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अकेलेपन का OTP

पुणे के एक व्यस्त बैंक में सुबह भयंकर भीड़ थी। महीने का पहला हफ्ता होने के कारण हर काउंटर पर लोगों की लंबी-लंबी कतारें लगी हुई थीं। उसी एक कतार में ‘रघुनाथराव’ नाम के लगभग 75 साल के एक बुजुर्ग खड़े थे। उनके हाथों की उंगलियां बुढ़ापे के कारण कांप रही थीं और हाथ में एक पुराना, जिसकी स्क्रीन टूटी हुई थी, ऐसा स्मार्टफोन था।

उनका नंबर आया। काउंटर पर बैठे क्लर्क ने चिढ़े हुए स्वर में पूछा,
“क्या काम है बाबा? जल्दी बताइए।”

रघुनाथराव बहुत विनम्रता से बोले,
“साहब, इस बैंक खाते को एक मोबाइल नंबर से लिंक करना था। वह नंबर बंद न हो जाए, इसलिए उसका ऑटो-डेबिट शुरू करवाना है।”

क्लर्क ने कंप्यूटर पर कुछ टाइप किया और बोला,
“आपके मोबाइल पर 6 अंकों का OTP आया होगा, वह बताइए।”

रघुनाथराव ने जेब से चश्मा निकाला। वे कांपते हाथों से स्क्रीन पर मैसेज खोलने की कोशिश करने लगे। लेकिन उन्हें टचस्क्रीन ठीक से चलाना नहीं आता था। गलती से कुछ और ही खुल जाता।

दो मिनट बीत गए। उनके पीछे लाइन में खड़ा ‘रोहन’ नाम का लगभग 25 साल का एक कॉर्पोरेट युवक बहुत परेशान हो गया।

वह गुस्से में बोला,
“अरे काका, क्या कर रहे हैं आप? एक साधारण OTP भी नहीं देख पा रहे? डिजिटल इंडिया आ गया है, लेकिन आप जैसे बुजुर्ग लोग बैंक में आकर बस समय खराब करते हैं। घर पर बैठना चाहिए ना! हमें ऑफिस के लिए देर हो रही है!”

बैंक के बाकी लोग भी रघुनाथराव की तरफ देखकर हंसने लगे और आपस में बातें करने लगे। रघुनाथराव का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उन्होंने अपराधबोध से सिर झुका लिया।

रोहन गुस्से में आगे आया,
“दीजिए फोन, मैं देखता हूं OTP,”
और उसने बदतमीजी से उनके हाथ से फोन छीन लिया।

रोहन ने स्क्रीन लॉक खोला और मैसेज ऐप में गया। बैंक का OTP सबसे ऊपर था। उसने वह 6 अंकों का OTP क्लर्क को बता दिया।

क्लर्क ने पूछा,
“कौन सा नंबर चालू रखना है साहब?”

रघुनाथराव की आवाज अचानक भारी और कांपती हुई हो गई। वे धीरे से बोले,
“मेरी… मेरी पत्नी का नंबर है… श्रीमती सुमती जोशी।”

रोहन ने यूं ही फोन के ‘सेंट मैसेजेस’ देखे… और अगले ही पल उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसका शरीर सुन्न हो गया, गला सूख गया और आंखें डर से फैल गईं।

उसने देखा कि ‘सुमती’ नाम के उस नंबर पर रघुनाथराव पिछले दो साल से हर दिन सैकड़ों मैसेज भेज रहे थे—

“सुमे… आज टिफिन में तुम्हारी याद आई। सब्जी जल गई थी।”
“सुमे… आज घुटनों में बहुत दर्द है, तुम होती तो तेल लगा देती।”
“सुमे… बेटा कल भी मिलने नहीं आया। बहुत अकेला महसूस करता हूं… तुम मुझे कब अपने पास बुलाओगी?”

रोहन सन्न रह गया। उसी समय रघुनाथराव आंखें पोंछते हुए क्लर्क से बोले—

“साहब, मेरी सुमती दो साल पहले ही गुजर गई। मेरा इकलौता बेटा अमेरिका में रहता है, वो दो साल में एक बार भी मुझसे मिलने नहीं आया। सुमती के जाने के बाद मैं इस बड़े घर में बिल्कुल अकेला हो गया हूं।

हर रात जब अकेलापन सहन नहीं होता, तो मैं उसके इस बंद नंबर पर मैसेज करता हूं… मुझे लगता है वह पढ़ रही होगी।

कल टेलीकॉम कंपनी का मैसेज आया कि अगर इस नंबर पर रिचार्ज नहीं किया गया, तो इसे बंद करके किसी और को दे दिया जाएगा।

साहब… अगर यह नंबर किसी और को चला गया, तो उसके व्हाट्सएप की वह मुस्कुराती तस्वीर भी चली जाएगी… मैं हर रात किससे बात करूंगा? यही मेरे जीने का एकमात्र सहारा है… इसलिए मेरे मरने से पहले यह नंबर हमेशा के लिए मेरे खाते से जोड़ दीजिए।”

यह दिल तोड़ देने वाली सच्चाई पूरे बैंक में गूंज गई… और एसी वाले उस बैंक में एक डरावनी, सन्न कर देने वाली खामोशी छा गई।

क्लर्क के हाथ में पकड़ा माउस रुक गया। लाइन में खड़े लोगों की नजरें झुक गईं।

रोहन को अपने अस्तित्व, अपनी पढ़ाई और ‘डिजिटल इंडिया’ के अहंकार से घृणा होने लगी।

जिस व्यक्ति को वह ‘समय बर्बाद करने वाला अनपढ़’ समझ रहा था… वह बैंक लेन-देन के लिए नहीं, बल्कि अपने टूटे हुए जीवन और अकेलेपन को बचाने के लिए आया था।

रोहन ने कोई नाटक नहीं किया। न चिल्लाया, न माफी मांगी।

वह बस एक मूर्ति की तरह खड़ा रहा। उसकी आंखें लाल हो गई थीं और उनसे खामोश आंसू बह रहे थे।

उसने अपनी जेब से अपना नया iPhone निकाला। हाथ कांप रहे थे। उसने उसी समय अपने पैसे से सुमती के उस नंबर पर अगले दस साल का रिचार्ज कर दिया।

फिर उसने रघुनाथराव का पुराना फोन बहुत सम्मान से उनके हाथों में वापस रखा। एक शब्द भी नहीं बोला।

बस भीड़ के बीच, वहीं बैंक के फर्श पर, वह कुछ सेकंड के लिए उस अकेले पिता के चरणों में झुक गया।

इसके बाद वह अपना काम अधूरा छोड़कर चुपचाप सिर झुकाए बैंक से बाहर निकल गया।

उसकी खामोशी और आंसू यह कह रहे थे—
हम तकनीक में चाहे जितना आगे बढ़ जाएं, इंसान के अकेलेपन का कोई OTP नहीं होता।

इंसान को जीने के लिए स्क्रीन नहीं, बल्कि किसी अपने के साथ की जरूरत होती है… जिसे दुनिया का कोई नेटवर्क पूरा नहीं कर सकता।

आज हम बुजुर्गों पर गुस्सा करते हैं कि उन्हें तकनीक समझ नहीं आती… लेकिन उनके उस अज्ञान के पीछे छिपी बात करने की भूख को हम कब समझेंगे?

इस घटना के बारे में आप क्या सोचते हैं? जरूर बताइए।

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