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रामनवमी और नवरात्र: आस्था, संस्कृति और चिंतन

पिछले कई साल से मैंने एक बात पर गौर किया है कि नवरात्र पर अचानक चौराहों,मेट्रो,मंदिरों बाजारों प्रतिष्ठानों और आवासीय क्षेत्रों के आस पास भीख मांगने वाली बच्चियों की संख्या बहुत बढ़ जाती है।झुंड के झुंड ये लोग घरों के आस पास घूमते हैं और कन्यापूजन के बहाने आटा,फल,पैसा,खाना लेकर इकट्ठा करते हैं।

 

पैसा मिलने के बाद इन्हें तिलक मिटाते और #कलावा तोड़ते हुए जब देखा तो विश्वास हो गया कि इनसे कोई ये सब काम करवा रहा है।#कन्यापूजन वाले दिन #कंजक लाने का ठेका सा उठने लगा है।

 

हिंदुओं को जानवरों की चर्बी से बना घी ही पूजा में प्रयोग करने की क्या विवशता है समझ में नही आता। रोहिंग्याओं की लूट का जरिया हो गया है कन्याओं को खिलाना और उन्हें दक्षिणा देना।संगठित रूप से  म्लेच्छ अपनी बच्चियों को इस हेतु टूल बना रहे हैं।बालिकाओं का क्या ही दोष पर उन्हे श्रद्धा की बजाय केवल पैसों के लिए इस्तेमाल करने वाले समुदाय का पतन हो चुका है।

 

भारत के कई इलाको में घर या क्षेत्र जिनमें गाय का मांस खाया जाता वहां देवी का वास नही हो सकता।ऐसे क्षेत्रों से  झुंड के झुंड कन्या पूजन के दिन औरतें बच्चियों को लेके निकलती हैं।

 

महागौरी की शुभता का कुछ तो ध्यान रखिए,पुण्य पाने के लालच में कितना मल मज्जा पीब इकट्ठा कर रहे हो यह पता कर तो लो।

 

हिंदुओं अगर तुम्हे कंजक खिलाने के लिए कोई नहीं मिल रहा तो अपने नाते रिश्तेदार की बेटियों के खाते में पैसे भेज दो पर गोमांस खाने वालों को पैसा देकर महापाप न करो।

 

विचार अवश्य करिएगा महागौरी आपकी और आपके परिवार की रक्षा करें।…….

 

आज अन्नपूर्णाओं की रसोई का नववर्ष है। उस देश में जहाँ भूखे पेट सोना बहुत बड़ा दोष है, अन्नपूर्णायें चूल्हे को विराम दे रात में नवान्न देवी को अर्पण कर पुनरारम्भ करेंगी।

नवमी के नव रोटी तब्बे पेट भरी!

अष्टमी नवमी की इस सन्धि रात्रि में नवारम्भ होगा। श्रीराम का जन्मदिन है। राजतिलक होते होते उनको वनवास भी इसी दिन सुनाया गया।

मध्याह्न में जन्मा सूर्यसम तेजस्वी पुरुषोत्तम इस राष्ट्र की भाग्यरेखा परिवर्तित करने निकल पड़ा। १४ अयनचक्र वह दक्षिण की ओर बढ़ता गया और इस महान देश की हर जाति, हर समाज को रामरक्षा सूत्र में जोड़ता गया।

जिन राक्षसों के यहाँ देवता और ब्रह्म भी बन्दी थे, उनका संहार कर उसने दर्शा दिया कि अप्रतिहत मानवीयता के आगे खल शक्तियाँ टिक नहीं सकतीं।

कल अब तक के महानतम महामानव का जन्मदिन है। मनाइये, पूरे उत्साह से।

जन जन में रमने वाले राम आ रहे हैं, सब मंगल होगा।

 

रामनवमी

गृहदेवियों की कड़ाही में वैष्णवी तंत्रशास्त्र

 

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आज चैत्र-नवरात्र की नवमी विद्ध अष्टमी है। भाद्रपद की कृष्ण-अष्टमी, चैत्र की शुक्ल-अष्टमी, कार्तिक की अमावस्या, फाल्गुन की कृष्ण चतुर्दशी तथा पूर्णिमा, ये सभी काल-रात्रियाँ हैं।

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महारात्रि, तथा भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को मोहरात्रि भी कहा जाता है किन्तु हैं सभी कालरात्रियाँ ही। आज की रात्रि साक्षात कालरात्रि है। आज की रात्रि में निद्रा का निषेध है।

रक्तबीज गर्वोन्मत्त था। भूमि पर पतित उसका प्रत्येक रक्त-बिन्दु एक नवीन रक्तबीज बन उठ खड़ा होता था, और उसे मारने का प्रत्येक प्रयास नवीन रक्तबीजों को जन्म देता जा रहा था। मनुजता त्राहि कर कर रही थी, देवत्व किंकर्तव्यविमूढ़ था, और राक्षसी अट्टहास से दिशायें कम्पित थी।

उपाय एक था – उस संक्रामकता का कोई भी बीज धरा को स्पर्श न कर सके, और उन परिस्थितयों में यह असंभव था।

महाकाल काल से ऊपर अवस्थित है क्योंकि महाकाल की शक्ति सृजन एवं विनाश का एक संतुलन सदा बनाये रखती है। और उस महाकाल की संतुलन शक्ति है महाकाली। संसृति की सुरक्षा हेतु वह हर अत्य, अनीति, अत्याचार-अनाचार के रक्त-बिंदुओं को अपने खप्पर में रोप कर अपनी लपलपाती जिह्वा से चाट जाती है ताकि उसकी निर्दोष-निष्पाप संततियों का अस्तित्व बचा रहे। अबोध शिशु अपनी माता के उस रौद्र स्वरूप को देख कर सहम जाता है, चीत्कार कर उठता है, त्राहिमाम कह उठता है, क्योंकि उसे माता की करुणामयी मूर्ति देखने का अभ्यास है। उसे नहीं ज्ञात है कि शवाकार लेटे शिव के वक्ष पर पग धरे और रक्तिम जिह्वा काढ़े उस रौद्र मूर्ति में भयावहता नहीं, नारी सुलभ लज्जा का सूक्ष्म चित्रण है। दाँतों तले दबी जीभ निकाले नारी अपनी भूल को, अपनी लज्जा को ही अभिव्यक्त कर रही होती है।

वह आद्या समस्त सृष्टि की आदियोनि है, अंतरिक्ष के जन्म से पूर्व, कल्प के जन्म से पूर्व उसका अस्तित्व था, और महाप्रलय के बाद भी रहेगा। वह श्यामा त्रिपुरसुंदरी भुवनमोहिनी हिरण्यगर्भ विष्णु एवं महाकाल रुद्र की अभिलाषा का लक्ष्य है। वे इसके कामबाणों से बिद्ध हो कर ही सक्रिय हो पाते हैं। जब तक इस महानटिनी प्रिया के चरण उनके हृदय का स्पर्श नहीं करते, वे निष्क्रिय ही रहते हैं। चञ्चल कटाक्ष वाली प्रकृति उसी निर्विकार आद्या की प्रतिरूप छाया है जिसके लिये पुरुष पूरक है किन्तु गौण है।

भारतीय तंत्रदर्शन के विद्वान जो भी कहें, भारतीय ग्राम्य दर्शन की एक अपनी ही पीयूषधारा है। भोजपुरी प्रदेश और भोजपुरी परिवेश में कालिका की मूर्ति नहीं पूजी जाती। भोजपुरिये तो पूजते हैं एक चैत्य पर बने सात स्तन जो मातृका शक्ति का प्रतीक है। यही सप्तस्तन धारिका ही हमारी, हम भोजपुरियों की पराशक्ति पराम्बा कालिका है। हम अनादि से अनंत तक के बुभुक्षित-पिपासितों की माता सात से कम स्तन वाली हो भी कैसे सकती है? हम जन्म जन्म के भूखे! हमारा पेट भरना कोई मजाक थोड़े है!

तो आज उसी सप्त-मातृका के उपासना की रात्रि है जो विशुद्ध वात्सल्य की प्रतीक है।

यही हमारी धरती माता है, यही शस्य-लक्ष्मी है, यही वाणी और भूमि स्वरूपा गौ है, यही जगदम्बा स्वरूपिणी जगद्धात्री है, यही पति-पत्नी के मध्य का अनुराग और कामभाव है। असुर संहारिणी खड्ग-खप्पर धारिणी भीषण कात्यायनी से भिन्न हम भोजपुरियों के स्वभाव के अनुकूल, दूध-पूत देने वाली, हमारे लोकधर्म की देवता, रुद्रप्रिया से भिन्न विशुद्ध वैष्णवी स्वभावा!

और आज उसे अर्पित किया जाता है सात जोड़ा पूरी, गुड़ और चावल का चारुपाक, मरसा का रक्तिमवर्णी शाक, यव-गोधूम चूर्ण से निर्मित अवलेह, लौंग-गुड़ की धार के साथ!

 

सात जोड़ा पूरी! नवरात्रि के साथ जुड़ी नौ की संख्या से आविष्ट जनमानस नौ पूरियां अर्पित करता है किन्तु यह परम्परा खंडित परम्परा है। उस आद्या को सात जोड़ी पूरियां अर्पित करने का ही लोक-विधान है क्योंकि वह कालरूप भगवती कालिका अपने संतानों को भयमुक्त करने को भले वैष्णवी स्वरूप धारण किये है, किन्तु है वह काल की अधिष्ठात्री ही! काल की सात इकाइयों सप्तवारों की दिन-रात की जोड़ी सात जोड़े पूरियों से ही संतुष्ट होती है।

 

भोजपुरियों का ‘पूरी’ शब्द भी अर्थगहन शब्द है।

 

जिसे सारा भारत पूरी कहता है उसे भोजपुरिये पूड़ी कहते हैं।

 

भोजपुरियों की पूरी तो है ‘दाल-पूरी’! और भाषाशास्त्र के अनुसार यही उचित भी है। जिसे पूरन से भर कर पूरा किया जाय वह होती है पूरी! और पूरन बनती है नमक-हल्दी-हींग के छौंक वाली पिसी चने की दाल! यह भगवती-नैवेद्य  पूर्णतः दार्शनिक एवं तांत्रिक अवधारणाओं का भौतिक मूर्त स्वरूप है।

 

पूरन अर्थात पूर्णम! तंत्रशास्त्र के अनुसार पूर्णम है ‘अ’ से ‘ह’ तक की बावन अक्षरों की वर्णमाला! और इन्ही बावन वर्णों की वर्णमाला की एक संज्ञा वर्णमालिनी भगवती है जो उसी आद्या, उसी गौ, उसी वाणी का स्वरूप है।

अपने अक्षर रूप में निर्गुण भगवती की प्रतीक वह अक्षरा कभी क्षरित न होने वाली निराकार-निर्गुण परमाशक्ति भगवती की ही द्योतक है। वही जब शब्दों में पैठती है तो साकार सगुण हो जाती है। यह पूर्णम, यह ‘अ’ से ‘ह’ तक की बावनी, यह चने की उबली पिसी दाल वही निराकार निर्गुण पराशक्ति है जिस पर जल के साथ गूँथे हुए गोधूम-चूर्ण का माया-कवच चढ़ाया जाता है। गेहूँ का आटा है कण रूप में बिखरी सृष्टि,

और जल है नारायणी करुणा।

 

नार का अर्थ जल है।

 

नारायणी करुणाजल से मिल कर संसृति का गोधूम चूर्ण जिस माया के रूप में पिण्ड का आकार पाता है उसका आवरण स्वीकार कर वह स्वाद-गंध-रंग जैसी निराकार पराशक्ति रूप की विशिष्टता ग्रहण कर लेती है।

चने की हल्दी-हींग-नमक वाली पिसी दाल, आटे की लोई में भर कर कर्मगति के बेलने से नियति की चौकी पर बेली जाती है। निराकार शक्ति पर माया का आवरण नियति तथा कर्मगति के अनुसार एक रूप पाती है।

 

किन्तु स्वाद हेतु मात्र इतना ही पर्याप्त नहीं है।

 

आवश्यकता होती है स्नेह की! आवश्यकता होती है तपश्चर्या की! स्नेह और तप के बिना हर निर्मिति रूखी है, कच्ची है!

 

वही स्नेह है घृत! और वही तप है आग! तप्त परिस्थियों की कड़ाही में तपश्चर्या की अग्नि के ऊपर खौलते स्नेहसागर में माया कवच से वेष्ठित परम पूर्णम जब पकती है तब बनती है हम भोजपुरियों की भरी-पूरी दाल भरी पूरी! 

 

आज घर-घर में साक्षरा और निरक्षरा गृहदेवियों की कड़ाही में साक्षात अक्षरा परमा प्रकृति का वैष्णवी तंत्रशास्त्र उस आद्या को समर्पित होने हेतु व्यवहारिक रूप में उतरता है। उतर रहा है!!

 

मैं, एक तपभ्रष्ट, ऊपर से नीचे तक आटे का लोंदा, किसी भी पूर्णम की सम्भावना से रहित, किसी भी स्नेह और तप के संसर्ग से वञ्चित, यह जानता हूँ कि जब मेरे पूर्वजन्मों के पुण्य का चन्द्रमा क्षीण हो कर पाण्डुरवर्णी हो चुकेगा,

 

जब मरणसूर्य मेरे सिरहाने आ खड़ा होगा,

 

उस समय यही आद्या मेंरे पास मृत्युप्रिया बन कर आयेगी और मैं उसका हाथ पकड़ कर चल दूँगा एक नये मार्ग पर!

 

उसका हाथ पकड़ लेने के पश्चात मुझे कोई भय नहीं सतायेगा क्योंकि भय तभी तक है जब तक मृत्युप्रिया का हाथ थामने को नहीं मिलता। उसका हाथ थामते ही पार्वती रूपा धरित्री से लेकर मृत्युलोक की अजानी भूमि तक एक वृन्दावन छाया मिलेगा।

 

भय कैसा? मृत्यु और अमृत उसी एक ममतामयी के दो रूप हैं। उसी के दिवस और रात्रि रूपी दो आनन!

कालाष्टमी की शुभकामनायें!

आगे और है

 

रामनवमी : राम जी लिहलें अवतार रे चइतवा

 

फागुन रेचक है। वास्तविक मधुउत्सव तो चैत्र में होता है। नौ दिन नवदुर्गा अनुष्ठान, जन जन में रमते राम का नवजन्म नये संवत्सर में।

नवान्न दे पुनः प्रवृत्त होती धरा का स्वेद सिंचन, धूप में सँवरायी गोरी का पिया को आह्वान – गहना गढ़ा दो न, बखार तो सोने से भर ही गयी है!

 

चैत में शृंगार का परिपाक होता है। गेहूँ कटता है, रोटी की आस बँधती है, मधुमास भिन्न भिन्न अनुभूतियाँ ला रहा होता है एवं ऐसे में उस राम का जन्म होता है जो आगे चल कर मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये किंतु उनके जन्मोत्सव में जो भिन्न भिन्न पृष्ठभूमियों के लोकगायकों एवं नर्तकों की हर्षाभिव्यक्ति होती है, उसमें उल्लास स्वर नागर शास्त्रीयता तथा अभिरुचि की मर्यादाओं को तोड़ता दिखता है। इसमें गाये जाने वाले चइता चइती की टेर अरे रामा, हो रामा होती है।

चइता पुरुष गान है।

 

पूरी प्रस्तावना के साथ गान होता है। प्रकृति भी आने वाले के स्वागत में है, रसाल फल गए हैं, महुवा मधुवा गए हैं, पवन कभी लहराता है तो कभी सिहराता है।

घर में नया अन्न आ गया है, पूजन हो रहा है, मंगल गान है, क्रीड़ा है। मस्ती भरे वातावरण में राम जी जन्म लेते हैं! ढोल की ढमढम के साथ बधाई गीतों की धूम है।

 

सावन से न भादो दूबर,

फागुन से ह चइत ऊपर

गजबे महीना रंगदार रे चइतवा।

 

आम टिकोराइ जाला

महुवा कोचाइ जाला

रस से रसाइल रसदार रे चइतवा।

 

कबहू लहर लागे

कबहू सिहर लागे

किसिम किसिम बहेला बयार रे चइतवा।

 

गेंहू के कटाई होला

नवमी के पुजाई होला

लेके आवे अजबे बहार रे चइतवा।

 

घरे घरे मंगल होला

कुस्ती आ दंगल होला

मस्ती से भरल मजदार रे चइतवा।

 

ढोल ढमढमाय लागे

चइता गवाय लागे

राम जी लिहलें अवतार रे चइतवा।

 

बाजे अजोधा में अनघ बधइया

ए राम रामजी जनमलें

दसरथ जी के अंगनइया।

 

बाजे चइत मास गावेला बधइया

ए राम रामजी जनमलें

दसरथ जी के अंगनइया।

 

 

चैत्र शुक्ल नवमी

‼️ *रामत्व का दिव्य उदय* ‼️

 

 *ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट् समत्ययुः।*

 *ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ ।।*

 *नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु।*

 *ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह ।।*

 *प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम्।*

 *कौसल्याजनयद्रामं दिव्यलक्षणसंयुतम् ।।*

 

चैत्र शुक्ल-नवमी केवल पंचाङ्गनिर्दिष्ट तिथि मात्र नहीं, अपितु भारतीय आध्यात्मिक चेतना के दिव्य नभोमण्डल में उदित वह मंगलमयी वेला है, जब धर्म ने साकार सौन्दर्य धारण किया, सत्य ने मर्यादा का रूप लिया, करुणा ने लोकमङ्गल का संकल्प किया और परमात्मतत्त्व ने श्रीराम के रूप में मानवता के मध्य अवतरण किया। यह अविर्भाव केवल एक राजकुल में पुत्र-जन्म की लौकिक घटना नहीं, प्रत्युत सनातन धर्म की पुनः प्रतिष्ठा, साधुजन-परित्राण, दुष्ट-दमन तथा जीवन-मूल्यों के पुनरुद्भासन का महापर्व है।

 

 

भगवान् श्रीराम भारतीय मनीषा में केवल अयोध्या के राजा ही नहीं, अपितु धर्मस्वरूप, शीलसिन्धु, सत्यप्रतिष्ठ, लोकनायक तथा मर्यादा के परम प्रतिमान रूप में प्रतिष्ठित हैं। इसीलिए कहा गया “रामो विग्रहवान् धर्मः।” उनके व्यक्तित्व में पराक्रम है, किन्तु उद्दामता नहीं; ऐश्वर्य है, किन्तु अहंता नहीं; करुणा है, किन्तु दुर्बलता नहीं; त्याग है  वे शक्ति और शुचिता, वीर्य और विनय, नीति और निष्कम्प धर्मनिष्ठा के अद्वितीय समन्वय हैं।

 

श्रीरामचरित का प्रत्येक प्रसंग मानवीय जीवन के लिए एक दार्शनिक आलोकपुञ्ज है। पितृवचनपालनार्थ राज्यत्याग, प्रतिकूलताओं में धैर्य, विपत्तौ अपि धर्मस्य अनन्य पालन, भ्रातृप्रेम, मित्रनिष्ठा, प्रजावत्सलता तथा शत्रुपक्षेऽपि न्यायशीलता; ये सभी केवल आचरणगत गुण नहीं, अपितु उस आत्मसंयत महत्ता के उद्घोष हैं, जिसमें मनुष्य अपने स्वार्थातीत होकर ऋत, सत्य और धर्म के व्यापक विधान से जुड़ता है। श्रीराम का जीवन सिखाता है कि महत्ता पद में नहीं, आचरण में है; जय बाहुबल में नहीं, अपितु सत्यबल, धर्मबल और आत्मबल में निहिता है।

 

रामत्व नामजप  उद्धारक है, किन्तु यह अन्तःकरण में सद्गुणों के आविर्भाव का नाम है। जहाँ विवेक जाग्रत होता है, जहाँ कर्तव्य पूज्य बनता है, जहाँ संबंध मर्यादामय होते हैं, जहाँ शक्ति लोकहितसमर्पिता होती है, जहाँ करुणा आत्मविस्तार का रूप धारण करती है, वहीं रामत्व का प्रकाश प्रकट होता है। इस दृष्टि से रामनवमी बाह्य उत्सव से अधिक अंतर्मन के परिष्कार, चित्तशुद्धि और जीवनमूल्यों की पुनः प्रतिष्ठा का साधनामय पर्व है।

परिपूर्णता के दिव्य चिह्न: भगवान श्रीराम और माता सीता के 48 चिह्न

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