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नीच शुक्र सप्तम में मूल फल का अज्ञात रहस्य।

वैदिक ज्योतिष में सप्तम_भाव (कलत्र भाव, साझेदारी, विवाह एवं व्यापार का मुख्य केंद्र) में शुक्र की नीच स्थिति (कन्या राशि में) एक जटिल एवं गहन योग बनाती है। यहाँ हम #सूर्य_सिद्धांत के खगोलीय गणितीय आधार, ग्रहों की दृष्टि-प्रणाली, नीचभंग के सिद्धांतों एवं शास्त्रीय प्रमाणों के साथ चरणबद्ध विश्लेषण प्रस्तुत करेंगे।

सर्वप्रथम, सैद्धांतिक आधार समझें → सूर्य सिद्धांत (आर्यभट्ट_वराहमिहिर_एवं_ब्रह्मगुप्त के ग्रंथों से प्रेरित) में ग्रहों की स्थिति खगोलीय गणना पर आधारित है। शुक्र की कक्षा पृथ्वी से निकटतम आंतरिक ग्रह है, अतः इसकी गति तीव्र (औसत 1.6° प्रतिदिन) होती है, जो वैदिक_गणित में “शीघ्र गति” कहलाती है।

नीच_राशि_कन्या_में_शुक्र की स्थिति तब बनती है जब उसका भौगोलिक निर्देशांक  कन्या संक्रांति के निकट हो। यहाँ शुक्र की ऊर्जा (शक्ति) न्यूनतम होती है, क्योंकि कन्या (बुध की राशि) में शुक्र की सौंदर्य-प्रधान प्रकृति विश्लेषणात्मक एवं आलोचनात्मक हो जाती है।

चरण १: नीच_शुक्र_सप्तम_में मूल फल (बिना भंग के)

सप्तम भाव → विवाह, जीवनसाथी, साझेदारी, व्यापारिक संबंध, यौन सुख।

शुक्र → सौंदर्य, प्रेम, विलास, वैवाहिक सुख, कला, वाहन, आकर्षण का कारक।

नीच होने पर → शुक्र_की_प्राकृतिक शक्ति क्षीण हो जाती है। फलस्वरूप:  जीवनसाथी में आकर्षण की कमी या आलोचनात्मक स्वभाव।  वैवाहिक जीवन में असंतोष, बहस, अलगाव की संभावना।  साझेदारी में धोखा, व्यापार में हानि।  यौन जीवन में असंतुलन या कमी।

खगोलीय_दृष्टि_से  शुक्र की निकटता सूर्य से  यदि हो तो और भी कमजोर। सूर्य सिद्धांत में ग्रहण योग जैसी स्थिति में शुक्र की किरणें पृथ्वी पर कम प्रभावी होती हैं।

 

चरण २: नीचभंग_राजयोग की संभावना (सबसे महत्वपूर्ण)

शास्त्रों (फलदीपिका, बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, जातक पारिजात) में नीच ग्रह राजयोग दे सकता है यदि नीचता भंग हो। शुक्र के लिए मुख्य नीचभंग योग:

नीच_राशि (कन्या) का स्वामी बुध → यदि बुध केंद्र (1,4,7,10) में हो तो नीचभंग।

उच्च राशि (मीन) का स्वामी गुरु → यदि गुरु केंद्र में या सप्तम पर दृष्टि दे तो भंग।

नीच ग्रह की राशि का स्वामी (बुध) उच्च का हो या स्वराशि में।

शुक्र पर गुरु या बुध की दृष्टि।

सूर्य के साथ युति (शुक्रादित्य योग में नीचभंग संभव)।

नवांश में उच्च या स्वराशि।

यदि ये योग बनें तो नीच शुक्र  राजयोग कारक बन जाता है।  प्रारंभ में संघर्ष (नीच फल), बाद में उन्नति (राज फल)। उदाहरण: सप्तम_में_नीच_शुक्र, यदि बुध लग्न या चतुर्थ में हो  विवाह के बाद व्यापार/साझेदारी से अपार लाभ, जीवनसाथी से धन-प्राप्ति।

 

चरण ३: ग्रहों की दृष्टि एवं योग का विश्लेषण

शुक्र_की_पूर्ण_दृष्टि_सप्तम_से  लग्न पर (स्वयं पर)। नीच शुक्र की दृष्टि  लग्न को कमजोर बनाती है (आत्मविश्वास में कमी, आकर्षण में कमी)। अन्य ग्रहों की दृष्टि:

मंगल की 4th/7th/8th दृष्टि → विवाद बढ़ाता।

शनि की 3rd/7th/10th दृष्टि → विलंब या कष्ट।

गुरु की 5th/7th/9th दृष्टि → नीचभंग + शुभ फल (सबसे उत्तम)।

सूर्य की दृष्टि →  यदि निकट, अन्यथा शुक्र को नियंत्रित करता।

ग्रहण योग: यदि शुक्र सूर्य के निकट हो तो “ग्रहण” जैसा प्रभाव, फल में अस्थिरता। नक्षत्र आधार: यदि विशाखा/अनुराधा/ज्येष्ठा में हो तो संघर्ष अधिक।

 

चरण ४: कौन सा ग्रह अच्छा/कमजोर फल देगा

अच्छा फल देने वाले ग्रह: गुरु  नीचभंग का मुख्य कारक, विवाह सुख, धन, संतान देता।  बुध  नीच राशि स्वामी, बुद्धि से लाभ, व्यापार में सफलता। चंद्र  यदि शुक्र पर दृष्टि दे तो भावनात्मक संतुलन।

कमजोर फल देने वाले ग्रह: मंगल विवाद, अलगाव।  शनि  विलंब, कष्ट, वैवाहिक सुख में कमी।  राहु  धोखा, असामान्य संबंध। सूर्य  यदि combustion तो शुक्र को और कमजोर।

 

चरण ५: कुल फल एवं लाभ (संक्षेप में)

बिना नीचभंग  वैवाहिक जीवन में असंतोष, साझेदारी में हानि, जीवनसाथी से तनाव → लाभ न्यून।

नीचभंग होने पर  प्रारंभिक कष्ट के बाद राजयोग  जीवनसाथी सुंदर/धनवान, व्यापार में अपार लाभ, कला/विलास से यश  अत्यधिक लाभ।

इस प्रकार, नीच शुक्र सप्तम में द्वंद्वात्मक फल देता है  संघर्ष से उत्थान। पूर्ण कुंडली विश्लेषण आवश्यक, परंतु सिद्धांततः नीचभंग होने पर यह राजयोग सिद्ध होता है।

जातक को गुरु-बुध की शक्ति बढ़ानी चाहिए → फलोत्तम।

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शुक्रवार को जन्म लेने वाले जातक का फलादेश

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