
पृथ्वी अपने आपमें अद्भुत है। इसका न्यास, विन्यास और इतिहास ही नहीं, आवास और विकास भी अद्भुत ही है।
आइये हिरण्याक्ष जैसे exploiters से माता धरती की रक्षा करें ।
पृथ्वी दिवस
वाराह नारायण की जय।
भारतीय परंपरा में पृथ्वी…
पृथ्वी दिवस हमें यह याद दिलाने का अवसर है कि हम इस पृथ्वी के प्रति अपना पुत्रभाव पूरी तरह दिखाएं और इसकी धारण शक्ति, सौन्दर्य की गंभीरता को बनाए रखें। पृथ्वी को हमारी माता कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण के बाद, पौराणिक मिथक रूप में वराहावतार का अाख्यान जाहिर करता है कि जलमग्न पृथ्वी का ब्रह्मा ने अवतार लेकर उद्धार, उत्थान किया और मनुष्यों को सौंपा कि वे इसकी गरिमा, स्थिति, पवित्रता को बनाए रखे। सभी दोहन मित् मित् हो अर्थात संयम को समझा जाए और पृथ्वी के सौंदर्य को बनाए रखा जाए।
वेद में पृथ्वीसूक्त में जो अवधारणा आई है, वह बड़ी ही प्रासंगिक हैं, उसमें पृथ्वी के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्धारण हुआ है। यह भी कहा गया है कि यह भूमि सर्वेश्वर द्वारा हमें श्रेष्ठ, आर्योचित उद्देश्यों के लिए दी गई है– अहं भूमिमददामार्यायाहं। (ऋग्वेद 4, 26, 2)
इस पर रहने वालों के लिए सर्वेश्वर ने सूर्य, चंद्रमा, गगन, जलादि सब समान बनाए हैं, इन संसाधनों का संतुलित उपयोग, उपभोग ही करना चाहिए अन्यथा यह रत्नगर्भा अपना स्वरूप खो बैठेगी और वह घातक होता है। पृथ्वी से बडी कोई हितकारी नहीं। महाभारत, विष्णुपुराण, वायुपुराण, समरांगण सूत्रधार आदि में पृथुराजा के द्वारा पृथ्वी के दोहन का जो आख्यान है, वह जाहिर करता है कि धरती ने बहुत दयालु होकर मानव को अपने संतान के रूप में सब कुछ देने का निश्चय किया… मगर मानव की लालसाएं धरती के लिए हमेशा घातक सिद्ध हुई, वह लालची ही होता गया। ब्रह्मवैवर्त के प्रकृतिखंड में भी ऐसी धारणा आई है। सुबह उठते ही पृथ्वी को प्रणाम करने की परंपरा हमारी संस्कृति में शामिल रही है। मनुस्मृति, देवीभागवत, पद्मपुराण आदि में ऐसे कई विचार हैं जो पृथ्वी के प्रति हमारे व्यवहार को निर्धारित करते हैं। पृथ्वी के प्रति नमस्कार का मंत्र भी हमसे कुछ कर्तव्य मांगता है।
विष्णुपुराण में पृथ्वी गीता आई है जिसमें पृथ्वी ने स्वयं अपनेे विचार रखें हैं कि हर कोई ये समझता है कि ये भूमि मेरी है और मेरे बाद मेरी औलाद की रहेगी। न जाने कितने राजा आए, चले गए, न राम रहे न रावण… सब समझते हैं कि वे ही राजा हैं, मगर अपने पास खडी मौत को नहीं देखते… मनोजय के मुकाबले मुक्ति है ही क्या। (विष्णुपुराण 4, 24) शिल्पग्रंथों में वराह मूर्तियों के साथ पृथ्वी को भी बनाने का निर्देश मिलता है जिसमें उसका रत्नगर्भा रूप प्रमुख है। पृथक से भूदेवी की मूर्ति के लक्षण भी मयमतम् आदि में मिलते हैं, उनके मूल में भाव ये है कि हम पृथ्वी को देवी की तरह स्वीकारें और उसके सौंदर्यमय स्वरूप को ऐसा बनाए रखें कि आने वाली पीढि़यां भी ये कहे कि हमारे बुजुर्गों ने हमें बेहतरीन धरती सौंपी हैं…।
यही पृथ्वी दिवस का संकल्प होना चाहिए।
✍🏻 Aage padhen
आज पृथ्वी दिवस है। अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त के पारायण का दिन।
शिला भूमिरश्मा॑ पांसु: सा भूमि: संधृ॑ता धृता। तस्यै हिर॑ण्यवक्षसे पृथिव्या अ॑करं नम॑:॥
जो पृथ्वी शिला, भूमि, पाषाण तथा धूलिकणों को धारण करती है उस हिरण्यवक्षा पृथ्वी को मैं प्रणाम करता हूँ।
(अथर्ववेद, काण्ड १२, अध्याय १, पृथ्वी सूक्त मंत्र/ऋचा २६)
किन्तु माया तो कुछ और सोच कर बैठी है।
अनन्त काल के क्रोड़ में खेलते ग्रहों, नक्षत्रों, ताराओं, नीहारिकाओं, धूमकेतुओं के साथ खेलती, नाचती, झूमती और सूर्य से नेह-सूत्र में बँधी घूमती, भूत और भविष्य के सभी जीवों की पालनकर्त्री हमारी पृथ्वी, हमारी धरती माता, काल के कारण-रूप पिता सूर्य के साथ काल की क्रीड़ाओं में नित्य सहभागी है। अव्यक्त महाकाल की अधिष्ठात्री महाकाली का एक प्रतिरूप हमारी यह पृथ्वी भी है जो उस अव्यक्त महाकाल को अपनी भंगिमाओं द्वारा व्यक्त करती है।
तांत्रिकों की भाषा रहस्यवादियों एवं तत्त्वदर्शियों की भाषा से भिन्न होती है, योगियों की भाषा इन तीनों से भिन्न होती है, गणितज्ञों एवं वैज्ञानिकों की भाषा इन पूर्व चारो से भिन्न होती है किन्तु साहित्य की भाषा तो इन सभी से भिन्न होते हुए भी इन सबका समन्वय होती है।
साधना के क्षेत्र में बीजमंत्रों का अपना विशिष्ट महत्व है और बीजमंत्रों में प्रमुख आदि बीज हैं – ऐं, ह्रीं, श्रीं और क्लीं। ऐं अग्नितत्व वाला बीज है। यह वाक् या वाणी का प्रतिनिधि बीज है। इस बीज से सरस्वती की, वाणी की सिद्धि होती है। यह महासरस्वती के प्रीत्यर्थ प्रयुक्त होता है। अग्नि से, तेज से वाक् की और वाक् से ज्ञान की उपलब्धि होती है।
ह्रीं और श्रीं दोनों बीज व्योमतत्व वाले हैं। ह्रीं भुवनेश्वरी के और श्रीं महालक्ष्मी के प्रीत्यर्थ प्रयुक्त होता है। ह्रीं मायाबीज है और श्रीं ऐश्वर्य बीज!
किन्तु क्लीं पृथ्वीतत्व का बीजमंत्र है। शक्ति-उपासना में यही बीज काली – तत्व का भी प्रतिनिधि है और यही काम – तत्व का भी।
रहस्यदर्शियों ने क्लीं बीज को पृथ्वी तत्व और काली तत्व से अनायास ही नहीं जोड़ा है। हमारी पृथ्वी एक प्रकार से काली-तत्व की भी प्रतिनिधि है (और एक अन्य प्रकार से काम तत्व की भी)। काली है काल की अधिष्ठात्री, पृथ्वी है काल के कलन का माध्यम। क्लीं बीज ‘क’कार, ‘ल’कार और बिन्दु रूप ‘म’कार के संयोग का फलन है।
क्लीं का ‘क’ वर्ण है काम, जल, प्राण और मुख का द्योतक। जल से प्राण है, जिसका स्थूल रूप वायु है क्योंकि वायु नहीं तो जल नहीं, जल नहीं तो वायु नहीं, और वायु या जल न हों तो प्राण ही नहीं।
क्लीं का ‘ल’ वर्ण साक्षात पृथ्वी का ही द्योतक है। पृथ्वी देती है अन्न और अन्न से ही बनता है मन।
और क्लीं में बिन्दु रूप ‘म’कार इन दोनों जल तत्व और धरा तत्व का वेधन करके दोनों को संयुक्त करता है और तब मन तथा प्राण का विकास होता है। अतः हमारी यह धरा, यह धरित्री, यह धात्री भी क्लीं द्वारा व्यक्त होने वाली है, काली है, महाकाली है।
और प्रणव है महाकाल का बीजमंत्र! चतुर्मात्रात्मक ॐ कार महाकाल का प्रतिनिधि है, ब्रह्म का स्वरूप है। यही सवितृ बीज भी है। गायत्री मंत्र वास्तव में सवितृ बीज ॐ का ही विस्तार है। अतः सविता या सूर्य ही प्रकारांतर से महाकाल की भूमिका का निर्वाह करता है। त्रिलोचन महाकाल के तीन नेत्र सूर्य, चन्द्र एवं अग्नि ही कल्पित किये गये हैं।
बहुधा यह उपदेश दिया-लिया जाता है कि अहं निकृष्ट है, त्याज्य है किन्तु शब्द अहं प्रत्यक्ष शिवतत्त्व है जो विश्वाकार हो कर विश्व का कर्ता, भर्ता और हर्ता होता है। उस अकृत्रिम अहं भाव की स्फुरणा में किसी अन्य भाव या भिन्न वस्तु का बोध सम्भव नहीं, सिवा इदं भाव के। अहं अर्थात् मैं, और इदं अर्थात् यह, दोनों ही युगपद हैं। अहं वह निकृष्ट है जिसमें इदं न हो, और अकृत्रिम अहं, इदं से विच्छिन्न होता ही नहीं। अहं से तात्पर्य अ हं से भी है। जो बिना हं का हो वही अहं है। किन्तु बिना हं के तो विशुद्ध शिव तत्व भी शव बन जाता है, निष्क्रिय, निश्चेष्ट! इस शव को क्रियमाण करती है शक्ति और विशुद्ध शक्ति तत्व है सः! और हं तथा सः के योगनद्ध होने से बनता है हंसः! यह एक पूर्ण बीज है जिसे प्रेत बीज कहते हैं। प्रेत – प्र इत – प्रकर्ष रूप से घटित हुआ! यह शिव-शक्ति की महा-सुषुप्ति का द्योतक है। सुषुप्ति का विलोम है जागरण अतः हंसः का विलोम है सोऽहं!
सोऽहं! सो अहं! और सोऽहं अर्थात् वही हूँ मैं! दैट्स एम आई! इस सोऽहं से यदि स और ह को अलग कर दें तो बचता है ॐ! है न अहं रोचक? श्लाघ्य? वरणीय? कैसे छोड़ दूँ भाई? इस माया-महोदधि में यदि इस अहं का साथ छूटा तो मेरा मैं मुझे फिर खोजे नहीं मिलेगा। यह अहं है, तो सोऽहं की सम्भावना है। अहं के जाते ही सोऽहं की सम्भावना चली जायेगी। और संभावनाओं को सहेजना पड़ता है, संजोना पड़ता है, जोगाना पड़ता है, उन्हें त्यागा नहीं जाता। मैं सोऽहं हो सकने की सम्भावना को नहीं त्याग सकता अतः मैं अपने अहं को नहीं त्याग सकता।
अरे! आज तो बैशाखी अमावस्या भी है (लेखक वर्ष 2020 की बात कर रहे हैं, यह लेख उसी दिन लिखा गया था)। चन्द्रमा, पृथ्वी और सूर्य के स्थिति-विशेष का नाम है अमावस्या। चन्द्रमा मनसो जातः। पृथ्वी से अन्न, अन्न से मन और मन से चन्द्रमा। जिस शिव पर महाकाल का आरोप किया गया है उस शिव-महाकाल के भाल पर बालरूप मयंक की कल्पना भी कोई ऐसे ही नहीं है। काल के भाल पर तिथियों का चन्दन यह चन्द्र ही तो चर्चित करता है!
साधारण वार्ता में साहित्य की और साहित्य में रहस्यवाद की या विज्ञान की या तत्वदर्शन की भाषा? कर रहा हूँ न दुस्साहस?
क्या करूँ? यह क्लीं बीज है ही दुस्साहसी बनाने वाला। काली के चरणों में एक बार सर्वात्मना शिशु भाव से शीश नवा देने वाला, धरित्री की धूलि में एक बार शिशु रूप में छैला कर लोट जाने वाला सबसे बड़ा दुस्साहसी होता है क्योंकि तब उसके भीतर न कुछ पा लेने की आकाङ्क्षा ही रह जाती है, न कुछ खो देने का भय ही रह जाता है।
मघा के सौजन्य से मेरे ऐसे ही एक दुस्साहस का साक्ष्य, काल-तत्व सूर्य और काली-तत्व पृथ्वी के स्नेह-बन्धन के कुछेक आयामों के स्पर्श की लोलुपता भरे दुस्साहस का साक्ष्य है यह लेख, कलन और ललन का घमन्जा, इस भावना के साथ कि – इदं लोकाय, इदन्न मम। और आप सभी से इस प्रार्थना के साथ कि – क्षमहु नाथ सब अवगुन मोरे!
लेख के उत्प्रेरक थे मेरे परम सुहृद मित्र श्री सनातन कालयात्री जी और मित्र शब्द सूर्य का ही पर्याय है। द्वादश आदित्यों में कनिष्ठ, सूर्य या विवस्वान का ही एक नाम है मित्र! वही सूर्य विष्णु भी हैं, पृथ्वी के पति, पृथ्वी के आकर्षण का केंद्र! यही कारण है कि पृथ्वी का भार हरण करने श्री विष्णु को बारम्बार पृथ्वी पर आना होगा! आना ही होगा!
लेख को विविध चित्रों से सज्जित करने का श्रेय मघा के सम्पादक मण्डल को जाता है जिस हेतु मैं हृदय से आभारी हूँ।
[22 अप्रैल 2020 को मघा में प्रकाशित आलेख, और तद् दिन लिखित यह भूमिका, जिस दिन संयोगात् बैशाखी अमावस्या भी थी।
अनन्त की यात्रा को प्रस्थान कर चुके उस सनातन कालयात्री की सनातन यात्रा कहीं न कहीं चल ही रही होगी। किन्तु मेरी यात्रा अब थम चुकी है।
मेरे पास तो शेष हैं मात्र उस यात्री के साथ कुछ दिनों तक की गयी यात्राओं की सुधियाँ एवं उनके आग्रह पर मेरे द्वारा ललित शैली में लिखे कतिपय निबन्ध और उनकी भूमिका में लिखी कुछ पंक्तियाँ।
सुभ सीतल मंद सुगंध समीर
कछू छल छंद सो छ् वै गये हैं।
पदमाकर चांदनी चंदहु के
कछु औरहिं द्वारन च्वै गये हैं।
मनमोहन सौं बिछुरे इतही
बनि के न अबै दिन द्वै गये हैं।
सखि वे, हम वे, तुम वेई बने,
पै कछू के कछू मन ह्वै गये हैं।।]
यथा योग्यं, तथा कुरु!
🙏🙏
✍🏻Agey aur padhe
2
विश्व पुस्तक दिवस 23 अप्रैल
सृष्टि की प्रथम पुस्तक,,,
हालांकि वेद का अर्थ ज्ञान होता है,,इसके अलावा लाभ,, अस्तित्व,, विचार भी वेद को ही कहते हैं,,
वेद को पुस्तक कहना भी उचित नहीं क्योंकि पुस्तक एक नपा तुला शब्द है और सीमित आकार प्रकार में बंधी एक वस्तु,,
फिर भी प्रचलित भाषा के आधार पर वेद यानी वह पुस्तकें जिसमें वैदिक संहिताओं को लिखकर सुरक्षित किया गया है ,,
सृष्टि के आरम्भ में #सर्वप्रथम कोई शब्द मनुष्य के मुँह से बोला गया तो वह था–#अग्नि,,
सर्वप्रथम कोई वाक्य या पंक्ति बोली गई वह थी वेद की ऋचा–#अग्निमिळे पुरोहितं यज्ञस्य देवं ऋत्विज्ञम
सर्वप्रथम कोई ग्रन्थ लिखा गया वह था–#ऋग्वेद,,
ॐ श्री परमात्मने नमः।
Agey aur padhe
पोथी, पुुंथी, चौपड़ी, पुस्तक, ग्रन्थ
उन सभी को नमन और प्रणाम जिन्होंने पुस्तक के महत्व को बरकरार रखा है, जिनके घरों को दीवारें नहीं, पुस्तकें शोभायमान करती है और जिनके हाथों को पुस्तक रत्न की तरह आभरणमय करती हैं।
बधाई कि पुस्तकों के प्रति आदर अब भी हमारे मन में कहीं न कहीं बना हुआ है। पुस्तक कहीं पोथी, कहीं पुंथी, कहीं चौपड़ी तो कहीं ग्रन्थम् नाम से जानी जाती है। नई पीढ़ी बुक कहती है और ई से किंडल तक के रूप आ गए हैं …। सब शब्दों की अपनी अपनी परिभाषाएं हैं। असुर बेनीपाल ने तो पूरा पुस्तकालय ही बनवाकर दुनिया को एक परम्परा दे दी थी।
क्या ये मालूम है कि पुस्त विश्वव्यापी शब्द है, इस शब्द के विदेशी होने की भी मान्यता भी है लेकिन चरक ने सूत्र स्थान में कहा है :
वैद्य भाण्डौषधै: पुस्तै: पल्लवैरवलोकनै:।
लभन्ते ये भिषक्शब्दमज्ञास्ते प्रतिरूपका:।। (11, 51)
अन्यत्र संस्कृत में “वीणा च पुस्तकं” कह कर इसे सरस्वती का करचिह्न भी बताया है। हमारे यहां पुस्तक शब्द बहुत काल से व्यवहार में आ रहा है। पुस्तक लेखन, पुस्तक दान के महत्व कई पुराणों में आया है। अग्निपुराण और उससे पूर्व शिवधर्मोत्तर पुराण में तो पुस्तक की यात्राएं तक आयोजित करने का वर्णन मिलता है। उसका पूरा विधान भी लिखा गया है कि नन्दी नागरी अक्षरों में लिखी गई पुस्तक को सिंहासन पर विराजित कर नगर में उसकी भव्य परिक्रमा करवाई जाए..।
नारदपुराण में विविध पुस्तकों को लिखवार दान करने के कई पुण्य फलों को लिखा गया है। वैसे यह प्रसंग लगभग प्रत्येक पुराण के अन्त में मिल ही जाता है।… तो यह भी कहा गया है पुस्तक शब्द अरब के रास्ते आया। पुस्त माने हाथ। हाथ में रखने के कारण यह पुस्तक है। चरक ने भी वैसा प्रयोग किया। इस स्वरूप ने मूर्तिकारों को बहुत प्रभावित किया और पुस्तक जो रेयल पर रखकर पढी जाती थी, वह हाथों की शोभा होकर ब्रह्मा, सरस्वती आदि की मूर्तियों के करकमल में आयुध-स्वरूप स्थान पा गई। यह शब्द पांचवीं सदी तक तो व्यवहार में आ ही चुका था क्योंकि बाद में हर्ष के दरबारी बाण ने इसे प्रयुक्त किया है।
हमारे यहां तो ग्रंथ कहा जाता था। ग्रंथ से आशय जिसको ग्रंथित या गांठ लगाकर रखा जाए। पुरानी जितनी पोथियां हैं, उन सबमें कागज अलग-अलग होते थे और उनको क्रम लगाते हुए क्रमश: रखा जाता। उनके ऊपर और नीचे लकड़ी के पट्टियों को कागज के ही आकार में जमाया जाता था। उसको लाल, पीले कपड़े या खलीते में बांधकर डोरी की गांठ लगा दी जाती थी। गांठ के कारण ही ये पोथियां ग्रंथ कही जाती… दुनियाभर के प्राचीन पुस्तकालयों में पांडुलिपियां इसी सूरत में मिलती हैं। ग्रंथ शब्द आज भी व्यवहार में है और बहुत सम्मान का स्थान रखता है। हर किताब को ग्रंथ नहीं कहा जाता क्यों…।
पट्टी या तख्ती
लिखने के लिए कभी तख्ती काम में आती थी। इसे पाटी कहा जाता। पट्टी भी इसी का नाम है। पट्टी पढ़ाना, पट्टी लिखना, पट्टी पहाड़े.. कई मुहावरों से इसके मायने समझे जा सकते हैं। मगर, आज यह चलन के बाहर हो गई है। स्कूलों से पट्टी का प्रयोग बाहर होता जा रहा है।
कई प्रकार की पट्टियां बनती थी। काष्ठ फलक की बनी पट्टी, मिट्टी की पट्टी, श्लिष्ट पाषाण की पट्टी और गत्ते पर कालिख चढ़ाकर तैयार की गई पट्टी। हर्ष के दरबार में लिखने के लिए पट्टिकाओं के निर्माण का संदर्भ बाणभट्ट भी देता है। बहुत पहले कागज को बचाने के लिए ग्रंथकार पट्टियों पर ही श्लोक की रचना करते थे ताकि गलती होने पर तत्काल सुधार हो जाए। बाद में अच्छी लिखावट वाला उसको बहुत मनोयोग से कागज या भुर्जपत्र पर लिखता। इसलिए कई ग्रंथों की मूल प्रति या पहली पांडुलिपि नहीं मिलती है।
काष्ठफलक की पट्टियां तो अब देखने को भी नहीं मिलती जो एक हाथ लंबी, आधे हाथ चौड़ी और लगभग 5 यव मोटी होती थी। विद्यार्थियों के लिए पट्टीदान का महत्व भी मिलता है। पूर्व में पट्टिकाओं पर रमणियों को अपने मन के उद्गार लिखते हुए मंदिरों पर दिखाया जाता था। आज केवल उनकी स्मृतियां ही रह गई हैं। संत ज्ञानेश्वर फिल्म के एक गीत : पट्टी लिखना, पोथी भी पढ़ना, सारे जग में चम चम चमकना… में वह पट्टी दिखाई देती है।
सोचिये, वह भी क्या दौर था जब पट्टी पर गणित के सवाल होते। तब गणित को भी पाटीगणित के नाम से ही जाना जाता था। श्रीपति, श्रीधर, आर्यभट, भास्कराचार्य आदि ने इस शब्द का प्रयोग किया है, हालांकि टीकाकारों ने क्रमपद्धति के रूप में इस शब्द का अर्थ लिया है मगर, यह पाटी पर होने के अर्थ में अधिक व्यावहारिक थी… आज कहां गया वह दौर…।
एक पुस्तक यह भी –
भारत की प्रसिद्ध कहानियों की किताब है पंचतंत्र. किसी जमाने में ये संस्कृत में लिखी गई थी. अगर धार्मिक किताबों को छोड़ दिया जाये तो ये सबसे ज्यादा बार अनुवाद की गई किताब होती है. बगदाद में अल मंसूर यानि दूसरे अब्बासिद खलीफ़ा ने इसका अनुवाद करवाया तो कहा गया था कि लोकप्रियता में इस से ऊपर सिर्फ कुरआन है.
ग्यारहवीं शताब्दी तक ये किताब यूरोप पहुँच चुकी थी. सोलहवीं शताब्दी में ये ग्रीक, लैटिन, स्पेनिश, इटालियन, जर्मन, पुरानी इंग्लिश, चेक जैसी अनगिनत भाषाओँ में पाई जाने लगी थी.
फ्रांस में देखेंगे तो कम से कम ग्यारह पंचतंत्र की कहानियां तो Jean de La Fontaine की रचनाओं में है. किताब के शुरू में ही बताया जाता है कि इसके रचियेता पंडित विष्णु शर्मा है. कोई और अलग किताब उसी काल के इस नाम के विद्वान् का जिक्र नहीं करती इसलिए उन्हें ही किताब का लेखक माना गया.
कहानी के हिसाब से वो महिलारोप्य नाम की राजधानी से राज्य करने वाले किसी सुदर्शन नाम के राजा के बेटों को पढ़ाते हैं. ये महिलारोप्य नाम की राजधानी भी अब नहीं मिलती.
राजा सुदर्शन के तीन बेटे थे, बाहुशक्ति, उग्रशक्ति, और अनंतशक्ति. राजा तो अच्छे थे लेकिन तीनों राजकुमार बड़े ही उज्जड किस्म के थे. परेशान राजा ने एक दिन दरबारियों से पूछा, किस तरह बच्चों को सही रास्ते पर लाया जाए? ऐसे तो ये नाश कर देंगे.
इस मुद्दे पर सब अपनी अपनी राय रखने लगे. आखिर सुमति नाम के एक विद्वान् ने कहा कि अलग अलग विषय पढ़ाने में बरसों लगेंगे. उनमें राजकुमारों की रूचि होगी या नहीं इसका भी पता नहीं. अगर कोई इन ग्रंथों का सार राजकुमारों को बता सके, वो भी गैर परंपरागत तरीकों से तो कोई बात बने.
राजा सुदर्शन को सलाह अच्छी लगी तो उन्होंने सौ ग्राम (गाँव) देने की कीमत पर पंडित विष्णु शर्मा को बुलाने का प्रयास किया. पंडित विष्णु शर्मा ने शिक्षा के बदले धन लेने से तो मना कर दिया लेकिन राजकुमारों को पढ़ाने के लिए तैयार हो गए. जो कहानियां उन्होंने राजकुमारों को सिखाई वही आज पंचतंत्र के नाम से जानी जाती हैं.
एक कहानी में ही गुंथी हुई दूसरी कथा के रूप में आज भी पंचतंत्र हमारे पास है. पंचतंत्र का नाम पंचतंत्र इसलिए है क्योंकि इसे पाँच तंत्रों (भागों) में बाँटा गया है:
मित्रभेद (मित्रों में मनमुटाव एवं अलगाव)
मित्रलाभ या मित्रसंप्राप्ति (मित्र प्राप्ति एवं उसके लाभ)
काकोलुकीयम् (कौवे एवं उल्लुओं की कथा)
लब्धप्रणाश (हाथ लगी चीज (लब्ध) का हाथ से निकल जाना (हानि))
अपरीक्षित कारक (जिसको परखा नहीं गया हो उसे करने से पहले सावधान रहें; जल्दबाजी में कदम न उठायें)
पंचतन्त्र के कई संस्करण उपलब्ध है. कई शुरूआती अनुवाद जो कि सीरियन और अरबी अनुवादों से लिए गए हैं. क्षेमेन्द्र की लिखी “बृहत्कथा मंजरी” और सोमदेव लिखित ‘कथासरित्सागर’ उसी के अनुवाद हैं. तन्त्राख्यायिका एवं उससे सम्बद्ध जैन कथाओं का संग्रह है. ‘तन्त्राख्यायिका’ को सर्वाधिक प्राचीन माना जाता है. इसका मूल स्थान कश्मीर है.
इस किताब की वजह से भी पंडित विष्णु शर्मा और महिलारोप्य को कश्मीर का माना जाता है. नेपाल के इलाकों के पंचतंत्र और हितोपदेश का एक रूप भी उपलब्ध होता है.
बिना मौजूद हुए भी पंडित विष्णु शर्मा के लिखे की वजह से हमने काफी सीखा. शायद इसलिए भी सिर्फ श्रुति की परम्पराओं में नहीं, काम की चीज़ों को लिखकर रखना चाहिए. हमने पंचतंत्र की कई कहानियां उठा उठा कर ताज़ा राजनैतिक मामलों पर चिपकाई हैं.
पंचतंत्र के नाम में “तंत्र” होने का एक कारण भी ये है कि ये राजनैतिक समझदारी सिखाती थी.