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“अब विश्राम के क्षण…” लता मंगेशकर जी

करीब 28 दिन पहले ही इन सब बातों की शुरुआत हो गई थी… बहाना बनी कामवाली बाई… सच कहूँ तो इस उम्र में कुछ भी हो, कोई छोटा-सा कारण ही काफ़ी होता है… कुछ न कुछ “लेबल” तो लगना ही चाहिए ना… फिर वही रोज़मर्रा की भागदौड़… ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती… (वहाँ की नर्स से अस्पताल का नाम पूछा)… मुस्कुराते चेहरे वाले डॉक्टर समदानी ने भरोसा दिलाया,
“सब कुछ ठीक हो जाएगा दीदी।”
मैं मन-ही-मन मुस्कुरा दी… शायद अब यह “अंतिम यात्रा” की भूमिका ही थी…

फिर इलाज शुरू हुआ… नाक-मुँह में नलियाँ, लगातार डगमगाता ऑक्सीजन स्तर… कभी होश रहता, कभी नहीं… जब होश रहता, तब पूरा “जीवन-पट” आँखों के सामने से गुजरने लगता… क्या यादें कम थीं?… 92 वर्षों में से कम से कम 87-88 साल तो साफ़ याद थे… एक के बाद एक यादों की गठरियाँ… कभी संदर्भ समझ आता, कभी नहीं…

बचपन के दिन याद आते तो चेहरे पर अपने-आप मुस्कान आ जाती… माई, बाबा और हम सब भाई-बहन… बाबाजी का दिव्य गायन… समझ में न आता, फिर भी कानों को वही सबसे अच्छा लगता… बाबा के पास संगीत सीखने आने वाले विद्यार्थी… उनके सिखाने में मेरी रुचि… आशा की शरारतें, उसका चंचल स्वभाव, जो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं था… बाळ (भाई) की बीमारी… और फिर एक दिन हमें बच्चों को कोई ऊपर की मंज़िल पर ले गया… नीचे आने नहीं दिया… उसी दिन “बाबा” हमें छोड़कर चले गए थे… मैं अचानक बड़ी हो गई… होना ही पड़ा…

फिर पूरे परिवार को संभालने का संकल्प… मजबूरी में फिल्मों की ओर मुड़ते कदम… स्टेज शो करके कमाने का आनंद… क्या-क्या याद आ रहा था… और फिर होश चला गया… कुछ समझ में नहीं आया…

ज़िंदगी भर कितने लोग जुड़े… गिनती नहीं… होश आता-जाता रहा… कई चेहरे सामने आते रहे… नौशादजी, सज्जादजी, रोशनजी, ख़य्यामजी, मदन भैया, हेमंतदा, सचिनदा, फडके साहब, खळेकाका, अनिल विश्वासजी, मुकेश भैया, किशोरदा, रफ़ी साहब… मानो सबने घेरा बना लिया हो… कुछ से मतभेद भी हुए… आज उन सब पर बस हँसी आती है… ऐसा नहीं होना चाहिए था…

आज फिर सारी जाँचें हुईं… अब और क्या-क्या सहना बाकी है, कौन जाने…

आज सुबह से मिले हुए सम्मान, उपाधियाँ, कई पुरस्कार याद आ रहे हैं… ख़ास तौर पर “भारत रत्न”… लोगों ने बहुत प्रेम दिया… देश-विदेश में किए गए शो… इन सब का ऋण कैसे चुकाऊँगी?…

कितनी परीक्षाएँ, कितने संकट आए… मगर मंगेशा की कृपा और माई-बाबा के आशीर्वाद से सब निभ गया…

लेकिन अब मन थक गया है… कुछ भी नहीं चाहिए… 7-8 साल हो गए, गाना पूरी तरह बंद है… बाहर जाना भी छूट गया… घर में बैठकर टीवी पर बस देखती रहती हूँ कि आसपास क्या चल रहा है…

घर के सब लोग अपने-अपने जीवन में स्थिर हो गए हैं… ज़्यादा चिंता किसी की नहीं रही… अब दिल से लगता है कि यह “यात्रा” यहीं समाप्त हो जाए… लेकिन “वहाँ से” बुलावा तो आना चाहिए ना?… मन पूरी तरह तृप्त है… हज़ारों नहीं, लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों का प्रेम मिला है… सम्मान मिला है… और क्या चाहिए… फिर वही विचारों की गठरियाँ…

कल से डॉक्टर समदानी के चेहरे पर चिंता दिख रही है… साँसें भारी हो गई हैं… अब तो हर साँस लेना भी कठिन हो रहा है… मंगेशा, अब मुक्त कर दो… यह कौन-सा गीत मन में गूँज रहा है—
तेरे किनारे जिए, हँसे, कड़ी चट्टानों में अमृत पिया… अब सब कुछ समाप्त हुआ… पीछे बस नाम रह गया…”

फिर सब कुछ घूमने लगा है… कुछ समझ नहीं आ रहा… बहुत गहराई में, किसी गड्ढे या भँवर में घूम रही हूँ, ऐसा लग रहा है… रुक नहीं पा रही… सहन नहीं हो रहा…

अभी-अभी आशा आकर गई… बाळासाहेब के भतीजे राज ठाकरे भी आए थे… आज कुछ विशेष-सा लग रहा है… सचिन भी देखकर गया… आज “मुक्ति” दिखाई दे रही है… आज साँसें बहुत भारी हो गई हैं… आशा के गीत की तरह “बोझ भारी हो गया है” ऐसा लग रहा है… कोई तो मुक्त करो… डॉक्टर, डॉक्टर…

…अब एकदम हल्का लग रहा है… पंख-सा… सारी नलियाँ निकाल दी गई हैं… लगता है जैसे ऊपर से नीचे सबको देख रही हूँ…

चारों ओर ऐसा माहौल क्यों है? सन्नाटा, दुख?… मतलब… मतलब… मैं… शायद ऐसा ही है… आज माई और बाबा की बहुत याद आ रही है… उनसे मिलने की तीव्र इच्छा हो रही है…

मेरे सिर पर चादर डाल दी गई है… लेकिन यह कैसी जादू है? मुझे सब दिख रहा है… मुझे लेने 4-5 लोग आए हैं… रोज़ के अस्पताल वाले… रो रहे हैं… मैं उनसे पूछ रही हूँ, लेकिन वे सुन नहीं रहे… उनकी बातों से समझ आ रहा है, मुझे घर ले जा रहे हैं—प्रभुकुंज… घर और घरवाले कब दिखेंगे, यही सोच है…

गाड़ी आ गई… यह उलटे अक्षरों में क्या लिखा है? एम्बुलेंस… हाँ… घर पर सब मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे ना? उषा, आशा, हृदयनाथ, सारे बच्चे… बेचारे घबराए होंगे… लेकिन अब मैं उनके सिर पर हाथ भी नहीं फेर पाऊँगी… यही बुरा लग रहा है…

चारों ओर सुनाई दे रहा है कि मैं अनंत यात्रा पर निकल गई हूँ… नहीं-नहीं, मैं तो अभी यहीं भटक रही हूँ… क्या इतने लोगों के प्रेम-बंधन इतनी आसानी से छूट जाते हैं?… कितने बड़े-बड़े लोग प्रभुकुंज आ रहे हैं… मैं तो बहुत संकोच में पड़ गई हूँ… यह क्या, इतनी सेना और पुलिस क्यों?… तिरंगा दिख रहा है… मुझे इस तिरंगे पर और इसकी रक्षा करने वाले सैनिकों पर गर्व है… आपको मेरा वह गीत पसंद है ना—
मेरे वतन के लोगो…”
उसे गाते समय नहीं, अब सुनते समय भी गला भर आता है… लेकिन आज आप सबका गला रुंधा हुआ देखकर दिल भर आता है… आप मुझसे इतना प्रेम क्यों करते हैं? मैंने किया ही क्या है? बस गाने ही तो गाए हैं…

अभी-अभी सुनने में आया है कि मोदी साहब मुझे देखने आ रहे हैं… अरे बाप रे, कितना बड़ा आदमी… प्रधानमंत्री हो तो ऐसा… मेरे लिए खास आए हैं, सारे कार्यक्रम रद्द करके… यह तो बहुत ज़्यादा हो गया… आज उन्हें एक बार फिर भरकर, यानी बंद आँखों से देख पाऊँगी…

अब मुझे तिरंगे में लपेट दिया गया है… क्या कहूँ, कैसा लग रहा है?… लगता है जैसे हम पूरे भारत की शान हों… सैन्य वाहन भी कितना सुंदर सजा है… इसी में अब जाना है… सामने मेरी बहुत मुस्कुराती हुई तस्वीर लगी है… सच में विश्वास नहीं होता, मैं ऐसी थी… आज भी बहनों ने साथ नहीं छोड़ा… आशा और उषा दोनों बगल में खड़ी हैं… मैं चुपचाप उन्हें देख रही हूँ… बिल्कुल टूट गई हैं… हमारी गाड़ी मुंबई की सड़कों से धीमी गति से चल रही है… दोनों ओर लोग आँसू भरी आँखों से अंतिम बार देखने खड़े हैं… कितना प्रेम है यह?… इसका ऋण कैसे चुकाऊँ?… मैं बहुत संकोच से भर गई हूँ…

अच्छा, लगता है शिवाजी पार्क ले आए हैं… यानी बाळासाहेब के यहाँ… कुछ रिश्ते ऐसे ही बनते हैं… सैनिक ‘सलामी’ देकर अब ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ में मुझे बड़े सम्मान से कंधों पर उठाकर ले जा रहे हैं… जैसे बचपन में बाबा के कंधों पर बैठकर मेला देखती थी… हाँ, मेला ही… इतनी भीड़… जहाँ देखो लोग ही लोग… और यह क्या? मुझे कंधों से नीचे एक सफ़ेद चबूतरे पर रख दिया… और ये सब लोग कहाँ जा रहे हैं?… लेकिन एक बात सच है—मेरे सफ़ेद रंग के प्रेम को इन्होंने याद रखा… पर अब बहुत अकेलापन लग रहा है… मुझे सबके बीच अकेला छोड़ दिया गया है… आसपास कोई नहीं… दूर कुर्सियों पर बाळ, आशा, उषा, आदिनाथ, भारती भाभी सब दिख रहे हैं… पूरी तरह टूटे हुए… उन्हें कैसे समझाऊँ?… मैं बहुत थक गई हूँ… अब मुझे विश्राम के क्षण” चाहिए…

यह अचानक हलचल कैसी? मोदीजी आए हैं शायद… हाँ… अरे बाप रे, वे मेरे सामने नतमस्तक हो रहे हैं… अभी लग रहा है कि उठकर उन्हें प्रणाम करना चाहिए था… देश के प्रधानमंत्री मेरे सामने झुक रहे हैं… मैं धन्य हो गई… उनकी पीठ देखते हुए दिल से आशीर्वाद दिया—आप ही मेरे भारत देश को प्रगति के पथ पर ले जा सकते हैं… मेरा लाडला सचिन भी दिख रहा है… उसकी आँखें भी नम हैं… मेरा मानसपुत्र… सुखी रहो…

अब मंत्रोच्चार सुनाई दे रहा है… यानी समय आ गया… चंदन की शय्या… माई और बाबा से मिलने को व्याकुल हो गई हूँ… बहुत हल्का लग रहा है… अब लाखों-करोड़ों दिलों में हमेशा के लिए “ज्योति” बनकर रहना है… अपनी ही आवाज़ का जादू उनके दिलों से सुनना है… उनके सुख-दुख में अपने सुरों से साथ देना है… इसी के लिए तो माई-बाबा ने मुझे यहाँ भेजा था ना… बाबा, आप कल्पवृक्ष बनकर मुझे सब कुछ दे गए… अब आपका आदेश नहीं टालूँगी… आ रही हूँ… आ गई… चारों ओर ज्वालाएँ उठ रही हैं… और मुझे आपसे मिलने की तीव्र आस लगी है…

सबको “नमस्कार” और “आशीर्वाद”… जब भी याद करोगे, मैं मौजूद रहूँगी… लेकिन अब जाने दो…
अंतिम प्रणाम तुम्हें 🙏, छोड़कर जा रही हूँ यह गाँव…
घाटी-घाटी से, मावलदेवा, मंदिर छोड़ दौड़ चली…”

(हम सबकी प्यारी लतादीदी का काल्पनिक मनोगत)

 

किस कैरियर में भेजे बच्चें को।

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