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अर्धनारीनटेश्वर

सामान्य हिंदुओं में एक प्रचलित धारणा है कि महाशिवरात्रि का अर्थ शिव-पार्वती विवाह है…

लेकिन

नाथ परंपरा में इस विषय को अलग दृष्टिकोण से देखा जाता है।
निर्गुण, निराकार ब्रह्मशिव तत्व —
#एक_अहं_बहुस्यामि (मैं एक होकर अनेक हो जाऊँ)।

उस तत्व का प्रतिबिंब ही शक्ति है —
जो हर अर्थ में उसके समान है।

वह तत्व विकाररहित है,
और वह शक्ति परम विकारयुक्त है।

वह पुरुष तत्व है,
और वह प्रकृति तत्व है।

इन दोनों का मिलन — प्रकृति और पुरुष का एकत्व —
एक + अंत = एकांत होकर आज ब्रह्मांड के रूप में प्रकट हुआ।

यह प्रक्रिया… उसका काल… उसका विस्तार… अनादि और अनंत है,
परंतु उसका चरम क्षण महाशिवरात्रि है।

वह अंतिम क्षण ही महाशिवरात्रि है —
जब ब्रह्मांड क्षणभर के लिए स्थिर हो जाता है
और शेष बचता है केवल शून्य।

शून्य अर्थात निर्गुण —
परंतु गुणहीन नहीं, बल्कि पूर्णता।

उसमें कोई रिपु नहीं,
कोई आसक्ति नहीं,
कोई ‘अहं’ नहीं,
कोई अहंकार नहीं।

शिव ऐसे ही निर्गुण हैं।

उनका प्रतिबिंब शक्ति है —
जो सगुण है,
प्रत्येक गुण की पराकाष्ठा।
उस पूर्ण शक्ति को यदि कोई चुनौती दे,
तो उसे परास्त करने की विजयी प्रवृत्ति ही प्रकृति है।

शिव-शक्ति…
प्रकृति-पुरुष…

मानो एक समद्विबाहु त्रिकोण ∆

उसका मजबूत आधार — स्थिर ऊर्जा स्तंभ — शक्ति, सामर्थ्य, पुरुष, शिव।

और उस त्रिकोण का नुकीला, तेजस्वी शिखर —
कोमलता, गति, वेग, ऊर्जा का प्रवाह — प्रकृति, शक्ति।

शिव का सौंदर्य उनकी शक्ति, ऊर्जा और सामर्थ्य है।
प्रकृति की शक्ति उसकी कोमलता, गति और उसका सौंदर्य है।

उस गति को… उस वेग को… उस शक्ति को… उस प्रकृति को…
उस स्थितप्रज्ञ ऊर्जा स्तंभ शिव के प्रति मोह और आसक्ति उत्पन्न होती है।

वह उनकी स्थितप्रज्ञ अवस्था को भंग करने का संकल्प लेती है
और उसे प्राप्त भी करती है।

क्या यह मिलन क्षणिक है?

नहीं।

यह अव्याहत और अविरत है।

इसी से स्पंदन उत्पन्न होता है,
जो चेतना को जन्म देता है।
प्रत्येक जीव में गर्भावस्था से जो स्पंदन आता है,
वह यहीं से उत्पन्न होता है।

ऐसी है यह ब्रह्मांड की रचना —

स्थिति स्थापित करने वाले शिव
और
गतिशील, चपल शक्ति
के मिलन से जन्म लेने वाले जीवात्मा।

इन जीवों के मन की — हाँ, शरीर की नहीं —
परम उच्च अवस्था क्या है?

वह स्त्री भी है और पुरुष भी।
वह पिता भी है और माता भी।
वह धरती भी है और आकाश भी।
वह सूर्य भी है और अंधकार भी।
वह अग्नि भी है और जल भी।

यही है सच्चा प्रकृति और पुरुष का एकत्व।

स्त्री को समझते समय प्रकृति को… आदिमाया को… शक्ति को…
जानने का यह एक छोटा-सा, सीमित बुद्धि के अनुसार प्रयास है।

सभी प्राणीमात्र को महाशिवरात्रि की शुभकामनाएँ।

 

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