
ज्योतिष के ग्रंथों में मन को समझने के लिए चंद्रमा की स्थिति एवं उसपर पड़ने वाले ग्रहों के प्रभाव का विशेष महत्व माना गया है। चन्द्रमा को मन ,भावना तथा अवचेतन प्रवृत्तियों का प्रमुख कारक माना गया है।
1 ) यदि चंद्रमा पर शनि, और राहु का प्रभाव हो, साथ ही यदि गुलिक आदि में से भी किसी का प्रभाव आ जाए तो, मन की सामान्य कार्यप्रणाली में विशेष परिवर्तन दिखाई दे सकता है। शनि व्यक्ति को गंभीर,अंतर्मुखी, कभी कभी अवसादग्रस्त बनाता है। राहु असामान्य, जटिल , तिकड़मी, और बहुत दूर तक सोचने वाला बना सकता है।
इनका संयुक्त प्रभाव व्यक्ति को कई बार विश्लेषणात्मक, और रहस्यदर्शी बनाता है, पर कभी कभी द्वंद्व या मानसिक तनाव भी।
2) इसके साथ यदि अष्टमेश और द्वादशेष का प्रभाव भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से चंद्रमा पर हो तो व्यक्ति के अंदर रहस्यमय प्रवृत्तियां या गहन मानसिक द्वंद्व उत्पन्न हो सकता है, जो अवचेतन से प्रभावित हो सकता है। ये व्यक्ति बहुत योग्य एवं बुद्धिमान हो सकते हैं, किन्तु कई बार उनकी सोच गैर पारंपरिक, जटिल तथा नकारात्मक प्रभाव वाली हो सकती है।
यदि ये ग्रह बली हो और परस्पर अंशो में अधिक दूर न हो, तो व्यक्ति उन इच्छाओं को कार्यरूप में ला सकता है, यदि अल्पबली है तो वह कुंठाग्रस्त भी हो सकता है।
3) उपरोक्त स्थितियों में यदि पुरुष की कुंडली है और अधिकांश ग्रह , जन्म कुंडली, नवांश कुंडली एवं द्रेष्काण में सम राशि में स्थित हो ( ऐसी स्थिति में चंद्रमा, गुरु, बुध, मंगल, शुक्र उच्च के हो सकते हैं ) इनमें से दो या उससे अधिक ग्रह राहु, केतु अक्ष में आकर शनि से प्रभावित हो एवं इन युतियों में अष्टमेश, और द्वादशेष भी हो, तो व्यक्ति की मनोस्थिति एक अलग ही द्वंद्व एवं सामाजिक मान्यताओं से अलग सोच या अनुभव दे सकती है।
इसी के साथ यदि मंगल अल्पबली हो या एक से अधिक प्रभाव से पीड़ित हो जाए एवं शुक्र अपेक्षाकृत अधिक बली हो, तो कुछ कुंडली अध्ययन में यह संकेत मिलता है कि ऐसी स्थिति में कभी कभी व्यक्ति में, अपनी पहचान या लैंगिक प्रवृत्ति के स्तर पर भी भ्रम की स्थिति बन सकती है, या पारंपरिक लैंगिक अभिव्यक्ति से भिन्न प्रवृत्ति का भी संकेत मिल सकता है।
वास्तव में मन को समझना एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है , ज्योतिषीय तथ्यों से कुछ संकेत प्राप्त हो सकते हैं ।
उपरोक्त ग्रह योगों से, मन की जटिलता के कुछ संकेत तो प्राप्त हो सकते हैं, पर अन्य ग्रहों कि युति, दृष्टि तथा राशि स्थिति के अनुसार फल में पर्याप्त परिवर्तन संभव है। परिस्थितिजन्य प्रभाव भी परिणामों में अंतर उत्पन्न कर सकता है।