
भारत की चुप्पी ही इस युद्ध में सबसे ऊँचा बयान है –
खामनेई अब नहीं रहे-
अमेरिका और इजरायल ने मध्य-पूर्व की तस्वीर बदल दी-
और भारत? कुछ नहीं बोला –
न हमलों की निंदा,
न खामनेई के लिए शोक-संदेश,
न “हम ईरान के साथ हैं” का बयान-
पूर्ण मौन –
लोग पूछ रहे हैं: क्यों?
यह है असहज करने वाला सच –
ईरान कभी भारत का मित्र नहीं था – कभी भी नहीं –
उसने मित्रता का अभिनय किया –
मेज़ पर मुस्कुराया –
चाबहार में भारत के निवेश का लाभ उठाया-
दशकों तक भारत की सद्भावना को अपने हित में इस्तेमाल किया-
और फिर क्या?
हर बार जब पाकिस्तान-समर्थित आतंकियों ने भारतीय धरती पर भारतीयों का नरसंहार किया, ईरान मौन रहा-
हर बार जब भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई की, ईरान ने ओआईसी में भारत की निंदा की-
कश्मीर के मुद्दे पर?
ईरान हर बार पाकिस्तान के साथ खड़ा हुआ-
हर एक बार –
चालीस वर्षों तक ईरान ने इस्लामी एकजुटता को हथियार की तरह इस्तेमाल किया-
और उस हथियार का निशाना अक्सर भारत ही रहा-
भारत ने हर बार यह याद रखा-
यह चुप्पी कूटनीति नहीं है-
यह स्मृति है –
वह शासन, जिसने भारत की आतंकरोधी कार्रवाई को “आक्रामकता” कहा, अब समाप्त हो चुका है-
वह सर्वोच्च नेता, जिसने 1.4 अरब भारतीयों के साथ आतंकवाद के विरुद्ध कभी खुलकर साथ नहीं दिया, अब नहीं रहा-
और मोदी ने एक भी कूटनीतिक आँसू नहीं बहाया-
यह कोई चूक नहीं है, यह एक निर्णय है –
जो मौन में सुनाया गया — किसी भी प्रेस विज्ञप्ति से अधिक मुखर-
लेकिन अधिकांश विश्लेषक एक बात समझ नहीं पा रहे हैं –
भारत केवल इस युद्ध को देख नहीं रहा है-
भारत उस स्थिति की रूपरेखा तैयार कर रहा है जो इसके बाद बनेगी-
एक कठोर सत्य है, जिसे नकारना आसान नहीं
यह लेख किसी का whatsapp पर मिला है –
खामनेई का खुद का बयान भी सुनिए –
20 अगस्त 2018 को खामेनेई का ट्विटर पर संदेश
“प्रिय हज यात्रियों,
इस्लामिक उम्माह (मुस्लिम समुदाय) के लिए,
सीरिया, इराक, फिलिस्तीन, अफ़ग़ानिस्तान, यमन, बहरीन, लीबिया, पाकिस्तान, कश्मीर और म्यांमार तथा दुनिया के अन्य हिस्सों में पीड़ित लोगों के लिए दुआ करना न भूलें-
और आप अल्लाह से प्रार्थना करें कि वह अमेरिका और अन्य घमंडी शक्तियों तथा उनके समर्थकों के हाथ काट दे”
आज ईरान स्वयं इराक और बहरीन पर हमले कर रहा है –
ऐसे में भारत का चुप रहना क्या गलत है ?
UAE में 44 लाख भारतीय रहते हैं।सऊदी अरब में 27.5 लाख भारतीय हैं। कुवैत में 10 लाख, कतर में 8.5 लाख, ओमान में 6.5 लाख, बहरीन में साढ़े 3 लाख भारतीय हैं।
ये वो देश हैं, जिनपर ईरान मिसाइलें मार रहा है।
अगर भारत के साथ व्यापार की भी बात करें तो ईरान के साथ हमारा व्यापार $1.68 billion है।
वहीं,
सऊदी अरब: $ 41.88 billion
UAE: $ 100 billion
कुवैत: $ 10.22 billion
क़तर : $ 19 billion
ओमान: $ 10.61 billion
बहरीन : $ 1.64 billion
अगर कूटनीति का मतलब अपने देश के interest को सबसे आगे रखना है तो हमें किसका साथ देना चाहिए?
एक ओर अमेरिका, इजराइल और 56 मुस्लिम देश हैं, दूसरी ओर ईरान। इस युद्ध में ईरान की हार निश्चित है। भारत को क्या करना चाहिए।
सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे मुस्लिमों के अनुसार ईरान के पक्ष में आ जाएं या भारत को जिसमें फायदा हो, वो करें?
किसी मुस्लिम देश ने ईरान के पक्ष में एक शब्द नहीं बोला, ईरान के दोस्त चीन ने कुछ नहीं कहा, ऐसे में अपने देश के ज़हिलों के कहने से भारत वो बेवकूफी कर दे?
राष्ट्र प्रथम, राष्ट्र का हित सर्वप्रथम…
बाकी हिंदू-मुस्लिम, कांग्रेस-भाजपा आदि सब बाद में