Sshree Astro Vastu

‘चिति’ : एक शब्द, जो सभ्यता और संस्‍कृति के तिरोहित होते ही विलुप्‍त हो जाता है!

भारतीय चिंतन परंपरा में कुछ शब्द ऐसे हैं, जिनके बारे में मान सकते हैं कि वे अपने भीतर संपूर्ण सभ्यता के अनुभव, दर्शन और आत्मबोध को समेटे हुए हैं। ‘चिति’ ऐसा ही एक गहन और बहुआयामी शब्द है। यह शब्द संस्कृत व्याकरण की सूक्ष्मता से आरंभ होकर वैदिक यज्ञ-विधानों, ब्राह्मण ग्रंथों, कश्मीर शैव दर्शन और आधुनिक राष्ट्रचिंतन तक एक निरंतर यात्रा करता हुआ दृष्टिगत होता है। इसकी विशेषता है कि यह “चेतना” का द्योतक न होकर उस मूल शक्ति का संकेतक है,  जिसके माध्‍यम से चेतना का चेतन्‍य होना संभव होता है।

 

भारतीय चिंतन में ‘चिति’ वह तत्व है, जो संस्कृति को दिशा देता है, जीवन-मूल्यों को आधार प्रदान करता है और भारत को उसकी विशिष्ट पहचान देता है। किंतु एक गहरा प्रश्न यह है कि क्या यह ‘चिति’ स्थायी है? या फिर यह भी सभ्यता और संस्कृति के साथ बदलती, क्षीण होती और अंततः विलुप्त हो जाती है? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें ‘चिति’ की यात्रा को उसके व्याकरणिक, वैदिक, दार्शनिक और आधुनिक संदर्भों में समझना होगा। आज जब हम राष्ट्र, संस्कृति और पहचान जैसे प्रश्नों पर विचार करते हैं, तब ‘चिति’ की अवधारणा एक महत्वपूर्ण बौद्धिक उपकरण के रूप में सामने आती है।

 

संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘चिति’ शब्द “चित्” धातु (ज्ञाने) से बना है, जिसमें “क्तिन्” प्रत्यय का योग होता है। चित् + क्तिन् = चिति। यह स्त्रीलिंग शब्द है, जिसका मूल अर्थ है, वस्‍तुत: चेतना, ज्ञान अथवा बोध।

 

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझनी आवश्यक है कि ‘चिति’ सिर्फ ज्ञान की क्रिया नहीं है, यह ज्ञान की आधारशक्ति है। यह वह आंतरिक प्रकाश है, जोकि हमारे अनुभव, विचार और स्मृति को संभव बनाता है। यही कारण है कि ‘चिति’ का प्रयोग आगे चलकर भाषा तक सीमित नहीं रहता है, यह दर्शन और आध्यात्मिकता का केंद्रीय तत्व बन जाता है।

 

वैदिक साहित्य में ‘चिति’ का प्रारंभिक प्रयोग यज्ञीय संदर्भ में मिलता है। यहाँ ‘चिति’ का अर्थ मुख्यतः अग्नि-वेदी या यज्ञ की संरचना से है। यह वेदी एक सुव्यवस्थित ब्रह्मांडीय प्रतिरूप होती है, जिसमें प्रत्येक ईंट का स्थान और संख्या प्रतीकात्मक महत्व रखती है। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है, “चितिर् वै यज्ञस्यायतनम्” अर्थात् चिति ही यज्ञ का आधार है। इसी प्रकार से कहा गया, “एषा वै चितिर्यज्ञस्य रूपम्”, यह चिति ही यज्ञ का स्वरूप है।ऐतरेय ब्राह्मण में आया, चितिं चिनुते यज्ञस्य सिद्धये।यज्ञ की सिद्धि के लिए चिति (वेदी) का निर्माण किया जाता है।

 

यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता संदर्भ) में अग्निं चितिं च समिधा दधामि। कहा गया, अर्थात् मैं अग्नि और चिति (अग्निवेदी) को समिधा से स्थापित करता हूँ। यहाँ ‘चिति’ ही यज्ञ वेदी है। यहाँ ‘चिति’ का अर्थ स्पष्ट रूप से भौतिक है, किंतु उसकी व्याख्या में आध्यात्मिक संकेत निहित है। यज्ञ-वेदी को ब्रह्मांड का लघु रूप माना गया है, जहाँ सृष्टि के तत्वों को पुनर्संयोजित किया जाता है। इस प्रकार ‘चिति’ का प्रारंभिक अर्थ हमें यह संकेत देता है कि भारतीय चिंतन में भौतिक और आध्यात्मिकता के बीच कोई कठोर विभाजन नहीं है। ब्रह्माण्‍ड और मैं को जानने की यात्रा कहीं से भी आरंभ की जा सकती है।

 

ब्राह्मण ग्रंथों में ‘चिति’ का अर्थ और अधिक गहराई प्राप्त करता हुआ मिलता है। वही वेदी, जोकि पहले यज्ञ का आधार थी, अब ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक बन जाती है। शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख मिलता है, “स य एषा चितिः स एष पुरुषः” अर्थात् यह चिति ही पुरुष है। यहाँ ‘पुरुष’ का अर्थ सामान्य मनुष्य नहीं है, यह समझलीजिए, वह तो ब्रह्मांडीय सत्ता है, जोकि समस्त सृष्टि का आधार है। इस प्रकार ‘चिति’ अब सिर्फ एक संरचना नहीं रह जाती है, यहां यह सृष्टि के मूल तत्व का प्रतीक बन जाती है। यह परिवर्तन भारतीय दर्शन की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है, जिसमें बाह्य जगत के माध्यम से आंतरिक सत्य की खोज की जाती है।

 

उपनिषदों में ‘चिति’ ‘चिति’ का प्रयोग आत्मा की चेतना या ब्रह्म की चेतना के रूप में होता है। यह वह शक्ति है जिससे सभी अनुभव संभव होते हैं। यहां सार रूप में कहा गया, “चिति ही वह तत्व है जिससे सब कुछ प्रकाशित होता है।”

 

आगे हमें ‘चिति’ का सबसे विकसित और परिष्कृत स्वरूप “कश्मीर शैव दर्शन” में देखने को मिलता है। यहाँ ‘चिति’ को परम चेतना, स्वतंत्र शक्ति और सृष्टि के मूल कारण के रूप में परिभाषित किया गया है। यहाँ ‘चिति’ परम शिव की स्‍वभाविक चेतन (स्वतंत्र चेतना) शक्ति है। इसे स्वतंत्र, सर्वव्यापी और सृजनशील शक्ति माना गया है। यही सृष्टि को उत्पन्न, संचालित और लय करती है। समस्त जगत ‘चिति’ का ही विस्तार है।

 

शिवसूत्र में कहा गया है, “चितिः स्वतन्त्रता विश्वसिद्धिहेतुः”, यानी कि “चिति की स्वतंत्रता ही विश्व की उत्पत्ति का कारण है।” इस तरह से कश्मीर शैव दर्शन में ‘चिति’ का स्वरूप अपने चरम पर पहुँचता है। अत: वह चिति ही है, जिससे विश्व का निर्माण और संचालन होता है। इस स्तर पर ‘चिति’ किसी समाज की चेतना से ऊपर संपूर्ण ब्रह्मांड की चेतना बन जाती है, एक ऐसी शक्ति, जो सर्वत्र विद्यमान है।फिर “स्पन्दकारिका” में कहा गया-

यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ।

तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः॥

 

तात्‍पर्य यह है कि जिस (चिति-शक्ति) के उन्मेष और निमेष से जगत का उदय और लय होता है, उस शंकर की हम स्तुति करते हैं। यहाँ ‘चिति’ शक्ति रूप में निहित है। अत: इस परंपरा में ‘चिति’ एक दार्शनिक अवधारणा से आगे आकर एक अनुभूति है। यह वह चेतना है, जो स्वयं को विश्व के रूप में प्रकट करती है। यहाँ ‘चिति’ और ‘शक्ति’ एक ही मानी जाती हैं; सृजन, स्थिति और लय की मूल ऊर्जा के रूप में यह व्‍याप्‍त है। क्षेमराज ने अपने ग्रंथ प्रत्यभिज्ञाहृदयम् में लिखा, चितिः स्वतन्त्रविश्वसिद्धिहेतुः। चिति स्वतंत्र है और वही विश्व की सिद्धि का कारण है।

 

तंत्र शास्त्रों में ‘चिति’ का प्रयोग शक्ति के रूप में होता है।  यहाँ ‘चिति’ का अर्थ महाशक्ति अथवा आद्य शक्ति है। यह वह ऊर्जा है जो साधना, ध्यान और जागरण के माध्यम से अनुभव की जाती है। इसे कभी-कभी कुंडलिनी शक्ति से भी जोड़ा जाता है। अभिनवगुप्त ने तंत्रालोक में कहा, “चितिः स्वातन्त्र्यमात्मनः विश्वसृष्ट्यादिकारिणी।” यानी कि चिति आत्मा की स्वतंत्र शक्ति है, जो विश्व की सृष्टि आदि कार्य करती है।

 

वहीं जब ये शब्‍द संस्कृत साहित्य में प्रयोग में लाया जाता है, तब उस अर्थ में यह बुद्धि, स्मृति, विवेक, चिन्तन शक्ति के अर्थ को परिभाषित करता है। प्राय: कवि ‘चिति’ का प्रयोग मानसिक जागरूकता या बौद्धिक क्षमता के लिए करते हैं। योग और ध्यान में ‘चिति’ का अर्थ शुद्ध चेतना से है। ध्यान की वह अवस्था जहाँ मन शांत होता है और चेतना शेष रहती है, इसलिए इसे ‘चैतन्य’ की अनुभूति भी कहा गया है।

 

वस्‍तुत: आधुनिक काल में ‘चिति’ को एक नया आयाम मिला, जब इसे राष्ट्र की आत्मा के रूप में समझा गया। इस दृष्टिकोण के अनुसार प्रत्येक राष्ट्र की एक मौलिक चेतना होती है, जोकि उसकी संस्कृति, परंपरा, जीवन-मूल्यों और सामाजिक व्यवहार को दिशा देती है। यही ‘चिति’ है। इस विचार के अनुसार राष्ट्र सिर्फ भौगोलिक सीमाओं से परिभाषित नहीं होता है, उसकी पहचान उसकी आंतरिक चेतना से होती है। यह चेतना ही उसे अन्य राष्ट्रों से अलग बनाती है और उसकी विशिष्टता को बनाए रखती है।

 

“हर राष्ट्र की अपनी चिति होती है”, यह विचार पं. दीनदयाल उपाध्याय का है। उन्होंने अपने प्रसिद्ध दर्शन एकात्म मानवदर्शन में ‘चिति’ को राष्ट्र की आत्मा (National Soul) के रूप में परिभाषित किया है। अत: संक्षेप में उनका आशय हुआ, ‘चिति’ यानी राष्ट्र की मौलिक चेतना यह तय करती है कि राष्ट्र की संस्कृति, जीवन-मूल्य, विकास की दिशा क्‍या होगी। इसलिए वे कहते हैं कि हर राष्ट्र की अपनी अलग ‘चिति’ होती है, और उसी के अनुसार उसका चरित्र व विकास निर्धारित होता है।

 

यहां  ‘चिति’ और ‘संस्कृति’ के संबंध को समझना अत्यंत आवश्यक है। ‘चिति’ मूल तत्व है, जबकि संस्कृति उसकी अभिव्यक्ति है। इसे बीज और वृक्ष के रूपक से समझा जा सकता है; बीज में वृक्ष की पूरी संभावना निहित होती है, किंतु उसका स्वरूप समय, स्थान और परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है। संस्कृति में परिवर्तन स्वाभाविक है। यह बाहरी प्रभावों, आंतरिक विकास और ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण निरंतर बदलती रहती है। लेकिन उसकी जड़ में जो मूल चेतना है, वही ‘चिति’ है।

 

यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है, क्या ‘चिति’ स्थायी है, या यह भी बदलती है? परंपरागत दृष्टि में ‘चिति’ को स्थायी माना गया है, किंतु ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह स्पष्ट है कि जब किसी भूभाग में व्यापक स्तर पर सांस्कृतिक, सामाजिक और जनसंख्या संबंधी परिवर्तन होते हैं, तब उसकी सामूहिक चेतना भी प्रभावित होती है। यदि किसी क्षेत्र में नई सभ्यता, नए मूल्य और नई जीवन-दृष्टि दीर्घकाल तक स्थापित हो जाते हैं, तब उस स्‍थ‍िति में वहाँ की ‘चिति’ भी नए रूप में अभिव्यक्त होने लगती है।

 

इसका अर्थ यह नहीं कि पुरानी चेतना पूरी तरह समाप्त हो जाती है, बल्कि यह कि वह परिवर्तित रूप में उपस्थित रहती है या कभी-कभी दब जाती है। या अबर देशों के अर्थ में इसे समझें और कहें तो हमें यह मानना ही होगा कि यह पूरी तरह से समय बीतने के साथ समाप्‍त भी हो जाती है। हालांकि मेरे गुरुदेव श्रद्धेय पंकज जी ने  पं.

 

दीनदयाल जी की स्‍थापना को सीधे चुनौती नहीं दी हैं किंतु उन्‍होंने यह पूरी तरह से अप्रत्‍यक्ष रूप से स्‍थापित किया है कि “चिति” भी किसी भौतिक-भौगोलिक राष्‍ट्र के लिए स्‍थायी तत्‍व नहीं है।

 

अत: इसे ऐतिहासिक और दार्शनिक रूप से संतुलित ढंग से समझना आवश्यक है। “चिति” जैसी अवधारणा मूलतः सांस्कृतिक-दार्शनिक व्याख्या है, न कि कोई ठोस ऐतिहासिक उपकरण, इसलिए इस विषय को भावनात्मक या एकरेखीय ढंग से नहीं समझते हुए बहुस्तरीय ऐतिहासिक साक्ष्यों और विचारों के आधार पर समझना अधिक उचित है।

 

भारतीय चिंतन में, विशेषकर दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित “चिति” की अवधारणा के अनुसार, चिति किसी राष्ट्र या समाज की गहरी अंत:प्रेरणा, उसकी मूल जीवन-दृष्टि और मूल्य-व्यवस्था का संकेत करती है। यह आवश्यक नहीं कि यह किसी एक धर्म या संप्रदाय से ही पूरी तरह परिभाषित हो; बल्कि यह दीर्घकालीन ऐतिहासिक अनुभव, सामाजिक संरचना, भाषा, कला, और सामूहिक स्मृति का सम्मिलित परिणाम होती है। इसी कारण, जब हम इतिहास में सांस्कृतिक परिवर्तन की बात करते हैं, तो उसे सिर्फ “आक्रमण” या “परिवर्तन” जैसे एक ही कारण से नहीं जोड़कर देखते हैं। किंतु इससे जुड़ा दूसरा यथार्थ भी है, जैसे कि मध्य एशिया, अफगानिस्तान या दक्षिण-पूर्व एशिया, उनका इतिहास वास्तव में बहुपरतीय रहा है।

 

उदाहरण के लिए, अफगानिस्तान प्राचीन काल में वैदिक और बाद में बौद्ध संस्कृति से गहरे रूप से जुड़ा रहा। गांधार क्षेत्र, जोकि आज के अफगानिस्तान और पाकिस्तान के हिस्सों में आता है, बौद्ध कला और शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। यहाँ संस्कृत और प्राकृत का प्रभाव था और यह संपूर्ण क्षेत्र भारतीय था। लेकिन समय के साथ यहाँ विभिन्न शक्तियों विशेषकर यूनानी, कुषाण, हूण और बाद में इस्लामी शासनों का प्रभाव पड़ा। इस परिवर्तन में “बलात परिवर्तन” का सबसे अधिक योगदान रहा। आखिरकार जीवन के भय ने यहां सब कुछ बदल दिया, इसमें व्यापार, राजनीतिक सत्ता, सामाजिक गतिशीलता और स्थानीय स्वीकृति जैसे अनेक कारकों को देखा जा सकता है।

इसी प्रकार इंडोनेशिया का उदाहरण लें। यहाँ प्राचीन काल में हिंदू प्रभाव यानी यहां की चिति सनातन रही, फिर और बौद्ध प्रभाव अत्यंत प्रबल था, मजापहित और श्रीविजय जैसे साम्राज्य इसका प्रमाण हैं। हां, कुछ-कुछ जगह बाली द्वीप पर हिंदू संस्कृति जीवित है। लेकिन इंडोनेशिया का अधिकांश भाग आज मुस्लिम बहुल है। यह परिवर्तन मुख्यतः सैन्य आक्रमण के साथ ही व्यापारियों, सूफी और स्थानीय राजाओं के माध्यम से धीरे-धीरे हुआ।

 

इसके बावजूद, वहाँ की भाषा, कला, रामायण-महाभारत की परंपराएँ और सांस्कृतिक प्रतीक आज भी भारतीय प्रभाव को दर्शाते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि सांस्कृतिक परिवर्तन के बावजूद एक गहरी सांस्कृतिक निरंतरता भी बनी रही। पर क्‍या हम यह कह सकते हैं कि भारत की जो वर्तमान चिति है, वही आज इंडोनेशिया की है? 

 

इसी तरह से मध्य एशिया के क्षेत्रों, जैसे उज्‍बेकिस्तान या ताजिकिस्तान में भी प्राचीन काल में भारतीय सनातन सांस्कृतिक प्रभाव में रही। वहां की “चिति” भी भारत की तरह ही सनातन हिन्‍दू रही, फिर बौद्ध पंथ यहाँ तक फैला, तब भी बहुत कुछ चित‍ि स्‍थ‍िर रही, लेकिन बाद में इस्लाम का प्रसार हुआ और सामाजिक-धार्मिक संरचना बदल गई। फिर भी भाषा, लोक परंपराओं और कुछ सांस्कृतिक तत्वों में पुरानी परतें पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं। अब फिर वही प्रश्‍न उठता है कि क्‍या उज्‍बेकिस्तान या ताजिकिस्तान की “चिति” को भी हम आज भारत की तरह ही सनातन हिन्‍दू कह सकते हैं? 

 

यहाँ एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि संस्कृति का परिवर्तन हमेशा बहुआयामी होता है। जब कोई नया धर्म, पंथ या विचारधारा किसी क्षेत्र में आती है तब वह वहाँ की पूर्ववर्ती परंपराओं के साथ संवाद करती है। कभी-कभी टकराव होता है, तो कभी समन्वय भी होता है। उदाहरण के लिए, भारतीय महाद्वीप में इस्लाम के आगमन के बाद संघर्ष हुआ, हां, यह अवश्‍य दिखा कि कैसे भक्ति आंदोलनों के माध्यम से एक नई सांस्कृतिक धारा विकसित हुई, जिसमें दोनों परंपराओं के तत्व सम्मिलित होते हुए भी दिखे।

 

ऐसे में अब यदि “चिति” के संदर्भ में इसे देखें, तो यह कहना अधिक सटीक होगा कि किसी क्षेत्र की चिति एक स्थिर, अपरिवर्तनीय वस्तु नहीं है, बल्कि वह समय के साथ विकसित होती है। यदि हम उपाध्याय जी की मूल परिभाषा को मानें, तो वे चिति को अपेक्षाकृत स्थायी मानते हैं और संस्कृति को उसका परिवर्तनीय रूप। लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो जब समाज की मूल संरचना, मूल्य और पहचान लंबे समय तक बदलते रहते हैं, तो उस समाज की “चिति” भी एक नए रूप में विकसित हो सकती है। कई बार वह पूरी तरह से बदल भी जाती है, पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश का ताजा उदाहरण आज हमारे सामने मौजूद है। वहां भारतीय “चिति” कहां दिखती है! इसलिए यह कहना सही होगा कि “इस्लाम के आगमन से यहां की पूरी की पूरी “चिति” ही

 

बदल गई है। कई क्षेत्रों में धार्मिक और सांस्कृतिक परिवर्तन हुए हैं।

 

अंततः, “चिति” जैसी अवधारणा को समझते समय हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह एक दार्शनिक रूपक (philosophical metaphor) है, न कि ऐसा ऐतिहासिक उपकरण जिससे हम जटिल सामाजिक परिवर्तनों को सरल निष्कर्षों में बाँध दें। इसलिए संतुलित निष्कर्ष यही होगा कि धर्म और संस्कृति के परिवर्तन से किसी समाज की पहचान में बड़ा बदलाव आता है, स्‍वभाविक है ऐसे में “चिति” भी बदलती है। भारत इस संदर्भ में एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। क्‍योंकि यहां बहुसंख्‍यक हिन्‍दू सनातन समाज निवासरत है, यहाँ हजारों वर्षों में अनेक सांस्कृतिक परिवर्तन हुए, इन सभी ने भारतीय समाज को प्रभावित भी किया, किंतु प्रज्ञा पूरी तरह से हिन्‍दू सनातनी रही, इसलिए यहां “चिति” वही रहती आ रही है जोकि वैदिक काल के समय में मौजूद रही जोकि भारत की एक मूल सांस्कृतिक धारा आध्यात्मिकता, सह-अस्तित्व, विविधता में एकता और जीवन के प्रति समग्र दृष्टिकोण में है। यह निरंतरता ही भारत की ‘चिति’ का मूल तत्व मानी जाती है, किंतु यह ध्‍यान रहे, यह तभी तक है जब तक कि यहां हिन्‍दू सनातनी हैं। 

 

2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल 30 से अधिक जिले ऐसे हैं जहाँ मुस्लिम आबादी 50 प्रतिशत से अधिक यानी बहुमत में है। हालांकि, 100 से अधिक जिलों को ‘अल्पसंख्यक केंद्रित’ (Minority Concentrated Districts) के रूप में वर्गीकृत किया गया है जहाँ मुस्लिम आबादी का एक बड़ा हिस्सा (20 प्रतिशत से अधिक) रहता है।

 

“जम्मू-कश्मीर” के अधिकांश जिले मुस्लिम बहुल हैं। मुख्य जिलों में शामिल हैं-  श्रीनगर (95.19 फीसद), अनंतनाग (97.99), बारामूला (95.15), कुपवाड़ा (94.59), बडगाम (97.65), पुलवामा (95.49), पुंछ (90.45), कुलगाम (98.49), राजौरी (62.71), डोडा (53.82 प्रतिशत) आदि।

 

असम में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत काफी अधिक (लगभग 34.22%) है और यहाँ कई जिले मुस्लिम बहुल हैं; धुबरी, बारपेटा, गोलपारा, हैलाकांडी, करीमगंज, नगांव, मरिगांव और दरांग। पश्चिम-बंगाल राज्य की कुल आबादी का लगभग 27% हिस्सा मुस्लिम है,  मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर। केरल में मुस्लिम आबादी लगभग 26.56 प्रतिशत है; मलप्पुरम (यहाँ मुस्लिमों की संख्या सबसे अधिक है)।

 

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी संख्या के मामले में सबसे अधिक है (लगभग 3.85 करोड़), लेकिन बहुमत वाला एक जिला (2011 के आंकड़ों के अनुसार) प्रमुखता से आता है, वह है रामपुर (50.57 फीसद)। अन्य महत्वपूर्ण जिलों में  मुरादाबाद, संभल, सहारनपुर और बिजनौर (जहाँ आबादी 40 प्रतिशत से अधिक है)।

 

बिहार में मुस्लिम आबादी लगभग 16.87 प्रतिशत है; किशनगंज (एकमात्र जिला जहाँ मुस्लिम बहुमत में हैं)। लक्षद्वीप : यह भारत का एकमात्र ऐसा प्रशासनिक क्षेत्र है जो लगभग पूरी तरह मुस्लिम बहुल है, यहां मुस्लिम आबादी: लगभग 96.58 प्रतिशत है। हरियाणा में नूंह (जिसे पहले मेवात कहा जाता था), यहाँ मुस्लिम आबादी बहुमत में है।

 

इसी तरह से 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, भारत में ईसाई बहुल (जहाँ ईसाई आबादी 50 फीसद से अधिक है) जिलों की संख्या 35 से अधिक है। ये मुख्य रूप से पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में स्थित हैं।

नागालैंड में लगभग 11 जिले आते हैं। यह राज्‍य भारत का सबसे बड़ा ईसाई बहुल राज्य है, जहाँ लगभग 87.93 फीसद जनसंख्‍या ईसाई है।  दीमापुर, कोहिमा, मोकोकचुंग, मोन, पेरेन, फेक, तुएनसांग, वोखा और ज़ुन्हेबोटो। इन सभी जिलों में ईसाइयों की संख्या बहुत अधिक (90 प्रतिशत से ऊपर) है।

 

मिजोरम में लगभग 08 जिले ऐसे हैं, मिजोरम में ईसाई आबादी लगभग 87.16 प्रतिशत है। आइजोल, लुंगलेई, चम्फाई, लावटलाई, सैहा, ममित, कोलासिब और सेरछिप ये सभी जिले हैं।

मेघालय में लगभग 07 जिले हैं,  मेघालय की कुल आबादी का लगभग 74.59 फीसद हिस्सा ईसाई है। ईस्ट खासी हिल्स (शिलांग), वेस्ट खासी हिल्स, साउथ गारो हिल्स, वेस्ट गारो हिल्स, ईस्ट गारो हिल्स, री-भोई और जयंतिया हिल्स ये यहां के जिले हैं।

 

मणिपुर में लगभग 5-6 जिले ऐसे हैं, यहां ईसाई आबादी लगभग 41.29 प्रतिशत है, लेकिन पहाड़ी जिलों में वे बहुमत में हैं। चुराचांदपुर (सर्वाधिक ईसाई आबादी वाला), चंदेल, उखरुल, सेनापति और तामेंगलोंग ये वो जिले हैं।

अरुणाचल प्रदेश में ईसाई आबादी तेजी से बढ़ी है और यहाँ 04 जिलों में वे बहुमत में हैं। यहां के प्रमुख जिले, कुरुंग कुमे, तिरप, पापुम पारे और लोंगडिंग है। अब अन्य राज्यों के प्रमुख जिलों की बात करें तो उत्तर-पूर्व के बाहर भी कुछ जिलों में ईसाइयों की संख्या बहुत प्रभावशाली या बहुमत के करीब है, केरल में कोट्टायम, इडुक्की और एर्नाकुलम (यहाँ आबादी 30-45% के बीच है, पूर्ण बहुमत नहीं पर प्रभाव बहुत अधिक है)। तमिलनाडु में कन्याकुमारी (यहाँ ईसाइयों की संख्या काफी अधिक है)।झारखंड में सिमडेगा (यह झारखंड

 

का एकमात्र ईसाई बहुल जिला माना जाता है, जहाँ आबादी लगभग 51 प्रतिशत है)। अंडमान और निकोबार में निकोबार जिला (यहाँ लगभग 70.9% ईसाई आबादी है)।

 

अब सांख्यिकीय सारांश (2011 जनगणना) के अनुसार यहां देख लेते हैं, नागालैंड 87.93 प्रतिशत लगभग सभी जिले ईसाई बहुल हैं। मिजोरम 87.16 फीसद सभी जिले ईसाई बहुल हैं। मेघालय 74.59 प्रतिशत अधिकांश जिले ईसाई बहुल हैं। मणिपुर 41.29 फीसद सिर्फ पहाड़ी जिले ईसाई बहुल हैं।

 

इस तरह से यदि देखें तो 2011 की जनगणना के आधिकारिक आंकड़ों और हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत के 09 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हिंदू आबादी 50 प्रतिशत से कम है, जिसके आधार पर उन्हें वहाँ ‘अल्पसंख्यक’ माना जाता है। हिंदू अल्पसंख्यक वाले राज्य हैं,  मिजोरम: 2.75%, नागालैंड: 8.75%, मेघालय: 11.53%, अरुणाचल प्रदेश: 29%, मणिपुर: 41.39%, पंजाब: 38.40%, लक्षद्वीप: 2.5%, लद्दाख: लगभग 12.11%, जम्मू और कश्मीर: 28.44 प्रतिशत।

 

अंत में यहां यह समझ लें कि जैसे-जैसे भारत में हिन्‍दू जिलों और राज्‍यों में अल्‍पसंख्‍यक होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे उन जिलों और राज्‍यों में भारत की मूल सनातन “चिति” भी बदलती जा रही है। हिन्‍दू त्‍यौहारों पर आक्रमणों की संख्‍या में इजाफा हो रहा है, हिन्‍दू मारे जा रहे हैं, सड़कों पर नमाज हो रही है, लव जिहाद जैसे आम बात हो गया है, मंदिर तोड़े जा रहे हैं, आदि-आदि अनेक समस्‍याएं निरंतर सामने आ रही हैं और बढ़ती जा रही हैं। यानी कहने का कुल निष्‍कर्ष यह है कि भले ही पं. दीनदयाल उपाध्‍याय ने “चिति” के संदर्भ में स्‍थायित्‍व एवं विशेष राष्‍ट्र के संदर्भ में भारत की बात कही है, लेकिन यह भारत भी अब जो शेष है, वह अपने को बचा नहीं रख पा रहा है! संस्‍कृति तेजी से बदल रही है और इसी के साथ शेष बचे भारत की “चिति” भी… जिसे हम जैसे सभी स्‍वजन बनाए रखने के लिए सतत् प्रयासरत् हैं!

 

साधना के पात्र

शून्य की खोज

आप सभी लोगों से निवेदन है कि हमारी पोस्ट अधिक से अधिक शेयर करें जिससे अधिक से अधिक लोगों को पोस्ट पढ़कर फायदा मिले |
Share This Article
error: Content is protected !!
×