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800 सालों का इतिहास: जब यहूदी–मुस्लिम साथ थे, और आज आमने-सामने

800 साल पहले यहूदी और मुसलमान एकजुट होकर ईसाईयों से लड़े थे आज ईसाई और यहूदी साथ है लेकिन मुसलमानो के विरुद्ध नया धर्मयुद्ध कर रहे है।

 

कहानी सदियों पुरानी है ज़ब भारत को हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ जैसे वैभवशाली नगर सुशोभित कर रहे थे मगर अरब के रेगिस्तानो मे जीवन कठिन था। लोग कबीले बनाकर रहते थे और कई देवी देवताओं की मूर्तियां बनाकर उन्हें पूजते थे।

 

तब हज़रत इब्राहिम हुए जिन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया। इब्राहिम के दो बेटे हुए इस्माइल और ईसाक, इस्माइल की परम्परा को मुसलमानो ने निभाया जबकि ईसाक को यहूदी तथा ईसाईयों ने। ईसाक के बेटे याक़ूब हुए जिन्हे इजरायल कहा जाता है, याक़ूब के 12 बेटे जन्मे जिन्होंने यहूदियों के 12 शक्तिशाली कबीले स्थापित किये।

 

ये लोग येरुशलम के आसपास रहते थे, सूखा पड़ा तो मिस्त्र चले गए जहाँ अत्याचार शुरू हो गए। हज़रत मूसा जन्मे जो यहूदियों को मिस्त्र से छुड़ाकर लाये, मूसा को ही ईश्वर ने एक जमीन का वचन दिया था जिसे आज आप ग्रेटर इजरायल कहते है। फिर यहूदियों के एक न्यायप्रिय राजा डेविड हुए जिनका निशान आज इजरायल के ध्वज पर है।

 

डेविड के पुत्र हुए सोलोमन जिन्होंने यहूदियों का मंदिर टेम्पल माउंट बनवाया था। सोलोमन के समय येरुशलम सबसे वैभवशाली नगर बना, इसकी चमक ने आक्रांताओ को आकर्षित किया। बेबीलोन ने आक्रमण किया और यहूदियों का कत्लेआम किया साथ ही उनका मंदिर भी तोड़ दिया।

 

पारसी धर्म बना तो उनके राजा ने यहूदियों को फिर से येरुशलम मे स्थापित किया साथ ही मंदिर बनवाया। लेकिन असली नरसंहार तो अब होना था, एक यहूदी परिवार मे ईसा मसीह जन्मे जिन्होंने कुछ परंपराओ का विरोध किया। ईसा मसीह को सूली चढ़ाने वाले यहूदी ही थे, उस समय यूरोप मे रोमन साम्राज्य था।

 

ज़ब रोमन साम्राज्य ने ईसाई धर्म अपनाया तब यहूदियों पर असली गाज गिरी, ईसा मसीह की सूली के कारण यहूदी हेय हो गए। फिर से यहूदियों का नरसंहार हुआ और मंदिर तोड़ दिया गया, जो आज तक बन नहीं सका इसकी बस पश्चिमी दीवार बची है। 600 साल यहूदी ईसाईयों के डर से भागते रहे, कईयों को भारत ने शरण दी और आखिर ज़ब इस्लाम आया तो यहूदियों को राहत मिली।

 

मुसलमानो ने येरुशलम पर कब्जा किया और यहूदियों को बसने दिया, हालांकि यहूदियों का जीवन एक कॉन्ट्रैक्ट था। मुसलमान यहूदियों से जजिया कर लेते थे और उन्हें जिंदा रहने तथा अपनी उपासना का अधिकार भी देते थे। जहाँ टेम्पल माउंट था वहाँ मुसलमानो ने अल अक़्सा मस्जिद बनाई।

 

मुसलमानो के अनुसार ज़ब हजरत मुहम्मद स्वर्ग की यात्रा पर गए थे तो यही से गए थे। इस मस्जिद के परिसर मे वह पत्थर रखा है जहाँ से मुहम्मद के घोड़े ने उड़ान भरी थी।

 

अब ये स्थान भी यहूदी मुस्लिम विवाद का विषय बना हुआ है, खैर उस समय यहूदियों को जीवन जीने का अधिकार था यही बहुत था। यहूदी कही भी रहे मगर अपने उस टेम्पल माउंट की दिशा मे ही प्रार्थना करते थे, 400 सालो बाद ईसाईयों ने मुसलमानो के विरुद्ध धर्मयुद्ध छेड़ दिया और येरुशलम मे घुस आये, फिर से नरसंहार का दौर गहराया।

 

लेकिन ज़ब मुसलमानो का ऑटोमन साम्राज्य आया तो यहूदियों को फिर राहत मिली और वे बसने लगे। हालांकि यूरोप मे औद्योगिक क्रांति ने यहूदियों को अपनी ओर आकर्षित किया क्योंकि ये व्यापार वाला समाज है। लेकिन इसी के साथ यूरोप मे एंटी यहूदी विचारधारा भी फ़ैल गयी, हिटलर का युग आते आते तो सभी को पता है यहूदियों के साथ क्या हुआ।

 

यहूदियों ने येरुशलम लौटना शुरू किया कुछ अमेरिका भी गए लेकिन उससे पहले ही कुछ दार्शनिको ने कहा कि ज़ब तक यहूदियों को अपना देश नहीं मिल जाता वे इसी तरह भटकते रहेंगे। यहूदियों ने जर्मनी के विरुद्ध ब्रिटेन का साथ दिया और उन्हें इजरायल मिल गया, लेकिन अब मुसलमानो के साथ समीकरण बिगड़ गया।

 

मुसलमान इजरायल वाली भूमि पर पहले से थे और ब्रिटेन ने ये हिस्सा यहूदियों को दे दिया था। ज़ब से ईसाई थोड़े सौम्य हुए है यहूदियों की उनसे अच्छी बनती है और मुसलमान अब शत्रु हो गए है।

 

इस कहानी मे हिन्दू, बौद्ध, सिखो और जैनों के लिए एक सबक है। जितना आपसी अंतरो पर ध्यान दोगे उतना तनाव बढेगा और जितना समानता देखोगे उतना भाईचारा बढेगा। यदि हम आपस मे लड़ेंगे तो हमारा भी यही हाल होना है, वैसे हमारे बीच मे ऐसा झगड़ा ना तो था, ना कभी होगा लेकिन सतर्क रहे।

 

दूसरा यहूदी मुसलमान और ईसाई जितना हजरत मूसा से खुद को जोड़ेंगे उतना उनमे एकता बढ़ेगी, लेकिन वे ऐसा करेंगे नहीं क्योंकि इन्होने अंतर खाई मे बदल दिया है। मुसलमानो को चाहिए कि इजरायल यहूदियों के पास रहने दीजिये, फिलिस्तीन भूल जाइये। यहूदियों को चाहिए कि हजरत मूसा को वचनीत भूमि भूल जाए, आप हिन्दुओ की तरह 120 करोड़ नहीं हो तो ग्रेटर इजरायल मे बसोगे कैसे?

 

ईसाईयों को चाहिए कि जो हुआ उसे भूल जाए, एक हिन्दू होने के नाते हमें सहानुभूति है कि सूली पर नहीं लटकाना चाहिए था मगर अब हो चुका। ईसा मसीह खुद टेम्पल माउंट को पवित्र देखना चाहते थे, आपने तो तोड़ ही दिया।

 

संयुक्त राष्ट्र को चाहिए कि येरुशलम का विवाद जल्दी हल करें, एक ही जगह पर यहूदियों को टेम्पल माउंट और मुसलमानो को अल अक्सा मस्जिद चाहिए ये संभव नहीं है। पहले मंदिर था तो कायदे से मंदिर ही रहना चाहिए, लेकिन अल अक्सा मस्जिद मे एक पत्थर रखा है जिस पर पैर रखकर हजरत मुहम्मद स्वर्ग गए थे। उस पत्थर को सहज कर कही ओर रख सकते है।

 

हिन्दु और बौद्ध को यहाँ बीच मे कूदना होगा क्योंकि आपके 14 देश है, इसलिये बीच बचाव कीजिये। यदि आप नहीं गए तो इब्राहिम के ये बच्चे आपस मे लड़ लड़ कर एक पूरी सभ्यता को खत्म कर देंगे। यदि दुनिया एक वैश्विक ग्राम है तो इसका असर आप पर भी पड़ता रहेगा। अमेरिका और ईरान मे कौन जीता वो छोड़ दीजिये, आप सिर्फ लाशें गिनिये।

 

ये इसी तरह लड़ते मरते रहेंगे, हर 5-10 साल मे एक युद्ध लड़ते है यदि किसी अन्य धार्मिक पक्ष ने बचाव ना किया तो आगे भी यही होता रहेगा ।

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