
आज रात्रि 15 मार्च 2026 को प्रातः 1:08 बजे सूर्य का कुंभ राशि से मीन राशि में प्रवेश हो रहा है,जिसे सामान्यतः खरमास भी कहा जाता है। परंपरानुसार इस अवधि में विवाह आदि मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं।
इसी समय एक और महत्वपूर्ण खगोलीय स्थिति भी देखने को मिली है। हाल ही में मंगल और राहु लगभग एक ही अंश पर स्थित थे, जिसे ज्योतिष में अंगारक योग कहा जाता है। यह योग स्वभावतः उग्र, विस्फोटक और संघर्ष की परिस्थितियाँ निर्मित करने वाला माना जाता है। वर्तमान में यह स्थिति धीरे-धीरे परिवर्तित हो रही है।
मंगल मीन राशि की ओर अग्रसर हैं और राहु क्रमशः मकर की दिशा में सरक रहे हैं। इस कारण यह उग्रता अब धीरे-धीरे कम होने की संभावना भी बनती दिखाई देती है।
एक अन्य परिवर्तन यह भी है कि 11 मार्च से बृहस्पति का मार्गी भ्रमण प्रारंभ हुआ है, और 15 मार्च को सूर्य भी मीन राशि में प्रवेश कर रहे हैं। किंतु सूर्य के लिए आगे की स्थिति भी सहज नहीं है, क्योंकि मीन राशि में शनि पहले से स्थित हैं। इसलिए सूर्य को राहु के संघर्ष से निकलने के बाद शनि के कठोर प्रभाव का सामना करना होगा।
इन ग्रहों की जटिल स्थिति से विश्व स्तर पर तनाव, टकराव और अस्थिरता जैसी परिस्थितियाँ बनना अस्वाभाविक नहीं है।
कई लोग कहते हैं कि सूर्य शनि के पिता हैं और पिता-पुत्र में शत्रुता नहीं होती, परंतु ज्योतिषीय दृष्टि से यह स्थिति प्रकाश और अंधकार, तीव्र गति और मंद गति, तथा दो भिन्न विचारधाराओं के संघर्ष का प्रतीक बन जाती है।
जब अनेक ग्रह एक साथ विपरीत परिस्थितियों में होते हैं तो उसका प्रभाव केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक परिस्थितियों पर भी दिखाई देता है।
21 मार्च के बाद बुध के वक्री से मार्गी होने की प्रक्रिया भी स्थिरता की ओर संकेत करेगी, किंतु जब तक अनेक ग्रहों की स्थितियाँ असंतुलित रहती हैं, तब तक उथल-पुथल बनी रह सकती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी भवन के वास्तु में जब कई बड़े दोष एक साथ उपस्थित हो जाएँ तो परिणाम गंभीर हो जाते हैं।
इन परिस्थितियों का प्रभाव हर व्यक्ति पर समान नहीं पड़ता। जिसकी मूल कुंडली पहले से संघर्षपूर्ण होती है, उसके जीवन में ऐसे समय का प्रभाव अधिक तीव्र दिखाई देता है। वहीं जिनकी ग्रह स्थितियाँ संतुलित हैं, वे अपेक्षाकृत कम प्रभावित होते हैं।
वर्तमान ग्रह स्थिति, विशेषकर मंगल-राहु के अंगारक योग, को ज्योतिष में उग्र घटनाओं, संघर्ष, दुर्घटनाओं और युद्ध जैसी स्थितियों का कारक माना गया है। इसी कारण विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में जो तनाव और संघर्ष दिखाई दे रहे हैं, वे मानवीय दृष्टि से अत्यंत दुखद और निंदनीय हैं। युद्ध का प्रभाव केवल सैनिकों या शासकों तक सीमित नहीं रहता; इसका दुष्प्रभाव उन असंख्य सामान्य लोगों तक पहुँचता है जिनका उस संघर्ष से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता।
मानवता के दृष्टिकोण से युद्ध कभी भी समाधान नहीं हो सकता। यह विनाश, पीड़ा और असंतुलन को ही जन्म देता है। इसलिए ऐसे समय में आवश्यक है कि हम सभी शांति, संयम और प्रार्थना का मार्ग अपनाएँ। अंततः सारे ग्रह, सारी शक्तियाँ और सारी परिस्थितियाँ उसी परम सत्ता के अधीन हैं।
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि विश्व में शांति स्थापित हो, संघर्ष समाप्त हों और मानवता का कल्याण हो।
क्योंकि अंततः वही होगा जो समस्त सृष्टि के हित में होगा।
शिव महापुराण में शिव सहस्त्रनाम का वर्णन है। विष्णु जी ने शिवजी की पूजा १००० कमल से ओर शिव सहस्त्र नाम के मंत्रों से किया था। शिव जी ने उन्हें प्रसन्न होकर सुदर्शन चक्र दिया। शिव जी कहते है कि युद्ध में इस चक्र का , मेरे रूप का ओर सहस्त्र नाम का स्मरण करने से दुखों का नाश होगा और अविनाशी सिद्धि प्राप्त होगी।🙏