
पुणे के ‘कल्याणी नगर’ जैसे उच्चवर्गीय इलाके में ‘सखाराम’ नाम का एक व्यक्ति नगर निगम की कचरा गाड़ी चलाता था। उसकी उम्र लगभग 50 वर्ष थी। बदन पर नीली वर्दी, हाथों में दस्ताने और चेहरे पर मास्क।
सखाराम की एक खास आदत थी। जब वह सोसायटियों से कचरा इकट्ठा करता, तो गीला और सूखा कचरा अलग तो करता ही था, लेकिन अगर उसे कचरे में कोई ‘पुरानी किताब’ या ‘आधी लिखी हुई कॉपी’ मिलती, तो वह उसे अलग निकालकर एक थैले में रख लेता।
एक दिन उसकी गाड़ी एक बड़े बंगले के सामने खड़ी थी। उस बंगले में रहने वाला ‘चिन्मय’ नाम का इंजीनियरिंग का छात्र अपने पुराने सेमेस्टर की किताबें कबाड़ में फेंकने आया। उसने वे किताबें कूड़ेदान में डाल दीं।
सखाराम ने वे किताबें उठाईं, अपनी शर्ट से साफ किया और थैले में रख लिया।
यह देखकर चिन्मय हँसते हुए बोला,
“क्या काका? आपको पढ़ना आता है क्या? क्यों कचरा इकट्ठा कर रहे हैं? ये इंजीनियरिंग की किताबें हैं, आपके सिर के ऊपर से निकल जाएँगी। इससे अच्छा इन्हें कबाड़ी को बेच दो, दो पैसे मिलेंगे चाय पीने के लिए।”
सखाराम ने कुछ नहीं कहा। बस सिर हिलाया और किताबें संभालकर रख लीं।
चिन्मय ने फिर ताना मारा, “अरे, गाड़ी में जगह कम पड़ गई क्या? कचरा और ज्ञान एक ही थैले में? बड़ा शौक है आपका!”
सखाराम शांत स्वर में बोला,
“साहब, जिसे पेट की भूख होती है, उसे भोजन की कीमत समझ में आती है; और जिसे ज्ञान की भूख होती है, उसे अक्षरों की कीमत समझ में आती है। ये आपके लिए रद्दी हो सकती है, लेकिन किसी के लिए यही भविष्य है।”
चिन्मय को उसकी बात समझ नहीं आई। वह हँसते हुए चला गया।
…छह महीने बीत गए।
चिन्मय के कॉलेज की ‘एनएसएस’ (राष्ट्रीय सेवा योजना) की टीम एक ग्रामीण क्षेत्र में शिविर के लिए गई। वह गाँव बहुत पिछड़ा हुआ था। वहाँ न स्कूल था, न बिजली।
लेकिन गाँववालों ने बताया, “हमारे गाँव में एक ‘मुफ्त पुस्तकालय’ है, जहाँ हमारे बच्चे शाम को पढ़ने जाते हैं।”
चिन्मय और उसके दोस्त उत्सुकता से उस पुस्तकालय में पहुँचे। वह एक टीन की शेड में बना था।
लेकिन अंदर का दृश्य देखकर चिन्मय हैरान रह गया। लकड़ी की अलमारियों में हजारों किताबें सलीके से सजी थीं।
वहाँ उपन्यास थे, विज्ञान की किताबें थीं, प्रतियोगी परीक्षाओं की पुस्तकें थीं और… इंजीनियरिंग की किताबें भी थीं।
करीब 50-60 गरीब बच्चे, जिनके पास पूरे कपड़े भी नहीं थे, उन्हीं किताबों में डूबकर पढ़ाई कर रहे थे।
चिन्मय ने एक बच्चे से पूछा, “ये पुस्तकालय किसका है? क्या ये सरकार का है?”
बच्चा बोला,
“नहीं दादा। ये हमारे ‘सखाराम बाबा’ ने बनाया है। वो शहर में कचरा गाड़ी चलाते हैं। हर रविवार को गाँव आते हैं और बोरे भर-भर कर किताबें लाते हैं। वो कहते हैं, ‘मेरे पास स्कूल बनाने के पैसे नहीं हैं, लेकिन रद्दी से पुस्तकालय तो बना सकता हूँ ना।’”
चिन्मय के पैरों तले जमीन खिसक गई।
‘सखाराम?’ वही कचरा उठाने वाला आदमी?
तभी सखाराम वहाँ आया। उसके सिर पर किताबों का एक गट्ठर था। बदन पर वही नीली, मैली वर्दी थी।
चिन्मय को देखकर वह मुस्कराया।
“अरे साहब? आप यहाँ? पहचाना मुझे? मैं वही… आपके बंगले के सामने कचरा उठाने वाला।”
चिन्मय के पास शब्द नहीं थे। उसकी आँखों में आँसू आ गए।
उसने सखाराम के हाथ में वह किताब देखी—वही किताब जिसे छह महीने पहले उसने ‘कचरा’ समझकर फेंक दिया था और सखाराम को ‘अनपढ़’ कहकर अपमानित किया था।
चिन्मय दौड़कर गया और सखाराम के पैर पकड़ लिए।
“काका, मुझे माफ कर दीजिए! मैंने आपको अनपढ़ समझा, लेकिन आप तो सच में शिक्षित हैं।
मैं इंजीनियर बन गया, लेकिन मुझे किताब की कीमत समझ नहीं आई। आपने कचरे में से सोना ढूँढ़कर इन बच्चों का भविष्य बना दिया।
आज मुझे समझ में आया कि स्कूल इमारत से नहीं, बल्कि इंसानों से बड़ा होता है।”
सखाराम ने उसे उठाया और कहा,
“रोइए मत साहब। बस एक विनती है… अगली बार रद्दी बेचते समय सोचिए। वो रद्दी किसी का जीवन बदल सकती है।
मैं स्कूल नहीं जा सका, गरीबी के कारण पढ़ नहीं पाया। इसलिए चाहता हूँ कि ये बच्चे तो पढ़ें।
मेरे हाथ कचरे में होते हैं, लेकिन इन बच्चों का सिर आसमान में हो—बस यही सपना है।”
उस दिन चिन्मय ने शपथ ली।
वह पुणे लौटा और अपने कॉलेज में ‘डोनेट अ बुक’ अभियान शुरू किया।
आज सखाराम के उस छोटे से पुस्तकालय में 10,000 से अधिक किताबें हैं। और उस ‘कचरा गाड़ी के चालक’ को गाँव वाले आज कुलगुरु से कम नहीं मानते।
किसी के काम के आधार पर उसकी बुद्धिमत्ता और उदारता का मूल्यांकन मत कीजिए। एक कचरा उठाने वाला व्यक्ति भी समाज के लिए ‘विश्वविद्यालय’ खड़ा कर सकता है।
ज्ञान किताबों में होता है, लेकिन समझ और संस्कार इंसान के भीतर होते हैं।
पुरानी किताबें फेंकने के बजाय उन्हें ज़रूरतमंदों तक पहुँचाइए।
— पुस्तक आदान-प्रदान दिवस