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शक्ति उपासना, तंत्र परम्परा और सांस्कृतिक विविधता : एक वैचारिक विमर्श

वैसे तो कई हिन्दू अपने आप को स्वामी विवेकानंद से ज्यादा ज्ञानी मानते हैं, मगर स्वामी विवेकानंद से अधिक ज्ञानी और कम ज्ञानी दोनों ने ही भगिनी निवेदिता का नाम सुन रखा होता है। वो लम्बे समय तक स्वामी विवेकानंद के साथ रही थीं। जो स्वामी विवेकानंद से अधिक ज्ञानी हैं, उनके लिए इस बात का कोई विशेष अर्थ नहीं लेकिन दूसरे लोग शायद भगिनी निवेदिता की किताब “द मास्टर ऐज आई सॉ हिम” का नाम भी जानते होंगे।

इसका ग्यारहवां अध्याय है “द स्वामी एंड मदर-वोर्शिप” जिसमें स्वामी विवेकानंद पशु-बलि के बारे में कहते हैं, चित्र पूरा करने में थोड़ा रक्त भी लग जाए तो क्या हर्ज है?

 

शाक्तमत के अनुसार साधनाक्षेत्र में तीन भावों तथा सात आचारों की विशिष्ट स्थिति होती है। पशुभाव, वीरभाव और दिव्यभाव तीन भावों के संकेत हैं। तीनों भावों से जुड़े सात आचार हैं – वेदाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार, दक्षिणचार, वामाचार, सिद्धांताचार और कौलाचार।

इनमें दिव्यभाव के साधक का संबंध कौलाचार से है। आजकल राजनैतिक कारणों से लोग जिस “नाथ पंथ” का नाम जानने लगे हैं, वो भी कौलाचार से संबंधित है।  गंधर्वतंत्र, तारातंत्र, रुद्रयामल और विष्णायामल जैसे तंत्र के ग्रंथों के हिसाब से इसका प्रचार महाचीन (तिब्बत) से लाकर वसिष्ठ ने कामरूप (कामख्या-असम) में किया।

 

इसी कालिका के क्षेत्र कामख्या के आस पास लिखे गए कालिका पुराण में एक पूरा अध्याय ही “रुधिराध्याय” (अर्थात रक्त का अध्याय) कहलाता है। तंत्र की उपासना में जब साधक “द्वैत” भाव को पूरी तरह नकार देता है और अपने उपास्य में स्वयं को होम कर देता है, तब वो मानसिक स्थिति “दिव्य भाव” कहलाती है। कौलाचार पूर्ण अद्वैत वाले, दिव्यभाव के साधक के लिए सुगम होता है इसलिए इसे तांत्रिक आचारों में सर्वोत्तम भी माना जाता है। 

पंच मकार- मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन जिनका नाम संभवतः तंत्र से जुड़ा सुना होगा वो इसी उपासना के मुख्य साधन हैं।

 

कौल मत में बहिर्योग का प्रयोग होता है, और इसी से मिलते जुलते समयमार्ग में अंतर्योग (हृदयस्थ उपासना) का महत्व है। समयमार्गी पंच मकार का प्रत्यक्ष प्रयोग न करके इनके प्रतिनिधि स्वरुप दूसरी वस्तुओं का प्रयोग करता है (जिन्हें “अनुकल्प” कहा जाता है)।

कौल सीधे पंच मकार का ही अपनी पूजा में उपयोग करता है। बड़े साधकों के नाम देखें तो शंकराचार्य समयाचार के अनुयायी थे और दूसरी तरफ अभिनवगुप्त या गौडीयशाक्त लोग कौलाचार का पालन करते थे। किसी काल में दोनों एक साथ न रहे हों, ऐसा कहना अधिक से अधिक अतिशयोक्ति हो सकती है, सत्य नहीं।

 

सौंदर्य लहरी के भाष्यकार लक्ष्मीधर ने 41वें श्लोक की व्याख्या में कौलों में भी दो भेद बताये हैं। बाहरी तौर पर देखें तो उत्तर कौल शिव और शक्ति दोनों की सत्ता मानते हैं।

उनके अनुसार श्रृष्टि के सृजन काल में शक्ति प्रकट और शिव सुप्तावस्था में होते हैं, जबकि प्रलय काल में शिव जागृत और शक्ति सुप्तावस्था में होगी। उत्तर कौल शिव तत्व को नहीं, एकमात्र शक्ति को ही उपास्य मानते हैं। जैसे प्रकाश का न होना अँधेरा है, वैसे ही शक्ति के जागृत होने को श्रृष्टि और सुप्तावस्था में जाने को प्रलय भी माना जा सकता है। उत्तर कौल पद्दतियों पर ही महाचीन (तिब्बत) के तंत्र का अधिक प्रभाव दिखता है।

 

संभवतः उनकी उग्र उपासना पद्दतियों के कारण कौलाचारियों को आम लोगों और शासन का द्वेष भी झेलना पड़ा। ये बिलकुल अभी के समय जैसा है जब तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सत्ता, संवैधानिक प्रावधानों को नकार कर सीधा मंदिरों में हस्तक्षेप करती नजर आती है।

अब अगर वापस सौन्दर्यलहरी के 23वें श्लोक की व्याख्या में देखें तो वहां अर्धनारीश्वर की चर्चा है। आमतौर पर ये माना जाता है कि अर्धनारीश्वर रूप में शिव के शरीर का वाम भाग पार्वती का (नारी स्वरुप) हो जाता है।

सौन्दर्यलहरी की व्याख्या थोड़ी उल्टी है क्योंकि यहाँ साधक कहता है कि पार्वती ने ही जैसे शिव को सोख लिया हो! देवी का वर्ण लाल होने के कारण श्वेत शिव पर लालिमा दिखती है।

त्रिनेत्र, अर्ध-चन्द्र और वक्ष आदि के कारण शिव का दाहिना भाग गौण और देवी का वाम पक्ष प्रबल है। ये कौलाचारियों के उस मत को बल देता है जो शक्ति को प्रधान और शिव तत्व को गौण मानते हैं।

 

मुग़ल काल के भक्तिरस वालों के समझने के लिए ये कुछ वैसा है जैसे श्री कृष्ण का सौम्य रूप। आमतौर पर बांसुरी बजाते जिस सौम्य कन्हाई को देखने की आदत है, उनके विश्वरूप लेते ही कौरव पक्ष के सभी योद्धाओं की आंखे डर कर बंद हो जाती हैं। भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय (पैंतालिसवें श्लोक) में अर्जुन जैसा योद्धा जो कई युद्ध और संग्रामों में मृत्यु देख चुका है, वो कहता है कि मैं इस रूप से भयभीत हूँ! समेटिये इसे! अद्वैत मत के कौलाचारियों के लिए जो साधना पद्दतियां हैं, वो सबपर जबरन थोपी जाएँ, ऐसी कोई दूसरे छोटे मजहबों जैसी व्यवस्था हिन्दुओं में नहीं होती। इसका मतलब ये भी नहीं कि जिनके लिए स्वीकार्य हैं उनपर भी जबरदस्ती बल-प्रयोग  करके प्रतिबन्ध लगाए जाएँ। बलि देखने आपको कोई बांधकर तो ले नहीं जाता न, अपनी नाक हर मामले में न घुसेड़ें तो बेहतर।

 

बाकी आपकी भावना के आहत होने भर से माँ काली के हाथ से न खट्वांग गायब होगा, न उनकी लपलपाती जिह्वां अन्दर जायेगी, न उनके हाथ के कटे सरों से रुधिर बंद होता है, न उनकी मुंडमाला का लोप होता है। देवी उग्र ही रहेंगी। जिन्हें स्वीकार्य है, और जो बलि झेल नहीं पाते, दोनों को शक्तिपूजन के नवरात्र की शुभकामनाएँ !

 

*दुर्गा पूजा और पाठ*

 

“चंडी पाठ” के अंतिम हिस्सों में आद्या शक्ति के पुनः प्रादुर्भाव और मनुष्यों एवं देवताओं पर उनकी कृपा की चर्चा आती है। हिरण्याक्ष नामक राक्षस के वंश में रुरु नाम के असुर का पुत्र दुर्गमासुर था। उसने वर्षों की कठिन तपस्या करके ब्रह्मा से वर में चारों वेद मांग लिए। कहते हैं कि वर के प्रभाव से जब वेद दुर्गमासुर के पास चले गए तो ऋषि-मुनि वेदों के बिना यज्ञ नहीं कर पाते थे। देवताओं के यज्ञ भाग से विहीन होने पर वर्षा बंद हो गयी और लोग अकालग्रस्त हो गए।

 

ऐसे में देवताओं ने पूरे भुवन की स्वामिनी, देवी भुवनेश्वरी की उपासना की और देवी अपने शताक्षी रूप में प्रकट हुईं। जनता की दुर्दशा देखकर उनके सौ नेत्रों से आंसू बहने लगे और मान्यता है कि उनके रोते रहने के कारण नौ दिनों तक वर्षा होती रही। मनुष्यों के पास खाने पीने की वस्तुओं की कमी न हो इसलिए देवी शाकम्भरी रूप में भी प्रकट हुईं। संभवतः नवरात्र में शाकाहार की परम्परा आद्या शक्ति के इसी शाकम्भरी रूप के कारण है।

 

देवी के नामों को देखने पर एक और भी चीज़ ध्यान में आती है। देवी जिन राक्षसों का वध करती हैं, उनका नाम लिए बिना आप देवी का नाम नहीं ले सकते। महिषासुरमर्दिनी कहने के लिए महिषासुर कहना होगा, दुर्गा कहने पर दुर्ग नाम आ जाता है, चंड-मुंड के वध के कारण चामुंडा नाम होता है। पापनाशिनी की शक्ति यहाँ दिखती है। देवी के अस्त्र-शस्त्रों से जो छू गया उसके पाप कहाँ बचे होंगे? कुछ ऐसे ही कारणों से वैष्णो देवी जाने पर भी ऊपर भैरव मंदिर तक जाकर पूजा की जाती है। सनातनी उसे दुत्कारते नहीं।

 

भुवनेश्वरी सुनने पर ये भी ध्यान आ जायेगा कि इनके ही नाम पर तो भुवनेश्वर शहर का नाम है। ऐसा सिर्फ एक शहर के साथ हो रहा है ये भी मत सोचिये। चंडीगढ़ देवी चंडी के नाम पर, मुम्बई का नाम मुम्बा देवी के कारण, त्रिपुरा का नाम त्रिपुर सुंदरी के नाम पर है। पटना की नगर देवी पाटन देवी हैं, अम्बाला का नाम अम्बा से आता है, कश्मीर के श्रीनगर का नाम श्री यानी लक्ष्मी देवी के नाम पर है। मीरजा का मतलब समुद्र से जन्म लेने वाली यानि लक्ष्मी, उत्तरप्रदेश का मीरजापुर असल में मिर्ज़ापुर भी नहीं है।

 

कर्णाटक के हसन का नाम हस्सनाम्बे के नाम पर है। भारत भर के ऐसे नामों की एक सूची इंडिया टेल्स की वेबसाइट पर मिल जाएगी जो उन्होंने पिछले साल लगाईं थी। ये भी सोचिये कि विविधता में एकता भारत का परिचय है क्या? इन सभी जगहों पर देवी की उपासना पद्दति अलग अलग है। एक की प्रक्रिया दूसरे से बिलकुल अलग हो सकती है। इन विविधताओं को हम बर्दाश्त (टोलरेट) नहीं करते, उनके प्रति सहिष्णुता नहीं दिखाते, बल्कि उन सब का सम्मान करते हैं।

 

हमारी संस्कृति के दस किस्म के परिधान हो सकते हैं, साड़ी ही कई तरीके से पहनी जा सकती है। वो सबको एक ही बोरे में घुसकर बंद कर देना चाहते हैं। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद (कल्चरल इम्पेरिअलिस्म) किसी भी किस्म की विविधता को बर्दाश्त नहीं कर सकता इसलिए उन्हें सबरीमाला, शनि मंदिर या ब्रह्मा के मंदिरों में एक सी पूजा पद्दति चाहिए। कल को वो ये भी कह सकते हैं कि नौ बालिकाओं के कन्या-पूजन में पुरुषों का अधिकार छिनता है इसलिए पांच कन्याओं के साथ चार बालकों की भी पूजा करो!

 

निशाना एक ही हो तो उसपर प्रहार करना आसान हो जाता है। इस वजह से वो सह्लेश पूजा, सामा-चकेवा जैसी परम्पराओं को ओछा बताएँगे। वो ये भी कहने की कोशिश करेंगे कि दुर्गा पूजा की यही एक पद्दति होनी चाहिए। वो कहेंगे कि मध्यम मार्ग के अलावा सभी तंत्रोक्त रीतियाँ गलत या निम्न है। वो ये भी कहेंगे कि शाकाहारी उत्तम है, मांसाहारी लोग ये पूजा नहीं कर सकते, जबकि ये सोचना भी शुद्ध मूर्खता है। वो नहीं चाहते कि संविधान ने भी जिसे स्वीकारा है, जो पहले से प्रचलित विविधता भारत में स्वीकार्य रही है, वैसे अलग-अलग तरीकों से पूजा करने की छूट जारी रहे।

 

वो भारत के संविधान के भी शत्रु हैं। सांस्कृतिक उपनिवेशवादियों के हमले के बदलते रूपों को पहचाना आपकी जिम्मेदारी है। कोई दस महाविद्याओं की उपासना करता है, या कोई तीन महादेवियों की पूजा करता है, कौन देवी के नौ रूपों की साधना में लीन है, ये उसकी निजी स्वतंत्रता है। मजहब-रिलिजन के सामुदायिक मजबूरियों की धर्म वाली निजी स्वतंत्रता में कोई जगह नहीं। हाल में हेगल के सिद्धांतों की नक़ल से बने एक आयातित विचारधारा वाले मजहब के अलग-अलग वाद या फिरकों के जैसा, धर्म में भी सबको एक जैसा करने की मजबूरी नहीं होती है।

 

शाक्त परम्पराओं के लिए देवी की शक्ति के रूप में उपासना एक आम पद्धति थी। शक्ति का अर्थ किसी का बल हो सकता है, किसी कार्य को करने की क्षमता भी हो सकती है। ये प्रकृति की सृजन और विनाश के रूप में स्वयं को जब दर्शाती है, तब ये शक्ति केवल शब्द नहीं देवी है। सामान्यतः दक्षिण भारत में ये श्री (लक्ष्मी) के रूप में और उत्तर भारत में चंडी (काली) के रूप में पूजित हैं। अपने अपने क्षेत्र की परम्पराओं के अनुसार इनकी उपासना के दो मुख्य ग्रन्थ भी प्रचलित हैं। ललिता सहस्त्रनाम जहाँ दक्षिण में अधिक पाया जाता है, उतर में दुर्गा सप्तशती (या चंडी पाठ) ज्यादा दिखता है।

 

शाक्त परम्पराएं वर्ष के 360 दिनों को नौ-नौ रात्रियों के चालीस हिस्सों में बाँट देती हैं। फिर करीब हर ऋतुसन्धि पर एक नवरात्र ज्यादा महत्व का हो जाता है। जैसे अश्विन या शारदीय नवरात्री की ही तरह कई लोग चैत्र में चैती दुर्गा पूजा (नवरात्रि) मनाते भी दिख जायेंगे। चैत्र ठीक फसल काटने के बाद का समय भी होता है इसलिए कृषि प्रधान भारत के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। असाढ़ यानि बरसात के समय पड़ने वाली नवरात्रि का त्यौहार हिमाचल के नैना देवी और चिंतपूर्णी मंदिरों में काफी धूम-धाम से मनाया जाता है। माघ नवरात्री का पांचवा दिन हम सरस्वती पूजा के रूप में मनाते हैं।

 

सरस्वती के रूप में उपासना के लिए दक्षिण में कई जगहों पर अष्टमी-नवमी तिथियों को किताबों की भी पूजा होती है। शस्त्र पूजा में भी उनका आह्वान होता है। बच्चों को लिखना-पढ़ना शुरू करवाने के लिए विजयदशमी का दिन शुभ माना जाता है और हमारी पीढ़ी तक के कई लोगों का इसी तिथि को विद्यारम्भ करवाया गया होगा। देवी जितनी वैदिक परम्पराओं की हैं, उतनी ही तांत्रिक पद्धतियों की भी हैं। डामर तंत्र में इस विषय में कहा गया है कि जैसे यज्ञों में अश्वमेध है और देवों में हरि, वैसे ही स्तोत्रों में सप्तशती है।

 

तीन रूपों में सरस्वती, काली और लक्ष्मी देवियों की ही तरह सप्तशती भी तीन भागों में विभक्त है। प्रथम चरित्र, मध्यम चरित्र और उत्तम चरित्र इसके तीन हिस्से हैं। मार्कंडेय पुराण के 81 वें से 93 वें अध्याय में दुर्गा सप्तशती होती है। इसके प्रथम चरित्र में मधु-कैटभ, मध्यम में महिषासुर और उत्तम में शुम्भ-निशुम्भ नाम के राक्षसों से संसार की मुक्ति का वर्णन है (ललिता सहस्त्रनाम में भंडासुर नाम के राक्षस से मुक्ति का वर्णन है)। तांत्रिक प्रक्रियाओं से जुड़े होने के कारण इसकी प्रक्रियाएं गुप्त भी रखी जाती थीं। श्री माधवाचार्य ने तो सप्तशती पर अपनी टीका का नाम ही ‘गुप्तवती’ रखा था।

 

पुराणों को जहाँ वेदों का केवल एक उप-अंग माना जाता है वहीँ सप्तशती को सीधा श्रुति का स्थान मिला हुआ है। जैसे वेदमंत्रों के ऋषि, छंद, देवता और विनियोग होते हैं वैसे ही प्रथम, मध्यम और उत्तम तीनों चरित्रों में ऋषि, छंद, देवता और विनियोग मिल जायेंगे। इस पूरे ग्रन्थ में 537 पूर्ण श्लोक, 38 अर्ध श्लोक, 66 खंड श्लोक, 57 उवाच और 2 पुनरुक्त यानी कुल 700 मन्त्र होते हैं। अफ़सोस की बात है कि इनके पीछे के दर्शन पर लिखे गए अधिकांश संस्कृत ग्रन्थ लुप्त हो रहे हैं। अंग्रेजी में अभी भी कुछ उपलब्ध हो जाता है, लेकिन भारतीय भाषाओँ में कुछ भी ढूंढ निकालना मुश्किल होगा।

 

ये एक मुख्य कारण है कि इसे पढ़कर, खुद ही समझना पड़ता है। तांत्रिक सिद्धांतों के शिव और शक्ति, सांख्य के पुरुष-प्रकृति या फिर अद्वैत के ब्रह्म और माया में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। जैसा कि पहले लिखा है, इसमें 700 ही मन्त्र हैं (सिर्फ पूरे श्लोक गिनें तो 513) यानी बहुत ज्यादा नहीं होता। पाठ कर के देखिये। आखिर आपके ग्रन्थ आपकी संस्कृति, आपकी ही तो जिम्मेदारी हैं!

 

बाकि सबरीमाला की ही तरह प्रतिरोध जारी रखिये। ध्यान रहे कि हमलावरों ने जब जिस देश पर आक्रमण किया, वहां की सभ्यता संस्कृति को नष्ट करके वहां स्वयं को स्थापित कर लिया। सनातनी परम्पराएं इन आक्रमणकारियों का सबसे लम्बे समय तक (हज़ार वर्षों से ज्यादा) सामना करने वाली परम्परा है। प्रतिरोध की सबसे लम्बी परम्परा की एक कड़ी होने के नाते आपकी जिम्मेदारी होती है कि इसे एक पीढ़ी आगे बढ़ाएं। आपके मन के विचार, आपके शारीरिक कर्म, आपके वचन के एक भी शब्द से शत्रुओं की सहायता तो नहीं हुई न? जागृत रहिये!

 

आगे और हे

 

 

किसी को असफल बनाना हो तो उसके दो तरीके हो सकते हैं। एक तो सामान्य तरीका है कि लगातार उसकी निंदा ही करते रहो। कड़वा बोलो, कुछ अच्छा भी करे तो उसमें बुराई खोज लो। उसका आत्मविश्वास कभी ऐसा होगा ही नहीं कि वो कोई बड़ा कार्य करने की सोचे भी। अगर अपनी क्षमता से अधिक का प्रयास नहीं करेगा तो क्षमता कभी बढ़ेगी नहीं और वो आगे नहीं बढ़ पायेगा, ठहरा रहेगा। नया कुछ सृजन करने में निंदा का इतना डर होगा कि प्रयास ही न करे। गतिशील विश्व में ठहरे रहने का अर्थ पीछे जाना है, लोग आगे जाते जायेंगे और वो पिछड़ जायेगा।

 

एक दूसरा उपाय है व्यक्ति के हर कार्य की प्रशंसा करते रहना। वो गलत भी करे तो उसे सही बताते रहने से भी ऐसा ही होगा। ये कुछ-कुछ वैसा है जैसे कृत्य करते हुए आपने शकुनी-कर्ण आदि को महाभारत में देखा-सुना होगा। दुर्योधन कितना भी गलत करे, भीम को विष दे दे, लाक्षागृह में आग लगाने का षड्यन्त्र कर ले। यहाँ तक कि द्रौपदी चीरहरण भी करवा दे तो उसके आस पास के लोग उसे ही सही ठहरा रहे थे। मीठा-मीठा बोलकर उसकी ही प्रशंसा कर रहे होते हैं। इसलिए नीति के नाम पर बताया जाता है कि वैद्य, मंत्री और आचार्य हर बात में सहमती जताने लगें तो विनाश निकट ही है ऐसा समझ लेना चाहिए।

 

सिर्फ मीठा बोलते रहने से भी हानि होगी और सिर्फ कड़वा बोलते रहने से भी वही होगा। इसी बात को दुर्गा सप्तशती के शुरूआती हिस्से से भी समझ सकते हैं। मीठी-कड़वी बातें कानों के जरिये आपके दिमाग तक पहुँचती हैं और किसी भी नए सृजन की क्षमता को समाप्त कर डालती हैं। मधु और कैटभ नाम के दो राक्षस जिनके नाम से ही एक मधुर और दूसरा तिक्त/कड़वा लगता है, दोनों भगवान विष्णु के कान के मैल से उत्पन्न होते हैं। उत्पन्न होते ही जो सबसे पहला काम ये करते हैं, वो ये था कि सृजन के लिए जो ब्रह्मा जी उत्तरदायी हैं, उनका विनाश कर देने पर तुल जाते हैं। ब्रह्मा जी कि प्रार्थना पर भगवान विष्णु जागते भी हैं, तो इन राक्षसों का वध आसान नहीं था। उनको समझने-संतुष्ट करने के बाद ही उनका विनाश किया जा सका।

 

मनुष्यों के साथ भी बिलकुल ऐसा ही है। कहावतों में ही कहा जाता है कि जो माता से भी अधिक प्रेम दर्शाने लगे, उसे डायन समझो। वो खा जाना चाहती है। लगातार कोई निंदा करे तो फिर भी एक बार पहचानना आसान है। जो प्रशंसा ही करता जाए, उसे शत्रु के रूप में पहचान पाना कठिन होगा। फिर भी ये करना तो आवश्यक है। सूटकेस-फ्रिज इत्यादि में बंद होने वाली युवतियों ने माता पिता से ज्यादा, अत्यधिक प्रेम या अत्यधिक प्रशंसा में इसे पहचाना होता तो संभव है कि बच पातीं। लेकिन फिर उन्हें बचपन में धार्मिक ग्रन्थ पढ़वाने पर तो उनके साधू-सन्यासी हो जाने का डर लगा होगा न? इसलिए परिवार ने ऐसा कुछ पढ़ने-सीखने नहीं दिया होगा।

 

इससे आगे की कहानी में बताया जाता है कि इन राक्षसों के वध से जो मेदा यानि वसा (चर्बी) निकली, उसके कारण पृथ्वी सागर तल से ऊपर आई, दिखने लगी। मेदा से उत्पन्न होने के कारण धरती का एक नाम मेदिनी भी होता है। राक्षसी शरीर के वसा से उत्पन्न होने के कारण धरती अभक्ष्य यानी न खाने योग्य बताई गयी है। न्याय दर्शन में पृथ्वी को सूंघने के गुण से जोड़ा जाता है। जिनकी सूंघने की क्षमता कम हो गयी है, या चली गयी है, उनके लिए डॉक्टर, बागवानी करना एक अच्छा उपाय बताते हैं। मिट्टी खा नहीं सकते लेकिन हाथों-पैरों का जो मिट्टी के साथ स्पर्श बागवानी के दौरान होगा, उससे जिंक की आपूर्ति होगी और सूंघने की क्षमता वापस आएगी।

 

ऐसा हो सकता है कि डोडो पक्षी के गुण विकसित हो गए हों और शत्रु-मित्र में अंतर करने की क्षमता न बची हो। खतरे को सूंघने की क्षमता का विकास तो जरूरी है! दुर्गा सप्तशती के समाधी नाम के वैश्य की तरह आध्यात्मिक उपलब्धि चाहिए या सुरथ नाम के राजा जैसा सांसारिक उपलब्धियां चाहिए, वो दोनों ही दुर्गा सप्तशती से संभव हैं। दोनों में से कौन सी उपलब्धियां चाहिए, वो भी न पता हो तो अंत में आप “यथायोग्यं तथा कुरु” कहकर वो उत्तरदायित्व भी देवी पर ही छोड़ सकते हैं।  #नवरात्रि का समय है। आप सभी को नवरात्रि की शुभकामनाएं!

 

पर्वत की ऊँची चोटी के लिए संस्कृत में “शिखर”, और उसे धारण करने वाले, यानी पर्वत के लिए “शिखरि” शब्द प्रयुक्त होता है। इसी का स्त्रीलिंग “शिखरिणी” हो जाएगा। इसी शब्द “शिखरिणी” का एक और उपयोग “सुन्दर कन्या” के लिए भी होता है। शिखरिणी संस्कृत काव्य का एक छन्द भी है। इसी शिखरिणी छन्द में आदि शंकराचार्य ने सौंदर्यलहरी की रचना की थी। संस्कृत जानने वालों के लिए, शाक्त उपासकों के लिए या तंत्र की साधना करने वालों के लिए सौन्दर्यलहरी कितना महत्वपूर्ण ग्रन्थ है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी पैंतीस से अधिक टीकाएँ, केवल संस्कृत में हैं। हिन्दी-अंग्रेजी भी जोड़ें तो पता नहीं गिनती कहाँ तक जाएगी।

 

आदि शंकराचार्य के सौन्दर्यलहरी की रचना के साथ भी एक किम्वदंती जुड़ी हुई है। कहते हैं वो एक बार कैलाश पर्वत पर गए और वहां भगवान शिव ने उन्हें सौ श्लोकों वाला एक ग्रन्थ दिया। देवी के अनेक रूपों के वर्णन वाले ग्रन्थ को उपहार में पाकर प्रसन्न आदि शंकराचार्य लौट ही रहे थे कि रास्ते में उन्हें नन्दी मिले। नन्दी ने उनसे ग्रन्थ छीन लेना चाहा और इस क्रम में ग्रन्थ आधा फट गया! आदि शंकराचार्य के पास शुरू के 41 श्लोक रहे और बाकी लेकर नन्दी भाग गए। आदि शंकराचार्य ने वापस जाकर भगवान शंकर को ये बात बताई तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं, 41वें से आगे के श्लोकों को देवी की स्तुति में तुम स्वयं ही रच दो!

 

तो इस तरह तंत्र के साधकों का ये प्रिय ग्रन्थ दो भागों में बंटा हुआ है। पहले 41 श्लोक देवी के महात्म्य से जुड़े हैं और आनन्दलहरी के नाम से जाने जाते हैं। जहाँ से देवी के सौन्दर्य का बखान है उस 42वें से लेकर सौवें श्लोक को सौन्दर्यलहरी कहते हैं। अब जिस छन्द में ये रचा गया है उस “शिखरिणी” पर वापस चलें तो उसका पहला अर्थ पहाड़ की चोटी बताया जाता है। नन्दा देवी या वैष्णो देवी जैसी जगहों के बारे में सुना हो तो याद आ जायेगा कि देवी को पर्वत की चोटी पर रहने वाली भी बताया जाता है। दूसरे हिस्से के लिए अगर “शिखरिणी” का दूसरा अर्थ सुन्दर कन्या लें, तो नवरात्र में कन्या पूजन भी याद आ जायेगा।

 

एंथ्रोपोलॉजिस्ट यानि मानवविज्ञानी जब धर्म का अध्ययन करते हैं तो उसे दो भागों में बांटने की कोशिश करते हैं। रिलिजन या मजहब के लिए संभवतः ये तरीका आसान होगा। वृहत (ग्रेटर) धारा में वो उस हिस्से को डालते हैं जिसमें सब कुछ लिखित हो और उस लिखे हुए को पढ़ने, समझने और समझाने के लिए कुछ ख़ास लोग नियुक्त हों। छोटी (लिटिल) धारा उसे कहते हैं जो लोकव्यवहार में हो, उसके लिखित ग्रन्थ नहीं होते और कोई शिक्षक भी नियुक्त नहीं किये जाते। भारत में धर्म की शाक्त परम्पराओं में ये वर्गीकरण काम नहीं करता क्योंकि आदि शंकराचार्य को किसी ने “नियुक्त” नहीं किया था। रामकृष्ण परमहंस या बाम-खेपा जैसे शाक्त उपासकों को देखें तो बांग्ला में “खेपा” का मतलब पागल होता है। इससे उनके सम्मान में कोई कमी भी नहीं आती, ना ही उनकी उपासना पद्दति कमतर या छोटी होती है।

 

तंत्र में कई यंत्र भी प्रयोग में आते हैं। ऐसे यंत्रों में सबसे आसानी से शायद श्री यंत्र को पहचाना जा सकता है। सौन्दर्यलहरी के 32-33वें श्लोक इसी श्री यंत्र से जुड़े हैं। साधकों के लिए इस ग्रन्थ का हर श्लोक किसी न किसी यंत्र से जुड़ा है, जिसमें से कुछ आम लोगों के लिए भी परिचित हैं, कुछ विशेष हैं, सबको मालूम नहीं होते। शिव और शक्ति के बीच कोई भेद न होने के कारण ये अद्वैत का ग्रन्थ भी होता है। ये त्रिपुर-सुंदरी रूप की उपासना का ग्रन्थ है इसलिए भी सौन्दर्य लहरी है। कई श्लोकों में माता श्रृष्टि और विनाश का आदेश देने की क्षमता के रूप में विद्यमान हैं।

 

इसके अंतिम के तीन-चार श्लोक (सौवें के बाद के) जो आज मिलते हैं, उन्हें बाद के विद्वानों का जोड़ा हुआ माना जाता है। उत्तर भारत में जैसे दुर्गा-सप्तशती का पाठ होता है वैसे ही दक्षिण में सौन्दर्यलहरी का पाठ होता है। शायद यही वजह होगी कि इसपर हिन्दी में कम लिखा गया है। इसपर दो अच्छे (अंग्रेजी) प्रचलित ग्रन्थ जो हाल के समय में लिखे गए हैं उनमें से एक रामकृष्ण मिशन के प्रकाशन से आता है और दूसरा बिहार योग केंद्र (मुंगेर) का है। दक्षिण और उत्तर में एक अंतर समझना हो तो ये भी दिखेगा कि सौन्दर्यलहरी में श्लोकों की व्याख्या और सम्बन्ध बताया जाता है। श्लोक का स्वरुप, उसके प्रयोग या अर्थ से जुड़ी ऐसी व्याख्या वाले ग्रन्थ दुर्गा सप्तशती के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।

 

बाकी आस पास के रामकृष्ण मिशन या दूसरे जो भी योग अथवा संस्कृत विद्यालय हों, वहां तक जाकर भी देखिये। संस्कृति को जीवित रखना समाज का ही कर्तव्य है।

नवरात्र

 

 नवरात्र का त्यौहार चल रहा है। इस दौरान हो सकता है किसी शाम आरती के भजन के शब्द भी आपके कान में पड़ गए हों। अगर ऐसा कभी हुआ था तो क्या आपने “आगम-निगम बखानी, तुम शिव पटरानी” वाला वाक्य भी सुना था? ये “आगम-निगम” क्या होता है, ये भी सोचा क्या? किसी से पूछा कि उनका मतलब क्या होता है? नहीं! अरे रे रे! अब अगर अपने ही धर्म के बारे में आपने खुद ही जानने या किसी से पूछने की कोशिश नहीं की, तो फिर तो जाहिर है कि जो भी लोग आपके धर्म के बारे में कहेंगे, वही सुनकर आपको मानना पड़ेगा। सिर्फ आपको ही क्यों? आपकी आने वाली पीढ़ियों को भी अगर परम्पराओं के नाम पर हिन्दूफोबिक गिरोह बेइज्जत करें तो उनके पास भी जवाब नहीं होगा!

 

हर त्यौहार में ऐसा ही होता है। अब नयी पीढ़ी के हिन्दू शुगर फ्री जनरेशन वालों

‘चिति’ : एक शब्द, जो सभ्यता और संस्‍कृति के तिरोहित होते ही विलुप्‍त हो जाता है!

।। शक्ति पूजा का महत्व ।।

५१ सती शक्ति पीठ

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