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शारदा योग और उसका प्रभाव

वैदिक ज्योतिष के कई प्रमुख योगों की श्रृंखला में शारदा योग भी आता है ! शारदा योग के बनने से व्यक्ति भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में तरक्की तथा उन्नति करता है ! जैसे लेखक, कवि, राजनेता या अभिनेता आदि बनने के योग बनते हैं ! जब यह योग किसी व्यक्ति की कुण्डली में बनता है, तभी वह इस योग के प्रभाव से ही विशेष व्यक्ति बन पाता है, अन्यथा वह आम जीवन ही व्यतीत करता है !

 

शारदा योग वाले जातकों को स्त्री, पुत्र, भाइयों का सुख प्राप्त होता है ! वह रूप और गुण से सम्पन्न होते हैं ! राज्य सरकार से सम्मान प्राप्त करते हैं, गुरु ब्राह्मण व देवताओं के प्रति श्रद्धावान होते हैं ! वह विद्या विनोद में निपुण, तपोबल से परिपूर्ण होते हैं, ऐसे लोग  अपने धर्म का निर्वाह करने वाले भी होते हैं !”

 

“स्त्री पुत्र बन्धु सुखं, रूपगुणानुरक्ता:

भूपप्रियः गुरुमहीसुर देवभक्ताः !

विद्या विनोदरतिशील तपोबलाढ़्या:

जाता: स्वधर्मनिरता भुवि शारदाख्ये !!”

 

शारदा योग का निर्माण :

किसी जातक की कुण्डली में शारदा योग कुछ विशेष परिस्थितियों में ही बन सकता है जो इस प्रकार हैं —

 

यदि दशम भाव का स्वामी पंचम भाव में स्थित हो जाय तथा बली सूर्य सिंह राशि में स्थित हों तब इस योग का निर्माण होता है ! इसके अतिरिक्त यदि दशम भाव का स्वामी पंचम भाव में स्थित हों और बुद्ध व गुरु केन्द्र में स्थित हों, तथा सूर्य स्वराशि में स्थित हों तब भी यह योग बनता है !

 

शारदा योग में जो भी ग्रह शामिल होते हैं उनका मजबूत एवं बली स्थिति में होना अति आवश्यक होता है, तभी इस योग के प्रभाव भी परिलक्षित हो पाते हैं ! शारदा योग वाले व्यक्ति राज सरकार से सम्मानित होते हैं ! इस योग के जातक धार्मिक, तपस्वी, गुणी तथा विद्वान होते हैं ! धन- धान्य, संतान, भाई तथा घर के सुख से भी सम्पन्न होते हैं !

 

शारदा योग का प्रभाव :

यदि किसी जातक की कुण्डली में दशमेश पंचम भाव में स्थित है, बुद्ध व गुरु केन्द्र में हैं और सूर्य  स्वराशि में स्थित है तब शारदा योग बनता है, जो जातको को अच्छी उपलब्धियां प्रदान करने वाला होता है ! इन परिस्तिथियों में यदि अशुभ ग्रहों का किसी भी प्रकार से समावेश हो रहा हो तब यह योग नहीं बन पाता है और जातक इसके शुभ फलों से वंचित रह जाता है !

 

शारदा योग के निर्माण में बली ग्रहों की विशेष भूमिका होती है ! इसमें शामिल ग्रह अपनी मजबूत स्थिति के कारण इस योग को शुभ प्रभाव प्रदान करने वाला बनाते हैं ! जातक की कुण्डली में स्थित ग्रह बली होकर शारदा योग का निर्माण कर सकते हैं ! यदि इस योग में शामिल ग्रह में से एक भी ग्रह निर्बल होता है तब यह योग कमजोर होकर वांछित फल देने में सक्षम नही हो पाता है !

 

कुण्डली में इस योग के होने पर जातक को माँ शारदा का आशिर्वाद प्राप्त हो जाता है ! यदि बुद्ध केन्द्र में हों तब बुद्धि देने वाला होता है और सूर्य के प्रकाश के कारण जातक की बुद्धि शुद्ध और तीव्र हो जाती है ! दशम भाव कार्य क्षेत्र को दर्शाता है इसलिए दशमेश पंचम में आने के कारण बुद्धिपरक व्यापार करने में कुशलता पाता है ! जातक का ज्ञान विस्तृत होता है तथा जन उपयोगी बनकर समाज में अपनी अच्छी भूमिका निभाता है ! इस योग के बनने से जातक को राजसम्मान की प्राप्ति होती है, सरकार में उच्च पद प्राप्त हो सकता है !

 

इस योग में जन्म लेने वाले व्यक्ति को स्त्री और पुत्र सुख की प्राप्ति होती है ! उसे अपने बंन्धुओं से सुख और सहयोग की प्राप्ति होती है ! ऎसा जातक विवेकी, न्यायप्रिय बनता है ! शारदा योग के प्रभाव से जातक धार्मिक प्रवृति का व्यक्ति हो सकता है ! तपस्वी, शुभ गुणों से भरपूर तथा विद्वान व्यक्ति होता है ! व्यक्ति धन- धान्य से संपन्न, घर तथा संतान सुख से सुखी होता है तथा मान-प्रतिष्ठा स्थपित करने में सफल होता है !

 

 

 

कुसुम योग

 

कुण्डली में कुसुम योग निर्माण का प्रभाव :

 

ज्योतिष शास्त्र में कुसुम योग का महत्व विस्तार पूर्वक बताया गया है ! कुसुम योग बनने पर किसी व्यक्ति का जीवन किस प्रकार से प्रभावित होता है, इस तथ्य को अनेक ज्योतिष से सम्बंधित पुस्तकों में बताया गया है !

 ‘जातक परिजात’ के अनुसार इस योग में उत्पन्न होने वाला जातका शुभ फलों को प्राप्त करता है ! उच्च कुल में जन्म लेता है तथा पांण्डित्य से युक्त होता है ! इस योग में उत्पन्न व्यक्ति सुखी, ऐश्वर्य भोगी, विद्वान और प्रभावशाली होता है !

 

कुसुम योग का निर्माण :

 

“स्थिर लग्ने भृगौ केन्द्रे त्रिकोणेन्दो शुभेतरे !

मानस्थान गते सौरे, योगोऽयं कुसुमो भवेत् !!”

 

यदि कुण्डली स्थिर राशि लग्न की हो, शुक्र केंद्र में हों, चन्द्रमा त्रिकोण में शुभ ग्रहों से युक्त हों तथा शनि दशम स्थान में स्थित हों तब कुसुम योग का निर्माण होता है ! लग्न चर राशि का, शुक्र केन्द्र में, शुभ ग्रह युक्त चन्द्रमा त्रिकोण में, शनि दशम भाव में स्थित हों तब भी कुसुम योग बनता है ! कुछ ज्योतिषीयों की मान्यता है कि, इस योग के निर्माण के लिए स्थिर लग्न के स्थान पर चर लग्न होना अधिक महत्वपूर्ण होता है !

 

एक अन्य विचार के अनुसार यदि  स्थिर लग्न में गुरु स्थित हों, दशम भाव में शनि, दूसरे भाव में सूर्य और पंचम अथवा नवम भाव में चन्द्रमा स्थित हों तब कुसुम योग का निर्माण होता है !

 

त्रिफला के अनुसार —

 

*” लग्नात्सप्तमगे चन्द्रे चन्द्रादष्टमगे रवौ !*

*गुरुणा स्थीयते लग्ने कुसुमो योगः ईरित: !!”*

 

यदि लग्न से सप्तम चंद्रमा हो, चंद्रमा से अष्टम अर्थात जन्म लग्न से द्वितीय भाव में सूर्य स्थित हों और लग्न में बृहस्पति स्थित हों तब कुसुम योग का निर्माण होता है !

 

कुसुम योग का प्रभाव _

 

जातक परिजात के अनुसार —

” दाता महीमण्डलनाथबन्द्यो,

भोगी महावंशज राजमुख्य: !

लोके महाकीर्तियुक्त: प्रतापी

नाथो नराणां कुसुमोद्भव: स्यात !!”

 

कुण्डली में निर्मित कुसुम योग जातक को दान पुण्य करने वाला बनाता है ! जातक का जन्म उच्च कुल में होता है ! जातक को उच्च पद की प्राप्ति होती है, यश, कीर्ति और सम्मान की प्राप्ति होती है ! जातक की यह स्थिति ग्रहों के बलाबल पर आधारित होती है ! व्यक्ति राजा के समान सुख सुविधाओं से सम्पन्न होता है ! वह परिवार तथा समाज का मुखिया भी हो सकता है !

 

 “गुणी, दानी, प्रतापी तथा विद्वान लोगों की कुण्डली में कुसुम योग अधिकतर पाया जाता है !”

 

यदि किसी जातक की कुण्डली में लग्न चर राशि – (मेष, कर्क, तुला या मकर)  है, शुक्र केन्द्र में स्थित है, चंद्रमा शुभ ग्रहों से युक्त होकर त्रिकोण (5,9) में स्थित हो और शनि दशम भाव में स्थित हों, तब इस संयोग से कुसुम योग बनता है !

 

परन्तु “पंडित सीताराम झा ने”  “चर लग्न के स्धान पर स्थिर लग्न का होना मुख्य माना है ! उनके अनुसार कुसुम योग बनने के लिए लग्न में चर राशि के स्थान पर स्थिर राशि- (”वृष, सिंह, वृश्चिक या कुम्भ”) अवश्य होना चाहिए !

 

कुसुम योग के प्रभाव से जातक राज वैभव के समान सुख सुविधाओं से युक्त सम्पन्न  व्यक्ति होता है ! वर्तमान समय में व्यक्ति किसी उच्च पद पर आसीन या मंत्री पद प्राप्त कर लेता है ! इसीलिए तो इस योग के प्रभाव से व्यक्ति कुसुम के समान प्रफुल्लित अपनी ख्याति रूपी सुगंध बिखेरता हुआ स्वभाव से विनम्र सज्जन पुरुष कहलाता है ! यह योग कुण्डली को मजबूती प्रदान करने में सहायक और स्थिर प्रकृति का होता है, जिसके कारण जीवन में नई उर्जा शक्ति और साहस का प्रादुर्भाव देखा जा सकता है, बस यही कारण है कि शुक्र का स्थिर लग्न के केन्द्र भाव में होना आवश्यक माना गया है !

 

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