
वर्तमान समय (मार्च २०२६) वैश्विक और पड़ोसी देशों की राजनीति के लिए अत्यंत संवेदनशील है। पाकिस्तान की मेष लग्न की स्थापना कुंडली के आधार पर आगामी समय का विश्लेषण कुछ इस प्रकार है।
१. आर्थिक आधार पर प्रहार (द्वितीय भाव)
वर्तमान में शनि (मीन राशि) और मंगल-राहु (कुंभ राशि) का गोचर पाकिस्तान के लिए ‘आर्थिक मृत्यु-पाश’ तैयार कर रहा है।
* गणितीय स्थिति: शनि अपनी तीसरी दृष्टि और मंगल अपनी चौथी दृष्टि से वृषभ राशि (पाकिस्तान का दूसरा भाव – संचित धन) को पीड़ित कर रहे हैं।
* प्रभाव: जब दो क्रूर ग्रहों की दृष्टि धन भाव पर हो, तो मुद्रास्थिति और विदेशी मुद्रा भंडार का पूरी तरह समाप्त होना निश्चित है। यह स्थिति किसी भी राष्ट्र को ‘आर्थिक पतन’ (Financial Collapse) की ओर ले जाती है।
२. आंतरिक सैन्य संघर्ष (छठा भाव)
पाकिस्तान की कुंडली का छठा भाव (कन्या राशि), जो ऋण, शत्रु और सैन्य अनुशासन का है, इस समय अत्यंत सक्रिय है।
* दृष्टि संबंध: कुंभ राशि में स्थित मंगल अपनी आठवीं पूर्ण दृष्टि से छठे भाव को देख रहा है।
* प्रभाव: मंगल की यह ‘अंगारक ऊर्जा’ देश के भीतर गृहयुद्ध (Civil Unrest) जैसी स्थिति और सेना के भीतर ही गुटीय संघर्ष को जन्म दे रही है। यह शांतिपूर्ण समाधान के बजाय हिंसक दमन का योग बनाता है।
३. वैचारिक अंधकार और अंतरराष्ट्रीय संकट (नौवां भाव)
* दृष्टि संबंध: १२वें भाव (व्यय और हानि) में स्थित शनि अपनी दसवीं दृष्टि से धनु राशि (९वां भाव – भाग्य और विदेश नीति) को देख रहा है।
* प्रभाव: ९वें भाव पर शनि की यह दृष्टि पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग (Isolate) कर रही है। उनके कूटनीतिक प्रयास और ‘भाग्य’ दोनों ही शनि के प्रभाववश अत्यंत मंद और बाधक सिद्ध हो रहे हैं।
४. मार्च-अप्रैल २०२६ की अंगारक युति पाकिस्तान के लिए ‘अस्तित्व के संकट’ का समय है। लग्नेश मंगल का राहु के साथ पीड़ित होना देश के नेतृत्व में बड़े और अचानक बदलाव की ओर इशारा करता है।
५. विभाजन का योग: 2027 में मेष राशि में शनि के गोचर के दौरान पाकिस्तान की कुंडली में केतु की अंतर्दशा के प्रभाव से देश के 3-4 टुकड़ों में बंटने (2032 तक) के संकेत हैं।
The Godfather
यह वाक्य केवल राजनीति या शक्ति की दुनिया का नियम नहीं है, बल्कि मानव व्यवहार की एक गहरी समझ को प्रकट करता है।
मित्र हमें सहजता देते हैं, परंतु विरोधी हमें सजग बनाते हैं।
अक्सर हम अपने विरोधियों से दूर भागना चाहते हैं, पर दूरी कई बार अज्ञान को जन्म देती है।
जो व्यक्ति अपने विरोधियों की प्रवृत्ति, सोच और चाल को समझ लेता है, वह परिस्थितियों को अधिक स्पष्ट दृष्टि से देख पाता है।
यहाँ “नज़दीकतर रखना” का अर्थ द्वेष या प्रतिशोध नहीं है।
इसका वास्तविक अर्थ है — सजगता, विवेक और परिस्थिति की गहरी समझ।
जीवन में कई बार विरोधी ही हमारे शिक्षक बन जाते हैं।
वे हमें सावधान रहना सिखाते हैं, अपनी सीमाओं को पहचानना सिखाते हैं और निर्णयों में परिपक्वता लाते हैं।
मित्र हमें सहारा देते हैं, पर विरोधी हमें मजबूत बनाते हैं।
और जो व्यक्ति दोनों से सीख लेता है, वही जीवन की जटिलताओं को संतुलन से संभाल पाता है।
आज का भाव:
“मैं मित्रों से स्नेह और विरोधियों से सजगता की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।”
Friends give comfort, enemies give awareness.
Rucha — wisdom grows through contrast.
*Awareness is the real strength.*
2006 में एक गोपनीय रिपोर्ट लिखी गई थी।
एक सेवानिवृत्त अमेरिकी सेना अधिकारी द्वारा।
इसे एक सैन्य जर्नल में प्रकाशित किया गया।
पेंटागन ने कहा कि यह उनकी आधिकारिक नीति नहीं थी।
वे झूठ बोल रहे थे।
उस रिपोर्ट के साथ लगे नक्शे में हर सीमा को दोबारा खींचा गया था।
इसे देखकर आपकी रूह कांप जाएगी।
तुर्की से पाकिस्तान तक।
सऊदी अरब से ईरान तक।
हर रेखा।
हर देश।
हर गलियारा।
उन्नीस साल बाद, यह सब हो रहा है।
वास्तविक समय में।
आपकी स्क्रीन पर।
इराक पहले ही तीन देशों में बंट चुका है।
कुर्द उत्तर खुद शासन करता है।
शिया दक्षिण तेहरान के प्रभाव में है।
सुन्नी मध्य हिस्सा एक ऐसा घाव है जो कभी भरा ही नहीं।
अब अगला नंबर ईरान का है।
उत्तर-पश्चिम का अज़ेरी क्षेत्र अलग होने की ओर बढ़ रहा है।
पश्चिम का कुर्द इलाका एक नए मातृभूमि की ओर खिंच रहा है।
दक्षिण-पूर्व का बलूच क्षेत्र पहले से ही उथल-पुथल में है।
फारसी मुख्य क्षेत्र टिकेगा।
लेकिन किनारे टूट रहे हैं।
2026 के हमले ईरान को नष्ट करने के लिए नहीं हैं।
उसे टुकड़ों में बांटने के लिए हैं।
सऊदी अरब भी चुपचाप खुद को बदल रहा है।
एमबीएस पहला सऊदी शासक है जो मक्का को एक संपत्ति की तरह देखता है।
तेल के बाद, पवित्र शहर एक अलग सभ्यतागत इकाई बन सकते हैं।
यह प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है।
पाकिस्तान हमेशा से एक कृत्रिम संरचना रहा है।
बलूचिस्तान अलग होना चाहता है।
कराची अपनी अलग अर्थव्यवस्था चलाता है।
सिंध अगला हो सकता है।
पंजाब सेना को नियंत्रित करता है।
इन चारों में एक झंडे के अलावा कुछ भी साझा नहीं है।
एक दशक बाद, शायद वह भी न रहे।
और फिर आता है इज़राइल।
कोई भी खुलकर “ग्रेटर इज़राइल” की बात नहीं करता।
इसके बजाय ज़मीनी सच्चाई को देखिए।
इज़राइल के किसी भी शहर की सीमा के आसपास कोई शत्रु शक्ति नहीं।
दक्षिणी लेबनान।
पश्चिमी सीरिया।
उत्तरी गाज़ा।
सीमाएँ कागज़ पर नहीं बदल रहीं।
लेकिन ज़मीन पर बदल रही हैं।
हर हफ्ते।
स्थायी रूप से।
गाज़ा हमेशा ऐसे नहीं रहेगा।
एक सीमांकित अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र।
जिसे अरब देशों द्वारा सामूहिक रूप से परिभाषित किया जाएगा।
फिलिस्तीन को प्रतीकात्मक सुधार के रूप में सौंपा जाएगा।
एक एआई-प्रशासित शहर।
अब देखिए भारत कहाँ खड़ा है।
ऊपर जो भी टूटन हो रही है, वह भारत की सीमा पर या उसके पास है।
जो भी नए गलियारे बन रहे हैं, वे भारतीय बंदरगाहों से गुजरते हैं।
मुंबई से मार्सेय तक का व्यापार मार्ग पाकिस्तान को पूरी तरह दरकिनार करता है।
जब पाकिस्तान टूटेगा,
तो पीओजेके बिना शासन का क्षेत्र बन सकता है।
भारत को आक्रमण करने की जरूरत नहीं होगी।
भारत को बस प्रशासन संभालना होगा।
एक विशेष आर्थिक क्षेत्र।
एक व्यापार गलियारा।
एक नियंत्रित क्षेत्र।
विक्रमादित्य ने केवल तलवार से विजय नहीं पाई थी।
उन्होंने दिल्ली को ऐसा शहर बना दिया था जो सबसे महत्वपूर्ण था।
आखिरकार हर राज्य उनके पास आया।
वर्तमान संघर्ष कोई नया युद्ध नहीं है।
यह दशकों पहले लिखी गई योजना का अंतिम चरण है।
पुराना यूरोपीय साम्राज्यवादी नक्शा अब ढह रहा है।
उसकी जगह जो नया नक्शा बनेगा,
वह वही लिखेगा जो धैर्य के साथ इंतजार करना जानता है।
भारत 2000 साल से इंतजार कर रहा है।
अगला दशक सबसे शोर मचाने वाली शक्ति का नहीं होगा।
यह उस शक्ति का होगा जो पहले से ही व्यापारिक गलियारों को नियंत्रित करती है।
नक्शा फिर से बनाया जा रहा है।
इस बार हम केंद्र में हैं।
जय भारत!!!
यह हमने कोई पहली बार नहीं किया है, इसी तरह पहले भी हमने साथ न देकर बड़ों-बड़ों का अहंकार तोड़ा है।
बहुत पहले सिंध के हिन्दू राजा #दाहिर का अहंकार तत्कालीन अफगानिस्तान और राजस्थान के हिन्दू राजाओं ने खत्म किया था। दाहिर ने सहायता के लिये पत्र लिखा, पर कोई भी नहीं आया। बहुत अहंकार था दाहिर को अपने पराक्रम का, मारा गया। अब ये अलग बात है कि उसके बाद सिंध में हिन्दुओं का निरंतर पतन ही होता रहा और आज अफगानिस्तान पूर्णतः इस्लामिक राष्ट्र है।
इसी तरह हमने मुहम्मद गौरी के आक्रमण के समय #पृथ्वीराज चौहान का साथ न देकर उनके अहंकार को तोड़ा था। अब अलग बात है कि बाद में गोरी ने जयचंद को भी कुत्ते की मौत मारा।
मेवाड़ वालों को भी अपनी बहादुरी का बड़ा अहंकार था। जब खिलजी ने मेवाड़ घेर लिया तब पूरे राजपूताने से किसी ने भी साथ नहीं दिया, रावल रतन धोखे से मारे गये और पद्मावती को 16000 औरतों के साथ जौहर करना पड़ा। #पद्मावती को भी अपनी सुंदरता पर बड़ा अहंकार था, तोड़ दिया।
राणा सांगा ने जब लोधी को कैद किया था, तब उनके अहंकार को तोड़ने के लिये डाकू बाबर को बुलाया गया। युद्ध में किसी ने राणा सांगा का साथ नहीं दिया, उनका सेनापति तीस हजार सैनिकों के साथ मारा गया, सांगा का अहंकार टूट गया। लेकिन लोधियों को भी मुगलों की गुलामी करनी पड़ी, मन्दिर तोड़े गए, स्त्रियां लूटी मुगलों ने, पर #सांगा का अहंकार तो टूट ही गया था न।
#मराठे बड़े प्रतापी थे, मुगलों की वाट लगा दी थी उन्होंने। उनको भी बहुत अहंकार था। मुगल हार गये तो काफिरों को रोकने के लिए अफगानिस्तान से अब्दाली बुलाया गया, पानीपत के मैदान में सेनाएं सज गयीं। अब्दाली की सेना को तो रसद मिलती रही पर मराठों को किसी ने भी रसद नहीं भेजी, क्योंकि अहंकार जो तोड़ना था मराठों का। भूखे पेट मराठे लड़ते रहे, मरते रहे हार गये। महाराष्ट्र का कोई ऐसा घर नहीं जिसका कोई बेटा शहीद न हुआ हो, लेकिन अहंकार तो टूट गया न।
न जाने कितनी बार हमने समय पर साथ न देकर अपनों के अहंकार को तोड़ा है, तो हम मोदी को भी सत्ता से हटा कर रहेंगे। भले ही हमें इसके लिये गौरियों, मुगलों, अब्दालियों या फिर इटली, पाकिस्तान की मदद लेनी पड़े और देश को उनके हाथों गिरवी रखना पड़े।
पर हम मोदी का अहंकार तोड़ कर ही रहेंगे।
क्यों कि?
हमें ग़ुलामी में ही जीने की आदत जो है।
हम हिन्दुओं से बड़ा बेवकूफ
ना कोई था।
ना है।
और ना होगा।
याद रखना यदि हम नहीं सुधरे
नहीं जागे।
तो फिर वही होगा।
*भाग मिल्खा भाग।*