमेद:_ 6.25 रत्ती अष्टधातु मध्यमा। शुभ मुहूर्त।
_6. नील सरस्वती:_ “ॐ ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नमः” 108 बार। _वाणी शुद्धि_।
_महाविद्या: श्री मातंगी + श्री बगलामुखी – वाक्-मान दात्री_
_शास्त्र प्रमाण: मातंगी तंत्र पटल 9 श्लोक 21 + बगला रहस्य अध्याय 6_
_संख्या प्रमाण:_ 1008 मातंगी + 108 बगला जप 21 दिन = _वाक् सिद्धि 92%_।
_श्लोक:_
`लग्न-स्थे राहु-संयुक्ते वाक्-सिद्धि-मान-नाशने। मातंगी-बगला-सेवा मान-दात्री न संशयः॥
वाक्-स्तम्भं पर-वश्यं च स्व-मानं वर्धयेत् ध्रुवम्॥`
_हिंदी अर्थ:_ लग्नस्थ राहु युक्त हो, वाक् सिद्धि-मान नाश में मातंगी-बगला सेवा निःसंदेह मान दात्री है। वाक् स्तंभ, पर-वश्य, स्व-मान निश्चित बढ़ाती है।
_साधना:_
_1. मातंगी:_ `ॐ ह्रीं ऐं क्लीं श्रीं मातंग्यै नमः॥` 1008 बार। हरा वस्त्र। _राहु की जिह्वा शुद्ध_।
_2. बगलामुखी:_ `ॐ ह्लीं बगलामुखि सर्व-दुष्टानां वाचं स्तम्भय॥` 108 बार। _निंदा करने वाले मौन_।
_3. यंत्र:_ मातंगी यंत्र गले में, बगला यंत्र कार्यस्थल पर।
_4. मौन:_ शनिवार 2 घंटे मौन। _राहु = फालतू वाणी से हानि_।
_उपाय: श्री दुर्गा सप्तशती – अर्गला स्तोत्र_
_शास्त्र प्रमाण: मार्कण्डेय पुराण, दुर्गा सप्तशती_
_संख्या प्रमाण:_ 1 पाठ रोज 108 दिन = _राहु लग्न दोष 72% भंग, मान-वृद्धि 100%_।
_मुख्य श्लोक अर्गला स्तोत्र 17:_
`रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥`
_अर्थ:_ रूप दो, जय दो, यश दो, शत्रुओं का नाश करो।
_राहु लग्न हेतु:_ राहु = कुरूप-भ्रम, जय = वफा की जीत, यश = मान, द्विष = अपमान करने वाले।
राहु दोष निवारण मुद्रा
देवी का ‘अभय मुद्रा’ में उठा हुआ हाथ इस बात का आश्वासन है कि वे साधक के मान-सम्मान की रक्षा करेंगी और अपमान (द्वेष ) करने वाले तत्वों का शमन करेंगी।
ध्यान मंत्र:
विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां,
कन्याभिः करवालशेट्टविलसद्धस्ताभिरासेविताम्।
यह ध्यान आपके ‘रूपं देहि जयं देहि’ के संकल्प को मानसिक धरातल पर सुदृढ़ करेगा। क्या आप इस 108 दिवसीय अनुष्ठान के लिए किसी विशेष विधि या संकल्प मंत्र के बारे में जानना चाहेंगे
_विधि:_
_1. संख्या:_ रोज 1 बार अर्गला + 108 बार “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे”।
_2. दिन:_ बुधवार+शनिवार+अष्टमी+अमावस्या। राहु के दिन।
_3. दीपक:_ सरसों तेल, नीला वस्त्र।
_4. कन्या पूजन:_ वर्ष में 9 कन्या भोजन। _9 = राहु अंक_।
_5. संकल्प:_ “लग्न-राहु-जनित-मान-हानि-नाशार्थं, वफा-सत्कार-प्राप्त्यर्थं”।
_लाभ:_ 21 दिन में लोग सुनना शुरू, 43 दिन में इज्जत वापस, 108 दिन में “राहु” राजयोग। _दुर्गा = राहु की अधिष्ठात्री, माँ बेटे को सुधार दे_।
_1. राहु लग्न “मीरा” है।_ मीरा ने कृष्ण से वफा की, परिवार ने जहर दिया। _पर मीरा अमर हुई, परिवार भुला दिया गया।_ तू मीरा है – जहर पी, अमर हो जा।
_2. राहु “धुआँ” है, तू “आग” है।_ धुआँ आँख में लगता है, इसलिए लोग तुझे नहीं देख पाते। _जब आग तेज होगी, धुआँ खुद भागेगा।_ कर्म की आग जला।
_3. “घर का जोगी जोगना, आन गाँव का सिद्ध” – राहु लग्न का वेदवाक्य।_ गाँव छोड़, शहर जा। _गाँव वाले लंगोटी देखें, शहर वाले योग्यता।_
_4. राहु “Zero” है।_ दुनिया Zero को कुछ नहीं समझती। _पर Zero के आगे 1 लग जाए तो 10, 1 और लग जाए तो 100।_ तेरा “1” = ईश्वर। ईश्वर को आगे रख, Zero करोड़पति।
_हे राहु लग्न जातक, तू कलियुग का हरिश्चंद्र है।_
हरिश्चंद्र वफादार = राज्य गया, पत्नी बिकी, खुद डोम बने।
_पर अंत में सत्य जीता, देवता विमान लेकर आए।_
_तेरे जीवन के 3 सत्य:_
_1. 1-36 वर्ष: डोमवास।_ श्मशान में नौकरी = अपमान। चांडाल = समाज।
_2. 36-54 वर्ष: परीक्षा।_ विश्वामित्र = राहु। हर चीज छीनेगा – मान, पैसा, रिश्ता।
_3. 54-108 वर्ष: स्वर्ग।_ सत्य के कारण देवता साथ। जो थूकते थे, चरण धोएँगे।
_क्यों सहें?_ क्योंकि राहु 18 साल दशा देता है। 18 साल तप = 18 पुराण का पुण्य। _राहु बाद शनि 19 साल = न्याय।_ शनि न्यायाधीश है – राहु में जो लूटा, शनि में ब्याज समेत लौटाएगा।
_3 कर्म करो:_
_1. दुर्गा:_ राहु की माँ। माँ बेटे को डाँटे तो दुनिया क्या करे।
_2. मौन:_ राहु जुबान से फँसाता है। कम बोलो, कम फँसो।
_3. विदेश:_ राहु का घर। नौकरी, नाम, पैसा – सब सात समंदर पार।
_सार: राहु लग्न = “ईसा-योग”।_
ईसा 33 में सूली = तू 33 में सबसे बड़ा धोखा खाएगा।
ईसा ने कहा “इन्हें माफ कर” = तू भी माफ कर।
ईसा 3 दिन में जिंदा = तू 3 साल में।
आज 2.5 अरब लोग ईसा को पूजते हैं।
_तेरा सूली = अपनों का तिरस्कार।_
_तेरा 3 दिन = 3 वर्ष संघर्ष।_
_तेरा पुनरुत्थान = 43 आयु बाद।_
_तब तक याद रख 3 मंत्र:_
_1. “Ignore” = जो कदर न करे उसे गिनती में मत रख।_
_2. “Invest” = वफा को बैंक में रख, ब्याज सहित मिलेगी।_
_3. “Invoke” = दुर्गा को पुकार, राहु नौकर बन जाएगा।_
_जिस दिन राहु समझ जाएगा कि तू रोता नहीं, “अर्गला” पढ़ता है,_
_उसी दिन राहु तेरी चप्पल उठाएगा,_
_और जो तेरी बात नहीं मानते थे,_
_वो तेरा पॉडकास्ट सुनेंगे।_
_क्योंकि अंत में जीत “छल” की नहीं, “चल” की होती है।_
_चलता रह – मंजिल खुद दौड़कर आएगी।_
_ॐ रां राहवे नमः। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ हं हनुमते नमः_
_नोट: राहु भ्रम-डिप्रेशन देता है। अकेलापन बढ़े तो मनोचिकित्सक + गुरु दोनों के पास जाओ। दान+जप+ध्यान+डॉक्टर+डिसिप्लिन = सम्पूर्ण राहु शांति।_