
यदि किसी जातक की जन्म कुण्डली में सप्तम स्थान अर्थात जीवनसाथी के भाव में यदि बृहस्पति और बुध एक साथ में स्थित हों तब उस व्यक्ति का एक ही विवाह होता है और यदि सप्तम में मंगल या सूर्य हों तब भी एक ही पत्नी होती है !
यदि किसी जातक की जन्म कुण्डली में लग्न का स्वामी और सप्तम स्थान का स्वामी दोनों एक साथ प्रथम अथवा सप्तम स्थान में स्थित हों तब व्यक्ति की दो पत्नियां होती हैं ! उदाहरण के लिए यदि लग्न सिंह हो और उसका स्वामी सूर्य, सप्तम स्थान कुंभ के स्वामी शनि के साथ प्रथम या सप्तम स्थान में स्थित हों तब उसका दो स्त्रियों से विवाह होता है ! यदि स्त्री की कुण्डली है तब उसका भी दो अलग अलग पुरुषों से विवाह हो सकते हैं, ऐसा शास्त्रों में उल्लिखित है !
यदि किसी जातक की कुण्डली में सप्तम स्थान के स्वामी के साथ मंगल, राहु-केतु या शनि छठवें, आठवें या 12वें भाव में स्थित हों तब पहली पत्नी की मृत्यु के बाद व्यक्ति दूसरा विवाह करता है !
यदि किसी जातक की जन्म कुण्डली में सप्तम या अष्टम स्थान में पापीग्रह शनि, राहु, केतु, सूर्य हों और मंगल 12वें भाव में स्थित हो तब व्यक्ति का दो विवाह होता है !
यदि किसी जातक की कुण्डली में लग्न, सप्तम स्थान और चंद्रलग्न इन तीनों स्थानो में द्विस्वभाव राशि यानी मिथुन, कन्या, धनु या मीन राशि हों तब जातक का दो विवाह होता है !
यदि जातक की कुण्डली में लग्न का स्वामी 12वें भाव में और द्वितीय भाव का स्वामी मंगल, शनि, राहु-केतु के साथ कहीं भी स्थित हो तथा सप्तम स्थान में भी कोई पापीग्रह बैठा हो तब जातक की दो पत्नियां होती ही हैं ! स्त्री की कुण्डली की स्थिति में यह फल पति के रूप में लेना चाहिए !
कुण्डली में यदि शुक्र किसी पापीग्रह के साथ स्थित हो तब जातक का दो विवाह होता है !
धन स्थान अर्थात द्वितीय भाव में कई पापी ग्रह स्थित हों और द्वितीय भाव का स्वामी भी पापी ग्रहों से घिरा हो तो तीन विवाह होते हैं !