
महाभारत के युद्ध का समय था। कुरुक्षेत्र की भूमि पर दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं। अर्जुन अपने ही गुरुओं, बंधुओं और प्रियजनों को सामने देखकर विचलित हो गए। उनके हाथ काँपने लगे, धनुष नीचे गिर गया, और उन्होंने युद्ध करने से मना कर दिया।
तब भगवान कृष्ण जी ने अर्जुन को जीवन का गूढ़ ज्ञान देना शुरू किया—यही ज्ञान आगे चलकर भगवद्गीता के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
अर्जुन ने कहा, “हे प्रभु, मैं आपके वचनों को सुन तो रहा हूँ, परंतु यदि आप मुझे अपना दिव्य स्वरूप दिखाएँ, तो मेरा संदेह पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगा।”
तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान की। उसी क्षण अर्जुन ने जो देखा, वह साधारण नहीं था—उन्होंने भगवान का विराट स्वरूप देखा, जिसमें अनगिनत मुख, नेत्र, और भुजाएँ थीं। पूरा ब्रह्मांड उसी स्वरूप में समाहित था—देवता, ऋषि, ग्रह-नक्षत्र, समय और काल, सब कुछ।
अर्जुन ने देखा कि सभी योद्धा उस विराट रूप में प्रवेश कर रहे हैं, जैसे पतंगे अग्नि में समा जाते हैं। तब उन्हें यह समझ आया कि यह युद्ध केवल उनका व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि ईश्वर की योजना का एक भाग है।
कंपित स्वर में अर्जुन बोले, “हे प्रभु, आप ही सृष्टि के आदि और अंत हैं। मैं आपके इस अद्भुत और भयानक रूप को देखकर भयभीत भी हूँ और धन्य भी।”
तब श्रीकृष्ण ने कहा—
“हे अर्जुन, मैं काल हूँ, जो संसार का विनाश करने आया हूँ। तू केवल निमित्त मात्र बन जा।”
यह सुनकर अर्जुन का मोह नष्ट हो गया। उन्होंने अपने कर्तव्य को समझा, और दृढ़ निश्चय के साथ युद्ध के लिए तैयार हो गए।
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जीवन में कई बार हम मोह और भ्रम में पड़ जाते हैं। लेकिन जब हम अपने कर्तव्य को समझकर, ईश्वर पर विश्वास रखते हुए आगे बढ़ते हैं, तभी सच्चा धर्म निभा पाते हैं।